सोमवार, 15 जून 2026

छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

 छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

एजुकेशन  और स्वास्थ्य विभाग में मलाईदार कुर्सियों का अजब जुगाड़; संघ की कथित सिफारिश और करोड़ों के लेन-देन का सनसनीखेज घालमेल



छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक ऐसा प्रशासनिक खेल चल रहा है जिसे सुनकर सुशासन के दावों की हवा निकल जाती है। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री मंच से गरजते हुए भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' और मलाईदार पदों पर सालों से जमे अधिकारियों-कर्मचारियों का अटैचमेंट तत्काल समाप्त करने की मुनादी करते हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य की बेलगाम अफसरशाही और शातिर दिमाग अधिकारी न तो मुख्यमंत्री के आदेशों की परवाह कर रहे हैं और न ही हाईकोर्ट की सख्त फटकार की। ट्रांसफर की आड़ में 'अटैचमेंट' और फिर 'डी-अटैचमेंट' का एक ऐसा समानांतर और गैरकानूनी सिंडिकेट खड़ा हो चुका है, जिसने राज्य की बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर दिया है।

पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले इस खेल की परतें जब खुलती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि सरकार चाहे जिसकी भी हो, सिस्टम को हांकने वाले चेहरे अपने ऐश-ओ-आराम के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं कि 'अटैचमेंट बंद करो और मूल विभाग में जाओ', लेकिन शातिर अधिकारियों के पास हर आदेश का कानूनी और गैर-कानूनी तोड़ पहले से तैयार रहता है। करोड़ों रुपये के लेन-देन और कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कुछ रसूखदार चेहरों की सिफारिशों के दम पर चल रहे इस खेल ने पूरी प्रशासनिक साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।

### **मंत्रालय (महानदी भवन) का अजूबा खेल: 10-10 साल से जमे हैं 'साहब'**

इस पूरे खेल का सबसे बड़ा अड्डा राज्य का दिल कहे जाने वाला मंत्रालय यानी 'महानदी भवन' बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, अकेले मंत्रालय में 200 से अधिक कर्मचारी और अधिकारी अटैचमेंट के सहारे कुंडली मारकर बैठे हैं। नियमतः इन्हें फील्ड पर होना चाहिए था, जहां इन्हें धूप, बरसात और ठंड में जनता के बीच काम करना था। लेकिन फील्ड की मुश्किलों से बचने और राजधानी की सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के लिए भारी-भरकम लेन-देन और राजनीतिक आकाओं की पैरवी का इस्तेमाल किया जाता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले 10-10 साल से एक ही जगह जमे हुए हैं। मंत्रालय कर्मचारी संघ ने इस विसंगति को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) से कई बार लिखित शिकायतें की हैं। हर बार सिर्फ खोखले आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर फाइलें दबा दी जाती हैं। वजह साफ है—इस सिंडिकेट में ऊपर से लेकर नीचे तक पैसों की मलाई बंटती है और 'भाई साहबों' की सिफारिश के आगे नियम-कायदे घुटने टेक देते हैं।

> ### **केस स्टडी: अंबिकापुर का 'जादुई' डी-अटैचमेंट फॉर्मूला**

> जब विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग के अटैचमेंट का मुद्दा गूंजा, तो स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की कि सभी अटैचमेंट तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जा रहे हैं। जिला प्रमुखों को पत्र जारी हुए। अंबिकापुर में चौतरफा दबाव के बाद जिला अधिकारी ने 16 कर्मचारियों का अटैचमेंट समाप्त कर उन्हें मूल स्थापना में भेजने का आदेश निकाला। लेकिन यह सिर्फ आंखों में धूल झोंकने का नाटक था। जैसे ही मामला शांत हुआ, अधिकारियों ने एक नया 'जादुई' आदेश जारी कर दिया। बहाना बनाया गया कि *"कर्मचारियों के जाने से विभाग का काम प्रभावित हो रहा है, अतः इन्हें वापस डी-अटैच (उसी मलाईदार पद पर अटैच) किया जाता है।"* यह फॉर्मूला अब पूरे प्रदेश के विभागों में धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है।


### **शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग पर वज्रपात: नौनिहालों का भविष्य अंधकार में**

इस अटैचमेंट और डी-अटैचमेंट के खेल की सबसे भारी कीमत सूबे के गरीब बच्चे और मरीज चुका रहे हैं। शिक्षा विभाग का हाल यह है कि बड़े पैमाने पर प्राचार्य, व्याख्याता और शिक्षक गांवों के स्कूलों को छोड़कर शहरों के दफ्तरों या मलाईदार अटैचमेंट सीटों पर बैठे हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ठप है। कहीं पांच क्लास के बच्चों को अकेला एक शिक्षक संभाल रहा है, तो कहीं स्कूलों के कमरों में ताले लटक रहे हैं। सरकार एक तरफ सरकारी स्कूलों में फीस लेने जैसे नए-नए आदेश निकाल रही है, जिससे विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका मिल रहा है कि सरकार सरकारी शिक्षा तंत्र को ही बंद करना चाहती है।

यही भयावह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की भी है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ अटैचमेंट के जरिए जिला मुख्यालयों या राजधानी के एअर-कंडीशंड कमरों में आराम फरमा रहे हैं। सुदूर अंचलों में गरीब मरीज स्ट्रेचर पर दम तोड़ रहे हैं, प्रसव के लिए महिलाएं तड़प रही हैं, लेकिन उनके हक के डॉक्टर और कर्मचारी प्रशासनिक जादूगरी के दम पर ऊंची कुर्सियों का सुख ले रहे हैं।

| विभाग | कागजी दावा / सीएम का आदेश | ग्राउंड रियलिटी (अटैचमेंट का सच) |

*मंत्रालय (जीएडी)** | सभी कर्मचारी फील्ड पर जाएं, अटैचमेंट पूरी तरह खत्म। | 200 से अधिक रसूखदार कर्मचारी 10 साल से पैरवी के दम पर जमे हैं। |

| **शिक्षा विभाग** | शिक्षकों की कमी दूर होगी, कोई अटैचमेंट नहीं रहेगा। | प्राचार्य और व्याख्याता दफ्तरों में बाबू बने हैं, स्कूलों में ताले लटक रहे हैं। |

| **स्वास्थ्य विभाग** | विधानसभा में घोषणा—सभी स्वास्थ्यकर्मी मूल पोस्टिंग पर भेजे गए। | अंबिकापुर जैसी 'डी-अटैचमेंट' की चालबाजी से सभी वापस एसी कमरों में लौटे। |

### **हाईकोर्ट की फटकार भी बेअसर: क्या यह सीधे तौर पर अवमानना नहीं?**

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिलासपुर हाईकोर्ट इस अटैचमेंट प्रथा को लेकर बेहद सख्त रुख अपना चुका है। माननीय न्यायालय ने कई मामलों की सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कहा है कि ट्रांसफर या पोस्टिंग की आड़ में किसी को मनमर्जी से अटैच करना कानूनी अधिकार नहीं है, यह पूरी तरह गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने अफसरशाही के कई ऐसे मनमाने आदेशों को निरस्त भी किया है। जब-जब कोर्ट का डंडा चलता है, जनता तालियां बजाती है कि अब व्यवस्था सुधरेगी। लेकिन राज्य की बेलगाम हो चुकी अफसरशाही को न तो कोर्ट की अवमानना का डर है और ना ही मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस खेल के पीछे एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। तबादला उद्योग पर कागजी रोक लगने के बाद 'अटैचमेंट' को ही कमाई का नया जरिया बना लिया गया है। मनशाई जगह पर टिके रहने के लिए लाखों रुपये का एडवांस और हर महीने का फिक्स कमीशन इस सिंडिकेट के शीर्ष तक पहुंचता है। जब कोई ईमानदार मंत्री या अधिकारी इस पर रोक लगाने की कोशिश करता है, तो संघ (आरएसएस) के बड़े पदाधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर 'ऊपर' से दबाव डलवा दिया जाता है।

> ### **सत्ता के गलियारों से सीधे सवाल...**

>  1. जब मुख्यमंत्री स्वयं मंच से 'जीरो टॉलरेंस' की घोषणा करते हैं, तो उनके मातहत अधिकारी उनके ही आदेशों का मजाक उड़ाने की हिम्मत कैसे कर पाते हैं?

>  2. क्या स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को यह पता है कि उनके द्वारा विधानसभा में दी गई क्लीन चिट को जमीनी अफसरों ने 'डी-अटैचमेंट' के जरिए रद्दी की टोकरी में डाल दिया है?

>  3. बिलासपुर हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जो अफसर 'अटैचमेंट' का खेल खेल रहे हैं, उन पर सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

>  4. क्या 'डबल इंजन' की सरकार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसी संस्था के रसूख का इस्तेमाल भ्रष्ट और कामचोर कर्मचारियों को संरक्षण देने के लिए किया जा रहा है?

निष्कर्ष: कथनी और करनी के बीच सुलगते सवाल**

छत्तीसगढ़ की जनता ने जिस सुशासन और बदलाव के भरोसे पर नई सरकार को चुना था, उसे ये शातिर अधिकारी अपनी चालाकी से मटियामेट करने में तुले हुए हैं। अगर करोड़ों रुपये के लेन-देन के इस 'अटैचमेंट उद्योग' को तुरंत ध्वस्त नहीं किया गया, तो मुख्यमंत्री के 'जीरो टॉलरेंस' के वादे का हश्र भी पिछली सरकारों जैसा ही होगा। अब गेंद पूरी तरह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पाले में है। क्या वे इन बेलगाम अफसरों पर नकेल कसकर अपनी प्रशासनिक धमक दिखाएंगे, या फिर छत्तीसगढ़ की जनता इसी तरह सिस्टम के इस क्रूर तमाशे को देखने के लिए मजबूर रहेगी? जनता जवाब का इंतजार कर रही है।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/5as2DabotK4?si=ffaUdOWOzEuC6zWH


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें