मंगलवार, 7 जुलाई 2026

कोर्ट से जीतकर भी अफसरों की चौखट पर हार जाता है आम आदमी

  कोर्ट से जीतकर भी अफसरों की चौखट पर हार जाता है आम आदमी; छत्तीसगढ़ में बढ़ा 'अवमानना' का ग्राफ


भारतीय न्याय व्यवस्था में अक्सर यह दोहराया जाता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं और अदालत की अवमानना करने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता। लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। राज्य के प्रशासनिक महकमों में बैठे रसूखदार अफसरों के आगे अदालती आदेश बौने साबित हो रहे हैं। स्थिति यह है कि एक आम नागरिक सालों-साल अदालतों के चक्कर काटने, अपनी गाढ़ी कमाई वकीलों की फीस में फूंकने के बाद जब केस जीत भी जाता है, तो सचिवालय और कलेक्ट्रेट की फाइलों में वह न्याय दम तोड़ देता है।

न्यायशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है— 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' यानी न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। परंतु छत्तीसगढ़ की अफसरशाही ने अब एक नया चलन विकसित कर लिया है— 'न्याय मिल भी जाए, तो उसे फाइलों के नीचे दबा दो।'

आंकड़ों की जुबानी: कानून के खौफ का खात्मा

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में लंबित अदालती अवमानना (Contempt of Court) के आंकड़े बेहद डराने वाले और चौंकाने वाले हैं। ये आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रशासनिक महकमों में न तो कानून का कोई डर बचा है और न ही जनता की तकलीफों की परवाह।

 वर्ष 2015 का परिदृश्य: साल 2015 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अवमानना के महज 391 मामले लंबित थे।

 मौजूदा स्थिति: यह आंकड़ा तेजी से बढ़कर 1945 मामलों तक पहुंच चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में प्रशासनिक संरक्षण के कारण अफसरों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि कोर्ट के आदेशों की सीधे तौर पर अनदेखी की जा रही है। अनुकंपा नियुक्ति, पेंशन, जमीन अधिग्रहण और मुआवजे जैसे संवेदनशील मामलों में भी कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अफसर फाइलें दबाकर बैठे रहते हैं।

जनता के टैक्स के पैसे से अफसरों की 'कवच-कुंडल'

इस पूरे खेल का सबसे कड़वा और स्याह सच यह है कि अदालती आदेशों की धज्जियां उड़ाने वाले ये आईएएस और आईपीएस अफसर अपनी जेब से कानूनी लड़ाई नहीं लड़ते। जब भी किसी अफसर के खिलाफ अवमानना का मामला दर्ज होता है, तो उनकी पैरवी के लिए सरकार टैक्सपेयर्स (जनता) के पैसे से महंगे और नामी वकीलों की फौज खड़ी कर देती है।

एक तरफ गरीब आदमी अपनी जमीन या जेवर बेचकर न्याय की आस में कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, वहीं दूसरी तरफ गलती करने वाले अफसरों को बचाने के लिए सरकारी खजाने से प्रति सुनवाई लाखों रुपए की फीस वकीलों को दी जाती है। यानी नुकसान हर तरफ से आम जनता और देश के करदाताओं का ही हो रहा है।

कड़े फैसलों से क्यों हिचक रही है न्यायपालिका?

वरिष्ठ विश्लेषकों और जानकारों के मुताबिक, इस प्रशासनिक निरंकुशता के लिए सिर्फ अफसरशाही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं व्यवस्थागत मजबूरियां भी इसके पीछे हैं। अदालतों द्वारा ऐसे बेलगाम अफसरों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई (जैसे जेल भेजना, सैलरी रोकना या सुविधाएं छीनना) करने के बजाय केवल 'कारण बताओ नोटिस' जारी कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।

इस हिचकिचाहट के पीछे कुछ गंभीर सवाल भी उठते हैं:

1. प्रशासनिक जरूरतें और प्रोटोकॉल: जजों को कामकाज के लिए सुरक्षित बंगले, गाड़ियां, सुरक्षा और प्रोटोकॉल स्टाफ की जरूरत होती है, जो राज्य सरकार (अफसरों) के माध्यम से ही मुहैया कराया जाता है।

2. रिटायरमेंट के बाद का लालच: सेवानिवृत्ति के बाद कई जजों को विभिन्न जांच आयोगों, ट्रिब्यूनलों या अन्य सरकारी पदों पर नियुक्ति की चाह होती है। यह संभावना उन्हें नौकरशाही के खिलाफ कड़े और सख्त कदम उठाने से रोकती है।

जब कोर्ट बहुत सख्ती दिखाता है, तो अफसर 'अति व्यस्तता' का बहाना बनाकर या उपस्थिति से छूट मांगकर साफ बच निकलते हैं और पीड़ित व्यक्ति अदालत का आदेश हाथ में लिए दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है।

छत्तीसगढ़ ही नहीं, अन्य राज्यों में भी यही ढर्रा

न्याय मिलने के बाद भी फाइलों को डंप करने का यह खेल सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश, उड़ीसा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जहां अनुकंपा नियुक्ति और पेंशनभोगी बुजुर्ग अदालती डिक्री मिलने के बावजूद सालों से अफसरों की चौखट पर एड़ियां रगड़ रहे हैं।

लोकतंत्र के वजूद पर संकट

बात सिर्फ किसी एक कोर्ट ऑर्डर के पालन की नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्यायपालिका की साख पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। अगर देश के आम नागरिक का अदालत और न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ गया, तो लोकतंत्र का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा। अब देखना यह है कि क्या हाई कोर्ट इन डराने वाले आंकड़ों को संज्ञान में लेकर इन रसूखदार अफसरों के खिलाफ कोई नजीर पेश करने वाली कार्रवाई करता है या आम आदमी यूं ही न्याय की आस में पथराई आंखों से सिस्टम को ताकता रहेगा।

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