डबल इंजन सरकार के दावों के बीच सुलगते दो गंभीर सवाल: कहीं नकली दवाइयां तो कहीं अस्पतालों का जहरीला कचरा ले रहा है जनता की सांसें!
देशभर में जीवन रक्षक 53 दवाइयां अमानक, कंपनियों का दावा- 'ये दवाइयां हमारी हैं ही नहीं'; क्या धड़ल्ले से बिक रहा है नकली मौत का सामान?
छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में 5 महीने से डंप है 'बायो-मेडिकल वेस्ट', भुगतान न होने से कचरा उठाने वाली कंपनी ने खड़े किए हाथ; बिलासपुर-सरगुजा संभाग में महामारी का खतरा।
राज्य से लेकर केंद्र तक में बैठी ‘डबल इंजन’ की सरकारें एक तरफ आयुष्मान कार्ड और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभूतपूर्व विस्तार के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, लेकिन धरातल की हकीकत बेहद खौफनाक और चौंकाने वाली है। देश में एक तरफ जहां डॉक्टरों के पर्चे पर लिखी जा रही दवाइयां नकली होने की कगार पर हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के अस्पतालों से निकलने वाला घातक मेडिकल कचरा (Bio-Medical Waste) आम जनता के स्वास्थ्य के लिए 'टाइम बम' बन चुका है। अस्पतालों के भीतर इलाज और अस्पतालों के बाहर फैला जहर अब सीधे तौर पर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है।
पार्ट- 1: मौत का खुला बाजार! अमानक ही नहीं, अब 'नकली' दवाओं का खौफ
हाल ही में केंद्रीय दवा नियामक संस्था की जांच में देशभर की 53 जीवन रक्षक दवाइयां अमानक (घटिया स्तर की) पाई गई थीं। मामला सिर्फ दवाओं के घटिया होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे एक कदम और आगे बढ़कर बेहद डरावना हो चुका है।
कंपनियों का पल्ला झाड़ना: इस जांच के बाद संबंधित दवा निर्माता कंपनियों में से कई ने साफ तौर पर यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि 'ये दवाइयां उनकी कंपनी ने बनाई ही नहीं हैं'।
सवालिया निशान: इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि देश के बाजारों, स्टॉकिस्टों और नामी दवा दुकानों तक सीधे तौर पर 'नकली दवाइयां' सप्लाई की जा रही हैं।
जिम्मेदार कौन?: जब मरीज डॉक्टर की सलाह पर महंगी और जरूरी दवाइयां खरीदता है और वह दवा ही नकली निकले, तो इलाज बेअसर होना लाजमी है। ऐसे में होने वाली मौतों के लिए क्या डॉक्टर जिम्मेदार हैं या वह पूरा सिस्टम, जो नकली दवाओं के इस नेक्सस को रोकने में नाकाम रहा है?
इलेक्टोरल बॉन्ड और घटिया दवाओं का कड़वा सच: इस पूरे मामले के तार चुनावी चंदे (इलेक्टोरल बॉन्ड) से भी जुड़ते दिख रहे हैं। पूर्व में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, चंदा देने वाली कंपनियों में कम से कम 5 ऐसी दवा कंपनियां भी शामिल थीं, जिनकी दवाइयां पहले घटिया पाई गई थीं। राजनीतिक चंदे की आड़ में जनता की सेहत को ताक पर रखने का यह खेल अब जानलेवा साबित हो रहा है।
पार्ट- 2: छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में छुपाया जा रहा है 'जहरीला कचरा'
एक तरफ नकली दवाओं का प्रहार है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ राज्य के भीतर स्वास्थ्य महकमे की एक और बड़ी लापरवाही सामने आई है। प्रदेश के 91 सरकारी व बड़े अस्पताल इस वक्त बायो-मेडिकल वेस्ट (अस्पताल के कचरे) के ढेर पर बैठे हैं।
4 से 5 महीनों से नहीं उठा कचरा: नियमों के मुताबिक अस्पतालों से निकलने वाले बेहद खतरनाक और संक्रमित कचरे को 24 घंटे के भीतर नष्ट करना अनिवार्य होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में पिछले 4-5 महीनों से कचरा उठाया ही नहीं गया है।
अस्पताल प्रबंधन की चालाकी: इस कचरे को सही तरीके से डिस्पोज करने के बजाय, कई जगहों पर अस्पताल प्रबंधन इसे छुपाने की कोशिश कर रहा है, जिससे पर्यावरण और अस्पताल आने वाले मरीजों व तीमारदारों को संक्रमण का भारी खतरा है।
क्यों थमा कचरा उठान?
राज्य सरकार ने अस्पतालों के कचरे को नष्ट करने का ठेका 'इनवायरो केयर इंटरनेशनल' (Enviro Care International) नामक कंपनी को दिया है। इस कंपनी के जिम्वे रेलवे के अस्पतालों का भी काम है। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा इस कंपनी का करीब 41 लाख रुपये का भुगतान अटका कर रखा गया है। बजट न मिलने के कारण कंपनी डीजल का खर्च और अपने कर्मचारियों को वेतन देने में असमर्थ है, जिसके चलते दूरस्थ अंचलों में काम पूरी तरह ठप हो गया है।
ये 5 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित:
इस कचरों के न उठने से बिलासपुर और सरगुजा संभाग का सबसे बुरा हाल है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल हैं: बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, कोरबा और संबंधित संभाग का पांचवा जिला। इन बड़े जिलों के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों-लाखों मरीज आते हैं, जो अनजाने में इस फैलते संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं।
बड़ा सवाल: विकास की इस गति का क्या फायदा?
दावा था कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार (डबल इंजन) होने से विकास के काम बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ेंगे। लेकिन अगर गरीबों को पक्के मकान और पक्की सड़कें मिल भी जाएं, और उनके जीवन की मूल आवश्यकता यानी 'स्वास्थ्य' को ही दांव पर लगा दिया जाए, तो ऐसे विकास के क्या मायने हैं? देश में बिना बीमारी के चलते-फिरते, नाचते-गाते युवाओं की अचानक आ रही मौतें और अस्पतालों का यह कुप्रबंधन चीख-चीख कर व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहा है।
रेलवे अस्पताल भी अछूता नहीं!
हैरान करने वाली बात यह है कि कचरा न उठाए जाने वाले इन 91 प्रभावित अस्पतालों की सूची में केंद्र सरकार के अधीन आने वाला रेलवे का अस्पताल भी शामिल है। यानी बजट और कुप्रबंधन की यह मार सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि सीधे केंद्र सरकार के विभागों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है।
Vidio देखें
https://youtu.be/-qGNTx_J5TQ?si=Kc8pOTKxPlSzj8ks
