डॉक्टर बनने के लिए ‘पूजा खेडकर’ स्टाइल फर्जीवाड़ा: बिलासपुर तहसील से EWS के नाम पर जारी हुए फर्जी सर्टिफिकेट, जांच में खुली पोल
MBBS वेरिफिकेशन में पकड़ में आया फर्जीवाड़ा; तहसीलदार के जाली दस्तखत से बने थे आर्थिक पिछड़ा वर्ग के प्रमाण पत्र
भाजपा नेता और रसूखदारों पर उठे गंभीर सवाल, क्या सिर्फ बाबू पर गाज गिराकर मामले को दबाने की हो रही कोशिश?
विशेष संवाददाता | रायपुर/बिलासपुर
महाराष्ट्र की चर्चित ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर का फर्जी सर्टिफिकेट प्रकरण अभी देश के जेहन से मिटा भी नहीं था कि छत्तीसगढ़ में ठीक उसी तर्ज पर एमबीबीएस (MBBS) में सीट हासिल करने के लिए फर्जी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) प्रमाण पत्र जारी करने का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। बिलासपुर तहसील कार्यालय की आड़ में रसूखदारों और भू-माफियाओं की साठगांठ से फर्जी सील-सिक्के और तहसीलदार के फर्जी हस्ताक्षरों से EWS सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए।
इस पूरे खेल का भंडाफोड़ तब हुआ जब नीट (NEET) के जरिए एमबीबीएस में प्रवेश के बाद मेडिकल काउंसिल और प्रशासनिक स्तर पर भौतिक सत्यापन (वेरिफिकेशन) किया गया। जांच में सामने आया कि जिन रोल नंबर और दस्तखत के आधार पर गरीब कोटे (EWS) से डॉक्टरों की पढ़ाई की सीट ली गई थी, उनका तहसील कार्यालय के सरकारी रिकॉर्ड से कोई वास्ता ही नहीं था।
तहसीलदार के फर्जी हस्ताक्षर, भाजपा नेता की बेटी समेत तीन छात्राओं के नाम उजागर
मामले की जब गहराई से पड़ताल की गई तो बिलासपुर तहसील में पदस्थ तहसीलदार गरिमा सिंह के नाम से जारी सात प्रमाण पत्रों पर संदेह हुआ। जब इन हस्ताक्षरों का मिलान तहसीलदार के असल हस्ताक्षरों से कराया गया, तो दस्तखत पूरी तरह जाली पाए गए।
अब तक सामने आए तीन प्रमुख मामलों में बिलासपुर के सरकंडा और सीपत क्षेत्र के रसूखदारों के नाम सामने आए हैं:
1. सुभान सिंह गुप्ता: बिलासपुर (सरकंडा) निवासी भाजपा नेता सतीश गुप्ता की बेटी।
2. भाव्या मिश्रा: सरकंडा निवासी सूरज मिश्रा की बेटी।
3. सुहानी सिंह: सीपत निवासी सुधीर कुमार सिंह की बेटी।
आरोप है कि इन सभी ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कोटे का नाजायज फायदा उठाने के लिए कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार कराए।
सिर्फ बाबू को नोटिस या आकाओं पर भी होगी कार्रवाई?
फर्जीवाड़े की बू आते ही शुरुआती प्रशासनिक खानापूर्ति करते हुए संबंधित बाबू को शो-कॉज (कारण बताओ) नोटिस थमा दिया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिना किसी प्रशासनिक संरक्षण और सत्ता-संगठन के प्रभाव के इतनी बड़ी जालसाजी मुमकिन है?
स्थानीय चर्चाओं और सूत्रों की मानें तो इस पूरे नेक्सस (गिरोह) के पीछे भाजपा नेता सतीश गुप्ता व अन्य रसूखदारों की मुख्य भूमिका बताई जा रही है, जिन्होंने तहसील कार्यालय की लचर व्यवस्था और दलालों के साथ मिलकर यह पूरा ताना-बाना बुना।
जाति से लेकर दिव्यांग कोटे तक; क्या पूरे प्रदेश में फैला है फर्जी प्रमाण पत्रों का दीमक?
यह कोई पहला मौका नहीं है जब राज्य में इस तरह का फर्जीवाड़ा सामने आया हो। इससे पहले भी प्रदेश के कई जिलों में फर्जी दिव्यांग (PWD) और फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और यहां तक कि राज्य लोक सेवा आयोग (CGPSC) के जरिए डिप्टी कलेक्टर और पुलिस सेवा में नौकरी पाने के संगीन आरोप लगते रहे हैं। राज्य के वास्तविक दिव्यांग युवा लंबे समय से फर्जी प्रमाण पत्र धारकों के खिलाफ आंदोलन करते आ रहे हैं, लेकिन हर बार मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
बिलासपुर का यह मामला तो महज "आइसबर्ग का सिरा" (सिर्फ एक हिस्सा) माना जा रहा है। अगर निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच (SIT या न्यायिक जांच) बैठाई जाए, तो EWS और अन्य आरक्षित कोटों के तहत पिछले कुछ सालों में हुए सैकड़ों दाखिलों और नौकरियों की पोल खुल सकती है।
उठते तीखे सवाल:
1. सत्ता का संरक्षण: जब भाजपा नेता की बेटी का नाम सीधे तौर पर फर्जी EWS मामले से जुड़ रहा है, तो क्या निष्पक्ष कार्रवाई होगी या मामले को दबाने का खेल शुरू हो चुका है?
2. असली पीड़ितों का हक किसने मारा?: जिन वास्तविक गरीब और मेधावी छात्र-छात्राओं का EWS कोटे पर अधिकार था, उनका भविष्य इस रसूखदार फर्जीवाड़े की बलि चढ़ गया।
3. सिस्टम का कौन सा पेंच ढीला?: क्या बिलासपुर तहसील कार्यालय फर्जी दस्तावेज बनाने की फैक्ट्री बन चुका है? सिर्फ निचले कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर बड़े मगरमच्छों को बचाने का प्रयास क्यों?
