गुरुवार, 12 जून 2025

रोहतक की वह बेटी जिसने जिया उल हक़ जैसे क्रूर तानाशाह की नींद उड़ा दी थी

रोहतक की वह बेटी जिसने जिया उल हक़ जैसे क्रूर तानाशाह की नींद उड़ा दी थी,,,


रोहतक के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी दसेक साल की उस दुबली मुस्लिम लड़की की एक सबसे पक्की हिन्दू सहेली थी. सहेली और उसकी बहन अपने संगीतप्रेमी पिता के निर्देशन में क्लासिकल गाना सीख रही थीं. एक दिन उस लड़की ने उनके सामने ऐसे ही कुछ गा दिया. शाम को सहेली के पिता उसे घर छोड़ने गए और उसके पिता से बोले – “"मेरी बेटियां अच्छा गा लेती हैं पर आपकी बेटी को ईश्वर से गायन का आशीर्वाद मिला हुआ है. संगीत की तालीम दी जाए तो वह बहुत नाम कमाएगी."  

यूँ 1945 के आसपास उस लड़की के लिए दिल्ली घराने के एक बड़े उस्ताद की शागिर्दी में भर्ती किये जाने की राह खुली. उस्ताद की संगत में जल्द ही उसने दादरा और ठुमरी जैसी शास्त्रीय विधाओं में प्रवीणता हासिल कर ली. पार्टीशन के 4-5 साल तक वह दिल्ली में गाना सीखती रही. 17 की हुईं तो उम्र में उनसे काफी बड़े एक पाकिस्तानी जमींदार को उनसे इश्क हो गया. जल्द ही इस शर्त पर दोनों का निकाह हुआ कि शादी के बाद भी उस की संगीत यात्रा पर कोई रोक नहीं आने दी जाएगी. पति ने अपना वादा अपनी मौत यानी 1980 तक निभाया.

यूँ हमें इक़बाल बानो नसीब हुईं. “हम देखेंगे” वाली इक़बाल बानो!

इक़बाल बानो की गायकी का सफ़र उनकी जिन्दगी जैसा ही हैरतअंगेज रहा. कौन सोच सकता था दादरा और ठुमरी जैसी कोमल चीजें गाते-गाते वह दुबली लड़की उर्दू-फारसी की गजलें गाने लगेगी और भारत-पाकिस्तान से आगे ईरान-अफगानिस्तान तक अपनी आवाज का झंडा गाड़ देगी. उसकी आवाज में एक ठहराव था और गायकी में शास्त्रीयता को बरतने की तमीज. 

फिर 1977 का साल उसके मुल्क में अपने साथ जिया उल हक जैसा क्रूर तानाशाह लेकर आया. धार्मिक कट्टरता के पक्षधर इस निरंकुश फ़ौजी शासक ने तय करना शुरू किया कि क्या रहेगा और क्या नहीं. इस क्रम में सबसे पहले उसने अपने विरोधियों को कुचलना शुरू किया. उसके बाद डेमोक्रेसी और स्त्रियों की बारी आई. जिया उल हक ने यह तक तय कर दिया कि औरतें क्या पहन सकती हैं और क्या नहीं. पाकिस्तान की औरतों के साड़ी पहनने पर इसलिए पाबंदी लग गयी कि वह हिन्दू औरतों का पहनावा थी.

कला-संगीत-कविता जैसी चीजों को गहरा दचका भी इस दौर में लगा. फैज़ अहमद फैज को मुल्कबदर कर दिया गया. हबीब जालिब को जेल भेज दिया गया. उस्ताद मेहदी हसन का एक अल्बम बैन हुआ. शायरों-कलाकारों को सार्वजनिक रूप  से कोड़े लगे. करीब बारह साल के उस दौर की पाशविकताओं और अत्याचारों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है.  

ऐसे माहौल में इक़बाल बानो ने विद्रोह और इन्कलाब के शायर फैज़ को गाना शुरू किया. सन 1981 में जब उन्होंने पहली बार फैज़ को गाया, निर्वासित फैज़ बेरूत में रह रहे थे और उनकी शायरी प्रतिबंधित थी. 

उसके बाद जमाने ने इक़बाल बानो का जो रूप देखा उसकी खुद उन्हें कल्पना नहीं रही होगी. बीस साल पहले उनकी आवाज कोमल, तीखी और सुन्दर हुआ करती थी – अनुभव और संघर्ष के ताप ने अब उसे किसी पुराने दरख्त के तने जैसा मजबूत, दरदरा और पायेदार बना दिया था. अचानक सारा मुल्क पिछले ही साल विधवा हुई इस प्रौढ़ औरत की तरफ उम्मीद से देखने लगा था.   

गुप्त महफ़िलें जमाई जातीं. प्रतिबंधित कविताएं गाई जातीं. स्कूल-युनिवर्सिटियों में पर्चे बांटे जाते. इक़बाल बानो हर जगह होतीं.

फिर 1986 की 13 फरवरी को लाहौर के अलहमरा आर्ट्स काउंसिल के ऑडीटोरियम में वह तारीखी महफ़िल सजी. पूरा हॉल भर चुकने के बाद भी हॉल के बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी. आयोजकों ने जोखिम उठाते हुए गेट खोल दिए. सीढियों पर, फर्श पर, गलियारों में – जिसे जहाँ जगह मिली वहीं बैठ गया. कुछ हजार सुनने वालों के सामने इक़बाल बानो ने फैज़ अहमद फैज़ को गाना शुरू किया:

“हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है, जो लौह-ए-अज़ल में लिक्खा है

हम देखेंगे”

इस नज्म के शुरू होते ही समूचे हॉल में बिजली दौड़ने लगी. सुनने वालों के रोंगटे खड़े होना शुरू हुए. दर्द के नश्तरों से बिंधी, इक़बाल बानो की पकी हुई आवाज के तिलिस्म ने धीरे-धीरे हर किसी को अपनी आगोश में लेना शुरू किया. अजब दीवानगी का आलम तारीं होने लगा. लोगों ने बाकायदा लयबद्ध तालियों से इक़बाल बानो का साथ देना शुरू किया. 

फिर नज्म का वह हिस्सा आया:

"जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे" 

भीड़ तालियाँ बजाने लगी. इन्कलाब और इक़बाल बानो की जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू हो गए. इस शोरोगुल के थामने तक इक़बाल बानो को गाना बंद करना पड़ा. उन्होंने फिर गाना शुरू किया. इस दफ़ा लोग बेकाबू होकर रोने लगे. 

कई बरसों की रुलाई दबाये बैठा एक मुल्क सांस लेना शुरू कर रहा था. 

उस रात अलहमरा आर्ट्स काउंसिल के आयोजकों-मैनेजरों के घर छापे पड़े. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर प्रोग्राम की सारी रेकॉर्डिंग्स जब्त कर जला दीं. किसी तरह एक प्रति स्मगल होकर दुबई पहुँच गयी. उसके बाद फैज़-इक़बाल बानो की उस जुगलबंदी का नया इतिहास लिखा जाना शुरू हुआ. दुनिया भर के युवा आज भी उसे लिख रहे हैं.

दो बरस बाद जिया उल हक के अपने ही सलाहकार-साथियों ने उस जहाज में आमों की एक पेटी के भीतर बम छिपा दिए थे जिस पर उसे यात्रा करनी थी. ये बम बीच आसमान में फटे. तब से बीते इतने बरसों में जनरल जिया की हेकड़ी का भूसा भर चुका है. 

इक़बाल बानो आज तक महक रही हैं. पता है 13 फरवरी 1986 की उस रात की कंसर्ट में इक़बाल बानो क्या पहन कर गई थीं?

काले रंग की साड़ी!

Cpd

#AshokPande  जी की जादुई लेखनी

बुधवार, 11 जून 2025

ट्रंप के भारत विरोधी एजेंडे की असली वजह…

 ट्रंप के भारत विरोधी एजेंडे की असली वजह…


यह पूरा देश जानता है कि कभी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को अपना सबसे बड़ा मित्र बताया था तब ट्रंप आख़िर ऐसी हरकत क्यों कर रहा है जिससे मोदी की छीछालेदर तो हो ही रही है भारत का नाम भी न केवल दुनिया में ख़राब हो रहा है बल्कि नई तरह की मुसीबत खड़ी हो रही है…

क्या इसकी वजह नरेंद्र मोदी की कोई चाल है जिसकी वजह से ट्रंप नाराज़ हो गया, या फिर इसकी वजह मोदी का मित्र प्रेम है या फिर ब्रिक्स में डॉलर को चुनौती देना या फिर कुछ और …

सोशल मीडिया में कितने ही क़यास चल रहे है इन क़यासों के बीच रजनीश जैन लिखते हैं- लॉस एंजेलिस में चल रहे दंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं, लेकिन उनका भारत-विरोधी एजेंडा रुकने का नाम नहीं ले रहा। वायरल तस्वीरों में एक अप्रवासी  भारतीय छात्र को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर हर भारतीय का खून खौल उठता है। यह न केवल एक व्यक्ति का अपमान है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान पर हमला है। फिर भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रहस्यमयी चुप्पी देश को हैरान कर रही है।

ट्रम्प प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्ती बरतते हुए भारतीयों को निशाना बनाया है। 2025 में सैन्य विमानों से 104 भारतीयों को हथकड़ियों में वापस भेजने की घटना ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं। सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने सही कहा कि भारत को अमेरिका से मानवीय व्यवहार की मांग करनी चाहिए थी, न कि अपराधियों सा बर्ताव स्वीकार करना चाहिए था। ट्रम्प का यह रवैया उनकी भारत-विरोधी नीतियों का हिस्सा है, जो भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में मध्यस्थता के दावे और भारत के रूस-चीन संबंधों पर तंज से स्पष्ट है।

मोदी सरकार की चुप्पी इस मामले को और गंभीर बनाती है। कभी ट्रम्प के लिए "अबकी बार ट्रम्प सरकार" का नारा देने वाले मोदी आज उनके सामने भारत का सम्मान दांव पर लगने के बावजूद खामोश हैं। क्या यह वही "मजबूत" भारत है, जिसका दावा सरकार करती रही है? विदेश मंत्रालय की ओर से सिर्फ औपचारिक बयानबाजी और सहयोग की बातें सामने आ रही हैं, लेकिन ठोस कदमों का अभाव है।

भारत को अब कूटनीतिक दबाव बनाना होगा। ट्रम्प के टैरिफ और निर्वासन नीतियों का जवाब भारत को अपने व्यापारिक और सामरिक हितों की रक्षा करते हुए देना चाहिए। भारतीय छात्रों और प्रवासियों के सम्मान की रक्षा के लिए अमेरिका में भारतीय दूतावासों को सक्रिय होना होगा। मोदी सरकार को चाहिए कि वह ट्रम्प के सामने भारत का पक्ष मजबूती से रखे, न कि चुप्पी साधे। देश का स्वाभिमान दांव पर है, और अब समय है कि भारत अपनी आवाज बुलंद करे।  लेकिन सिंदूरी लाल अपने ग्यारह साल को सदी के बेहतरीन साल मनवाने को आमादा है।

मंगलवार, 10 जून 2025

तब सवाल सिर्फ़ सोनम का नहीं है…

 तब सवाल सिर्फ़ सोनम का नहीं है…


राजा रघुवंशी और सोनम! पिछले कई दिनों से लोगों के ज़ेहन में कितने ही सवाल खड़े कर चुके हैं। पुलिस ने तो दावा भी कर दिया कि सोनम ही राजा की कातिल है… लेकिन कुछ सवाल अब भी बाक़ी है…

इंदौर के मिसिंग कपल का मेघालय से गायब हो जाना, उनमें से एक राजा रघुवंशी की हत्या हुई।फिर बदहवास हालत में सोनम रघुवंशी का मेघालय से बहुत दूर गाजीपुर में बरामद होना, पूरे देश में सनसनी मचा दी , कितने ही सवाल लोगों के ज़ेहन में उठे तो कितनी ही आशंका। जिसका जो मन चाहा सवाल उठाने लगे लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आख़िर सोनम ने हत्या जैसा कदम क्यों उठाया ?

लेकिन इसके अलावा भी कुछ सवाल है जिनके जवाब अभी आना बाकी है!

मीडिया पुलिस की थ्योरी पर काम कर रहा है *ओपन एंड शट* केस की तरह इसको एक सामान्य प्रेम प्रकरण की कथा बताया जा रहा है लेकिन यदि आप सारी स्थितियों का अन्वेषण करेंगे तो आपको बहुत सारे पेचीदा तथ्य नजर आएंगे! 

हो सकता है जो स्टोरी पुलिस एस्टेब्लिश करना चाहती है वैसा ही हो लेकिन फिर भी हर पहलू का निरीक्षण जरूरी है! 

मीडिया का काम होता है ऐसे उलझे हुए सवालों को न सिर्फ जनमानस के सामने लाना बल्कि प्रशासन को भी उनके प्रति जवाब देह बनाना!

लेकिन मीडिया क्या कर रहा है जो भी सोर्स है उसके वह सीधे पुलिस की स्टोरी से जुड़े हुए हैं वह इस एक सामान्य प्रेम प्रकरण की तरह पेश कर रहा है और लगभग उसने आम आदमी की मानसिकता में यह धारणा बना  दी है तो सोनम का किसी राज कुशवाहा से प्रेम प्रकरण था जो उस से 5 साल छोटा था उसी के पिता की फैक्ट्री में काम करता था और इस प्रेम के चलते  इस घटना को अंजाम दिया गया!

*मेघालय के मुख्यमंत्री* *कोनारूडसंगमा* के बयान के बाद  मीडिया इन्वेस्टिगेशन तो मानो एक तरह से रुक गया है! 

उसके पहले तक तो कभी बांग्लादेश रोहिगयो का नाम आ रहा था, कभी स्थानीय लूट से उसे जोड़ा जा रहा था, और कभी दुर्घटना का एंगल भी प्रस्तुत किया जा रहा था !

क्योंकि यह केस हाई प्रोफाइल हो चुका था पूरे देश में इसकी चर्चा थी उसके बाद पुलिस पर बहुत दबाव था और मेघालय पुलिस के लिए यह चुनौती बन गया था! 

पुलिस सब पहलुओं को विचार करती है लेकिन पुलिस के सामने एक बहुत बड़ा पहली यह भी होता है कि वह राज्य की आकांक्षाओं के अनुसार  इन्वेस्टिगेशन को अंजाम दें!

पर्यटन मेघालय का बहुत बड़ा व्यापार है और वहां की आर्थिक जीवन रेखा है यदि इस तरह की घटनाएं वहां सामने आती है और अगर उनके संदर्भ स्थानीय लूटपाट से या अंतर राष्ट्रीय अपहरणों से जुड़ता है तो उसका प्रभावित होना संभावित होता है! 

मुख्यमंत्री संगमा की पूरा प्रकरण में हाइपरएक्टिव भूमिका इस संदर्भ में रोचक विषय है! मर्डर मिस्ट्री अधिकांश पुलिस वाले ही डिक्लेअर करते हैं लेकिन यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री ने x पर इसको शेयर कर कर सोशल मीडिया के माध्यम से सारे देश को सूचना दी थी!

यहां एक तथ्य और काबिले गौर है, पुलिस ने अभी तक पूरी तरह एस्टेब्लिश स्टोरी की जानकारी नहीं दी है यानी जो कुछ मीडिया पर कहां जा रहा है वह पूरी तरह पुष्ट नहीं है!

कभी-कभी पुलिस   एक्यूज को कंफ्यूज करने के लिए सूडो स्टोरी भी एस्टेब्लिश करती है ताकि अपराधी निश्चित हो जाए और गलतियां करें ताकि वह पकड़ में आ सके! 

सोनम के बयान अभी भी यही है उसे फसाया जा रहा है उसके साथ जो कुछ घटा 10 दिनों मे लेकर मीडिया में पूरी तरह जानकारी नहीं दी गई है ना पुलिस ने उसके बारे में बहुत विस्तार से बताया है! 

और इसके लिखने के पीछे कुछ और तथ्य भी हैं, गाड़ी के ड्राइवर के बयान और ढाबे वाले के बयान यह तस्दीक कर रहे हैं , जब गाजीपुर में सोनम को देखा गया वहां आने के पहले तक वह बदहवास हालत में थी!

जिस राज कुशवाहा के साथ सोनम का प्रेम प्रकरण बताया जा रहा है उसके कोई डॉक्यूमेंट्री प्रूफ नहीं है यह एक सुनी सुनाई बातों का और मीडिया की कल्पना का आभासी चित्र है! 

तीसरा यदि सोनम को अपने प्रेमी के साथ फरार ही होना था तो उसके लिए राजा की हत्या करना क्यों जरूरी था यह तथ्य भी समझ के  परे हैं!

जिन लोगों को सुपारी किलिंग के लिए हायर किया हुआ बताया जा रहा है क्या वह हिस्ट्रीशीटर है, उनका क्या ऐसा इतिहास है अभी यह परीक्षण का विषय है!

अगर वह लूट थी तो फिर राजा के साथ सोनम को क्यों नहीं मारा गया यह भी एक बहुत बड़ा सवाल है! 

पुलिस तथ्य जुटा रही है अंतिम सत्य सामने आने तक हमें हमारी मानसिकता बनाने की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी! 

 हमारीचोटिल सामाजिक और मानसिक स्थिति के लिए तथ्यों को पूरी कसौटी पर कसना जरूरी है! 

क्योंकि यह सिर्फ सोनम के भरोसे का नहीं, औरत जात के भरोसे का सवाल है जो समाज का निर्माण करती है! 

प्रेम की अंधी पराकाष्ठा, और एक विवाहित स्त्री की नैतिकता के बीच में कर्तव्यों की अधर झूल इस कहानी के सारे सूत्र खुल जाने के बाद समाज में नए मानदंड तय करेगी!(साभार)

रविवार, 8 जून 2025

मंदिर-मंदिर घुमते मस्क की सच्चाई क्या हिंदू धर्म का अपमान नहीं…

 मंदिर-मंदिर घुमते मस्क की सच्चाई क्या हिंदू धर्म का अपमान नहीं…


एलन मस्क के पिता एरोल के भारत आ कर मंदिर मंदिर घुमते तस्वीर को लेकर कितने ही सवाल है और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जिस व्यक्ति का पूरा जीवन सनातन धर्म के विपरीत रहा है उसे लेकर न तो नफ़रती चिंटुओं की भावना आहत हो रही है न ही मंदिर के पुजारियों की। गौ मांस का सेवन करने वाले एरोल सिर्फ़ बिज़नेस के लिए भारत आये हैं और वे मंदिर मंदिर सिर्फ़ सरकार को खुश करने घुम रहे हैं इसके बाद भी यदि नफ़रती चिंटुओं को उनके साथ तस्वीर खिंचाने में मज़ा आ रहा है तो आप भी जान ले कि एलन मस्क के इस पिता एरोल की हक़ीक़त…

एरोल ग्राहम मस्क का जन्म वाल्टर और कोरा अमेलिया मस्क ( नीरॉबिन्सन) के घर 25 मई 1946 को प्रिटोरिया में हुआ था। उनके पिता दक्षिण अफ़्रीकी थे और उनकी माँ अंग्रेज़ थीं। उन्होंने क्लैफ़हम हाई स्कूल में पढ़ाई की, जहाँ उनका मेय हल्दमैन के साथ रिश्ता शुरू हुआ [ 3 ] जिनसे उन्होंने 1970 में शादी की। [ 4 ] परिवार प्रिटोरिया में रहता था , जहाँ मेय ने आहार विशेषज्ञ और एक मॉडल के रूप में काम किया। [ 3 ] उनके पहले बच्चे, एलोन रीव मस्क का जन्म 28 जून 1971 को हुआ, जिसका नाम मेय के दादा जे. एलोन हल्दमैन के नाम पर रखा गया, रीव उनकी नानी का पहला नाम था। [ 3 [ 1 ]

1979 में मस्क और उनकी पत्नी मेय का तलाक हो गया। [ 3 [ 23 ] अपने संस्मरण में मेय ने अपनी शादी को अपमानजनक बताया और आरोप लगाया कि एरोल हिंसक था। [ 24 ] वह अपने तलाक के दौरान एक समय को याद करती है जब उसने एक पड़ोसी के घर में शरण ली थी जब एरोल उसे ढूंढते हुए चाकू लेकर आया था। [ 12 ] तलाक के बाद, मस्क ने अपने बच्चों की कस्टडी के लिए अपनी पूर्व पत्नी पर बार-बार मुकदमा किया। [ 12 ]उन्होंने कुछ समय के लिए सू नाम की एक महिला से शादी की थी। [ 12 ]

1990 के दशक की शुरुआत में, एरोल ने, जो उस समय 45 वर्ष के थे, 25 वर्षीय हेइडे बेजुइडेनहौट से विवाह किया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि वह "मेरे जीवन में देखी गई सबसे सुंदर महिलाओं में से एक थी।" [ 25 ] बेजुइडेनहौट से उनकी दो बेटियाँ थीं। [ 26 ]

1992 में एरोल मस्क दक्षिण अफ्रीका में Heidi Bezuidenhout नाम की महिला से दूसरी शादी करते हैं ,


● Heidi को पहली शादी से चार साल की बेटी Jana थी...!


● Jana जब जवान होती है तब एरोल मस्क अपनी इस सौतेली बेटी को पेट से कर देता है अब तो वो दो बच्चों की माँ हैदोनों केबीच 42 वर्ष का अंतर है...!


 एलन मस्क अपने पिता की हरकत पर उन्हें EVIL कहा हैइस बात की सच्चाई इसकी ख़ुद की वेबसाइट विकिपीडिया पर भीमौजुद है...!


● अब ऐसे आदमी को एक राज्य में मंदिर दर्शन के नाम पर स्टेट गेस्ट का दर्जा दिया जा रहा है क्या यह उचित है...?

दूसरी अहम बात ये एलन मस्क का पिता तो गौ मांस भी खाता है,

इसे प्रभु श्री राम जी के मंदिर औऱ अयोध्या में इतनी इज़्ज़त क्यो दी जा रही है VHP Digital वालो...?

या अब RSS org हिंदू की भावनाओं को रुपए में बेचते हो...?

● ज्ञात हो एलन मस्क ऐरोल मस्क की पहली बीवी से पैदा हुवे हैं जिसे ऐरोल मस्क ने तलाक़ देकर दूसरी महिला के साथ सालों तकलिव इन रिलेशनशिप में थे लेक़िन उससे कोई संतान नही होने से उससे अलग होकर तीसरी शादी Heidi Bezuidenhout नाम कीमहिला से किये जिस महिला की उसके पहले तलाकशुदा पति से महज 4 साल की बेटी थीजिसका नाम Jana है अब इसी सौतेलीबेटी के जवान होने पर ऐरोल मस्क को 2 औलाद Jana से हुवे हैं , ऐसे चरित्रहीन (कैरेक्टर लेसको मंदिरों में घुमाना स्टेट गेस्ट बनाना कितना  उचित है...!

शनिवार, 7 जून 2025

सबूत के साथ राहुल ने उठाये चुनाव पर सवाल

 सबूत के साथ राहुल ने चुनाव पर उठाये सवाल…


देश के नामचीन अखबारों में आज राहुल गांधी के छपे लेख से मोदी सत्ता को कितना फ़र्क़ पड़ेगा कहना मुश्किल है लेकिन जिन चुनावी व्यवस्था को लेकर राहुल ने सबूत के साथ बेईमानी को सामने रखा है क्या जनमानस पर इसका असर 

राहुल गांधी ने लिखा यह पांच प्रमुख तरीके हैं जिनसे चुनाव प्रभावित किया जा रहे हैं! पहले उन्होंने लिखा चुनाव आयोग की नियुक्ति को लेकर सरकार ने जो कुछ भी कदम उठाए हैं वह पारदर्शी नहीं है 

आप खुद सोचे cji ,प्रधानमंत्री और वि पक्ष का नेता चुनाव आयोग के अधिकारी तय करता था मुख्य चुनाव आयोग के अधिकारी को तय करने के लिए इन तीन सदस्यों की कमेटी थी जो बहुमत से किसी को भी चुनाव आयोग का अध्यक्ष  बनाती थी!

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने संसद में प्रस्ताव पास कर कर अपने बहुमत की ताकत से इस पूरी प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया है उन्होंने आगे लिखा अब मुख्य चुनाव अधिकारी बनने के लिए cji को हटाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री को शामिल कर लिया गया है ऐसे में आप खुद सोच सकते हैं एक निष्पक्ष आदमी को हटाकर एक पूर्वाग्रह वाले आदमी को यदि नियुक्ति के लिए आगे करते हैं तो इसका सीधा मतलब है आपका मन साफ नहीं है! 

जब दो व्यक्ति एक साथ मिलकर किसी अपने व्यक्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति को जिस पर देश का विश्वास नहीं है चुनाव अधिकारी बनना चाहेंगे तो विपक्ष का नेता और उसके विरोध के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ेगा! 

सब इसलिए किया गया ताकि चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का नियंत्रण रह सके ताकि वह अपने हिसाब से चुनाव को मैनेज कर 

राहुल गांधी फिर फर्जी वोटो का जिक्र करते हैं उनका कहना है की चुनाव आयोग को अपने हिसाब से मैनेज करने के बाद सरकार चुनाव जीतने के लिए फर्जी वोटो का उपयोग करती है! 

 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 76 लाख वोट बढ़ाए गए और उन चुनाव क्षेत्र को टारगेट किया गया जहां लोकसभा चुनाव में वह हारी वो!

उन्होंने इस बात के साक्ष्यप दिए की एक ही वाटर नंबर से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से वाटर दर्ज हैं जिनका उपयोग फर्जी वोटो के लिए किया जाता है! 

राहुल गांधी लिखते हैं फर्जी वोटरों के लिए कुछ बूथ भाजपा द्वारा निश्चित कर लिएजाते हैं, उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में 100000 वाटर केंद्र है लेकिन इसमें से सिर्फ 12000 बूथ का चयन किया गया जहां फर्जी वोटिंग करवाई गई!

ऐसे मतदान केदो पर औसतन 600 वोट फर्जी डालें अब आप सोच सकते हैं 5:00 बजे बाद यह 600 वोट डाले जाएं तो 10 घंटे का समय लगता है प्रति वाटर समय के हिसाब से क्या किसी बूथ पर भी 10 घंटे लाइन रही है! 

एक और आश्चर्यजनक बात यह थी बड़े हुए फर्जी वोटरों में नई उम्र के वोटर नहीं थे ज्यादातर उम्र दराज वॉटर थे जो चुनाव आयोग के इस दावे को भी गलत साबित करता है कि यह नए वोटरों में उत्साह की वजह से हुआ है!

नांदेड लोकसभा क्षेत्र इसका एक बेहतरीन उदाहरण है जहां पार्लियामेंट के चुनाव में यूपीए का उम्मीदवार जीत जाता है और वही सारी विधानसभा सीटों पर भाजपा का गठबंधन और वोटो का मार्जिन विधानसभा में इतना ही रहता है जीतने वोट बढ़ाए गए थे!

 भारतीय लोकतंत्र में यह बेहद चौंकाने वाला उदाहरण है एक ही मतदाता पर्ची लेकर बूथ में वोट डालने गया और अलग-अलग पार्टियों को वोट डाला और आश्चर्य तो इस बात का था कि उसने स्टेट में देवेंद्र फडणवीस को केंद्र में मोदी जी से ज्यादा प्राथमिकता दी! सवाल था क्या यह संभव है?

इसी तरह कामठी विधानसभा का उदाहरण भी दिया गया जहां लोकसभा में कांग्रेस को 136000 वोट मिले थे और भाजपा नीत गठबंधन को 119000 विधानसभा में यहां 50000के  लगभग वोट बढ़ाए गए और जब परिणाम आया विधानसभा का तो कांग्रेस को वोट मिले 134 000 जो पिछले लोकसभा के ही आसपास थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के वोट बढ़ाकर 175000 हो गए जिसमें 50000 वोटो का बहुत योगदान था!

राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया के चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के बाद जानबूझकर बढ़ा हुआ मत प्रतिशत बताया जाता है, 5:00  बजे के बाद जिन बूथों पर 

भारी मात्रा में मतदान प्रतिशत बताया जाता है यह सब मैनेज किया हुआ होता है! 

राहुल गांधी ने मिसमैच को लेकर भी सवाल उठाए राहुल गांधी का कहना था जब वोटिंग मशीन  इतनी परफेक्ट है तो जीतने वोट डाले जाते हैं उससे ज्यादा क्यों गिनती है या कम क्यों 

राहुल गांधी ने चुनाव चोरी करने के लिए चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा जवाब नहीं दिया जाता और जो तथ्य पूछे जाते हैं उनको तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है! 

उल्लेखनीय है की वोटिंग लिस्ट के सवाल पर कांग्रेस के तमामतर सवाल जो किए गए थे 

चुनाव आयोग ने  अभी तक उनका तथ्यात्मक जवाब नहीं दिया है! कुछ मामलों में तो उन्होंने यह कह कर भी पल्ला झाड़ लिया है कि हमारे पास इसका रिकॉर्ड नहीं है! 

अपनी शिकायत और सवालों का जवाब न देकर भारतीय लोकतंत्र की जो पारदर्शी पहचान थी उसको भी भारतीय चुनाव आयोग द्वारा खंडित किया जा रहा है! 

राहुल गांधी ने यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा सबूत को नष्ट किया जाता है ताकि उसे साबित नहीं किया जा सके! 

क्या आवश्यकता थी वोटिंग मशीनों से डाटा इरेज़ करने की, दिन भर वोटिंग मशीनों में काम आने वाली बैटरी है आखिर क्यों कई दिन बाद भी 100% पाई जाती है जब वोट गिने जाते हैं!

चुनाव आयोग ने हरियाणा के महाराष्ट्र के यहां तक की लोकसभा चुनाव के भी डाटा इरेज़ कर दिए हैं मशीनों से डाटा हटा दिए गए हैं! 

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद भी जब हजारों रुपए जमा कराकर ईवीएम मशीन को री  चेक करने की बात की गई तो चुनाव आयोग ने जिन हुए दाताओं को नहीं बताया बल्कि मार्क ड्रिल कर कर मशीन की सत्यता स्थापित करने की कोशिश की जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है! हिंदी अंग्रेजी दोनों में छपे इस लेख में राहुल गांधी ने इन पांच बातों से किस तरह चुनाव चोरी किया जाता है इसके बारे में विस्तार से लेख में अपनी बात रखी है !

महाराष्ट्र चुनाव के बाद जन विचार संवाद के पटल पर लगातार क्रमशः धारावाहिक के रूप में मैंने इन चुनाव चोरी पर फीचर लिखे थे और चुनाव व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए थे आज राहुल गांधी जी ने भी इस व्यवस्था को नंगा करने का प्रयास किया है और देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए शायद चुनाव की पारदर्शिता बेहद जरूरी है!

आखिर भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक पारदर्शी चुनाव व्यवस्था के इ तने खिलाफ क्यों हैं?पारदर्शी चुनाव की बात करते ही वह सबूत की बात करते हैं अरे सबूत तो चुनाव आयोग नष्ट कर रहा है कहां से  लाएंगे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशो का उल्लंघन हो रहा है सरकार, मुक्त दर्शक बनी हुई है और कानून के हाथ बांध दिए गए हैं क्या यह सब अपने आप में प्रमाण नहीं दाल में कुछ काला है? (साभार)


शुक्रवार, 6 जून 2025

दोस्त दोस्त न रहा…

 दोस्त दोस्त न रहा…


दरअसल न तो ट्रंप किसी के दोस्त हो सकते हैं और न ही अमेरिका ? ऐसे में ट्रंप को जिताने के लिये जिस तरह से नमस्ते ट्रंप का नारा बेकार गया उसी तरह से एलन मस्क की दोस्ती भी छू हो गई । क्या होगा इसका दूरगामी परिणाम..

असल में दोस्ती बेहद ही नाजूक रिश्ता है, और यदि दोस्ती इसलिए हुई हो कि स्वार्थ पूरा हो तब इसका टूटना तय है और शायद यही वजह है कि अपनी दूसरी पारी में ट्रम्प ने इस दोस्ती की पोल खोल दी और न केवल मोदी सरकार बल्कि भारतीयों की बेइज्जत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा लेकिन मोदी ख़ामोश हैं । क्यों? ये बड़ा सवाल है ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अपने उद्योगपति मित्र की वजह से क्या ब्लेकमेलिंग का शिकार हो रहे हैं 

तो दूसरी तरफ़ एलन मस्क से भी ट्रंप के रिश्ते समाप्त होने की ख़बर हैं लेकिन मोदी की तरह मस्क चुप नहीं हैं बल्कि वे खुलकर सामने आ गये हैं।

हालाँकि दोनों तरफ से आरोपों की झड़ी लग चुकी है , एक दूसरे को बर्बाद करने की कस्मे खाई जा रही है।  मस्क ट्रम्प पर महाभियोग चलाने के लिए कांग्रेस के सदस्यों से अपनी आत्मा जगाने की बात कर रहे है। ट्रम्प सरकारी ठेकों से मस्क को निकालने की बात कर रहे है। 

इसी दौरान मस्क ने ' एप्सटीन ' फाइल को सार्वजनिक करने की मांग कर दी है।  रंगीन मिजाज यौन अपराधी जेफ्री एप्सटीन ने आत्म हत्या कर ली है लेकिन उनके मुक़दमे से संबंधित दस्तावेजों में ट्रम्प का नाम भी आया है। ट्रम्प का चरित्र वैसे भी खुली किताब रहा है। आप चाहे तो दो और दो का जोड़ लगाकर अपनी राय बना सकते है !

दो भैंसों की लड़ाई में हमेशा घाँस कुचली गई है। कल डोजोन्स गिरकर बंद हुआ और टेस्ला के शेयर इतिहास में दूसरी बार 14 परसेंट हलके हुए। मस्क की दौलत के सागर से 34 बिलियन डॉलर की बूंद छलक गई। 

है न ग़ज़ब क़िस्से, दोस्ती के ये दोनों क़िस्से इतिहास में दर्ज तो होंगे लेकिन इसे किस रूप में लिया जाएगा , कहना मुश्किल है।

गुरुवार, 5 जून 2025

संसद का विशेष सत्र बुलाने से डरी मोदी सत्ता…

 संसद का विशेष सत्र बुलाने से डर गई मोदी सरकार…


ढाई सौ सांसदों ने जब मोदी सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग लिखित में की तो सरकार ने साफ़ मना कर दिया, क्यों? सरकार का यह फ़ैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि परिस्थितियाँ सामान्य नहीं है, आतंकवादी अभी भी नहीं पकड़े गये है, सीजफ़ायर क्यों और कैसे हुआ, भारत की कूटनीति इतनी कमजोर क्यों, और सबसे बड़ा सवाल राफ़ेल को लेकर है। तब सत्र नहीं बुलाने को लेकर विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है…



पहलगाम के बाद सीजफ़ायर को लेकर  ट्रंप के मुद्दे पर सरकार बुरी तरह घिर गई है! अमेरिकन मध्यस्थता  को लेकर ट्रंप के लगातार बयानों से सरकार बैक फुट पर है! और इसका जवाब सरकार के पास नहीं है !क्योंकि आधिकारिक रूप से सीज फायर की घोषणा होने के पहले टेंप ने यह घोषणा कर दी थी, अगर इसे स्वीकार किया जाता है तो राहुल गांधी का वह नॉरेटिव भारतीय जनता पार्टी और मोदी जी की सरकार के आभा मंडल को धूमिल कर देगा क्योंकि फिर पूरे देश में गूंजेगा

,फ़ोन  आया, नरेंद्रर , हो गये  सरेंडर 

शायद सरकार इस बात से भी भयभीत है की संसद में बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे और यदि उनके जवाब टाले या गलत जवाब दिए गए और वह सिद्ध हो गए तो पूरे देश में सरकार की बड़ी थू  थू होगी!

कुछ तथ्य तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया के द्वारा जाहिर कर दिए जाने की वजह से चर्चा में है लेकिन ऐसा माना जाता है कुछ तथ्य अभी भी ऐसे हैं जिन्हें सरकार बताना नहीं चाहती और ससद बुलाने के बाद उन पर चर्चा होना अनिवार्य हो जाएगा!

और वह सब सरकार का नॉरेटिव खराब करेगी दरअसल पहलगाम के बाद इस सीमित स्ट्राइक के बाद सरकार एक राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरे देश में भुनाना चाहती थी,

पुलवामा के विपरीत इस बार सरकार कामयाब नहीं हो सकी! कुछ स्थितियां ऐसी बनी  जो सरकार के विश्लेषण के बाहर थी! प्लान  असफल हो गया! 

इस योजना के तहत ही इस विवादास्पद स्ट्राइक के बाद मोदी जी प्रदेश प्रदेश स्वयं की पीठ थपथपाने लगे और राष्ट्रवाद का माहौल बनाने लगे लेकिन जिस तरह सारे देश ने घर-घर सिंदूर योजना पर रिएक्ट किया जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की तिरंगा यात्राओं को समर्थन नहीं मिला और मोदी जी की सभाओं के बाद भी राष्ट्रवाद का यूफोरिया नहीं बना, तो सरकार को लगने लगा यह *मुद्दा बैकफायर* कर रहा है !

मोदी जी के एजेंडे में ना देश की विदेश नीति थी ना देश की कूटनीति थी ना देश की अर्थव्यवस्था थी और संसद  बुलाने के बाद इन 12 सालों में यह पहली बार था जब उन्हें जवाब देना पड़ता  इन सारी असफलताओं का जिन्हें अक्सर वह आपदा में अवसर की बात से खारिज करते हैं!

  मोदी जी की एक शैली है आम आदमी से कनेक्ट करने की जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब रहे लेकिन वर्तमान संदर्भ इस आभामंडल को भी अपने नॉरेटिव से प्रभावित करते हुए नजर आ रहे हैं! 

जो एक भ्रामक इमेज अपने खरीदे हुए मीडिया से मोदी जी भारत की बनाना चाहते थे उसका कितना दुष्प्रभाव पड़ा है एक आभासी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात पूरे विश्व में की गई एक आभासी अर्थव्यवस्था के नाम पर हिंदुस्तान के उत्कृष्टता  की बात पूरे विश्व में की गई , जबकि स्थितियां देश में अनुकूल नहीं थी बेरोजगारी बढ़ रही थी महंगाई बढ़ रही थी रुपया गिर रहा था मुद्रास्फीति बढ़ रही थी लेकिन बात चौथी इकोनॉमी की जाती थी, विश्व गुरु की की जाती थी, तेजी से विकसित होते एक आधुनिक भारत की बात की जाती थी लेकिन जहां आज भी तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ता है! और इसी भ्रामक इमेज की वजह से भारत विश्व राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि पूरी विश्व राजनीति इस समय व्यापार पर आधारित है? और संपन्न राष्ट्र किसी और को अपने बराबर देखना पसंद नहीं करते इसलिए आज भारत चीन की भी आंख की किरकिरी है अमेरिका की भी, और रूस ने भी उसे एक सम्मानजनक दूरी बना रखी है! और वहीं पाकिस्तान को अमेरिका भी आशीर्वाद दे रहा है और चीन भी दूध पिला रहा है!


ससद बुलाने के बाद यह *आभासी इमेज* दरक कर गिर जाती, उनका जो वास्तविक चित्र है इस आभासी इमेज के आगे बहुत छोटा पड़ जाता और शायद सत्ताधारी दल यह नहीं चाहता था इसलिए सवालों से बचने के लिए उसने संसद बुलाना उचित नहीं समझा!

सत्ताधारी दल बिहार चुनाव तक स्थितियों की अनुकूलता चाहता था वह नहीं चाहता था कि देश की मानसिकता किसी नए नॉरेटिव की ओर आगे बढ़ने लगे, 

क्योंकि संसद में

 *सामाजिक जनगणना* को लेकर भी सवाल किए जाते !

चुनाव के पहले सरकार इनसे बचाना चाहती थी! वह नया नॉरेटिव बनाने की कोशिश करेगी ससद बुलाने के पहले बच्चे हुए दिनों में नॉरेटिव को अपना अनुकूल बनाने के लिए! 

और इस सबके अलावा सबसे बड़ा सवाल होगा राफ़ेल पर।राफेल इस पूरी स्ट्राइक में विवादास्पद रहा है लेकिन जिस तरह कांग्रेस सरकार का सौदा खारिज कर कर मोदी जी की सरकार ने ऊंचे दामों पर राफेल का सौदा किया था लेकिन उसके बावजूद तकनीकी स्थानांतरण की सहमति नहीं ली गई थी और उसके बाद जब अभी इतनी विपरीत परिस्थिति में भी एसॉल्ट कंपनी ने राफेल का सोर्स कोड देने से भारत को इनकार कर दिया और भारत के राफेल का गिरना न गिरना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि भारत में भी चर्चित रहा उसके बाद सरकार को यह भी लगता था यदि संसद बुलाई गई तो उसके ईमानदार चेहरे को भी वैसे तो वह बचा नहीं है लेकिन शीर्ष पर भी आरोपों की बौछार की जाएगी इन स्थितियों में तोउसका बचना बहुत मुश्किल हो जाता!

ऐसी परिस्थिति में सत्ता ने सत्र से भाग जाने के निर्णय को उचित समझा।(साभार)