आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अस्मिता और हक की लड़ाई: सहकारी समितियों में 'पसंदीदा' चेहरों को बिठाने पर गहराया विवाद
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में आदिम जाति सेवा सहकारी समितियों (LAMPS) के भीतर चल रही प्रशासनिक और राजनैतिक नियुक्तियों को लेकर विवाद गहरा गया है। आदिवासी समाज ने इसे अपने अधिकारों पर 'अघोषित डाका' करार देते हुए सड़क पर उतरने की चेतावनी दी है। ताजा मामला कोरिया (बैकुंठपुर) और बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से सामने आया है, जहां इन समितियों के शीर्ष पदों पर गैर-आदिवासी (ओबीसी व अन्य) वर्गों के लोगों को पिछले दरवाजे से बिठाने का आरोप लग रहा है।
पांचवीं अनुसूची केवल कागजों तक सीमित का आरोप:
आदिवासी नेताओं और जागरूक नागरिकों का कहना है कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री और आदिवासी वन व कृषि मंत्रियों के होने के बावजूद जमीनी स्तर पर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की उपेक्षा की जा रही है। आदिवासी नेता रमेश टेकान और विष्णु परस्ते के अनुसार, इन क्षेत्रों में 'पांचवीं अनुसूची' लागू होने के दावों के विपरीत, सहकारी समितियों की कमान सामान्य व अन्य पिछड़ वर्ग के राजनैतिक चेहरों को सौंप दी गई है। इसके खिलाफ कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया है, लेकिन धरातल पर नियमों की धज्जियां लगातार उड़ाई जा रही हैं।
बिचौलियों का बढ़ा प्रभाव, किसान परेशान:
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जिन समितियों का गठन आदिवासियों के आर्थिक उत्थान, खाद-बीज और ऋण की सुगम उपलब्धता के लिए किया गया था, वहां अब राजनैतिक बंदरबांट चल रही है। गैर-आदिवासी नेतृत्व होने के कारण स्थानीय आदिवासी किसानों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे उनका आर्थिक शोषण बढ़ गया है।
राजस्थान की तर्ज पर बड़े आंदोलन की चेतावनी:
आदिवासी समाज ने हाल ही में कोरिया में एक बड़ा प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि इन नियुक्तियों में सुधार कर केवल आदिवासी चेहरों को जिम्मेदारी नहीं दी गई, तो यह असंतोष एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा। उन्होंने राजस्थान के बाड़मेर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी ऐसे ही एक फैसले के खिलाफ आदिवासियों ने मोर्चा खोला था, जिसके बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े थे। छत्तीसगढ़ में भी वैसी ही स्थिति निर्मित होने की संभावना जताई जा रही है।

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