विकास की वेदी पर 'नरबलि': छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र क्यों बन रहे हैं 'डेथ जोन'?
मुनाफे की अंधी दौड़, लचर सिस्टम और कॉरपोरेट की लापरवाही के बीच घुटती मजदूरों की सांसें। क्या चंद रुपयों का मुआवजा ही है गरीब के खून की कीमत?
मौत का खूनी आंकड़ा
छत्तीसगढ़, जिसे हम देश के विकास के पावरहाउस के रूप में देखते हैं, आज वहां के कारखानों से उठती चिमनियों का धुआं सिर्फ उद्योगों की तरक्की नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों की अर्थियों का मंजर भी बयां कर रहा है । हाल ही में सक्ती जिले के डबरा थाना क्षेत्र के सिंघी तराई में स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुआ भीषण बॉयलर ब्लास्ट इस बात का ताजा और खौफनाक सबूत है । इस हादसे में चार दर्जन से अधिक लोग इसकी चपेट में आ गए।
लेकिन यह कोई इकलौता हादसा नहीं है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले दो सालों (2024 से 2026 तक) में राज्य के उद्योगों में मरने वाले मजदूरों की संख्या 300 के पार पहुंच चुकी है 。 सवाल यह उठता है कि यह महज औद्योगिक दुर्घटनाएं हैं या फिर सिस्टम और कॉरपोरेट के गठजोड़ द्वारा किया जा रहा सीधा-सीधा 'कत्ल'?
'डेथ जोन' में तब्दील होते चार प्रमुख जिले
छत्तीसगढ़ का औद्योगिक मॉडल आज एक डरावने रूप में सामने आ रहा है । राज्य के चार प्रमुख जिले—रायपुर, रायगढ़, दुर्ग और सक्ती—मजदूरों के लिए 'डेथ जोन' बन चुके हैं ।
खुद सरकारी आंकड़े (विधानसभा के बजट सत्र की रिपोर्ट के अनुसार) यह स्वीकार करते हैं कि राज्य में कुल 7,324 फैक्ट्रियां हैं ।
इनमें से 948 फैक्ट्रियों को सरकार खुद बेहद खतरनाक मानती है 。
इन खतरनाक फैक्ट्रियों में से भी 32 उद्योग ऐसे हैं जो 'अति-संवेदनशील और खतरनाक' श्रेणी में आते हैं ।
इसके बावजूद, इन फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया गया है। ना तो मजदूरों को मानक सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं और ना ही उनके पास सिर छिपाने के लिए सही हेलमेट होते हैं ।
हादसे के बाद 'मैनेजमेंट' का खूनी खेल
जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, जैसे कुछ समय पहले रायगढ़ के 'रियल स्पार्क एंड पावर' में छह लोगों की मौत हुई या बेनला ब्लॉक की 'स्पेशल ब्लास्ट फैक्ट्री' में धमाका हुआ, तो उसके बाद एक तयशुदा स्क्रिप्ट पर काम शुरू होता है 。
1. एफआईआर में झोल: स्थानीय प्रशासन और कॉरपोरेट के बीच ऐसा गठजोड़ होता है कि एफआईआर की धाराएं बेहद कमजोर और मामूली लापरवाही की लगाई जाती हैं ।
2. नेताओं और रसूखदारों का कवच: कई बार मिल मालिकों को राजनीतिक रसूख या बड़े नेताओं के रिश्तेदार होने का फायदा मिलता है, जिससे वे आसानी से बच निकलते हैं ।
3. बलि का बकरा: किसी भी बड़े उद्योगपति, मालिक या मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) को कभी जेल जाते नहीं देखा जाता । गिरफ्तारी के नाम पर केवल छोटे प्लांट मैनेजरों या सेफ्टी अफसरों को आगे कर दिया जाता है, जिन्हें तुरंत जमानत मिल जाती है ।
मुआवजा: खून की कीमत या पल्ला झाड़ने का जरिया?
हादसे के तुरंत बाद सरकार और कंपनियां मुआवजे का ऐलान कर देती हैं—मृतकों को 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपये । पिछले दो सालों में करीब 17 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा बांटा जा चुका है ।
परंतु क्या किसी गरीब के घर का चिराग बुझने की कीमत महज कुछ लाख रुपये है? श्रमिक संगठनों और ग्रामीणों का अब एक ही साफ और कड़ा रुख है: "हमें मुआवजे की भीख नहीं, बल्कि काम के दौरान सुरक्षा की गारंटी चाहिए।"
यदि सरकार दिखावे के लिए किसी फैक्ट्री को सील भी करती है, तो जन आक्रोश ठंडा होते ही दो-चार महीने में उसे चुपके से दोबारा चालू करवा दिया जाता है ।
बड़ा सवाल: गैर-इरादतन हत्या का मामला क्यों नहीं?
श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन होने के बावजूद इन औद्योगिक घरानों पर 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide) का मामला दर्ज क्यों नहीं किया जाता? सच तो यह है कि जब 'पैसा बोलता है, तब सत्ता खामोश हो जाती है' । हर तीन महीने में छत्तीसगढ़ के किसी न किसी कोने से मजदूरों के चीखने और अपंग होने की खबरें आती हैं 。
निष्कर्ष और मांग
छत्तीसगढ़ में औद्योगिक प्रगति की जो इमारत खड़ी की जा रही है, उसकी बुनियाद में मजदूरों का खून लगा है । अब समय आ गया है कि सरकार खोखले दावों से ऊपर उठकर इन 948 खतरनाक फैक्ट्रियों की सुरक्षा ऑडिट कराए । विपक्ष और मजदूर यूनियनों की मांग भी जायज है कि गंभीर घायलों को कम से कम 50 लाख और मृतकों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा मिले और दोषियों को सीधे जेल भेजा जाए ।
जब तक कॉरपोरेट जवाबदेही तय नहीं होगी और मुनाफाखोरी से ऊपर इंसानी जान को अहमियत नहीं दी जाएगी, तब तक छत्तीसगढ़ के ये 'डेथ जोन' इसी तरह बेकसूरों की बलि लेते रहेंगे ।
