सोमवार, 22 जून 2026

मलाईदार पदों पर 'दागी' मेहरबान, दांव पर नौनिहालों का भविष्य!

 मलाईदार पदों पर 'दागी' मेहरबान, दांव पर नौनिहालों का भविष्य!


 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में ४० से अधिक विवादित अफसरों को सत्ता का 'कवच', करोड़ों का बजट और जांच ठंडे बस्ते में।


छत्तीसगढ़ की सत्ता में "हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे" के बुलंद नारों के साथ आई डबल इंजन सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। राज्य का सबसे संवेदनशील विभाग—शिक्षा विभाग—जिसके कंधों पर छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी है, वह खुद भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और संगीन आरोपों से घिरे अफसरों के सिंडिकेट से कराह रहा है। विभाग में ४० से अधिक ऐसे शीर्ष और मलाईदार पदों पर बैठे अधिकारी सक्रिय हैं, जो किसी न किसी बड़े घोटाले या विभागीय जांच के दायरे में हैं। लेकिन कार्रवाई के बजाय इन्हें सत्ता का वरदहस्त और मलाईदार पोस्टिंग का तोहफा मिल रहा है।

युक्तीकरण का खेल और सुलगते सवाल

छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग पर सवालिया निशान उसी दिन गहरे हो गए थे, जब हजारों सरकारी स्कूलों को 'युक्तीकरण' (मर्जिंग) के नाम पर बंद या स्थानांतरित करने की कवायद शुरू हुई। गरियाबंद में वर्ष १९६५ से संचालित एक ऐतिहासिक गर्ल्स स्कूल (कन्याशाला) को जब दूसरे स्कूल में मर्ज करने का फैसला हुआ, तो छात्राओं और पालकों को सड़कों पर उतरना पड़ा। छात्राओं की सुरक्षा, बुनियादी सुविधाओं की कमी और लचर परीक्षा परिणामों वाले स्कूलों में जबरन भेजे जाने के इस फैसले ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। इसी तरह, बिलासपुर संभाग में युक्तीकरण के आत्मघाती फैसलों के कारण 'पंडो' विशेष पिछड़ी जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल जाने के लिए ७ से ८ किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ रहा है, जिसके चलते कई बच्चों ने पढ़ाई ही छोड़ दी है।

एक तरफ ५७,००० शिक्षकों की बहुप्रतीक्षित भर्ती का विज्ञापन समय पर नहीं आ पाता, बच्चों को वक्त पर किताबें और यूनिफॉर्म नसीब नहीं होतीं, वहीं दूसरी तरफ विभाग के मलाईदार बजट को संभालने की चाबी उन चेहरों को सौंप दी गई है जिन्हें तकनीकी रूप से जेल की सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

४० का सिंडिकेट: जांच ठंडे बस्ते में, नेता-अफसर नेक्सेस

यह महज संयोग नहीं बल्कि एक सोची-समझी प्रशासनिक गलबहियां है। जिन ४० से अधिक अफसरों पर करोड़ों रुपये के घोटालों, पद के दुरुपयोग और वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप हैं, उनके खिलाफ फाइलों को दबा दिया गया है।

इस सिंडिकेट को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के महत्वपूर्ण राजनेताओं और मंत्रियों के साथ इन अफसरों के सीधे तार जुड़े हैं। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय (जिनके पास कुछ समय के लिए यह विभाग था) के कार्यकाल के दौरान भी इन दागी चेहरों का बाल बांका नहीं होना, इस प्रशासनिक और राजनीतिक साठगांठ की गहराई को बयां करता है। सुचिता, संस्कार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दावा करने वाले संगठन भी इन 'दीमकों' पर कार्रवाई कराने में लाचार या मौन नजर आते हैं।

दागियों के भरोसे करोड़ों का बजट

शिक्षा के मंदिर को दागियों का जमावड़ा बना देने से न केवल सरकारी खजाने को चूना लग रहा है, बल्कि नीतिगत फैसले भी प्रभावित हो रहे हैं। प्राचार्यों और शिक्षकों के स्तर पर होने वाले नैतिक पतन और यौन शोषण के मामलों से इतर, यह शीर्ष स्तर का प्रशासनिक भ्रष्टाचार है जो पूरे महकमे को खोखला कर रहा है। करोड़ों रुपये के बजट वाली योजनाओं की कमान जब दागी अफसरों के सिंडिकेट और नेताओं के नेक्सेस के हाथ में हो, तो व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश खत्म होने लगती है।

मैगजीन व्यू: जनता की अदालत में सुलगते प्रश्न

 सुचिता का दावा बनाम दागियों को पनाह: क्या भ्रष्ट और विवादित अफसरों को गोद में बिठाकर छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारा जा सकता है?

 युक्तीकरण या शिक्षा का संकुचन: आदिवासी और दूरस्थ अंचलों के बच्चों को स्कूल से दूर करने वाली नीतियों के पीछे असली एजेंडा क्या है?

 फाइलों पर कुंडली: इन ४० दागियों की जांच को ठंडे बस्ते में डालने के लिए जिम्मेदार राजनीतिक रसूखदार कौन हैं?

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में टाट-पट्टी पर बैठकर भविष्य का सपना देखने वाले गरीब बच्चों की उम्मीदें इन ४० दागियों के सिंडिकेट के बीच पिस रही हैं। यदि सरकार वास्तव में 'सुशासन' की पक्षधर है, तो इन दागी चेहरों को मलाईदार कुर्सियों से हटाकर सलाखों के पीछे भेजना होगा, वरना शिक्षा व्यवस्था का यह दाग कभी धुल नहीं पाएगा।

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