शनिवार, 18 जुलाई 2026

दर्जनों दवाओं के सैंपल फेल, फिर भी एक कंपनी पर मेहरबान क्यों है सरकार?

 छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था से खिलवाड़: दर्जनों दवाओं के सैंपल फेल, फिर भी एक कंपनी पर मेहरबान क्यों है सरकार?



छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। राज्य के सरकारी अस्पतालों में आम जनता को बांटी जाने वाली दवाइयों की गुणवत्ता को लेकर एक ऐसा खेल चल रहा है, जो सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली और निजी अस्पतालों की कथित लूट के बीच एक ऐसा नेक्सेस (गठजोड़) काम कर रहा है, जिसमें दवा कंपनियां, रसूखदार अधिकारी और सत्ता में बैठे लोग शामिल नजर आते हैं।

इस पूरे नेक्सेस के केंद्र में है एक स्थानीय दवा कंपनी—नियो इंडिया लिमिटेड’ (Neo India Limited), जिसकी दर्जनों दवाइयां जांच में फेल हो चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार और प्रशासन इस पर मेहरबान हैं।

🏛️ एमएसएमई (MSME) की आड़ और नियमों में भारी ढील

इस पूरे खेल के पीछे केंद्र सरकार की एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) को बढ़ावा देने की नीति का हवाला दिया जा रहा है, जिसका फायदा उठाकर छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार ने टेंडर प्रक्रियाओं में अभूतपूर्व छूट दे दी है [01:17]।

राजधानी रायपुर के पास आरंग (दी औद्योगिक क्षेत्र) में स्थित इस नियो इंडिया लिमिटेड कंपनी को सरकारी टेंडरों में भाग लेने के लिए कई तरह के नियमों से मुक्त रखा गया है:

1. टर्नओवर की बाध्यता खत्म: स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर टेंडर में कंपनी के लिए अपने टर्नओवर का जिक्र करना जरूरी नहीं रखा गया है [03:27]।

2. सर्टिफिकेट की अनदेखी: हर जिम्मेदार दवा कंपनी के लिए जरूरी माने जाने वाले WHO-GMP (World Health Organization - Good Manufacturing Practices) सर्टिफिकेट की अनिवार्यता को भी इस टेंडर प्रक्रिया में शिथिल कर दिया गया [03:47]।

3. L1 रेट पर 50% सप्लाई का अधिकार: यदि कोई बाहरी राज्य की कंपनी टेंडर में सबसे कम बोली (L1) लगाकर जीत भी जाती है, तो भी स्थानीय नीति के तहत इस कंपनी को उस L1 रेट पर 50% दवाइयां सप्लाई करने की भारी छूट दी गई है [04:06]।

💊 दर्जनों दवाइयां फेल, फिर भी ब्लैकलिस्ट से दूरी क्यों?

नियमों के मुताबिक, यदि किसी दवा कंपनी की तीन दवाओं के सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल हो जाते हैं, तो उसे 3 साल के लिए ब्लैकलिस्ट (काली सूची) में डाल दिया जाता है [05:06]। लेकिन नियो इंडिया लिमिटेड के मामले में यह नियम पूरी तरह हवा में उड़ा दिया गया है।

कंपनी की लगभग दो दर्जन से अधिक दवाइयों के सैंपल गुणवत्ता मानकों पर पूरी तरह फेल पाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं [05:14]:

 नाइट्रेट से संबंधित दवाइयां और टेलमीसार्टन (Telmisartan)

 जिंक सल्फेट और डाइसाइक्लोमाइन (Dicyclomine)

 फाइटोनाडियोन (Phytonadione)

 सामान्य इलाज में काम आने वाली बुखार-खांसी की दवाइयां, जैसे पैरासिटामॉल (Paracetamol) भी जांच में फेल हो चुकी हैं।

 सिर्फ दवाइयां ही नहीं, अस्पतालों में ऑपरेशन के लिए सप्लाई किए गए चिकित्सा उपकरण (औजार) भी घटिया दर्जे के और जंग लगे हुए पाए गए, जिन्हें वापस करना पड़ा था [06:07]।

इतने गंभीर उल्लंघनों के बाद भी अधिकारियों की मेहरबानी का आलम यह है कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय, सिर्फ खराब बैच की दवाइयां लौटा दी जाती हैं और उनसे नया बैच भेजने को कह दिया जाता है [07:41]।

👥 कौन हैं इस कंपनी के पीछे?

इंटरनेट और आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, इस कंपनी के डायरेक्टर्स में मनीष अग्रवाल, आशीष अग्रवाल, अजय अग्रवाल और राहुल शेरस शामिल हैं [06:34]। सत्ता और व्यापारियों के बीच के इस कथित गठजोड़ के कारण ही इस कंपनी पर कार्रवाई करने से हाथ खींचे जा रहे हैं।

📜 मेडिकल घोटालों का पुराना इतिहास

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य महकमे और दवा आपूर्ति में गड़बड़ी का यह कोई पहला मामला नहीं है। पूर्ववर्ती डॉक्टर रमन सिंह के कार्यकाल से लेकर अब तक कई मेडिकल घोटाले सामने आ चुके हैं। पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर द्वारा उठाए गए एक अन्य दवा घोटाले में भी जांच चल रही है, जिसमें 14 अफसरों के शामिल होने की बात सामने आई थी, हालांकि केवल आधा दर्जन लोग ही जेल में हैं और बाकी आज भी मजे से नए पदों पर बैठे हैं [09:00]।

वर्तमान में स्वास्थ्य मंत्रालय सरगुजा क्षेत्र से आने वाले मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के पास है [01:32]। अस्पतालों में खाली पदों की भर्ती न होना और इस तरह की गुणवत्ताहीन दवाओं की बेखौफ सप्लाई ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

🕒 निष्कर्ष

स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन जब बात जनता की सेहत और जिंदगी की हो, तो मानकों से समझौता करना एक गंभीर अपराध है। दर्जनों जीवनरक्षक दवाओं के फेल होने के बाद भी एक ही कंपनी को बार-बार जीवनदान देना यह साफ करता है कि राज्य में आम लोगों की जान की कीमत से बड़ा रसूखदारों का खेल हो चुका है।

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