निजी खर्च पर हुए मोतियाबिंद ऑपरेशनों को सरकारी उपलब्धि बता थपथपाई जा रही पीठ!
1,08,000 ऑपरेशनों के लक्ष्य के मुकाबले सरकारी अस्पतालों और एनजीओ की कुल साख महज 38,365 पर सिमटी
नाकामी छिपाने को आम जनता द्वारा निजी अस्पतालों में अपनी जेब से कराए गए 70,983 ऑपरेशनों को सरकारी आंकड़ों में जोड़ा गया
प्रदेश भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की लचर स्थिति: साल भर में दर्ज हुए मात्र 1,409 ऑपरेशन
रायपुर।
प्रदेश में ‘डबल इंजन’ सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के पोस्टमार्टम से खुलासा हुआ है कि गरीबों को मुफ्त इलाज और मोतियाबिंद से मुक्ति दिलाने का दावा करने वाला सरकारी तंत्र पूरी तरह वेंटिलेटर पर है। अपनी नाकामी और लचर व्यवस्था को छिपाने के लिए विभाग ने ऐसा खेल खेला है, जिसे आंकड़ों की बाजीगरी और जनता के साथ धोखाधड़ी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
साल 2025-26 के लिए राज्य सरकार ने पूरे छत्तीसगढ़ में 1 लाख 8 हजार गरीबों के मोतियाबिंद का मुफ्त ऑपरेशन करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन जब विभागीय समीक्षा रिपोर्ट के आंकड़े सामने आए, तो सरकारी दावों की हवा निकल गई।
सरकारी तंत्र की पोल खोलते आंकड़े (2025-26):
1. सरकारी मेडिकल कॉलेज: प्रदेश भर के तमाम बड़े और आधुनिक समझे जाने वाले सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलकर पूरे साल में महज 1,409 मोतियाबिंद ऑपरेशन ही कर पाए। [02:05]
2. जिला सिविल व केंद्रीय अस्पताल: राज्य के सभी जिला और सिविल अस्पतालों का कुल प्रदर्शन 31,146 ऑपरेशनों तक सीमित रहा। [02:19]
3. गैर सरकारी संस्थाएं (NGOs): एनजीओ के माध्यम से 5,810 ऑपरेशन कराए गए। [02:28]
यदि इन सभी सरकारी व्यवस्थाओं और एनजीओ के आंकड़ों को जोड़ भी दिया जाए, तो कुल जमा आंकड़ा 38,365 ऑपरेशनों पर ही अटक जाता है। [02:38] यह आंकड़ा तय लक्ष्य (1.08 लाख) के आधे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पाता।
यूं रची गई आंकड़ों की 'चालाकी'
जब लक्ष्य और उपलब्धि के बीच एक बड़ा गड्ढा दिखने लगा, तो स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने अपनी साख बचाने के लिए एक अजीबो-गरीब पैंतरा अपनाया। प्रदेश के जिन आम नागरिकों ने मजबूरी में, कर्ज लेकर या अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखकर निजी अस्पतालों में अपनी जेब से 70,983 मोतियाबिंद ऑपरेशन [01:27] कराए, सरकार ने उन निजी ऑपरेशनों को भी अपनी सरकारी रिपोर्ट में घसीट लिया।
सरकारी ऑपरेशनों (38,365) और निजी खर्च पर हुए ऑपरेशनों (70,983) को एक साथ जोड़कर रिपोर्ट तैयार की गई और ढिंढोरा पीटा गया कि "सरकार ने मोतियाबिंद मुक्ति के लक्ष्य को लगभग हासिल कर लिया है।"
'आंख फोड़वा कांड' का डरावना अतीत और वर्तमान का अंधेरा
स्वास्थ्य विभाग की यह बदहाली छत्तीसगढ़ के लिए नई नहीं है। राज्य में पूर्ववर्ती रमन सरकार के कार्यकाल के दौरान महासमुंद, बालोद, बिलासपुर और जगदलपुर जैसे क्षेत्रों में हुए 'आंख फोड़वा कांड' की दर्दनाक यादें आज भी ताजा हैं, [04:49] जब घटिया दवाओं और लापरवाही के कारण दर्जनों गरीबों ने अपनी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए गंवा दी थी।
आज सरकार और चेहरे भले बदल गए हों, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का न होना, मशीनों का खराब रहना और महीनों लंबी तारीखें मिलना आम बात हो गई है। मजबूरी में गरीब बुजुर्ग अपनी जिंदगी भर की कमाई निजी अस्पतालों में लुटा रहे हैं और सरकार उन्हीं के आंकड़ों पर श्रेय बटोर रही है।
3 तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:
1. जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?: जब सरकारी और एनजीओ तंत्र मिलकर लक्ष्य का 40% भी पूरा नहीं कर पाया, तो इस विफलता के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
2. क्या यह जनता से धोखा नहीं?: आम नागरिकों द्वारा अपनी गाढ़ी कमाई से निजी अस्पतालों में कराए गए इलाज को सरकारी रिपोर्ट में शामिल करना क्या सीधे तौर पर आंकड़ों की जालसाजी नहीं है?
3. करोड़ों का स्वास्थ्य बजट कहां?: आयुष्मान योजना और स्वास्थ्य विभाग के भारी-भरकम बजट के बावजूद यदि गरीब को प्राइवेट अस्पताल का ही दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो विभाग का असल काम क्या रह गया है?
