मोदी की मुट्ठी में बीजेपी और संघ भी
क्या भारतीय जनता पार्टी पूरी तरीके से बदल गई है क्या भारतीय जनता पार्टी के सामने मोदी के अलावा कोई विकल्प नहीं है या फिर मोदी की मुट्ठी में भारतीय जनता पार्टी चली गई यह सवाल हम इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि जो कुछ इन दिनों चल रहा है वह हैरान करने वाला है ।
जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी मोदी के गिरफ्त में आ गई किस तरीके से सब कुछ बदल गया है और भारतीय जनता पार्टी के सामने अब कोई विकल्प नहीं बचा है कि वह देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार चले और शायद इसकी झलक सबसे पहले तो लोकसभा चुनाव के दौरान जारी संकल्प पत्र में आपको देखने को मिल गया था भारतीय जनतापार्टी ने जो घोषणा पत्र जारी किया था घोषणा पत्र के नाम से उसमें वादों की फेहरिस्त थी लेकिन इस बार ना तो महंगाई को लेकर कोई सवाल है ना कोई बात है और ना ही बेरोजगारी को लेकर कोई बड़ा निर्णय सरकार करते दिखाई दी, दूसरे जो मुद्दे हैं भ्रष्टाचार से लेके सारे मुद्दे गायब हैं किसानों की आय दोगुनी करने का जो वादा 2014 में किया गया था उसका भी पता नहीं यानी बहुत सारे वादे जो 2014 में किए गए थे 10 साल सत्ता में रहने के बाद वे पूरे नहीं हुए लेकिन उनका कहीं कोई जिक्र नहीं यहाँ तक की अग्निवीर का भी कहीं जिक्र नहीं था।76 पेज की मोदी की इस गारंटी में 53 पेज में मोदी की तस्वीर और इसके अलावा कहीं कोई किसी की हैसियत नहीं है कहा जाए तो गलत नहीं होगाएक पेज में साइड में कहीं दिखते गृह मंत्री अमित शाह दिखाई दे रहे थे तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कहीं एक पेज में दिखा दे रहे थे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का अध्यक्ष भाषण केअलावा कहीं जिक्र नहीं है लेकिन 2014 में चार बड़े नेताओं की तस्वीर थी और दूसरे पेज में ये तस्वीर थी भाजपा या आरएसएस के प्रमुख संस्थापक जनसंघ के नेताओं श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल लेकिन 2019 आते आते यह इसमें कुछ और बदलाव किया गया सारे नेताओं को गायब कर दिया गया था और श्यामा प्रसाद मुखर्जी दीनदयाल उपाध्याय के साथ अटल बिहारी वाजपेई की तस्वीर को जोड़ते हुए सबसे आखिरी पन्ने पर स्थान दिया था लेकिन २०२४ आते आते सब कुछ बदल गया तो क्या भारतीय जनता पार्टी हर तरह से बदल चुकी है कांग्रेस की तुलना ना करें क्योंकि आज विश्वास की बात है लेकिन क्या देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो छवि बिगड़ चुकी है इलेक्ट्रॉल बंड और हिडन बर्ग की रिपोर्ट के बाद उस छवि पर भाजपा को इतना भरोसा था या फिर यह मोदी की धमक है जिसके आगे पूरी पार्टी घुटने टेक द सवाल आप कई उठा सकते हैं लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी का अंदरूनी मामला है उन्हेंशायद अब भी उस छवि पर भरोसा था चुनाव जीतने का जिस छवि को लेकर आरएसएस ने भी सवाल उठाए थे अपने मुखपत्र ऑर्गेनाइजर और क्या भारतीय जनता पार्टी झूठ की राह पर चल पड़ी है इस सवाल का जवाब बेहद ही मुश्किलहै क्योंकि झूठ और अपवाह की राजनीति के आसरे नफरत फैलाने का खेल का आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगते रही है ऐसे में यदि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बात बात पर झूठ बोलते हैं झूठों की फेहरिस्त है और उसकी गारंटी के साथ भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ गई जिसका ख़ामियाज़ा २४० सीट के रूप में सामने आया
लेकिन शायद पार्टी के नेता इससे सबक लेने को तैया नहीं हैं।
भारतीय जनता पार्टी में ना तो वह राजनैतिक सचिता की बात की जा सकती है और ना ही भय भूख और भ्रष्टाचार जैसे नारों का ही कहीं पार्टी विद डिफरेंस भी कहीं दिखाई नहीं देता तब ऐसी परिस्थिति में अब जब एपिस्टन फ़ाइल और अमेरिका ट्रेड डील के मामले गर्म है, ईरान से दूरी का मामला पेचीदा हो रहा है तब भी भरोसा ?
तब क्या बीजेपी भी यह मान चुकी है कि चुनाव के लिए वोट चोरी और चुनावी सेटिंग के आसरे सत्ता क़ायम रहेगी इसलिए वे खामोश हैं या सच में गुजराती लॉबी ने पार्टी को अपनी मुट्ठी में रख लिया है
तब संघ भी क्या उनकी मुट्ठी में चला गया है
लग तो यही रहा है और यही वजह है कि अब मोहन भागवत की भूमिका पर सवाल उठ रहे है
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