सोमवार, 1 मार्च 2010

मेरे देश को बचाओ ...


अरे परिचय का मोहताज नहीं है बाबूलाल

इस बार होली में सिर्फ उढ़ाओ गुलाल

रायपुर का पीछा नहीं छोढ़ेगा ये बाबूलाल

कभी गली तो कभी कुछ बनकर हुआ लाल

पैसे से पुराना इसका नाता है

पैसे पाकर मस्त हो जाता है

जब बदनाम गली बंद हुआ

फिर कैसे बाबूलाल का जन्म हुआ

इस बार होली में फकत गुलाल लगाओ

इस देश को बाबूलाल से बचाओ

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

भ्रष्टाचार को लोकाचार कह कर सभी विभागों में रेट चार्ट रख दे

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद दूसरी बार नगरीय निकायों के चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने बेशर्मी से पैसे बहाये। जनप्रतिनिधि बनने के लिए टिकिट से लेकर चुनाव जीतने की होड़ में कांग्रेसी और भाजपाईयों ने लोकाचार की सारी सीमाएं लांघ डाली। टिकिट के लिए तो गाली गलौज मारपीट हुई ही बड़े नेताओं को अपमानित तक होना पड़ा। जनसेवा के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं में इतना जोश था कि वे मरने-मारने पर उतारू हो गए। यह सब अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है।
टिकिट के बाद तो चुनाव जीतने कई प्रत्याशियों ने लाखों खर्च कर डाले राजधानी में ही मतदाताओं को खुलेआम प्रलोभन दिया गया। ऐसा कोई वार्ड नहीं था जहां शराब की नदियां नहीं बहाई गई हो। कार्यकर्ता चुनाव कार्यालय में जुआं खेलते शराब पीते रहे और आम आदमी सब कुछ देखते सुनते खामोशी ओढ़े रखा।
कांग्रेस और भाजपा जैसी प्रमुख पार्टियां जब चुनाव जीतने इस तरह के हथकंडे अपना रही हो तब भला चुनाव जीतने के बाद वह कैसे भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और जनसेवा का काम करेगी यह समझा जा सकता है। जबकि जो लोग लाखों खर्च कर चुनाव जीतने की स्थिति में हैं वे लोग अभी से खर्च किए गए रकम की वसूली का रुपरेखा तैयार करने लग गए है।
कोई माने या न माने अब तो राजनीति पूरी तरह से व्यवसाय बन चुकी है और चुनाव लड़ने वाले इसे व्यवसायिक इन्वेस्टमेंट के तहत रकम खर्च करता है और चुनाव जीतने के बाद इसकी वसूली में लग जाता है। और जो पार्टियां भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की बात करता है वह अंधेरगर्दी के सिवाय कुछ नहीं है।
अब तो राजनैतिक पार्टियां खासकर कांग्रेस और भाजपा को भ्रष्टाचार के बारे में बात ही नहीं करनी चाहिए बल्कि छत्तीसगढ़ में बैठी भाजपा सरकार को चाहिए कि वह भ्रष्टाचार को लोकाचार कह कर सभी विभागों में रेट चार्ट रख दे। इसकी शुरुआत वह चाहे तो नगरीय निकायों से शुरु कर सकती है। वह एक रेट चार्ट बना दे कि नक्शा पास कराने के लिए 15 दिन में एक राशि तय कर दे। जन्म प्रमाण पत्र के लिए इतनी राशि, मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए इतनी राशि, ले आऊट के लिए इतनी राशि, सफाई के लिए, नल कनेक्शन के लिए और इसी तरह से अन्य कार्यों के लिए एक निश्चित राशि तय कर दे ताकि यहां काम के लिए आने वाला आदमी निर्धारित फीस के अलावा लोकाचार के लिए राशि दे और कम से कम काम हो जाए। इसके कई फायदे हैं फाईल जल्दी निपटेगा क्योंकि अफसरों को भी मालूम रहेगा कि जितनी फाईल निपटेगा उतनी राशि उसे शाम को अपनी जेब में लेकर जाना है।
इस तरह की बातें कहने का मतलब कतई यह नहीं है कि मैं भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहा हूं लेकिन कांग्रेस और भाजपा में नगरीय निकाय के चुनाव को लेकर जनसेवा के लिए जिस तरह की होड़ मची है और लाखों रुपए चुनाव में खर्च किए गए उससे तो कम से कम भ्रष्टाचार को लेकर इनसे कोई उम्मीद करना बेमानी होगी।
यह बात मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि भ्रष्टाचार आज लोकाचार हो गया है और लेने वाले व देने वालों में संकोच नहीं होगा तो समय भी बचेगा।
आज छत्तीसगढ में भ्रष्टाचार अपनी गहरी जड़े जमा चुका है। प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर मंत्रियों के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और सरकार इन आरोपों को राजनीति कहकर खारिज कर रही है यह अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है।

कृषि जमीनों की बरबादी पर आमादा सरकार

एक तरफ देश मंहगाई की चपेट में हैं। उत्पादन कम होने की वजह से आम आदमी को महंगाई की त्रासदी झेलनी पड़ रही है। जोत का रकबा बढ़ाने नए-नए तरीके निकाले जा रहे हैं और दूसरी ओर छत्तीसगढ़ सरकार विकास के नाम पर कृषि जमीन को बरबाद कर रही है। कृषि जमीनों को कौड़ी के मोल अधिग्रहित करना अंधेरगर्दी नहीं है तो और क्या है।
बस्तर में उद्योग लगाने पर आमदा सरकार वहां के किसानों-आदिवासियों के साथ जो सलूक कर रही है वह अंधेरगर्दी नहीं है तो और क्या है। हम उद्योग के विरोधी नहीं है लेकिन जिस तरह से कृषि जमीनों पर उद्योग लगाई जा रही है और किसानों से जबरिया जमीनें ली जा रही है वह गलत है। नगरनार इस्पात संयंत्र को लेकर पूरे प्रशासनिक अमले को झोंक दिया गया है। किसानों को डरा धमका कर जमीने ली जा रही है।
यही हाल नई राजधानी के निर्माण को लेकर है। जहां की जमीनों का बाजार भाव 25-30 लाख रुपया एकड़ है वहां सरकार सिर्फ 5-7 लाख रुपया मुआवजा दे रही है। जो किसान अपनी जमीनें नहीं बेचना चाह रहे हैं उनसे जबरदस्ती की जा रही है। आखिर सरकार राजधानी किसके लिए बना रही है। सरकारी कर्मचारियों और नेताओं को अधिकाधिक सुविधा उपलब्ध कराने कृषि जमीनों की बरबादी से आम लोगों को क्या हासिल होने वाला है।
अब तो सरकार ने अंधेरगर्दी की सारी हदें पार करना शुरू कर कमल विहार योजना ला रही है। इस योजना से हजारों एकड़ कृषि जमीन बरबाद हो जायेगी और फिर उत्पादन घटने का दुष्पपरिणाम पूरा देश भुगतेगा। लगता है सरकार को महंगाई से कोई लेना देना नहीं है नहीं तो वह विकास के लिए कृषि भूमि को बरबाद करने की बजाए कोई और तरीका ढूंढती।
एक जमाना था जब छत्तीसगढ़ को धान के कटोरे के रुप में विश्व प्रसिध्दि मिला था लेकिन औद्योगिक विकास को लेकर सरकार की अंधेरगर्दी ने कृषि का रकबा समेट दिया है और आगे भी वह कृषि भूमि को बरबाद करने पर तुली है। उरला, सिलतरा, मंदिरहसौद क्षेत्र में उद्योगों में तो कृषि जमीन गई और अब इसके प्रदूषण से खेती की जमीनें बंजर हो रही है।
हिरमी-रवान, बलौदाबाजार क्षेत्र में सीमेंट उद्योगों के प्रदूषण से कृषि जमीने बरबाद हो रही है और लगातार उत्पादन कम हो रहा है। जिसके चलते चावल का मूल्य आसमान छूने लगा है। सब्जियों के दाम तो आम आदमी के पहुंच के बाहर है और इसके बाद भी सरकार नगरनार, नई राजधानी या कमल विहार जैसी योजनाओं को पूरा करने सरकारी दमन का रास्ता अख्तियार कर रही है तो यह अंधेरगर्दी के सिवाय कुछ नहीं है।
छत्तीसगढ़ राज्य को कई लोग अभिशप्त कहने लगे हैं तो इसकी वजह सरकार का आम आदमी के प्रति रवैया है। सरकारी जमीनों, खदानों और वन संपदाओं को कौड़ी के मोल बेचने में आमदा सरकार की नजर अब कृषि भूमि पर है। इसके दो फायदे मिलते हैं पहला उद्योगों को कौड़ी के मोल जमीन दिलाने कमीशन ले लो और फिर निर्माण में अपनी ठेकेदारी कर लो। दो-दो तरफ से मिल रहे इस कमीशन की वजह से ही सरकार निर्माण को ही विकास का नारा देते नहीं थकती।
अब तो सरकार ने सरकारी जमीनों का बंदरबाट करना शुरु कर दिया है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि सरकार ऐसे लोगों को सरकारी जमीन कौड़ी के मोल दे रही है जो पहले से ही करोड़पति और अरबपति है। ये लोग जहां चाहे जमीन खरीद सकते हैं इनके पास पैसों की कमी नहीं है। लेकिन मोटे कमीशन पर इन्हें जमीन दी जा रही है और आम आदमी के लिए अपना आशियाना बनाना कठिन हो रहा है। यह सरकारी अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है।इधर छत्तीसगढ़ के किसान आंदोलित हैं। भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए किसानों को 270 रुपए बोनस और मुफ्त में बिजली देने की बात कही थी लेकिन साल भर बाद भी सरकार अपने वादे को नहीं पूरा कर रही है। चुनाव जीतने झूठा घोषणा करना अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। पहले ही अकाल और सरकारी दमन से अपनी उपज गंवा चुके किसान आंदोलन नहीं तो और क्या करें। ऐसे में कहीं हिंसक घटनाएं हो जाए तो इसकी जवाबदारी किसी होगी। लेकिन हाल के सालों में सरकार लोगों का ध्यान तभी रखती है जब वे हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। इस प्रशासनिक रवैये को बदलना होगा अन्यथा सरकार की मुसीबतें बढ़ेगी।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

वाह रे...नेतागिरी

छत्तीसगढ़ विधानसभा का सत्र चल रहा है। पहले ही दिन कांग्रेस ने किसानों का मुद्दा जोरदार उठाया लाठी चार्ज से लेकर किसानों को चुनाव पूर्व भाजपा द्वारा छले गए मुद्दे विधानसभा में छाये रहे। सरकार के पास न तो 270 रुपए बोनस के मामले में कोई जवाब था और न ही मुफ्त बिजली देने के योजना का ही जवाब था। ऐसे में कांग्रेस ने सरकार के जवाब से अंसतुष्ट होकर विधानसभा से बहिगर्मन कर दिया। विधानसभा में जनहित के सैकड़ों मुद्दे उठते हैं और उठाये जाते हैं। विधायक देवजी पटेल ने तो सीधे मुख्यमंत्री से ही सवाल जवाब किया और जब भाजपा के विधायक को ही मुख्यमंत्री से विधानसभा में सवाल करने पड़ रहे हो तब अंधेरगर्दी का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
तोड़ मरोड़ कर जवाब देने के लिए बार विधानसभा अध्यक्षों को मंत्रियों को डांटना पड़ा है इसके बाद भी मंत्री जवाब देने से बचने के बहाने ढूंढ ही लेता है। अब विदेश दौरे का मामला ही ले लो किसने कितना खर्च किया के ब्यौरा को आसानी से छुपाया गया। अधिकारियों द्वारा खर्च की गई राशि तो बताई गई लेकिन मंत्रियों ने कितने खर्च किए यह बात छुपाना अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। आखिर जनप्रतिनिधि बने नेता सरकारी खजाने को किस तरह लुटा रहे है यह बात जनता को पता होना चाहिए।
सरकार के अंधेरगर्दी के किस्से थमने का नाम ही नहीं ले रही है। शराब का मामला हो या दौरे के खर्चों का मामला हो। हर तरफ लोग त्रस्त हैं। महंगाई बेलगाम होते जा रही है और जमाखोरी-कालाबाजारी चरम पर हैं। महंगाई को लेकर कोई बोलने को तैयार नहीं है। केन्द्र सरकार राज्य सरकार पर तो राज्य सरकार केन्द्र सरकार पर दोषारोपण में व्यस्त हैं ऐसे में सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई ने आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है। छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान क्षेत्र है लेकिन अब सरकार की नजर कृषि भूमि पर है वह खेती की जमीन को विकास के नाम पर अधिग्रहित करने आमदा है और जब उपज ही न हो या उपज का भाव ठीक से न मिले तो महंगाई तो बढ़ना ही है। छत्तीसगढ़ में किसानों के साथ अत्याचार की कहानी नई नहीं है। सीमेंट उद्योगों में जमीन देने वाले किसान आज भी परेशान है और अब तो गन्ना बोने वाले किसान भी सरकार की अंधेरगर्दी से त्रस्त है। ऐसा कहीं नहीं होता कि किसी भी उत्पादक को लागत से कम बेचा जाए लेकिन छत्तीसगढ़ में गन्ना किसानों को मजबूर किया जा रहा है कि वह अपनी उपज कम कीमत पर बेंचे। पूरे देश में 210 रुपए में बिकने वाला गन्ना यहां 165 रुपए में ही खरीदने की घोषणा सरकार ने की और जब उत्पादक लागत नहीं निकलने की वजह से किसान ने गन्ना बेचने की बजाय उसे गुड़ बनाने की घोषणा की तो सरकार गुड़ बनाने में प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। देश के सर्वश्रेष्ठ गन्ना उत्पादक किसानों के साथ सरकार का यह रवैया अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है। इस पर कांग्रेस की चुप्पी आश्चर्यजनक है। सरकारें आती जाती रहती हैं और सरकार बनने की गणित भी दूसरी है लेकिन याद वे किये जाते हैं जो काम करते हैं।
छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही है कि अकूत संपदा संसाधन होते हुए भी यहां के लोग बदहाली में जी रहे हैं। सरकार भी विकास का मतलब निर्माण समझती है अधिकारी तो पैसा कमाने निर्माणों को मंजूरी देते हैं यही वजह है कि राज्य बनने के 8-9 साल बाद भी छत्तीसगढ़ के आम लोगों को टेक्स की वजह से परेशान होना पड़ रहा है। सरकारी खजानों की लूट का यहां कई अनोखा मामला है। पर्यटन में बगैर नाम पते के लाखों रुपए के देने का मामला हो या जनसंपर्क में प्रचार सामग्री के घपले का मामला हो। सरकार ने अपने लोगों को बचाने का नया फार्मूला भी तय कर लिया है। अब तो पर्यटन में स्टेशनरी घोटाले में रिकवरी का दूसरे विभाग के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार का नया हथियार पा लिया है। खूब भ्रष्टाचार करो और पकड़े गए तो केवल उसी मामले का पैसा दो और हल्ला हो तो समकक्ष के कमाउ विभाग में चले जाओ। सरकार की यह नीति अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप लो, संवाद प्रभारी के खिलाफ छापा तो नौकरी गई...


छत्तीसगढ़ में अफसर राज हावी है इसका यह नमूना मात्र है। छत्तीसगढ़ में सरकारी विज्ञापन के मोह ने पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने में कोई कमी नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि यहां अधिकारियों के खिलाफ खबर छपते ही उसकी तीखी प्रतिक्रिया होती है।
पिछले दिनों मृत्युजंय मिश्रा ने अपनी नौकरी से हटाये जाने को लेकर संवाद प्रभारी कोरेटी के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस ली। ढसाढस भरे प्रेस कांफ्रेंस में वैसे तो सभी अखबारों के पत्रकार मौजूद थे लेकिन रोज निकलने वाले अखबारों में से दो-तीन अखबारों में ही यह खबर प्रकाशित हो पाई। इनमें से प्रतिदिन राजधानी में भी यह खबर प्रमुखता से छप गई। इस खबर को ठाकुर नामक पत्रकार ने बनाया था। जैसे ही अखबार में खबर छपी हड़कम्प मच गया। जब हमने पत्रकारिता की शुरुआत की थी मुझे याद है। तब हड़कम्प मचाने वाली खबरों पर संपादन के द्वारा पत्रकारों की पीठ थपथपाई जाती थी लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। इस पत्रकार की नौकरी ही चली गई।
पत्रकारिता के इस नए मापदंड से कोई पत्रकार हैरान भी नहीं है क्योंकि ऐसा यहां अक्सर होने लगा है और कभी नेता या अधिकारियों द्वारा पत्रकारों को नौकरी से निकलवाने की धमकी नई भी नहीं है। लेकिन सिर्फ सरकारी विज्ञापन के लिए जनसंपर्क के अधिकारियों से ऐसी घनिष्ठता आश्चर्यजनक है। छत्तीसगढ़ में यही सब कुछ हो रहा है और विज्ञापन देने वाली इस संस्था के अधिकारियों का प्रभाव बड़े-बड़े बैनरों पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है। कई पत्रकार तो अब आपसी चर्चा में व्यंग्य तक करने लगे हैं कि मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप सकते हो लेकिन जनसंपर्क या संवाद के अधिकारियों की करतूत को छापोगे तो नौकरी चली जाएगी। छत्तीसगढ़ में अखबार मालिकों के इस रवैये की वजह से ही शासन-प्रशासन में स्वेच्छाचारिता बढ़ी है और यही हाल रहा तो पत्रकारिता पर यह कलंक धुलने वाला नहीं है।
और अंत में...जनसंपर्क में नौकरी वही लोग कर सकते हैं जो अपना वेतन भी अधिकारियों पर कुर्बान कर दे। ऐसे ही एक युवक यहां अपने नियमित होने के इंतजार में आधा वेतन अधिकारियों के लिए छोड़ देता है। इसके सर्टिफिकेट भी फर्जी होने की चर्चा है।

सभापति के समय की करनी, पंचायत में भरनी पड़ी...

यह तो कुत्ते की दुम... वाली कहावत को चरितार्थ करता है वरना जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस की यह दुर्दशा नहीं होती। कई जिलों में बहुमत के बाद भी कांग्रेस की अध्यक्षीय गई तो इसकी वजह नेतृत्व की कमजोरी के साथ-साथ कांग्रेस में बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई है। यही नहीं यदि कांग्रेस ने निगम में सभापति के चुनाव में सबक लेकर कड़ी कार्रवाई करती तो उसे यह दिन देखना नहीं पड़ता।
दरअसल छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बिखराव की वजह बड़े नेताओं की आपसी गुटबाजी के अलावा प्रदेश अध्यक्ष का पिछलग्गू होना है। छत्तीसगढ़ में अजीत प्रमोद कुमार जोगी, मोतीलाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल की लड़ाई जग जाहिर है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष जब अपनी कार्यकारिणी ही नहीं बना सकता तो उनसे बहुत ज्यादा उम्मीद करना भी बेमानी है। यही वजह है कि लगातार चुनाव हारने से यहां के कांग्रेसी पस्त हो गए है और जब सत्ता की तरफ से जरा भी लालच दी जाती है वे बगावत करने से भी गुरेज नहीं करते ।
प्रदेश के दर्जनभर जिलों में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों की संख्या भाजपा के मुकाबले अधिक थी लेकिन कांग्रेसी इन्हें संभाल नहीं पाए और 14 जिलों में भाजपा अपना अध्यक्ष बनाने कामयाब रही। यही स्थिति निगम चुनाव में भी रही और कांग्रेस को डेढ़ दर्जन स्थानों में अपने सभापति से वंचित होना पड़ा। क्रास वोटिंग को लेकर अध्यक्ष धनेन्द्र साहू ने तब भारी नाराजगी दिखलाई थी और जांच कमेटी भी बनाई गई लेकिन कांग्रेस की कमजोरी उजागर हो गई राजधानी के पार्षदों ने तो मोबाईल के कॉल डिटेल तक नहीं दी और उन पर किसी ने कार्रवाई की हिम्मत नहीं दिखाई। शायद यही वजह है कि जिला पंचायत के चुनाव में कांग्रेसियों ने पार्टी के नेताओं की परवाह नहीं की और लालच में भाजपा को वोट दे दिया।
कांग्रेस की इस दुर्दशा के लिए प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू और मोतीलाल वोरा द्वारा गठित कार्यकारिणी अपनी जिम्मेदारी से कैसे बचेंगे यह सवाल निष्ठावान कांग्रेसियों में चर्चा का विषय है। बहरहाल छत्तीसगढ क़ांग्रेस में हो रही इस बिखराव पर राष्ट्रीय नेतृत्व ने ध्यान नहीं दिया तो हालत और बदतर होगी जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा।

पुलिसिया गुण्डागर्दी का शिकार पत्रकार,सिटी एसपी की मौजदूगी, सरकार खामोश

यह तो पुलिसिया गुण्डागर्दी का एक नमूना है कि वह चाहे तो किसी को भी थाने में बुलवाकर मारपीट कर सकता है और सरकार भी ऐसी गुण्डागर्दी पर कुछ नहीं करती। फिर यदि किसी के नाम के पीछे सिंह शब्द हो तो वह इस प्रदेश में शेर है।
यह वाक्या तो एक नमूना है वरना महिलाओं से मारपीट करने में भी यहां की पुलिस पीछे नहीं रहती। ताजा मामला शहर के विभिन्न दैनिकों देशबंधु, भास्कर, हरिभूमि, नेशनल लुक और आज की जनधारा में काम कर चुके स्वतंत्र पत्रकार बबलू तिवारी का है। बताया जाता है कि बबलू तिवारी का आफिस मालिक से किसी बात को लेकर विवाद है और इसी के चलते आफिस मालिक ने राजेन्द्र नगर थाने में शिकायत की है। इस शिकायत के आधार पर सिटी एसपी रजनेश सिंह ने 10 फरवरी को उसे अपने कार्यालय में बुलवाया और जब पत्रकार बबलू तिवारी कार्यालय पहुंचा तो वहां सिटी एसपी नहीं थे लेकिन वहां मौजूद राजेन्द्र नगर थाना प्रभारी अंसारी, पुरानी बस्ती सीएसपी व अन्य स्टाफ थे और अंसारी ने बबलू से अश्लील गाली गलौज कर न केवल उसकी पिटाई की बल्कि उसे मकान खाली करने की चेतावनी दी। इस दौरान पुरानी बस्ती सीएसपी ने बबलू की जेब की तलाशी ली और कहा कि मकान खाली नहीं किया तो आर्म्स एक्ट में जेल भिजवा दूंगा।
इसके बाद रजनेश सिंह वहां पहुंचे। रजनेश सिंह ने आते ही बबलू से बात की इधर बबलू ने भी अपने मित्र जो दैनिक भास्कर में संवाददाता है सुदीप त्रिपाठी को बुलवा लिया। इसके बाद भी रजनेश सिंह ने बबलू को धमकाया और उच्चाधिकारियों को गलत रिपोर्ट भी दी। यही कारण है कि रजनेश सिंह की भी पिटाई में सहमति होने का संदेह है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले की उच्चाधिकारियों से शिकायत करने के बाद भी पुलिस वालों के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। पुलिस के इस रवैये से पत्रकारों में रोष है और वे मुख्यमंत्री से भी इसकी शिकायत करने वाले हैं।
इधर पुलिसिया गुण्डागर्दी को लेकर कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि रजनेश सिंह का सीधे सरकार में बैठे लोगों से संबंध है इसलिए वे मनमानी करते रहते हैं। बताया जाता है कि पिछले दिनों लोहा व्यवसायी अच्छेलाल जायसवाल को भी धंधा बंद करने की धमकी दी गई थी और झूठा फंसाकर गिरफ्तार किया गया था। बहरहाल रजनेश सिंह के इस कार्रवाई को लेकर बबलू तिवारी ने न्यायालय जाने का मन बना लिया है और रजनेश सिंह के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो वे कोर्ट में मुकदमा दर्ज करेंगे।