शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी

 राष्ट्रवाद के मुखौटे में ज़मीन का खेल? एक छत्तीसगढ़िया डॉक्टर की बेबसी की कहानी


सत्ता
का दम और बेदम होता कानून: जब अपनी ही ज़मीन के लिए 'अपराधी' बन गया एक नागरिक

 स्वदेशी का नारा, ज़मीन पर कब्ज़ा और बेबस प्रशासन: रायपुर से ग्राउंड रिपोर्ट


क्या सत्ता और रसूख का नशा इस कदर हावी हो सकता है कि कानून की धज्जियां उड़ाते हुए किसी आम नागरिक की पुश्तैनी ज़मीन पर ही कब्ज़ा कर लिया जाए? क्या धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले संगठन धरातल पर सादगी का चोला उतारकर भू-माफिया जैसा बर्ताव करने लगे हैं? ये सवाल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के न्यू शांति नगर से उठ रहे हैं, जहाँ एक पढ़ा-लिखा छत्तीसगढ़िया युवक अपनी ही खरीदी हुई ज़मीन पर एक ईंट रखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

मुख्य मामला: पुश्तैनी ज़मीन और 'स्वदेशी' की नज़र

मामला जांजगीर-चांपा के निवासी डॉ. अजय देवांगन का है। [02:52] उनके पिता ने साल 1995 (सन सतानवे) में रायपुर के न्यू शांति नगर में एक डाइवर्टेड (विपत्तित) प्लॉट खरीदा था। [02:59] पिता का ट्रांसफर होने के कारण वे उस समय वहां निर्माण नहीं करा सके। लेकिन जब यह ज़मीन डॉ. अजय देवांगन के संरक्षण में आई, तो उन्होंने पिछले तीन साल में करीब 5 से 6 बार अपनी ज़मीन की बाउंड्री वॉल कराने का प्रयास किया। [03:10]

विडंबना देखिए, डॉ. देवांगन की इस ज़मीन के ठीक बगल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अनुसांगिक संगठन 'स्वदेशी जागरण मंच' का कार्यालय 'स्वदेशी भवन' स्थित है। [03:28] डॉ. देवांगन का आरोप है कि जब भी वे अपनी ज़मीन पर काम शुरू कराने आते हैं, स्वदेशी भवन के कर्मचारी शुभ्रराज चाकी और अन्य लोग कभी पुलिस भेजकर, तो कभी धमकियां देकर काम रुकवा देते हैं। [03:37]

आरोप: 'ओने-पौने दाम में बेचो, नहीं तो...'

डॉ. देवांगन का कहना है कि उनकी मूल ज़मीन में से लगभग 800 स्क्वायर फीट का हिस्सा कम हो चुका है, जिसे कथित तौर पर बगल के निर्माण द्वारा दबा लिया गया है। [05:07] इतना ही नहीं, पीड़ित का आरोप है कि उन्हें अलग-अलग नंबरों से फोन पर धमकियां दी जा रही हैं कि 'इस ज़मीन पर मत घुसना, यह हमारी है।' [04:27] डॉक्टर ने बातचीत में खुलासा किया कि उन्हें यह तक कहा गया—"ज़मीन हमारे कब्ज़े में है, तुम्हें इसे ओने-पौने (चना-मुर्मुरा) के भाव में हमें ही बेचना पड़ेगा।" [06:24]

मददगार की भूमिका में छत्तीसगढ़ क्रांति सेना

जब शासन-प्रशासन से हताश होकर पीड़ित डॉक्टर ने 'छत्तीसगढ़ क्रांति सेना' से संपर्क किया, तब जाकर इस मामले में स्थानीय स्तर पर हलचल मची। [07:29] क्रांति सेना के हस्तक्षेप के बाद पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर बाउंड्री करा पाए और वहां ताला लगवाया गया। [08:46] क्रांति सेना के पदाधिकारियों का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में बाहर से आने वाले कुछ लोग रसूख और संगठनों का नाम लेकर स्थानीय छत्तीसगढ़िया लोगों की ज़मीनों को निशाना बना रहे हैं। [09:25]

प्रशासनिक रवैये पर सुलगते सवाल

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू प्रशासनिक रवैया है। आरोप है कि छुट्टी के दिन (ईद/बकरीद जैसी राजपत्रित छुट्टी) भी तहसीलदार और पुलिस अमला स्वदेशी भवन के इशारे पर मौके पर पहुंच जाता है। [08:53] जब पीड़ित अपनी ही ज़मीन पर अवैध ढांचा हटवाने के लिए जेसीबी (JCB) चलाता है, तो रसूखदारों के दबाव में उस पर 'ध्वनि प्रदूषण' का मामला दर्ज कर उसे थाने में दो-दो घंटे बैठाया जाता है। [03:51], [05:38]

यह स्थिति रायपुर में 'पुलिस कमिश्नर प्रणाली' लागू होने के बाद की है। [02:35] ऐसे में पत्रिका के माध्यम से यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या कमिश्नरेट प्रणाली आम जनता की सुरक्षा के लिए है या फिर रसूखदारों के अवैधानिक कामों को संरक्षण देने के लिए? [10:12]

निष्कर्ष (Conclusion):

कल तक जो संगठन विपक्ष में रहते हुए सादगी, स्वदेशी और संस्कारों की दुहाई देते थे, सत्ता के नजदीक आते ही उनके इस रूप को देखकर आम जनता हैरान है। एक तरफ जहां भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक डॉक्टर अपनी वैध ज़मीन के कागज़ात जेब में लेकर इंसाफ की भीख मांग रहा है। यह कहानी सिर्फ एक ज़मीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि रसूख बनाम न्याय की उस जंग की है जिसमें कानून और निष्पक्षता दांव पर लगी है।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/ovGJnVXqN_0?si=DDtlMdu6SA3-tE3x