अंधेर से उजाले की ओर चलो। इस वाक्य का साफ शब्दों में यही अर्थ है। पर आम आदमी के लिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कैसे अंधेर से उजाले की ओर चला जा सकता है। अंधेरा घना है और सब तरफ अपराध बड़े हैं। आम आदमी भी स्वार्थी हो गया है। मुंह देखी बात करने वालों की जमात बढ़ने लगी है इसलिए अपराध बढ़े हैं। अंधेरगर्दी बढ़ा है और भगवान के घर देर है अंधेर नहीं का जुमला भी थोथा साबित होने लगा है।
छत्तीसगढ राय की कल्पना या सपना देखने वालों ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि राय बनते ही लुटेरों की जमात सामने आ जाएगी और पूरे देश में अपनी करतूतों का ऐसा डंका बजाएंगे कि छत्तीसगढ़ महतारी को भी शर्म आ जाए। सरकारी अंधेरगर्दी की असली वजह उन लोगों की चुप्पी है जो अपने लिए जी रहे हैं। या उन लोगों की वजह से अंधेरगर्दी बढ़ी है जो समाज का हित तो चाहते हुए गरीबों को खाना, दवाई, कपड़ा देते नहीं थकते लेकिन गलत बातों का विरोध करने से डरते हैं।
जब किसी चीज का विरोध ही नहीं होगा तो कोई गलत काम करने से कैसे रुख सकता है। छत्तीसगढ़ में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनका समाज में अपनी पहचान है और लोग जिनकी बातों को गंभीरता से लेते भी हैं लेकिन ये लोग भी वृक्षारोपण और दान-धर्म पर यादा भरोसा करते है। विरोध करने से डरते हैं और यही से अंधेरा अंधेरगर्दी का शक्ल अख्तियार करता है। क्या सरकारी जमीनों को बंदरबांट वह भी अपने लोगों में यह अंधेरगर्दी नहीं है फिर इसका विरोध कोई क्यों नहीं करता क्योंकि जिन भाजपा के दिग्गजों को ये जमीन दी गई है वे नाराज हो जाएंगे। नदियों का पानी बेच देना क्या अंधेरगर्दी नहीं है या फिर एक ही सड़क को हर साल बार-बार बनाना अंधेरगर्दी नहीं है।
सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां मंत्रियों और अधिकारियों की हरामखोरी नहीं हो रही है। फिर भी लोग खामोश है। दीपावली का मतलब सिर्फ दीप या रोशनी करके अंधेरे को दूर करना नहीं है। यह तो प्रतीक है राम के अयोध्या लौटने पर संभावित राम राय की कल्पना का। वास्तव में आम आदमी अपनी पेट के खातिर मरा जा रहा है। लेकिन सरकारी अंधेरगर्दी उसे ठीक से जीने नहीं दे रही है। क्या कोई सोच सकता है कि इस शहर ने पंचर वाले, नाका चोर, पंखा चोर को कहां से कहां बढ़ते देखा है या फिर अपनी शादी के लिए फर्जी एजेंसी का सहारा लेने वाले कहां पहुंच गए। सिर्फ मेहनत से तो दो-चार सौ करोड़ रुपए नहीं कमाए जा सकते। कम से कम इन लोगों ने कैसे कमाया है कोई भी बता देगा। दलाली से लेकर चोरी तक में डूबे इन लोगों के अचानक करोड़पति बनने की कहानी जितनी विभत्स है उससे कहीं अधिक विभत्स उन लोगों की करतूतें हैं जो गलत कार्यों पर प्रहार नहीं करते क्योंकि विष बेल को नहीं रोका गया तो वह आने वाली पीढ़ी को डस लेगा जिसके जिम्मेदार आप हम सब होंगे।
अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ दीप जलाना नहीं है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब न तो गरीबों को दवा, खाना या उपहार देना है। अंधेरे से रोशनी की ओर चलने का मतलब सिर्फ और सिर्फ अंधेरे पर प्रहार करना है और इसके लिए हमें स्वयं रोशनी बननी होगी।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
केबिनेट की लड़ाई आखिर सड़क तक पहुंची कैसे ?
जाँच होगी, बृजमोहन पर संदेह ?
रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार योजना को लेकर केबिनेट की बैठक में मंत्रियों की लड़ाई आखिर मिडिया तक कैसे पहुंची , इसे लेकर मुख्यमंत्री रमण सिंह न केवल नाराज है बल्कि भीतर ही भीतर पता किया जा रहा है,वैसे चर्चा इस बात की है की लड़ाई की खबर बृजमोहन अग्रवाल ने लिक की है? क्योंकि इससे फायदा उन्ही का हुआ है.
ज्ञात हो कि केबिनेट की बैठक में कमल विहार योजना के विरोध में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल न केवल खुलकर सामने आ गए थे बल्कि उनकी मंत्री राजेश मूणत से तीखी बहस भी हुई , दोनों मंत्रियों के बिच झड़प इतनी जबरदस्त रही कि राजेश मूणत को बैठक बिच में छोड़कर जाना पड़ा ,जबकि मुख्यमंत्री रमण सिंह ने योजना को रोक कर विसंगति दूर करने कि बात कही , लेकिन इसे ऐसा प्रचारित किया गया मानो इसे रद्द कर दिया गया हो.
इधर केबिनेट की बैठक में किस मंत्री ने क्या कहा सारी बातें अखबारों में चाप गई जो सरकार के लिए हैरानी वाली बात है,
हमारे भरोसे मंद सूत्रों का दावा है कि इस समूचे मामले को राजनैतिक फायदे और राजनैतिक दुश्मनी भुनाने लिक किया गया गया है चूँकि इससे बृजमोहन अग्रवाल को फायदा हुआ है इसलिए उन पर शक किया जा रहा है . सूत्रों का दावा है कि इस मामले को मुख्यमंत्री रमण सिंह ने गंभीरता से लाया है और इसका प्रभाव भी जल्द द्ल्खाने कि संभावना जताई जा रही है,जबकि बृजमोहन अग्रवाल के लिए यह सब नुकसान दायक हो सकता है.
रायपुर विकास प्राधिकरण की कमल विहार योजना को लेकर केबिनेट की बैठक में मंत्रियों की लड़ाई आखिर मिडिया तक कैसे पहुंची , इसे लेकर मुख्यमंत्री रमण सिंह न केवल नाराज है बल्कि भीतर ही भीतर पता किया जा रहा है,वैसे चर्चा इस बात की है की लड़ाई की खबर बृजमोहन अग्रवाल ने लिक की है? क्योंकि इससे फायदा उन्ही का हुआ है.
ज्ञात हो कि केबिनेट की बैठक में कमल विहार योजना के विरोध में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल न केवल खुलकर सामने आ गए थे बल्कि उनकी मंत्री राजेश मूणत से तीखी बहस भी हुई , दोनों मंत्रियों के बिच झड़प इतनी जबरदस्त रही कि राजेश मूणत को बैठक बिच में छोड़कर जाना पड़ा ,जबकि मुख्यमंत्री रमण सिंह ने योजना को रोक कर विसंगति दूर करने कि बात कही , लेकिन इसे ऐसा प्रचारित किया गया मानो इसे रद्द कर दिया गया हो.
इधर केबिनेट की बैठक में किस मंत्री ने क्या कहा सारी बातें अखबारों में चाप गई जो सरकार के लिए हैरानी वाली बात है,
बुधवार, 10 नवंबर 2010
अंधा पीसे, कुत्ता खाय...
यह तो अंधा पीसे कत्ता खाय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना स्वयं को स्थापित और बड़ा अखबार बनने की जिद में पत्रकारिता की दिनाें दिन यह दुर्गति नहीं होती। पिछले कुछ सालों से राजधानी के पत्रकारों में ही नहीं पत्रकारिता में भी बदलाव की बयार चली है। खरबों को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलाने की नई परम्परा के साथ-साथ संबंधों को यादा अहमियत दी गई। अखबारों से पाठकों के साथ संबंधाें को अहमियत दी जाती है तो सवाल कभी नहीं उठते लेकिन अहमियत दी गई अफसरों और नेताओं से संबंध स्थापित करने की। इसके चलते पत्रकारों की सोच में तो अदलाव आया ही पत्रकारिता की दुर्गति भी हुई। खासकर एम्सवन्लूजिव्ह और खोजी पत्रकारिता को तो बड़ा झटका लगा है। खबरों की तह तक जाने की परम्परा का भी अनादर हुआ। इससे अखबार मालिक और पत्रकार दोनों खुश है लेकिन पाठकों का एक वर्ग जो व्यवस्था की चोर से पीड़ित है उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब तो अखबारों में सामाजिक और सरकारी खबरें ही यादा दिखाई देती है। अपराधिक खबरों में भी वही खबर छपती है जो पुलिस बना देती है। मेरा दावा है कि राजधानी के अखबारों में काम करने वाले क्राईम रिपोर्टरों में आधे रिपोर्टर ऐसे होंगे जो राजधानी के 23 थानों और चौकियों को महिनों से नहीं देखे होंगे। ऐसे में उन थानों या चौकियों में हो रही अच्छी या बुरी कार्रवाई की खबरें कैसे छपती होगी अंदाज लगाया जा सकता है। संपादकों का क्या? अब तो रोज संपादकीय लिखना भी जरूरी नहीं है। ग्रुप के अखबारों में काम करने वाले संपादकों को कलम चलाने की बंदिशे भी कम नहीं होती। उनकों जवाबदारी तो प्रतिध्दंदी अखबाराें से तुलना करने और छुटी खबरों के बारें में पूछताछ में ही गुजर जाती है। इस सबके बाद यदि समय बचा तो अधिकारियों और नेताओं से अखबार हित में संबंध बनाने में चला जाता है। पत्रकारिता के इस स्तर तक पहुंचने में अखबार मालिकों का खैया तो जिम्मेदार रहा ही है। स्वयं पत्रकारों का खैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ साल पहले की बात है शहर के एक नामी गिरामी अखबार के एक रिपोर्टर ने जब आलीशान बंगला तैयार किया तो अन्य रिपोर्टर उन्हें खुब गाली देते थे लेकिन अब न तो पत्रकारिता की ऊचाई की बात होती है और न ही किसी का बंगले पर ही चर्चा होती है। जब तनख्वाह कम थी तब पत्रकारों में दुनिया बदलने का हौसला होता था लेकिन अब जब सुविधाएं बड़ गई है तो सुविधाएं बढ़ाने की जिद भी बढ़ी है। सुविधाएं छिन जाने का डर उन्हें बेहतर पत्रकारिता या खबरों से दूर रखता है। वे सोचते हैं खबरें छपने पर क्या होगा। अल्टा वे दुश्मन बन जायेंगे और इससे मिलने वाली सुविधाएं से वंचित होंगे। और फिर इस खबर के नहीं छपने से क्या होगा? बस इसी सोच के चलते ही हौज में दूध नहीं भर पाया था सभी शिष्यों ने अंधेरे का फायदा उठाकर गुरू के निर्देश की अवहेलना कर हौज को दूध की जगह पानी से भर दिया था। पत्रकारिता में भी सुविधाएं छिनने का डर कलम पर जंजीरे कसने लगी है।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस खैये का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के अवैध और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस खैये का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के अवैध और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
और उसकी शक्ति जाती रही
और उसकी शक्ति जाती रही बचपन में दादी-नानी की गोद में रात को एक कहानी सुनी थी कि किसी व्यक्ति को ईश्वर से यह वरदान मिला था कि उसके हाथ लगाते ही बीमारियां दूर हो जाती। उसने इस शक्ति का प्रयोग करना शुरु कर दिया। धीरे-धीरे उसकी ख्याति फैलने लगी। जब ख्याति फैलने लगी तो उसकी जय-जयकार होने लगी। अपनी जय-जयकार सुन वह प्रसन्न होने लगा और इस प्रसन्नता के साथ उसके मन में लालच घर करने लगा अब वह इस वरदान के एवज में उपहार भी स्वीकार करने लगा और इसके बाद और लालच बढ़ी तो वह फीस तय कर दिया। फीस तय करने के बाद उसकी शक्ति ईश्वर ने छिन ली। क्योंकि उसे यह वरदान देते समय ही चेता दिया गया था कि वह लालच में न आए।
कहने का तात्पर्य है लालच एक ऐसा तृष्णा है जो बुझती नहीं है इन दिनों इसी तरह की विचित्रता पूरे देश में हैं। कोई भी सांधु-संत प्रसिध्द होता है वह अपराधियों के धन के आगे नतमस्तक हो जाता है। इनके आसपास काले धन वालों का जमावड़ा होने लगता है। पाप करने वाले तो इसलिए दान कर रहे है कि उनका पाप थोड़ा बहुत उतर जाए। पर यह पाप उतर कर इन्हीं साधु-संतों के ऊपर चढ़ने लगा है। वे ऐसे लोगों को समाजसेवी कहने लगे है और आम आदमी मूकदर्शक बना है। बाबा रामदेव हो या मुरारीबाबू या फिर और संतों को मदद करने वालों की लिस्ट में ऐसे अपराधिक लोगों के नाम देख सकते है। भले ही ये साधु संत घृणा पाप से करो पापियों से नहीं या सुधरने का मौका देना चाहिए जैसे चिंतन लोगों के सामने प्रस्तुत करे लेकिन वास्तविकता यह है कि इनसे मिलने वाली मोटी रकन का लोभ साधु-संत भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। देखते ही देखते संतों की संपत्ति कई गुणा बढ़ जा रही है। काले धन साधु-संतों के पास खपाये जा रहे हैं और आयकर विभाग भी इस दान के काले धन पर कुछ नहीं कर पा रहा है। क्या आए दिन साधु-संतों का विवाद में फंसना इन काले धन का परिणाम नहीं है?
बुलंद ने अपने अभियान में इसे भी हिस्सेदार बनाया है कि अब अपराधियों का बहिष्कार का समय आ गया है और इनका साथ देने या अपने साथ बिठाने वालों की भी सार्वजनिक भर्त्सना होनी चाहिए। हिरण माकर या दारु पीकर गाड़ी चढ़ाने वाले या लड़कियों से छेड़छाड़ करने वालों का बहिष्कार होना ही चाहिए। युवाओं और आम लोगों को भी सोचना होगा कि जिसे नायक बनाकर पेश किया जा रहा है क्या वह वास्तविक जीवन में भी नायक है। ऐसे लोगों की करतूतों पर चुप बैठने की वजह या ऐसे लोगों को नायक बनाने का दुष्चक्र की वजह से ही आम आदमी का जीना दूभर हुआ है। आईये इस अभियान में आप भी हिस्सा ले और खलनायक को नायक बनाने की चेष्टा का प्रतिकार करें।
कहने का तात्पर्य है लालच एक ऐसा तृष्णा है जो बुझती नहीं है इन दिनों इसी तरह की विचित्रता पूरे देश में हैं। कोई भी सांधु-संत प्रसिध्द होता है वह अपराधियों के धन के आगे नतमस्तक हो जाता है। इनके आसपास काले धन वालों का जमावड़ा होने लगता है। पाप करने वाले तो इसलिए दान कर रहे है कि उनका पाप थोड़ा बहुत उतर जाए। पर यह पाप उतर कर इन्हीं साधु-संतों के ऊपर चढ़ने लगा है। वे ऐसे लोगों को समाजसेवी कहने लगे है और आम आदमी मूकदर्शक बना है। बाबा रामदेव हो या मुरारीबाबू या फिर और संतों को मदद करने वालों की लिस्ट में ऐसे अपराधिक लोगों के नाम देख सकते है। भले ही ये साधु संत घृणा पाप से करो पापियों से नहीं या सुधरने का मौका देना चाहिए जैसे चिंतन लोगों के सामने प्रस्तुत करे लेकिन वास्तविकता यह है कि इनसे मिलने वाली मोटी रकन का लोभ साधु-संत भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। देखते ही देखते संतों की संपत्ति कई गुणा बढ़ जा रही है। काले धन साधु-संतों के पास खपाये जा रहे हैं और आयकर विभाग भी इस दान के काले धन पर कुछ नहीं कर पा रहा है। क्या आए दिन साधु-संतों का विवाद में फंसना इन काले धन का परिणाम नहीं है?
बुलंद ने अपने अभियान में इसे भी हिस्सेदार बनाया है कि अब अपराधियों का बहिष्कार का समय आ गया है और इनका साथ देने या अपने साथ बिठाने वालों की भी सार्वजनिक भर्त्सना होनी चाहिए। हिरण माकर या दारु पीकर गाड़ी चढ़ाने वाले या लड़कियों से छेड़छाड़ करने वालों का बहिष्कार होना ही चाहिए। युवाओं और आम लोगों को भी सोचना होगा कि जिसे नायक बनाकर पेश किया जा रहा है क्या वह वास्तविक जीवन में भी नायक है। ऐसे लोगों की करतूतों पर चुप बैठने की वजह या ऐसे लोगों को नायक बनाने का दुष्चक्र की वजह से ही आम आदमी का जीना दूभर हुआ है। आईये इस अभियान में आप भी हिस्सा ले और खलनायक को नायक बनाने की चेष्टा का प्रतिकार करें।
गजब हैं गृहमंत्री
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम कंवर पूरे देश में मिसाल कायम कर रहे हैं। ऐसे गृहमंत्री को पाकर छत्तीसगढ़ के लोग खुश हैं। अपनी ईमानदारी का डंका बजा चुके गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने निजी स्क्वाड से अपराधियों में दहशत है। यही वजह है कि उन्हें पूरे देश का सर्वश्रेष्ठ गृहमंत्री माना जा रहा है। सरकार को भी चाहिए कि जिस तरह से गुजरात मॉडल और हैदराबाद को मॉडल बनाकर भ्रमण यात्रा किया जाता है उसी तरह से देश के दूसरे रायों के गृहमंत्रियों को भी बुलाया जाना चाहिए ताकि वे भी देख सकें कि किस तरह से गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने छत्तीसगढ़ में एक नया मिसाल कायम किया है।
गृहमंत्री ननकीराम कंवर के इस कार्यशैली से सबसे यादा दुखी डीजीपी विश्वरंजन जी है क्योंकि गृहमंत्री की ईमानदारी से वे परेशान है। परेशानी की प्रमुख वजह नक्सलियों के खिलाफ केन्द्र से आने वाली बड़ी रकम को माना जा रहा है। अब इसका बंदरबांट ठीक से न हो तो लड़ाई तो छिड़नी है। गृहमंत्री सिर्फ विश्वरंजन के पीछे ही नहीं पड़े हैं उन्होंने एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहकर अपनी साफ गोई का परिचय दिया है। है किसी गृहमंत्री में दम जो इतनी बड़ी बात कह दे न किसी गृहमंत्री में ये दम है कि वह विधानसभा में सरकार की खिंचाई करते हुए कह दें कि शराब माफिया थाने चला रहे हैं। इतना सब कुछ देखते-सुनते कोई गृहमंत्री कैसे थानों पर भरोसा करे इसलिए तो वे अपना निजी स्क्वाड बना रखे हैं। आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए?
अब थानों की कमाई बंद हो गई है। ढाबों में शराबखोरी तो छोड़िए अवैध शराब बेचने वाले भी भाग लिए है और थानों को सट्टा-जुआ या अपराधियों से मोटी रकम नहीं मिल रही है। इसलिए सब साजिश के तहत निजी स्क्वाड के पीछे पड़ गए हैं। आखिर प्रदेश को अपराध मुक्त करना हो तो अवैध रुप से पैसा कमाने वाले पुलिस पर अंकुश जरूरी है इसलिए निजी स्क्वाड खड़ा किया गया है। अपराधियों को पकड़ों तो दो चार दिन में वह छूट जाता है क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते इसलिए पिटाई जरूर है।
निजी स्क्वाड की ईमानदारी से थाने से लेकर अपराधियों के होश उड़े हुए है इसलिए भी साजिश रच कर उन्हें बदनाम किया जा रहा है। चूंकि मुख्यमंत्री डा. साहब भी जानते हैं कि गृहमंत्री ईमानदार है और वे गलत नहीं करेंगे। इसलिए वे भी निजी स्क्वाड की शिकायतों को तवाों नहीं दे रहे हैं। गृहमंत्री की एक और आदत है वे जिस काम का बीड़ा उठाते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं अब देखिए डेढ़ साल हो गया दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई कैलाश अग्रवाल का कबाड़ खरीदने का धंधा बंद हुए। है किसी में हिम्मत जो चालू करवा दे। अब दूसरे नए लोग धंधा कर रहे है। गृहमंत्री को पता नहीं है। पता चलेगा तो उनकी भी शामत आएगी। आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी।
गृहमंत्री ननकीराम कंवर के इस कार्यशैली से सबसे यादा दुखी डीजीपी विश्वरंजन जी है क्योंकि गृहमंत्री की ईमानदारी से वे परेशान है। परेशानी की प्रमुख वजह नक्सलियों के खिलाफ केन्द्र से आने वाली बड़ी रकम को माना जा रहा है। अब इसका बंदरबांट ठीक से न हो तो लड़ाई तो छिड़नी है। गृहमंत्री सिर्फ विश्वरंजन के पीछे ही नहीं पड़े हैं उन्होंने एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहकर अपनी साफ गोई का परिचय दिया है। है किसी गृहमंत्री में दम जो इतनी बड़ी बात कह दे न किसी गृहमंत्री में ये दम है कि वह विधानसभा में सरकार की खिंचाई करते हुए कह दें कि शराब माफिया थाने चला रहे हैं। इतना सब कुछ देखते-सुनते कोई गृहमंत्री कैसे थानों पर भरोसा करे इसलिए तो वे अपना निजी स्क्वाड बना रखे हैं। आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए?
अब थानों की कमाई बंद हो गई है। ढाबों में शराबखोरी तो छोड़िए अवैध शराब बेचने वाले भी भाग लिए है और थानों को सट्टा-जुआ या अपराधियों से मोटी रकम नहीं मिल रही है। इसलिए सब साजिश के तहत निजी स्क्वाड के पीछे पड़ गए हैं। आखिर प्रदेश को अपराध मुक्त करना हो तो अवैध रुप से पैसा कमाने वाले पुलिस पर अंकुश जरूरी है इसलिए निजी स्क्वाड खड़ा किया गया है। अपराधियों को पकड़ों तो दो चार दिन में वह छूट जाता है क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते इसलिए पिटाई जरूर है।
निजी स्क्वाड की ईमानदारी से थाने से लेकर अपराधियों के होश उड़े हुए है इसलिए भी साजिश रच कर उन्हें बदनाम किया जा रहा है। चूंकि मुख्यमंत्री डा. साहब भी जानते हैं कि गृहमंत्री ईमानदार है और वे गलत नहीं करेंगे। इसलिए वे भी निजी स्क्वाड की शिकायतों को तवाों नहीं दे रहे हैं। गृहमंत्री की एक और आदत है वे जिस काम का बीड़ा उठाते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं अब देखिए डेढ़ साल हो गया दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई कैलाश अग्रवाल का कबाड़ खरीदने का धंधा बंद हुए। है किसी में हिम्मत जो चालू करवा दे। अब दूसरे नए लोग धंधा कर रहे है। गृहमंत्री को पता नहीं है। पता चलेगा तो उनकी भी शामत आएगी। आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी।
रविवार, 7 नवंबर 2010
भास्कर का फरमान, प्रेस हटाओ!
वैसे तो अपने नए-नए फरमान को लेकर छत्तीसगढ़ के अखबार मालिक हमेशा ही सुर्खियों में रहे हैं। हरिभूमि ने हर शनिवार को अपने कर्मचारी पत्रकारों व फोटोग्राफरों के ही लिए फरमान जारी किया है कि वे इस दिन सफेद टी-शर्ट जिसमें हरिभूमि लिखा हो ही पहना करें। पत्रिका ने भी कोशिश की कि ग्रेजुएट ही रखेंगे लेकिन दोनों फेल हो गए अब भास्कर ने अपने कर्मचारियों, पत्रकारों और फोटोग्राफरों को नया फरमान जारी किया है कि वे अपनी वाहन में प्रेस नहीं लिखेंगे।जनसंपर्क सचिव का डर...
मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले एन बैजेन्द्र कुमार को यह डर हमेशा ही सताता रहता है कि कहीं जनसंपर्क में बैठे वर्तमान चंडाल चौकड़ी कहीं कुछ ऐसा वैसा न कर दें जिससे जवाब देना मुश्किल हो जाए। पहले ही घपलेबाजी यहां कम नहीं हुई है उसकी लीपापोती में पसीने छूट गए है अब फोटोग्राफरों की नियुक्ति को लेकर स्वराज दास की भूमिका पर सवाल उठ रहे है। कुरैटी के कारनामों की चर्चा भी कम नहीं है। दिक्कत ये है कि छोटे कर्मचारी इन चंडाल चौकड़ी से अलग दुखी है और अपने से होशियार को कोई पसंद नहीं करता तो हाशिये पर रखना मजबूरी है।
नवभारत और नार्को...
नवभारत ने बैंक घोटाले में लिप्त सिंहा के नार्कों टेस्ट की सीडी होने का दावा कर स्टोरी लगा दिया और कह दिया कि जिसे देखना है वे दफ्तर आ जाए। दफ्तर आने वालों को निराशा लगी और ये लोग दावा कर रहे हैं कि अब तक सेटिंग से दूर की ईमेज बनाने वाले नवभारत के रंगा-बिल्ला ने सेटिंग कर ली है। इस खबर से रंगा-बिल्ला को दस लाख मिला हो या नहीं ये तो रंगा-बिल्ला जाने लेकिन सीडी की क्लिपिंग लाने वाले रमेश बैस के करीबी पत्रकार दुखी हैं? उनका दुख दूसरे से सेटिंग की है या सीडी नहीं मिल पाने का यह तो वही जाने लेकिन दुष्प्रचार में यही सबसे आगे है।
और अंत में...
पत्रिका और नेशनल लुक की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि भास्कर के द्वारा इनके हॉकर खरीद लिए जाते हैं। अब यह भास्कर कर रहा है या नवभारत इसे लेकर आम चर्चा है। क्योंकि इस लड़ाई में नवभारत के मजे हैं।
बुधवार, 3 नवंबर 2010
दस साल पहले भी हुआ था भाजपा शर्मसार
मोहन के वरदहस्त का कारनामा...!
मोहन के खरीद-फरोख्त पर मुहर...!
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल के संरक्षण में चल रहे लोगों ने सलमान खान मामले में पहली बार भाजपा को शर्मसार किया हो। इससे ठीक दस साल पहले भी बृजमोहन अग्रवाल के समर्थकों ने भाजपा को तब शर्मसार किया था जब नेता प्रतिपक्ष के चुनाव में नंदकुमार साय को चुना गया था। इस हंगामें व तोडफ़ोड़ की वजह से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पलंग के नीचे छीपकर जान बचानी पड़ी थी जबकि पार्टी ने दर्जनभर लोगों को निलंबित किया था।
इस साल राज्योत्सव में अपराधिक छवि वाले सलमान खान को मंच पर स्थान देने को लेकर भाजपा के सिद्धांत कटघरे में हैं। इस घटना ने न केवल भाजपाईयों को शर्मसार किया है बल्कि प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। हालात यह है कि इस वजह से न तो भाजपाईयों को जवाब देते बन रहा है और न ही सरकार के पास ही कोई जवाब है। ज्ञात हो कि राज्योत्सव के आयोजन की पूरी जिम्मेदारी बृजमोहन अग्रवाल के संस्कृति विभाग की है और चर्चा इस बात की भी है कि यह सब अचानक नहीं हुआ है। कब सलमान खान आना है और किस तरह से सलमान खान का स्वागत होगा यह सब बृजमोहन अग्रवाल की जानकारी में तय हुआ है।
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल ने पार्टी को पहली बार इस स्थिति में लाया है। उनकी कार्यशैली हमेशा ही विवादों में रही है इससे पहले जब राज्य निर्माण हुआ तब भी बृजमोहन अग्रवाल को उनके समर्थक नेता प्रतिपक्ष के रुप में पेश किए थे और जब नरेन्द्र मोदी के प्रभार ने नेता प्रतिपक्ष बृजमोहन की बजाय नंदकुमार साय को बना दिया। इस बौखलाए बृजमोहन समर्थकों ने भाजपा के एकात्म परिसर में हंगामा और तोडफ़ोड़ किया। कई लोगों के साथ बदसलूकी और मारपीट भी हुई। यही नहीं नरेन्द्र मोदी जैसे कद्दावर नेता की पलंग के नीचे छीपकर अपनी जान बचानी पड़ी। तब चर्चा इस बात की भी रही कि यह सब बृजमोहन अग्रवाल की सहमति से हुआ। तब भाजपा ने इसे गंभीरता से लेते हुए बृजमोहन समर्थकों की जमकर खबर ली थी और करीब दर्जनभर लोगों को पार्टी से निलंबित किया था। बृजमोहन अग्रवाल ने तब भी इस मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर हीरों बने थे।
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल ने पार्टी को विवाद में नहीं फंसाया है हाल ही में निगम सभापति के चुनाव में भी उस पर पार्षदों के खरीद फरोख्त का आरोप लगा लेकिन सभापति बनाने के कारण इस खरीद फरोख्द को कसके अच्छे कारनामें के रुप में प्रस्तुत किया गया। इस बार भी सलमान को लेकर फजीहत तो हुई लेकिन उसके प्रभाव की वजह से मुख्यमंत्री व पार्टी संगठन कुछ भी कहने से बच रही है।
सलमान का सम्मान और नत्था का...
छत्तीसगढ़ सरकार की नीति है या संस्कृति विभाग की यह तो वही जाने लेकिन सलमान के लिए पलक पखड़े बिछाने वाले संस्कृति विभाग ने पिपली लाइव के हीरों मोहनदास मानिकपुरी उर्फ नत्था के मामले में अपने को अलग कर लिया। कई छत्तीसगढिय़ा कलाकार की उपेक्षा ने राज्योत्सव के आयोजकों के करतूतों पर सवाल उठाने लगे है।
जब मोहन ने योगेश को राज्योत्सव से दूर रहने कहा?
हर साल राज्योत्सव में अपना जलवा दिखाने वाले लाड़ले योगेश अग्रवाल ने इस साल राज्योत्सव से दूरी बनाई है तो इसकी वजह योगेश की वजह से मोहन पर लगने वाला आरोप और बदनामी है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हर साल राज्योत्सव के नाम पर लुटोत्सव की संज्ञा देने और छिछालेदर से संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल काफी खिन्न है। कहा जाता है कि उन्होंने इस बार अपने लाड़ले भाई योगेश अग्रवाल से साफ कह दिया था कि वह इस बार राज्योत्सव बनाम लुटोत्सव से अपने को दूर ही रखे। इसलिए योगेश ने इस बार दूरी बना ली।
ज्ञात हो कि पिछले साल योगेश अग्रवाल को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ था। दलाली से लेकर संस्कृति आयुक्त से उनकी लड़ाई तक खबरों की सुर्खियों में रही यही नहीं एक बड़े कलाकार के साथ दुव्र्यवहार की चर्चा भी जोरों पर रही और योगेश की वजह से राज्योत्सव को लुटोत्सव की संज्ञा दी जाती रही। हमारे सूत्रों के मुताबिक लगातार हो रही बदनामी व छिछालेदर की वजह से ही योगेश को दूर रखा गया।
मिसेस सीएम ने बचा लिया...
कहते हैं सलमान खान को सीएम हाउस लाने के लिए रमन सिंह के बच्चों ने जिद पकड़ ली थी लेकिन मिसेस सीएम श्रीमती वीणा सिंह ने साफ कह दिया कि ऐसे लोगों को बुलाने से बदनामी होगी और उनके इस कठोर रुख पर रमन सिंह को सहमत होना पड़ा। हालांकि चर्चा इस बात की है कि इस मामले में बाप-बेटे के बीच विवाद हुआ।
मोहन के खरीद-फरोख्त पर मुहर...!
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल के संरक्षण में चल रहे लोगों ने सलमान खान मामले में पहली बार भाजपा को शर्मसार किया हो। इससे ठीक दस साल पहले भी बृजमोहन अग्रवाल के समर्थकों ने भाजपा को तब शर्मसार किया था जब नेता प्रतिपक्ष के चुनाव में नंदकुमार साय को चुना गया था। इस हंगामें व तोडफ़ोड़ की वजह से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पलंग के नीचे छीपकर जान बचानी पड़ी थी जबकि पार्टी ने दर्जनभर लोगों को निलंबित किया था।
इस साल राज्योत्सव में अपराधिक छवि वाले सलमान खान को मंच पर स्थान देने को लेकर भाजपा के सिद्धांत कटघरे में हैं। इस घटना ने न केवल भाजपाईयों को शर्मसार किया है बल्कि प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। हालात यह है कि इस वजह से न तो भाजपाईयों को जवाब देते बन रहा है और न ही सरकार के पास ही कोई जवाब है। ज्ञात हो कि राज्योत्सव के आयोजन की पूरी जिम्मेदारी बृजमोहन अग्रवाल के संस्कृति विभाग की है और चर्चा इस बात की भी है कि यह सब अचानक नहीं हुआ है। कब सलमान खान आना है और किस तरह से सलमान खान का स्वागत होगा यह सब बृजमोहन अग्रवाल की जानकारी में तय हुआ है।
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल ने पार्टी को पहली बार इस स्थिति में लाया है। उनकी कार्यशैली हमेशा ही विवादों में रही है इससे पहले जब राज्य निर्माण हुआ तब भी बृजमोहन अग्रवाल को उनके समर्थक नेता प्रतिपक्ष के रुप में पेश किए थे और जब नरेन्द्र मोदी के प्रभार ने नेता प्रतिपक्ष बृजमोहन की बजाय नंदकुमार साय को बना दिया। इस बौखलाए बृजमोहन समर्थकों ने भाजपा के एकात्म परिसर में हंगामा और तोडफ़ोड़ किया। कई लोगों के साथ बदसलूकी और मारपीट भी हुई। यही नहीं नरेन्द्र मोदी जैसे कद्दावर नेता की पलंग के नीचे छीपकर अपनी जान बचानी पड़ी। तब चर्चा इस बात की भी रही कि यह सब बृजमोहन अग्रवाल की सहमति से हुआ। तब भाजपा ने इसे गंभीरता से लेते हुए बृजमोहन समर्थकों की जमकर खबर ली थी और करीब दर्जनभर लोगों को पार्टी से निलंबित किया था। बृजमोहन अग्रवाल ने तब भी इस मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर हीरों बने थे।
ऐसा नहीं है कि बृजमोहन अग्रवाल ने पार्टी को विवाद में नहीं फंसाया है हाल ही में निगम सभापति के चुनाव में भी उस पर पार्षदों के खरीद फरोख्त का आरोप लगा लेकिन सभापति बनाने के कारण इस खरीद फरोख्द को कसके अच्छे कारनामें के रुप में प्रस्तुत किया गया। इस बार भी सलमान को लेकर फजीहत तो हुई लेकिन उसके प्रभाव की वजह से मुख्यमंत्री व पार्टी संगठन कुछ भी कहने से बच रही है।
सलमान का सम्मान और नत्था का...
छत्तीसगढ़ सरकार की नीति है या संस्कृति विभाग की यह तो वही जाने लेकिन सलमान के लिए पलक पखड़े बिछाने वाले संस्कृति विभाग ने पिपली लाइव के हीरों मोहनदास मानिकपुरी उर्फ नत्था के मामले में अपने को अलग कर लिया। कई छत्तीसगढिय़ा कलाकार की उपेक्षा ने राज्योत्सव के आयोजकों के करतूतों पर सवाल उठाने लगे है।
जब मोहन ने योगेश को राज्योत्सव से दूर रहने कहा?
हर साल राज्योत्सव में अपना जलवा दिखाने वाले लाड़ले योगेश अग्रवाल ने इस साल राज्योत्सव से दूरी बनाई है तो इसकी वजह योगेश की वजह से मोहन पर लगने वाला आरोप और बदनामी है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हर साल राज्योत्सव के नाम पर लुटोत्सव की संज्ञा देने और छिछालेदर से संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल काफी खिन्न है। कहा जाता है कि उन्होंने इस बार अपने लाड़ले भाई योगेश अग्रवाल से साफ कह दिया था कि वह इस बार राज्योत्सव बनाम लुटोत्सव से अपने को दूर ही रखे। इसलिए योगेश ने इस बार दूरी बना ली।
ज्ञात हो कि पिछले साल योगेश अग्रवाल को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ था। दलाली से लेकर संस्कृति आयुक्त से उनकी लड़ाई तक खबरों की सुर्खियों में रही यही नहीं एक बड़े कलाकार के साथ दुव्र्यवहार की चर्चा भी जोरों पर रही और योगेश की वजह से राज्योत्सव को लुटोत्सव की संज्ञा दी जाती रही। हमारे सूत्रों के मुताबिक लगातार हो रही बदनामी व छिछालेदर की वजह से ही योगेश को दूर रखा गया।
मिसेस सीएम ने बचा लिया...
कहते हैं सलमान खान को सीएम हाउस लाने के लिए रमन सिंह के बच्चों ने जिद पकड़ ली थी लेकिन मिसेस सीएम श्रीमती वीणा सिंह ने साफ कह दिया कि ऐसे लोगों को बुलाने से बदनामी होगी और उनके इस कठोर रुख पर रमन सिंह को सहमत होना पड़ा। हालांकि चर्चा इस बात की है कि इस मामले में बाप-बेटे के बीच विवाद हुआ।
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