विकास या विनाश का 'एथेनॉल जाल': सुलगती ज़मीन, छिनती साँसें और खाली हाथ किसान
20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का सुनहरा सपना या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-ज़मीन पर डाका? जानिए कैसे पर्यावरण और रोज़गार के नाम पर चांदी काट रहे हैं पूंजीपति और राइस मिलर्स, जबकि स्थानीय युवाओं के हिस्से आई सिर्फ़ 8 हज़ार की गार्डगिरी!
छत्तीसगढ़ में इन दिनों पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की राष्ट्रीय नीति के तहत एक के बाद एक एथेनॉल प्लांट्स (Ethanol Plants) लगाने की बाढ़ आ गई है [01:26, 02:21]। सरकार इसे कृषि और ऊर्जा क्रांति का प्रतीक बता रही है—यह दावा किया जा रहा है कि अन्नदाता अब 'ऊर्जादाता' बनेगा [00:45]।
लेकिन कवर्धा से लेकर बेमेतरा के बेरला, पथर्रा, राका और चुन्नू जैसे ग्रामीण इलाकों में ज़मीनी हकीकत इस गुलाबी तस्वीर के बिल्कुल विपरीत है [00:55, 02:43, 02:54]। राज्य में लगभग 29 से 42 प्लांटों को मंज़ूरी दी गई है और ₹5200 करोड़ से अधिक के एमओयू (MoU) साइन किए गए हैं [02:31, 03:04]। मगर इस उद्योग क्रांति की आड़ में जो तबाही पक रही है, उसने दर्जनों गाँवों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है [00:55, 02:12]।
2. भूजल पर डाका: प्यासा होगा छत्तीसगढ़?
पर्यावरण विशेषज्ञों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 5 से 7 लीटर साफ़ पानी का इस्तेमाल होता है [03:48]।
रोज़ाना लाखों लीटर एथेनॉल बनाने वाली ये फैक्ट्रियाँ हर दिन करोड़ों लीटर पानी सोखेंगी [03:56, 04:08]।
बेमेतरा और बेरला जैसे मैदानी क्षेत्र पहले से ही 'डार्क ज़ोन' (Dark Zone) की कगार पर हैं, जहाँ गर्मियों में हैंडपंप और ट्यूबवेल जवाब दे जाते हैं [04:17, 04:27]।
सवाल यह उठ रहा है कि जो इलाका पहले से ही पानी की किल्लत झेल रहा है, वहाँ जल-भंडार का सीना चीरकर इन फैक्ट्रियों को अरबों लीटर भूजल दोहन की छूट किसने और क्यों दी? [04:35, 04:48]
3. 'रोज़गार' का लॉलीपॉप और भूमपुत्रों के साथ छल
प्लांट लगाने से पहले जनसुनवाई में ग्रामीणों को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे कि स्थानीय पढ़े-लिखे युवाओं को सम्मानजनक नौकरियां मिलेंगी [04:55, 05:08]। लेकिन सच्चाई बेहद कड़वी है:
एथेनॉल प्लांट पूरी तरह ऑटोमेटिक और हाई-टेक तकनीक पर चलते हैं, जहाँ डिस्टिलरी एक्सपर्ट्स, केमिकल इंजीनियरों और लैब तकनीशियनों की ज़रूरत होती है [05:25]।
स्थानीय युवाओं के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन इस विशिष्ट तकनीक का अनुभव न होने का बहाना बनाकर बाहरी राज्यों के लोगों को मलाईदार और मोटी तनख्वाह वाले पदों पर बैठा दिया गया है [05:38, 05:50]।
ज़मीन गंवाने वाले भूमिपुत्रों को बदले में मिली तो बस 8,000 से 10,000 रुपये की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी, हमाली या साफ़-सफ़ाई का काम [05:59]।
4. किसान बेहाल, सिंडिकेट की चाँदी
दावा था कि मक्का और धान उगाने वाले किसानों को इस क्रांति से सीधे नकद फ़ायदा होगा [03:16, 06:10]। लेकिन ज़मीनी खेल कुछ और ही है:
ये निजी कम्पनियाँ छोटे किसानों से सीधे अनाज नहीं खरीदतीं [06:20]।
इनका सीधा गठजोड़ और सिंडिकेट बड़े राइस मिलर्स के साथ है, जहाँ से भारी मात्रा में 'कनकी' (टूटा चावल) और राइस ब्रान उठाया जाता है [06:29, 06:39]।
आम किसान आज भी अपनी फ़सल बेचने के लिए सरकारी उपार्जन केंद्रों (सोसायटियों) की लंबी कतारों में खड़ा है [06:47, 06:56]। इस पूरी नीति का सीधा मुनाफ़ा उद्योगपतियों और मिलरों की तिजोरी में जा रहा है [06:39, 06:47]।
5. ज़हरीली हवा, दूषित पानी और जन-आक्रोश
कवर्धा और बेरला क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि इन प्लांट्स से निकलने वाला गंदा पानी और तीखी ज़हरीली बदबू आने वाले 10 किलोमीटर के दायरे में हवा और पानी को ज़हरीला बना रही है [07:25, 08:03]। ग्रामीणों में यह खौफ़ है कि आने वाले समय में यहाँ की हवा-पानी इतनी दूषित हो जाएगी कि उल्टी, सांस की बीमारियाँ और खेती का बंज़र होना तय है [08:03, 08:33]।
प्रमुख सवाल जो शासन-प्रशासन से जवाब मांगते हैं:
1. वाटर ऑडिट क्यों नहीं? क्या सरकार इन भारी जल-शोषण करने वाले प्लांट्स पर कड़ा वाटर ऑडिट लागू करेगी [08:13]?
2. रोज़गार कानून कब? क्या स्थानीय युवाओं के लिए कम से कम 80% नौकरियों की कानूनी गारंटी तय की जाएगी [08:24]?
3. पर्यावरण की रक्षा का क्या प्लान है? क्या चंद उद्योगपतियों के मुनाफ़े के लिए आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का पानी और साफ़ हवा छीन लेना ही 'सुशासन' है
