बस्तर में 'विकास' की नई क्रोनोलॉजी
जल, जंगल, जमीन पर 'बाहरी' पहरा या छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान से समझौता?
क्या छत्तीसगढ़ के अमूल्य संसाधनों का सौदा हो चुका है? एक तरफ बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त कर आदिवासियों तक 'सेवा डेरा' पहुँचाने का सरकारी दावा, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से राज्य के खनिज, जमीन और उद्योगों को गुजरात की बड़ी कॉरपोरेट लॉबी के हवाले करने की सुगबुगाहट। क्या यह महज एक संयोग है या एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी? पढ़िए, डबल इंजन सरकार के इस नए इंडस्ट्रियल पुश का पूरा कच्चा-चिट्ठा।
>
### **1. बस्तर का नया चेहरा: सुरक्षा कैंप से 'सेवा डेरा' का सफर**
राजनीति का एक स्थापित नियम है—कोई भी दौरा बेमकसद नहीं होता, हर कदम के पीछे एक बड़ी डील और एक गहरी क्रोनोलॉजी होती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बस्तर दौरा भी इसी का एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है।
सरकार का दावा है कि बस्तर अब नक्सलवाद के खात्मे की कगार पर है और अगले पांच वर्षों में यहाँ के लोगों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी। इस दावे को जमीन पर उतारने के लिए **'बस्तर विकास मॉडल 2.0'** के तहत एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई है। केरल जितने बड़े भूभाग में फैले बस्तर के सात जिलों को सुरक्षा देने के लिए स्थापित किए गए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 कैंपों को **"वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा"** में तब्दील किया जा रहा है।
इन सेवा डेरों की संकल्पना यह है कि सरकार खुद आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेगी। एक ही छत के नीचे बैंकिंग, आधार कार्ड, राशन और डिजिटल सेवाओं समेत केंद्र व राज्य सरकार की 371 योजनाओं का लाभ सीधे स्थानीय जनता को मिलेगा। पहली नजर में यह बस्तर के कायाकल्प की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर पेश करता है, लेकिन इस चमकते विकास मॉडल के पीछे एक दूसरी कहानी भी आकार ले रही है।
### **2. वायरल लिस्ट का सच: छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर किसका पहरा?**
जैसे ही बस्तर में विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे, ठीक उसी वक्त छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक सूची (लिस्ट) वायरल हो गई। यह सूची चीख-चीख कर सवाल पूछ रही है कि आखिर छत्तीसगढ़ के सारे बड़े ठेके, जमीनें और उद्योग एक विशेष राज्य की लॉबी की झोली में ही क्यों जा रहे हैं?
रायपुर से लेकर बस्तर तक, और सरगुजा से लेकर रायगढ़-राजनांदगांव तक, कॉरपोरेट दिग्गजों ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं है कि यह सूची गृह मंत्री के दौरे से सीधे जुड़ी है, लेकिन उद्योग जगत में मची यह हलचल इस प्रकार है:
* **अडानी पावर और अडानी एंटरप्राइजेस (अहमदाबाद):** ऊर्जा और केमिकल क्षेत्र के भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स के लिए इन्हें हरी झंडी मिलने की खबरें हैं, और ये सरगुजा संभाग में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश में हैं।
* **आरसेलर मित्तल निपॉन प्राइवेट लिमिटेड (सूरत):** बस्तर के खनिज-समृद्ध क्षेत्र में विशाल उद्योग स्थापित करने की तैयारी में है।
* **सफायर सेमीकॉम प्राइवेट लिमिटेड:** अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर क्षेत्र की यह कंपनी राजधानी रायपुर के रणनीतिक इलाकों में स्थापित होने जा रही है।
* **टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंस (अहमदाबाद):** दवा निर्माण क्षेत्र की इन बड़ी कंपनियों को छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों से सटी बेशकीमती जमीनें आवंटित की जा रही हैं।
* **ओक्स श्री इंसाल (राजकोट):** केंद्र सरकार के विजन के अनुरूप ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की जमीन का उपयोग करने की तैयारी में है।
* **अंबुजा सीमेंट:** प्रचुर चूना पत्थर (लाइमस्टोन) वाले क्षेत्रों में अपना साम्राज्य बढ़ा रही है, जो पहले ही सीमेंट की कीमतों और कथित अवैध वसूलियों को लेकर विवादों में रही है।
### **3. रोजगार का छलावा: 'लोकल' को चपरासी की नौकरी भी नहीं?**
सरकार इन बड़े उद्योगों के निवेश को 'रोजगार के सुनहरे अवसर' के रूप में पेश कर रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ का कड़वा इतिहास कुछ और ही बयां करता है। स्थानीय युवाओं को स्किल डेवलपमेंट के नाम पर अक्सर चपरासी या सुरक्षा गार्ड जैसी बेहद मामूली नौकरियां देकर टरका दिया जाता है, और कभी-कभी तो वह भी नसीब नहीं होती।
हाल के दिनों में प्रदेश में हुई बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं ने एक भयावह सच को उजागर किया है। हादसों में जान गंवाने वाले मजदूरों की सूची में अधिकांश नाम दूसरे राज्यों के श्रमिकों के थे। उद्योगों के भीतर यह अंदरूनी नीति साफ दिखती है कि स्थानीय युवाओं को काम पर रखने से बचा जाए, क्योंकि स्थानीय लोगों के शामिल होने से भूमि, पर्यावरण और मजदूरी को लेकर आंदोलन का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सवाल उठता है: **यदि छत्तीसगढ़ के युवाओं को जल, जंगल और जमीन खोने के बाद मजदूर बनने का भी हक नहीं मिलेगा, तो यह विकास किसके लिए है?**
### **4. फर्जी जनसुनवाई और 'उलगुलान' की गूंज**
सत्ता की ताकत के दम पर छत्तीसगढ़ के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में उद्योगों को स्थापित करने के लिए 'फर्जी जनसुनवाई' के गंभीर आरोप लग रहे हैं। खबरों के मुताबिक, कई जगहों पर तो मृत व्यक्तियों के अंगूठे के निशान लगाकर कॉरपोरेट घरानों को जमीनें सौंपने का खेल खेला गया है।
इस शोषण और दमन के खिलाफ अब छत्तीसगढ़ का आदिवासी और स्थानीय समाज चुप बैठने को तैयार नहीं है। बस्तर और सरगुजा से लेकर छुईखदान के मैदानी इलाकों तक जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई है। जंगलों के भीतर **'उलगुलान'** (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं।
### **5. सुलगते राजनीतिक सवाल: क्या बदल जाएगा छत्तीसगढ़ का नक्शा?**
इस वायरल सूची और ताबड़तोड़ फैसलों ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। क्षेत्रीय राजनीतिक दल और संगठन जैसे **छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ समाज पार्टी और जय जोहार पार्टी** ने सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। उनका सीधा आरोप है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केंद्रीय दबाव में आकर छत्तीसगढ़ को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों 'गिरवी' रख रही है।
**निष्कर्ष:
क्या 'डबल इंजन' की यह रफ्तार छत्तीसगढ़िया अस्मिता और पर्यावरण को कुचल कर आगे बढ़ेगी? क्या करोड़ों-अरबों के इस निवेश से स्थानीय युवाओं का भविष्य सचमुच सुधरेगा, या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ अपने बहुमूल्य संसाधनों को लुटते हुए देखना रह जाएगी? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की जनता को खुद तय करना होगा, क्योंकि इस बार लड़ाई सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान की है।
वीडियो देखें
https://youtu.be/tKxuX5pVeEs?si=XwNdU1Vy2YXAhOYV
