कॉरपोरेट चंदे का 'खेला': क्या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन की कीमत पर भरी जा रही है सत्ता की तिजोरी?
ADR की रिपोर्ट का बड़ा खुलासा— राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को पछाड़कर बीजेपी के लिए 'दुधारू गाय' बना छोटा सा छत्तीसगढ़; कॉरपोरेट मेहरबानी और आदिवासियों की बेबसी के बीच का कड़वा सच।
जब देश के गृह मंत्री अमित शाह ने रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र की एक चुनावी सभा में गरजते हुए कहा था कि "ओपी चौधरी को विधायक बनाओ, इन्हें बड़ा आदमी बनाने की जिम्मेदारी मेरी है," तब शायद ही किसी ने सोचा था कि इस 'बड़ा आदमी' बनाने के खेल के पीछे छत्तीसगढ़ के संसाधनों की इतनी बड़ी बिसात बिछाई जा रही है। आज यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या छत्तीसगढ़ के राजनेता बड़े आदमी बन पाए या नहीं, यह तो जांच का विषय है, लेकिन छत्तीसगढ़ के आसरे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश की सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी जरूर बन गई है ।
एडीआर (ADR) की रिपोर्ट और चंदे का चौंकाने वाला गणित
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विधानसभा चुनावों के दौरान चंदा उगाहने के मामले में भाजपा ने विपक्षी दलों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य माना जाता है, लेकिन चंदे के मामले में इसने मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।
आंकड़ों की बाजीगरी को समझें तो:
छत्तीसगढ़: भाजपा को यहाँ से कुल 76 करोड़ 29 लाख रुपये का चंदा मिला है, जबकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मात्र 27 लाख रुपये ही नसीब हुए ।
मध्य प्रदेश: भाजपा को 54 करोड़ 3 लाख रुपये मिले, जबकि कांग्रेस को 1 करोड़ 34 लाख रुपये मिले।
राजस्थान: भाजपा को 87 करोड़ 51 लाख रुपये का चंदा मिला ।
छत्तीसगढ़ से मिले कुल 76 करोड़ से अधिक के चंदे में से लगभग 70 करोड़ रुपये सीधे कॉरपोरेट घरानों की जेब से आए हैं । अब सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठता है कि क्या सत्ता के दम पर कॉरपोरेट घरानों से यह 'उगाही' की जा रही है? आखिर एक छोटे से राज्य से कॉरपोरेट घराने सत्तारूढ़ दल पर इतने मेहरबान क्यों हैं?
'चंदा दो, धंधा लो'— क्या दांव पर है छत्तीसगढ़ के संसाधन?
छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए एक लंबा और दमनकारी दौर चल रहा है। हसदेव से लेकर बस्तर तक आदिवासियों का आंदोलन जारी है। राजनीतिक गलियारों और जमीन पर यह सीधा आरोप लग रहा है कि छत्तीसगढ़ को कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेचा जा रहा है । यह चर्चा आम है कि सूबे में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक का चयन इस तरह किया गया है कि वे दिल्ली दरबार के इशारों पर काम कर सकें, जिसके चलते सूबे में कॉरपोरेट घरानों की मनमानी एंट्री हुई है ।
यूं तो देश में केवल 'अडानी' का नाम ही सबसे ज्यादा गूंजता है क्योंकि वे हर राज्य और हर बड़े ठेके में मौजूद हैं। लेकिन खेल सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। बस्तर में खदानों की नीलामी से लेकर कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा जैसे समृद्ध क्षेत्रों में अडानी के साथ-साथ कई अन्य कॉरपोरेट घरानों को मनमर्जी के मौके दिए जा रहे हैं । एडीआर के ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि छत्तीसगढ़ में एक नया समीकरण काम कर रहा है— "चंदा दो और छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधन ले जाओ" ।
संगीनों के साए में विकास या विनाश? रायगढ़ का वो वायरल सच
इस कॉरपोरेट मेहरबानी की सबसे डरावनी और दर्दनाक तस्वीर इन दिनों रायगढ़ के जेजामूड़ा से सामने आई है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है । जेजामूड़ा में अडानी की रेल लाइन बिछाने के काम को शुरू करने के लिए भारी पुलिस बल और कॉरपोरेट बाउंसरों की फौज तैनात की गई । संगीनों के साए में, पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ग्रामीणों की आवाज को दबाया गया ।
इस पूरी बर्बरता के बीच एक आदिवासी महिला की बेबसी और चीख देश के लोकतंत्र के मुंह पर करारा तमाचा है। उस महिला के पति को पुलिस ने सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया ताकि कॉरपोरेट का काम बिना किसी बाधा के चल सके । रोती-बिलखती उस महिला ने कैमरे के सामने जो कहा, वह छत्तीसगढ़ की नियति बन चुका है:
"मेरे पतिदेव को पहले छोड़ दो, फिर अपना काम करवाते रहना। हम अपनी जमीन फ्री में दान दे देंगे, हम एक रुपया भी पैसा नहीं लेंगे, बस मेरे पतिदेव को छोड़ दो..."
"
निष्कर्ष: क्या यही है नए छत्तीसगढ़ की परिभाषा?
एडीआर की इस रिपोर्ट ने उस पर्दे को हटा दिया है जिसके पीछे विकास का ढोंग रचा जा रहा था। जब कॉरपोरेट की थैलियों से करोड़ों रुपये सत्ताधारी दल की तिजोरियों में पहुंचते हैं, तो नीतियां जनता के हित में नहीं, बल्कि उन थैलियों को भरने वालों के हित में बनती हैं।
सवाल अनुत्तरित है: क्या आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ के बचे-खुचे प्राकृतिक संसाधनों को भी इसी तरह कॉरपोरेट के हवाले कर दिया जाएगा? और क्या छत्तीसगढ़ की जनता को अपनी ही जमीन पर बंधक बनकर रहना होगा? चंदे की यह सियासत छत्तीसगढ़ को विकास की ओर ले जा रही है या विनाश की ओर, इसका फैसला आने वाला वक्त और प्रदेश की जागरूक जनता ही करेगी।
