सोमवार, 29 जून 2026

सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़

 सीजी के अफसरों में 'रेंटल किंग' बनने होड़ 

साहबों की 'सफेद कमाई' का काला सच: आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की घोषित संपत्तियों के पीछे का पूरा खेल



रायपुर। जिनके हाथों में जिलों की कमान है, जिनके पास नीतियों को बदलने और मोड़ने की ताकत है, और जिनके एक दस्तखत से कॉरपोरेट जगत के फैसले तय होते हैं—वे साहबान आजकल एक नए धंधे के बेताज बादशाह बन चुके हैं। यह धंधा है 'रेंट' यानी किराएदारी का। छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली और गुरुग्राम के प्राइम लोकेशंस तक, नौकरशाही के रसूखदारों ने प्रॉपर्टी का ऐसा जाल बुना है कि आज वे 'रेंटल किंग' कहलाने लगे हैं।

यह कोई कोरी अफ़वाह या विरोधी दलों का आरोप नहीं है, बल्कि खुद इन आला अफसरों द्वारा सरकार को सौंपे गए अचल संपत्ति के ब्यौरे (IPR) की वो हकीकत है, जो चीख-चीखकर तंत्र की रीढ़ में समाई विलासिता को बयां कर रही है। सवाल सीधा है—क्या यह सिर्फ निवेश से होने वाली आय है, या फिर रसूख के दम पर काली कमाई को 'सफेद' करने की कोई सोची-समझी तरकीब?

आईएफएस (IFS) ने मारी बाजी: जब 'जंगल के रखवाले' बने जमीनों के सौदागर

आमतौर पर माना जाता था कि अकूत संपत्ति और जमीनों के मामले में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के बीच ही रेस चलती है। लेकिन हालिया आंकड़ों ने चौंका दिया है। इस बार वन सेवा के अफसरों (IFS) ने सबको पीछे छोड़ दिया है।

 तपेश कुमार झा: इन्हें किराए से हर महीने ₹60,000 की आय हो रही है।

 अनिल कुमार साहू: इनकी रेंटल इनकम ₹84,000 प्रति माह दर्ज है।

 प्रेम कुमार: ₹64,000 की कमाई सिर्फ किराए से कर रहे हैं।

 संजीता गुप्ता: इन्हें भी हर महीने ₹94,000 का भारी-भरकम किराया मिल रहा है।

 अरुण कुमार पांडे: ₹61,000 की रेंटल इनकम इनके खाते में जा रही है।

इनमें से कई अफसरों की प्रॉपर्टीज या तो प्राइम लोकेशंस पर हैं या फिर परिवार के सदस्यों के साथ 'साझेदारी' के खेल में उलझी हुई हैं। जंगल की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले इन साहबों के पास शहर के पॉश इलाकों में आलीशान बंगले और कमर्शियल स्पेस कहां से आए, इसका जवाब कानून के गलियारों में गुम है।

खाकी का 'खास' रेंट: करोड़ों के घोटाले के साए और लाखों का किराया

कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों का रसूख रखने वाले आईपीएस अधिकारियों की फेहरिस्त और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। इनमें उन चेहरों के नाम भी शामिल हैं जो बड़े विवादों और घोटालों की जांच के दायरे में रहे हैं।

 दीपांशु खाबरा: कोयला घोटाले में ईडी (ED) की पूछताछ का सामना कर चुके इस चर्चित चेहरे की सालाना या मासिक रेंटल इनकम के आंकड़े दंग करने वाले हैं। इन्हें किराए से ₹18 लाख की मोटी रकम मिल रही है।

 विवेकानंद: इनका साम्राज्य छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में फैली संपत्तियों से इन्हें ₹2 लाख 40 हजार का किराया मिल रहा है।

 पवन देव: इन्हें हर महीने ₹1,74,000 का किराया मिलता है।

 अरुण देव गौतम: ₹1,90,000 की रेंटल इनकम के साथ यह भी इस रेस में काफी आगे हैं।

 प्रदीप गुप्ता: इनका नेटवर्क उत्तर प्रदेश (UP) तक फैला हुआ है, जहां की संपत्तियों से इन्हें ₹60,000 का किराया मिल रहा है।

कुर्सी का 'कलेक्शन': आईएएस बिरादरी के वीआईपी रेंटर्स

नीति निर्माताओं और मंत्रालय में बैठने वाले आईएएस अफसरों की सूची भी कम दिलचस्प नहीं है। इनकी प्रॉपर्टी रायपुर के शंकर नगर, टैगोर नगर, समता कॉलोनी, चौबे कॉलोनी, छेरीखेड़ी और नया रायपुर जैसे उन इलाकों में हैं जहां आम आदमी जमीन की कीमत सुनकर ही पीछे हट जाता है।

 मनोज पिंगवा: कृषि भूमि के साथ-साथ कई फ्लैट्स के मालिक पिंगवा साहब को किराए से ₹1,800,000 (18 लाख) की भारी-भरकम रकम मिल रही है।

 गौरव द्विवेदी: इनकी रेंटल आय ₹36,000 घोषित है।

 विकासशील: उत्तराखंड से लेकर रायपुर तक फैले इनके प्रॉपर्टी एम्पायर से इन्हें ₹71,000 का रेंट मिल रहा है।

 रेणू पिल्ले: नया रायपुर के प्राइम फ्लैट्स से इन्हें ₹68,000 का किराया आ रहा है।

 रिचा शर्मा: छत्तीसगढ़ कैडर की इस अफसर की प्रॉपर्टी दिल्ली से सटे गुरुग्राम (गुड़गांव) में है, जहां से इन्हें भारी किराया मिल रहा है।

खोजी पड़ताल: रसूख और कॉरपोरेट का 'नेक्सस'

आखिर इन संपत्तियों का इतना ज्यादा और मनमाना किराया दे कौन रहा है? जब इस सच की तह तक जाने की कोशिश की गई, तो जो खेल सामने आया वह बेहद गंभीर है।

अधिकांश प्रभावशाली अधिकारियों ने अपनी संपत्तियां, बंगले और कमर्शियल स्पेस आम किरायेदारों को नहीं, बल्कि देश के बड़े कॉरपोरेट घरानों और निजी कंपनियों को किराए पर दे रखे हैं।

राजधानी रायपुर का 'मॉल श्री विहार' इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। एक दौर में मॉल श्री विहार के कई आलीशान बंगले असल में छत्तीसगढ़ के बड़े कॉरपोरेट घरानों के 'गेस्ट हाउस' या 'रेस्ट हाउस' बने हुए थे। कंपनियां इन प्रभावशाली अफसरों को खुश रखने के लिए बाजार दर से कहीं ज्यादा किराया चुकाती हैं। यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) का मामला है। जिस कंपनी के प्रोजेक्ट्स को क्लीयरेंस अफसरों की कलम से मिलना है, वही कंपनी साहब के बंगले का लाखों का किराया दे रही है—इसे आप क्या कहेंगे?

तीखे सवाल: क्या यह 'काली कमाई' का नया लॉन्ड्री सिस्टम है?

साल 2014 के बाद से इन अफसरों की प्राइम लोकेशंस पर संपत्तियों की बाढ़ सी आ गई है। घोषित संपत्ति तो सिर्फ 'टिप ऑफ द आइसबर्ग' (बर्फ का सिरा) है, असली खेल बेनामी संपत्तियों और करीबियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों का है।

1. बाजार मूल्य का खेल: क्या इन संपत्तियों का वास्तविक किराया उतना ही है जितना दिखाया जा रहा है, या फिर कैश में ली गई घूस को 'रेंट' दिखाकर बैंक खातों में वैध किया जा रहा है?

2. कॉरपोरेट मेहरबानी क्यों?: बड़ी कंपनियां इन अफसरों की ही संपत्तियों को महंगे दामों पर किराए पर लेने के लिए इतनी आतुर क्यों रहती हैं? क्या यह सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण की कीमत है?

3. सरकार की चुप्पी: रेंटल किंग बन चुके इन नौकरशाहों पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती? क्या कोई ऐसा कड़ा कानून आएगा जो अफसरों के कॉरपोरेट डीलिंग्स और बेनामी किरायों पर नकेल कस सके?

निष्कर्ष:

जनता टैक्स देती है ताकि व्यवस्था सुचारू रूप से चले, लेकिन व्यवस्था चलाने वाले खुद 'जमींदार' और 'रेंटल किंग' बनकर बैठ गए हैं। जब तक इन घोषित किरायों और इन्हें देने वाली कंपनियों के संबंधों की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक 'सफेद' कागजों के पीछे छिपा 'काला सच' कभी बाहर नहीं आएगा।

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