सोमवार, 23 दिसंबर 2013

जयचंद-मीरजाफर के जय होवय...


चुनाव होगे, सरकारो बनगे फेर हरईया मन के दुख ल कोनों नहीं समझत हे। बपरी रेणुका सिंह ह रो रो के कतका कलपे रीहिस के वोला भाजपाच के मन ह हरवाईन हे। मुख्यमंत्री घलो ह वोखर पीरा ले पिघल गे     रीहिस अऊ अइसन मन के खिलाफ कार्रवाई करे के बात करे रीहिस फेर आज तक रेणुका ह रोवत हे अऊ जयचंद अऊ मीरजाफर मन ह सरकार बने के खुशी मनावत हे।
इही हाल राजनांदगांव जिला ले लेके बस्तर अऊ सरगुजा म हे। हरईया ह हार गे अऊ पार्टी के घलो सरकार बन गे अब का करे बर हे। भीतरघात करईया मन के सूची अतेक लम्बा हे के  ओमन ल पार्टी ले निकाल दीही त लोकसभा चुनाव के का होही।
अइसने होथे जीतने वाला दल ह अपन भीतरघाती मन ल भुला जाथे अऊ सरकार बने के खुशी म मगन हो जथे। अऊ हरईया मन ह दु चार दिन जोर लगाथे अऊ तहां ले ए सोच के कलेचुप बइठ जथे के अगला चुनाव आही त महु ह मजा चखाहुं।
सत्ताबाजी दल के जब ए हाल हे त जेखर सत्ता नहीं आय हे तेखर त गोठेच बाल झन कर उहां त नीतईया घलो ह खुश नहीं हे। सत्ता आही त का का करबो कहीके सोचे रीहिन फेर सत्ता नहीं मिलीस त मुंह मसोस के रही गे।
इहों भीतरघाती मन ह सीना तान के चलत हे अऊ गोठियावत हे के कइसे कइसे करम करे बर पड़ीस हे। कांग्रेस म त अइसनेच होथे। प्रदेश अध्यक्ष चरणदास महंत ल हटाय ल पड़ गे नवा प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ल बना दिन।
भूपेश बघेल के प्रदेश अध्यक्ष बने ले अजीत जोगी ह उपरे ऊपर भले बने काहत हे फेर भीतरे भीतर जी ह कतका जरत हे तेन ल ो जानत हे अऊ ओखर जी ह जातर हे। तभे त कही दिस मे हा लोकसभा चुनाव नहीं लड़व।
अजीत जोगी ह लोकसभा नहीं लड़ही त कांग्रेस के का बिगड़ही तउन ल कोनो नहीं जानय फेर एक बात त तय हे के जोगी लडय़ चाहे झन लडय़ कांग्रेस ल छत्तीसगढ़ म खोयबर कुछु नहीं हे। पा जही त वाहवाही जरूर मिलही। अऊ कांग्रेस तीर नेता मन के घलो कमी नहीं हे एक एक सीट ले दस-दस झन दावेदार बाइठे हे जोगी नहीं लड़ही त कोनो अऊ लड़ही।
आज कल त खुला बात अऊ भीतरघात के जमाना हे तभे त भीतरघाती जयचंद मीर जाफर मन के जगह जगह पूछ होवत हे।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

कब चेतहु...


अभी जादा दिन नहीं बीते हे आंख फोड़वा कांड ल। फेर लागथे न तो सरकार चेते हे अऊ न डाक्टर मन चेतने वाला हे तभे त शिविर लगा लगा के मनमाने आपरेशन करत हे अऊ आम लोगन ल झंझट म डारत हे।
सिमगा म नसबंदी शिविर म फेर अइसने लपर-झपर के मामला सामने आय हे। तीस बिस्तर वाला अस्पताल म शिविर लगा के 52 झन माई लोगन के आपरेशन कर दिन। अऊ ए दरी घलों के बेवास्था नहीं करीन, आधा झन ल भुईयां म सोय ल पड़ीस, जाड़ के दिन म मे सब ह अतीयाचार वो हम त अऊ काय हे।
वो त पार्षद ल पता चलीस अऊ हल्ला गुल्ला मचीस त आनन भानन म दरी वरी मंगवाय गीस। सीएमओ ह त ए लंदर फंदर काम बर स्वास्थ्य केन्द्र ल दोसी बताये पल्ला झाड़ लीस। फेर अइसने कब तक चलही तेखर जवाब कखरो तीर नहीं हे।
सरकार ह हर स्वास्थ्य केन्द्र ल शिविर लगा के नसबंदी अऊ आंख के आपरेशन करे ल केहे हे फेर डॉक्टर मन ह हड़बड़ी म एकेच दिन म मनमाने आपरेशन कर देथे। यहु नहीं देखय के हड़बड़ी म गड़बड़ी होवत हे अऊ ओखर मन के करनी ल आम आदमी ल मरे ल पड़त हे।
पउर बालोद म अइसने आंखी के आपरेशन बर शिविर लगाय रीहिस, कतेक झन के आंखी फुट गे। हल्ला मचीस त दु चार डॉक्टर मन ल सस्पेंड कर दिन अउ डॉक्टर मन हल्ला गुल्ला मचाईन त मामला के लीपा-पोती कर दिन।
छत्तीसगढ़ म स्वास्थ्य सेवा के बुरा हाल हे। सरकारी अस्पताल के त भगवानेच ह मालिक हे डॉक्टर हे त दवई नहीं हे अऊ ले दे के शिविर करवात हे तउनों ह गड़बड़ सड़बड़ चलत हे। उपर ले नवा नवा नियम अलग चलत हे। डॉक्टर मन ह अपन घर ले दुकान चलावत हे अऊ दवई कंपनी ले पइसा खाके मांहगी दवई लिखत हे।
अतका लुट मचे हे के झन पूछ कहात हे। उपर ले मजबूरी ए हे के गांव गांव म झोला छाप डॉक्टर मन छछल गे हे। का दवई देवत हे का ईलाज करत हे तेखर ठिकाना नहीं हे। अइसने में छत्तीसगढ़ के का कइसन विकास होही कोनों नई जानय।
सरकार ह जब ले 35 हजार रूपया के ईलाज के बात करे हे तब ले डॉक्टर मन के लुट ह अऊ बाढ़ गे हे। कहु कछु बीमारी बता के सीधा बच्चादानी ल निकाल लेवत हे। अइसन डॉक्टर मन के चिंहारी घलो होगे फेर एखर मन के कुछु नहीं बिगड़ीस। सरकार ह काखर अइसन मन उपर कड़ा कार्रवाई नहीं करय कोनों नहीं जानय।
जतका मुंह ततका बात। फेर एक बात महुं ल कहना है के जब तक लापरवाही बरतने वाला मन उपर कड़ा कार्रवाई नहीं होही। ए लंदर-फंदर चलत रही अऊ आम लोगन मन मरत रही।

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

तहीं इज्जत नहीं करबे त दूसर ल का परे हे...


छत्तीसगढ़ राज बनगे अब छत्तीसगढ़ी भासा बर आंदोलन होवत हावय, विधानसभा ले लेके सड़क तक लड़ई चलत हे। स्कूल-कालेज म पढ़ाय के उदीम घलो होवत हावय फेर मामला ह हर घांव अटक जाथे।
कोनो भी राज के विकास बर उहां के भाखा-बोली के खास महत्व हे ए बात ल छत्तीसगढिय़ा मन ह कब समझही। जब तक अपन भाखा के इज्जत नहीं होही देश दुनिया म राज के इज्जत कइसे होही। गांव-गांव म रहवईया मन म हीन भावना आ जथे के वोला हिन्दी अऊ अंग्रेजी बने ढंग के नई अवय। अऊ जब कखरों म हीन भावना आ जथे त न वो ह बने ढंग के गोठियाय सकय न अपन परेशानी ल बताय सकय। तभे त अफसर मन तीर बोले म हिचकथे।
एखर सेती हमर मानना हे के जब तक छत्तीसगढ़ी ह सरकारी काम काज के भासा नहीं बनहीं छत्तीसगढिय़ा मन के विकास होना मुश्किल हे।
अतका छोटे से बात ल इहंा के नेता मन काबर नहीं समझय। वो मन काबर छत्तीसगढ़ी ले भागत हे। तउन समझ म नहीं आवय। वोट पाय बर छत्तीसगढ़ी बोलही अऊ जीत जही तहां ले मनमाने हिन्दी अंग्रेजी झाड़थे।
मोला हेमलाल के पीरा ह आज ले सुरता हे। बपरा ह नवा नवा सरपंच बने रीहिस। गांव के विकास के ओला अड़बड़ चिंता रीहिस। गांव के समस्या ल ले के मंत्री तीर गीस। मंत्री ह छत्तीसगढिय़ा हे फेर हेमलाल तीर अइसे हिन्दी झाड़त रीहिस के ओखर जी खिसियागे। सीधा सीधा कही दिस देख गा वोट मांगे बर आथस त छत्तीसगढ़ी म गोठियास आरस मंत्री बन गेस त तोर पॉवर हे अतेक बाढ़ गे। मोरेच तीर हिन्दी झाड़त हस अइसने तोर हाल रही त तोर नेतागिरी ह कब सिराही तहीं गम नहीं पावे।
उहां ले आके हेमलाल ह गांव वाला मन तीर अपन पीरा ल कतका नहीं गोठियाय रीहिस। अऊ आज हेमलाल के बात ह सिरतोकेच होगे। मंत्री ह चुनाव हार गे। ओखर अता पता नहीं हे।
रमन सरकार के हैर्टिक के शपथ ग्रहण म हिन्दी म हावथ लेवत देख आज मोला हेमलाल के गोठ-बात ह सुरता आगे। एक झन बृजमोहन अग्रवाल ल छोड़ कोनो छत्तीसगढ़ी म शपथ नहीं लीन। जेन बृजमोहन अग्रवाल ल सब झन परदेशिया कथे तेन ह छत्तीसगढ़ी म शपथ लीन अऊ जेन मन ह छत्तीसगढ़ी के नाम देश दुनिया म करना चाही तउन मन ह हिन्दी झाड़त रीहिन।
मैं ह हिन्दी भासा के विरोधी तो हंव न मोला हिन्दी बोलईया मन ले कोनो दिक्कत हे। हमर देश के भासा हे फेर मे हा अतका जानथौ के जेन ह अपन भासा के इज्जत नहीं करय वो भासा ह त समाप्त होही जथे ओखर संस्कृति ह घलो नस्ट हो जथे। अऊ वो ह इतिहास म पेढ़ के लइक रही जथे। जेन ह अपन भासा के इज्जत नहीं करय ओखर ईज्जत चलो कोनो नहीं करय।
अऊ इही हाल छत्तीसगढिय़ा नेता मन के रही त छत्तीसगढ़ के विकास कइसे होही। हमर जीयो अऊ जीयन दो के संस्कृति के का होही तेखर सेती समय रहत चेतावत हौ बाद म पछताय के सिवाय कुछु नहीं बाचहीं।

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

महु ह पीएम बनहुं...


वो दिन निहाली ह बिहिनिया बिहिनिया घाम तापत बइठे रीहिस, ततके म ओखर नाती ह आगे, अऊ डोकरा उपर झपाके कहात हावय, ए बबा महु ह पीएम बनहु, महु ल पीएम बना दे, का का करे ल पड़ही बता देतेस त वइसने वइसने कर दुहुं।
 ओखर गोठ-बात ल सुन के वो तीर जतका झन रीहिस ततका जम्मो झन हांस डारिन, फेर सरजू ह कीहिस अबे ते हा बने बढ़ लिख ले बड़े बन जा तब पीएम बनबे, अभी त तोर उमर ह नहीं होय हावय, पीएम बने बर पढ़ई लिखई के संग चुनाव घलो जीते ल पड़थे।
  फेर निहाली के नाती कहां मानने वाला हे वो ह कहे लागीस। हमर देस के पीएम मनमोहन सिंह ह त कभु चुनाव नहीं लड़े हे फेर कइसे बनगे। वोला कोन समझातीस।
 बात ल टारे बर जीवराखन ह कही दिस, जा भाग एमेर ले बड़े-बड़े तीर नहीं लागय।  फेर वोहा कहां मानने वाला हे जतका रेडिया  टीवी म सुने हे ततके ल बपरा ह जानथे। कहे लागीस वाह महु ल पीएम बनना हे। भाजपा वाला मन ह नरेन्द्र मोदी ल पीएम बना दे हावय अऊ कांग्रेस  ह घलो राहुल गांधी ल पीएम बनाबो काहत हे। ए बबा मोला ते हा पीएम बना दे न गा। तोर का बिगड़ही तेहा हौ कहा तहा ले सब  ल मै ह मना लुहु। मोरो टीवी म  फोटो आही। मे ह टीवी म देख देख के जान डारे हौ पीएम कइसे बनथे। फेर वोला कोनो समझा नहीं सकीस, साफ कही दिस वोखर संग पढ़ईया जम्मो लइका मन ह तैयार हे। वो ह किलास म का स्कूल म अउवल आथे अब त गांव वाला मन ह घलो कथे के निहाली के नाती अड़बड़ होशियार हे। निहाली के नाती के जिद ह बाढ़तेच जात रीहिस पढ़ई लिखई ल छोड़ ओखर पूरा ध्यान ह पीएम म लग गे।
खवई पीडई, खेलई, कुदई सब ल भुला दे हावय एकेच ढन रट लगाय हावय सब झन ह टीवी वाला ल कहाव के निहाली के नाती समारू ह पीएम हे। ओखरे फोटो छपही। गांव वाला मन असकटा गे त भुलवारे बर वोला कही दिस ले आज ले तै पीएम होगेस। अतका ल सुन के समारू ह खुश होगे हावय अऊ स्कूल मर म तावत रथे मैं पीएम बनगेव मैं पीएम बनगेव। अब वोलो कोन  समझावय के पीएम का होथे। भाजपा ह एखर पहिली लालकृष्ण आडवानी ल पीएम इन वेटिंग घोषित करें रीहिस, आज तक बपरा ह वेटिंग म लगे हे।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

आप की चुनौति...


रायपुर। कांग्रेस और भाजपा की अडिय़ल रूख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी ने जो अप्रत्याशित सफलता पाई है उससे एक बात तो तय है कि भारतीय जन मानस का दोनों ही बड़ी पार्टी से विश्वास टूटा है वहा आज भी राजनीति में उच्च आदर्श के सिद्धांत की न केवल  उम्मीद करती है बल्कि अपनी उम्मीद को साकर करने के किसी भी मौके को छोडऩा नहीं चाहती।
जन लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली से शुरू हुई लड़ाई को जब गां-कस्बों में समर्थन मिले लगा तब भी इसे नौटंकी बताने वालों की कमी नहीं रही। कांग्रेस ने तो अन्ना के जनलोकपाल को सिरे से नकारा ही भाजपा की भूमिका भी संदिग्ध हो गई। संसद में पहुंचकर जन लोकपाल बनाने की चुनौती को स्वीकार करने वाले केजरीवाल को कम आंकना दोनों ही दलों के लिए परेशानी बढ़ाने वाला साबित हुआ और दिल्ली की जनता ने बता दिया कि वह सरकार से क्या उम्मीद रखती है।
आम आदमी पार्टी ने ििजस बेबाकी से सरकार बनाने के प्रस्ताव को नकारा है सही मायने में यह उच्च राजनैतिक सिद्धांत है जिसे इस देश की लगभग तमाम पार्टियों ने सत्ता की चाह में भुजला दिया है।
भाजपा और कांग्रेस ने गठबंधन की राजनीति में जो खेल खेला है उसे लोग नहीं भूल पाये है। राम मंदिर बनने से लेकर घारा  370 हटाने को लेकर वोट बटोरने के बाद सत्ता के लिए इन मुद्दों को त्यागना भाजपा के लिए आज भी  दाग बना हुुआ है।
 सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौते की परम्परा के बीच आम आदमी पाटीर्र के रूख को भले ही एक वर्ग अडिय़ल रवैया कह रहा हो पर सच तो यह है कि सिर्फ  सत्ता सुख के लिए  सिद्धांतों से समझौता न केवल अनुचित है बल्कि उन लोगों के साथ धोखा और बेईमानी है जिन लोगों ने मुद्दों की वजह से अनपा वोट और समर्थन दिया है।
इतिहास में ऐसे कितने ही उदाहरण है जब लोगों ने सिद्धांतों के आगे अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया पर वे किसी दबाव या प्रलोवन में टूटे नहीं है और वे इतिहास पुरूष बन गए है। इस  देश को आज गांधी के बाद ऐसे ही उच्च आदर्शवाले नेताओं की जरूरत है।
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में चल रहे सत्ता के खेल में स्वयं को दूर रख  एक नया आदर्श सावित किया है और हम उनसे ही ताय आदर्शो की उम्मीद करते है ताकि अब तक हो रही जनता से धोखाधड़ी बंद हो।
केजरीवाल और  उसकी पूरी पार्टी देश भर में लोकसभा का चुनाव लड़ रही है और यह कांग्रेस और भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबिह होगी। भले ही आज आम आदमी पार्टी पूरे देश बजूद को इंकार किया  जा रहा है और हमसे भी कई लोग इत्तेफाक नहीं रखते हो पर हम बता देना चाहते हैं कि आज भी इस देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत है जो अपने नेता में आदर्श ढूढंता है और इनकी संख्या किसी भी सरकार बनाने-बिगडऩे के लिए काफी है।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

मोदी का नकली लाल किला भी काम नहीं आया


आदिवासियों पर लाठी चार्ज, भाजपा पर भारी!
बस्तर बराबरी पर तो सरगुजा में कांग्रेस आगे
रायपुर। आदिवासी सीटों के सहारे सत्ता तक दो बार पहुंची भाजपा के लिए इस बर सत्ता में वापसी में आदिवासी ही बाधा बन गये हैं। कहा जाता है कि आदिवासियों पर हुए लाठी चार्ज और नक्सली वारदातों का दर्द इस बार भाजपा पर भारी पडऩे लगा है ऐसे में मैदानी इलाके में वह क्या कर पाएगी कहना कठिन है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी अब तक बस्तर के पास रही है लेकिन बस्तर से जिस तरह की खबरें आ रही है उसके बाद इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास होने की प्रबल संभावना है।
अब तक रूझान से स्पष्ट हो गया है कि बस्तर में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला बराबरी का है और इस बार भाजपा को यहां 5 से 6 सीटों का नुकसान हो सकता है। पिछले दो चुनावों में बस्तर की 12 में से 11 सीट जीतकर सत्ता में आने वाली भाजपा के कई मंत्री भी यहां कांटे की टक्कर में फंस कर रह गये हैं। सूत्रों की माने तो इस बार यहा कम्यूनिष्ट पार्टी भी एक सीट जीत सकती है ऐसे में इस बराबरी की वजह से सत्ता की चाबी इस बार दूसरे क्षेत्र में चली गई है।
इधर राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि बस्तर में बराबरी की टक्कर की वजह से इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास आ गई है जहां 14 में से 10 सीटों पर कांग्रेस की जीत निश्चित माना जा रहा है। जबकि दो सीटों पर कड़े संघर्ष की स्थिति हैं। मोदी के लिए नकली लाल किला बनाकर सत्ता हासिल करने में लगी भाजपा को सरगुजा में जबरदस्त झटका लगा है वह यहां 2003 के चुनाव में 9 व 2008 के चुनाव में 10 सीटे हासिल कर सत्ता में आई थी इस बार यहां कब्जा बनाए रखने भाजपा ने पुरजोर लगाया था। यहां तक की प्रधानमंत्री इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के लिए नकली लाल किला भी बनाकर चर्चा में आये थे लेकिन जिस तरह के रूझान सामने आ रहे हैं उसके बाद तो यही कहा जा सकता है कि यहां नरेन्द्र मोदी का सहारा भी काम नहीं आया।
यहां मिले रूझान के मुताबिक भाजपा भटगांव सीट सीधे सीत रही है जबकि मनेन्द्रगढ़ और प्रतापपुर में वह कांटे के संघर्ष में फंसी है। जिन सीटों पर कांग्रेस की जीत तय मानी जा रही है उनमें बैंकुंठपुर वेदांती तिवारी, प्रेमनगर खेलसाय सिंह, रामानुजगंज बृहस्पति सिंह, सामरी डॉ. प्रीतम राम, लुंड्रा चिंतामणी महराज, अंबिकापुर टीएस सिंहदेव और सीतापुर अमरजीत भगत शामिल है। बताया जाता है कि भाजपा के बस्तर और सरगुजा संभाग में इस स्थिति के लिए कई कारण गिनाये जा रहे हैं जिनमें से प्रमुख कारण आदिवासियों पर लाठी चार्ज के अलावा कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के अलावा भाजपा के मौजूदा विधायकों की करतुत को बताया जा रहा है।
बहरहाल सरकार किसकी बनेगी यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन यह तो तय है कि इस बार सत्ता की चाबी बस्तर ही होगी।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

रमन का अगला शिकार बैस


मुख्यमंत्री के दावेदार निपट रहे हैं पर एक-एक करके

विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ भाजपा में जो कुछ हो रहा है वैसा पहले कभी राजनीति में नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह पर मुख्यमंत्री के दावेदारों क एक एक कर निपटाने का जो खेल चल रहा है वह हैरान कर देने वाला है। जिसने भी मुख्यमंत्री की दावेदारी की उसे हाशिये में डालने की कोशिश आश्चर्यजनक है। ताराचंद, करूणा शुक्ला के बाद अब अगला शिकार रमेश बैस हो तो अचरज नहीं होगा।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बारे में राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि वे जीतने सरल सौम्य व सीधे दिखते है वैसा वे है ही नहीं। राजनीति में माहिर रमन सिंह ने जब से मुख्यमंत्री पर संभाला है उनकी अपने प्रतिनिधियों पर नजर रहती है।
पहले कार्यकाल में डॉ. रमन सि ंह के कारनामों का विरोध करने वाले आदिवासी एक्सप्रेस की उन्होंने जिस बखुबी से हवा निकाली वह भले ही राजनैतिक सुझ बुझ कहा जाए लेकिन इसके बाद उन्होंने अपने विरोधियों के पर कतरने शिवराज सिंह, नंदकुमार साय और ताराचंद साहू को हाशिये पर लाने की कोशिश की शिवराज और नंदकुमार साय को इस कदर हाशिये पर डाला गया कि वे इससे उबर ही नहीं पा रहे है। जबकि स्व. दिलीप सिंह जुदेव ने सार्वजनिक रूप से रमन राज को प्रशासनिक आतंक की संज्ञा दी। स्व. ताराचंद साहू को तो पार्टी छोडऩे पर मजबूर कर दिया और  इसके बाद महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष करूणा शुक्ला इसलिए निशाने पर आये क्योंकि वे भी मुख्यमंत्री की प्रबल दावेदार होने लगी थी।
सूत्रों की माने तो करूणा शुक्ला को एक खेमे ने सांसद बनने से रोकते हुए जमकर भीतर घात किया और नितिन गडकरी के करीबी संचेती बंधुओं के कोल ब्लाक घोटाले में जब वे मुखर हुई उसी दिन से उन्हें हाशिये में डालने की जो कोशिश हुई उससे त्रस्त करूणा शुक्ला को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा।
बताया जाता है कि कुर्र्सी के लिए जो जो नेता खतरा बनकर उभरे उन्हें बाटने की झाजिश को लेकर भाजपा में कई तरह के सवाल उठने लगे है और लोग भाजपा में चल रहे इस खेल को जोगी राज से भी खतरनाक मानने लगे हैं। भाजपा में अब इस बात की चर्चा है कि डॉ. रमन सिंह का अगला शिकार रायपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद रमेश बैस होंगे? कहा जाता है कि रमन सिंह के खिलाफ जरा भी माहौल बिगड़ा तो रमेश बैस ही मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार है और वे दिल्ली में भी अच्छी पकड़ रखते हैं।
हालांकि कुछ लोग अगला शिकार के रूप में तेजी से उभर रही दुर्ग की सांसद सरोज पाण्डेय को भी बता रहे है और इन दिनों सरोज पाण्डेय को भी हाशिये में डालने की जबदस्त कोशिश हो रही है।
भाजपा में बड़े नेताओं को जिस तरह से हाशिये में डालने की कोशिश हो रही है वह आश्यर्च जनक है और यह खेल नहीं रूका तो आने वाले दिनों में भाजपा को मुसिबत बढ़ सकती है।
बहरहाल डॉ. रमन सिंह के सरल चेहरे के पीछे के सच को लेकर चल रही चर्चा थमने का नाम नहीं ले रहा है।
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