छत्तीसगढ सरकार क्या आम लोगों की सरकार है? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि छत्तीसगढ में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। सब तरफ राम नाम की लूट मची है। सरकार में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारी मनमानी पर उतारू है यहां तक कि विधानसभा में भी प्रश्नों के जवाब ठीक से नहीं दिए जा रहे हैं और सारा खेल एक सोची समझी रणनीति के तहत चल रहा है ताकि उद्योगपतियों को अधिकधिक लाभ मिले।
सरकार की स्थिति तो गृहमंत्री ननकीराम कंवर के अलग-अलग समय पर दिए दो बयानों से लगाया जा सकता है पहला बयान गृहमंत्री ने मुख्यमंत्री के गृह जिले में जाकर पुलिस कप्तान को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहा। यह किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया यह बताने की जरूरत नहीं है लेकिन विधानसभा में उनका यह कहना कि पुलिस वाले दस हजार रुपया महिना लेकर शराब वालों के लिए काम करते हैं यह सरकार के लिए डूब मरने वाली बात है। इतना ही नहीं है पूरा मामला। दरअसल राज्य बनने के बाद यहां की प्रचुर धन संपदा को लुटने में सरकार ने जिस तरह से उद्योगपतियों को सहयोग किया है वैसा आजादी के बाद किसी भी प्रदेश में नहीं हुआ होगा। जिंदल से लेकर बालको और अल्ट्राटेक से लेकर दूसरे उद्योगपतियों की मनमानी से आए दिन अखबार रंगे पड़े हैं। यहां तक कि बालको में हुई चिमनी कांड भी ऐसी जमीन पर हुई जो बालको ने कब्जा कर रखी है। शायद यहीं वजह है कि अजीत प्रमोद कुमार जोगी यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर सरकार अनिल अग्रवाल से डरती क्यों हैं।
दो चार सौ फुट जमीन पर कब्जा कर अपना आशियाना बनाने वालो पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार उद्योगों द्वारा अवैध कब्जे की गई हजारों एकड़ जमीन को लेकर क्यों खामोश है। क्या इसके एवज में मुख्यमंत्री से लेकर अन्य मंत्री व सरकारी अधिकारी को लाखों रुपए दिए गए हैं। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा कि वह उद्योगपतियों की मनमानी पर क्या इसलिए चुप है क्योंकि वहां से उन्हें पैसे मिल रहे हैं? आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए बैठी सरकार को क्या यह नहीं पता है कि उद्योगपतियों की मनमानी से आम आदमी प्रदूषण की वजह से बीमार हो रहा है और उनके गुण्डे आम लोगों को पीट रहे हैं।
क्या सरकार को खबर है कि उसके दर्जनभर से अधिक आईएएस अधिकारियों ने मौली श्री विहार में अपने बंगलों को इन्हीं उद्योगपतियों को लाखों रुपए किराए पर दे रखा है। एक साधारण आदमी भी समझ सकता है कि कोई किसी के 15-20 हजार किराये वाली जगह को एक लाख रुपए किराये में क्यों ले रहा है फिर यह बात सरकार के समझ में क्यों नहीं आ रहा है। क्या ऐसा नहीं है कि इन उद्योगपतियों ने प्रदेश के इन आईएएस अधिकारियों को ओब्लाईज् कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। उद्योगों को जिस पैमाने पर जमीन दी जा रही है और उन्हें जमीन कब्जा करने की छूट दी जा रही है क्या यह किसी अंधेरगर्दी से कम है। गरीबों के नाम पर दिए जाने वाले चावल क्या राईस मिलरों व धन्ना सेठों के गोदाम में नहीं जा रहा है। चौतरफा भ्रष्टाचार ने छत्तीसगढ क़ी वित्तीय स्थिति को डगमगा दिया है और सरकार ने इस पर अंकुश नहीं लगाया तो इसके दुखद परिणाम आना तय है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 23 मार्च 2010
क्या पैसा खिलाकर जाति प्रमाण पत्र बनाया गया है...

छत्तीसगढ में सत्ता के बल पर अधिकारियों से अनैतिक कार्य कराया जा रहा है। वामन राव लाखे वार्ड के पार्षद विजेता मन्नु यादव को पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र दिलाने में तो ऐसी ही भूमिका नजर आ रही है और ऐसा नहीं है तो अधिकारी पैसा खाकर किसी को भी जाति प्रमाण पत्र दे रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय दूरसंचार विभाग में सामान्य वर्ग से टेलीफोन मैकेनीक के पद पर कार्य कर रहे दयालदास मोहरे की पुत्री विजेता यादव को पार्षद चुनाव लड़ने तीन दिन में पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। चूंकि विजेता ने प्रेम विवाह मन्नु यादव से किया है और उसे भाजपा ने टिकिट दी थी। इसलिए सारा खेल आनन-फानन में हुआ।
इस मामले का सबसे रोचक पहलू तो यह है कि विजेता के भाई सुनील को जाति प्रमाण पत्र के लिए दिया आवेदन यह कहकर खारिज किया गया कि मोहारे जाति को छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जाति का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यह बात सुप्रीमकोर्ट ने भी तय कर दिया है कि प्रेम विवाह के बाद भी युवती की जाति नहीं बदलेगी। इस नियम के बाद भी यहां विजेता यादव को किस बिना पर पिछड़े वर्ग का जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया यह आसानी से समझा जा सकता है। बहरहाल इस मामले में कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी ने याचिका दायर भी कर दी है और देखना है कि सत्ता के गलियारे में इसकी क्या प्रतिक्रिया होती है।
रविवार, 21 मार्च 2010
बेचने तो निकले हो खरीदेगा कौन?

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता इन दिनों विषम स्थिति में है। सरकारी विज्ञापनों के लालच में खबरों से समझौता या सेल्फ सेंशरशीप चल रहा है। बड़े अखबार न तो खोजी पत्रकारिता को लगभग तिलांजलि ही दे दी है और खबरों पर मालिक से लेकर संपादक की निगाहें तेज हो गई है।
ऐसे में वे पत्रकार जो इस पेशे को मिशन के रुप में लेते हैं उनके लिए खबरें बनाना मुश्किल हो गया है इसलिए कुछ पत्रकारों को लगा कि हम सब मिलकर खबरें बेचने का काम करते हैं। इसी कड़ी में मीडिया-हाऊस बनाया गया है। शहर के प्रतिष्ठित अखबारों में काम कर चुके अहफाज रशीद, नवीन शर्मा और मधुसूदन सुनीता गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने मीडिया हाउस बना लिया है। इकना कहना है कि वे पत्रकारिता को नया आयाम देंगे और प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खबरें बनाएंगे। इन्होंने नवरात्रि के प्रथम दिवस पर इसे लांच भी कर दिया लेकिन इस सवाल का जवाब शायद इनके पास भी नहीं है कि खबरें यदि बनाई गई तो इसे खरीदेगा कौन?
दरअसल यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं कि इन दिनों खबरों से यादा मार्केटिंग और विज्ञापन को महत्व दिया जा रहा है। अखबार ऐसी खबरों से अटा पड़ा रहता है जो या तो सूचनात्मक हो या फिर जिसके माध्यम से विज्ञापन बटोरे जा सकते हैं। ऐसे में मीडिया हाउस को लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक है। अखबार हो या प्रिंट मीडिया उन्हें अपने मतलब की खबरें चाहिए और मीडिया हाउस सिर्फ उनकी मतलब पर काम करेगा तो पत्रकारिता को नया आयाम देने के सपने का क्या होगा तब भला नौकरी क्या बुरी होगी।
और अंत में....
मीडिया हाउस को जिस ताम-झाम के साथ लांच किया गया उसे लेकर लोग यह कहने लगे हैं कि पत्रकारिता के चंडाल चौकड़ी में चंडाल का नाम बताया जाए और वह टिक गया तो हाउस बन जाएगा।
ऐसे में वे पत्रकार जो इस पेशे को मिशन के रुप में लेते हैं उनके लिए खबरें बनाना मुश्किल हो गया है इसलिए कुछ पत्रकारों को लगा कि हम सब मिलकर खबरें बेचने का काम करते हैं। इसी कड़ी में मीडिया-हाऊस बनाया गया है। शहर के प्रतिष्ठित अखबारों में काम कर चुके अहफाज रशीद, नवीन शर्मा और मधुसूदन सुनीता गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने मीडिया हाउस बना लिया है। इकना कहना है कि वे पत्रकारिता को नया आयाम देंगे और प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खबरें बनाएंगे। इन्होंने नवरात्रि के प्रथम दिवस पर इसे लांच भी कर दिया लेकिन इस सवाल का जवाब शायद इनके पास भी नहीं है कि खबरें यदि बनाई गई तो इसे खरीदेगा कौन?
दरअसल यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं कि इन दिनों खबरों से यादा मार्केटिंग और विज्ञापन को महत्व दिया जा रहा है। अखबार ऐसी खबरों से अटा पड़ा रहता है जो या तो सूचनात्मक हो या फिर जिसके माध्यम से विज्ञापन बटोरे जा सकते हैं। ऐसे में मीडिया हाउस को लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक है। अखबार हो या प्रिंट मीडिया उन्हें अपने मतलब की खबरें चाहिए और मीडिया हाउस सिर्फ उनकी मतलब पर काम करेगा तो पत्रकारिता को नया आयाम देने के सपने का क्या होगा तब भला नौकरी क्या बुरी होगी।
और अंत में....
मीडिया हाउस को जिस ताम-झाम के साथ लांच किया गया उसे लेकर लोग यह कहने लगे हैं कि पत्रकारिता के चंडाल चौकड़ी में चंडाल का नाम बताया जाए और वह टिक गया तो हाउस बन जाएगा।
घोटाले में नाम कमाओं,बजट में हिस्सा बढ़ाओं

यह चतुर नौकरशाही है या फिर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का विरोधियों को चुप करने की रणनीति। लेकिन प्रदेश के जिस दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में करोड़ों-अरबों रुपए के घोटाले की कहानी सामने आ रही है उसी बृजमोहन अग्रवाल के विभागों को प्रदेश के कुल बजट का 20 फीसदी हिस्सा दिए जाने को लेकर जनसामान्य में कई तरह की चर्चा है।
वैसे तो राय बनने के बाद से ही पीडब्ल्यूडी, खनिज, पंचायत, उर्जा, स्वास्थ्य, सिंचाई विभाग को काफी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और भाजपा शासनकाल में तो यहां हुए घपलों को लेकर खूब हल्ला मचा। बताया जाता है कि पर्यटन और संस्कृति विभाग में हुए काले कारनामें ने इस विभाग को भी चर्चा में ला दिया। इकलौता यही विभाग है जहां प्रचार प्रसार के नाम पर जमकर बंदरबांट हुए और यहां बैठे अफसरों ने करोड़ो कमाए। राय का ताजा बजट करीबन साढ़े तेईस हजार करोड़ है और इनमें से एक बडा हिस्सा पीडब्ल्यूडी, शिक्षा, पर्यटन और संस्कृति के लिए जारी किया गया है। यानी जिन विभागों को बृजमोहन अग्रवाल संभाल रहे हैं उन्हें साढ़े पांच हजार करोड़ आबंटित किया गया है।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक यह उन नौकरशाहों की करतूत है जो अपनी जेबें गरम करना चाहते हैं इसलिए ऐसे विभागों में यादा बजट दिया गया जहां खाने की छूट मिल सके। जबकि एक अन्य सूत्रों का कहना है कि यह डॉ. रमन सिंह की रणनीति का हिस्सा है ताकि बृजमोहन अग्रवाल नाराज न हो और उसकी तरफ नजर न उठाये। मामला जो भी हो लेकिन आम लोगों में यह प्रतिक्रिया खुले आम सुनाई पड़ रही है कि जो सबसे यादा भ्रष्टाचार करेगा उसे ही बजट में सर्वाधिक आबंटन दिया जाएगा। छत्तीसगढ में जिस पैमाने पर पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार चल रहा है वह आश्चर्यजनक है सड़कों का हाल तो बदतर है ही भवनों के निर्माण में भी जमकर धांधली की जा रही है। जबकि पर्यटन में मोटल निर्माण में बाउंड्री निर्माण और घास लगाने के नाम पर जबरदस्त घोटाले हुए हैं। संस्कृति विभाग ने तो स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा कर बाहर के कलाकारों को बुलाने में जमकर दलाली की है।
बहरहाल बजट में एक ही मंत्री को 20 फीसदी आबंटन को लेकर कई तरह की चर्चा है ऐसे में आम लोगों में डॉ. रमन सिंह की छवि को लेकर चर्चा स्वाभाविक है।
वैसे तो राय बनने के बाद से ही पीडब्ल्यूडी, खनिज, पंचायत, उर्जा, स्वास्थ्य, सिंचाई विभाग को काफी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और भाजपा शासनकाल में तो यहां हुए घपलों को लेकर खूब हल्ला मचा। बताया जाता है कि पर्यटन और संस्कृति विभाग में हुए काले कारनामें ने इस विभाग को भी चर्चा में ला दिया। इकलौता यही विभाग है जहां प्रचार प्रसार के नाम पर जमकर बंदरबांट हुए और यहां बैठे अफसरों ने करोड़ो कमाए। राय का ताजा बजट करीबन साढ़े तेईस हजार करोड़ है और इनमें से एक बडा हिस्सा पीडब्ल्यूडी, शिक्षा, पर्यटन और संस्कृति के लिए जारी किया गया है। यानी जिन विभागों को बृजमोहन अग्रवाल संभाल रहे हैं उन्हें साढ़े पांच हजार करोड़ आबंटित किया गया है।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक यह उन नौकरशाहों की करतूत है जो अपनी जेबें गरम करना चाहते हैं इसलिए ऐसे विभागों में यादा बजट दिया गया जहां खाने की छूट मिल सके। जबकि एक अन्य सूत्रों का कहना है कि यह डॉ. रमन सिंह की रणनीति का हिस्सा है ताकि बृजमोहन अग्रवाल नाराज न हो और उसकी तरफ नजर न उठाये। मामला जो भी हो लेकिन आम लोगों में यह प्रतिक्रिया खुले आम सुनाई पड़ रही है कि जो सबसे यादा भ्रष्टाचार करेगा उसे ही बजट में सर्वाधिक आबंटन दिया जाएगा। छत्तीसगढ में जिस पैमाने पर पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार चल रहा है वह आश्चर्यजनक है सड़कों का हाल तो बदतर है ही भवनों के निर्माण में भी जमकर धांधली की जा रही है। जबकि पर्यटन में मोटल निर्माण में बाउंड्री निर्माण और घास लगाने के नाम पर जबरदस्त घोटाले हुए हैं। संस्कृति विभाग ने तो स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा कर बाहर के कलाकारों को बुलाने में जमकर दलाली की है।
बहरहाल बजट में एक ही मंत्री को 20 फीसदी आबंटन को लेकर कई तरह की चर्चा है ऐसे में आम लोगों में डॉ. रमन सिंह की छवि को लेकर चर्चा स्वाभाविक है।
रमन बने असरदार,क्योंकि वे हैं लाचार|जोगी की दमदारी पर इंडिया टुडे कायल


यह तो देश की राजनैतिक परिस्थितियां ही है कि यहां फूलनदेवी जैसी डकैत सांसद के दरवाजे पर पहुंच जाती है और अंधेरगर्दी मचाने वाले देश के सबसे बड़े राय के मुख्यमंत्री बन जाते है। छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी तमाम घपलों-घोटालों के बाद भी छत्तीसगढ में सबसे असरदार माने जाते हैं तो इसकी वजह कांग्रेस में बिखराव के अलावा पैसों की भूख है जिसके आगे तमाम राजनेता नतमस्तक है।
इंडिया टुडे के ताजा सर्वे रिपोर्ट के आधार पर रमन सिंह इसलिए छत्तीसगढ क़े सबसे असरदार व्यक्ति है क्योंकि उन्होंने विरोधियों की हवा निकाल दी और अजीत जोगी को छोड़ अन्य कांग्रेसियों में चुनौती देने का साहस नहीं है। ऐसे में अजीत जोगी की दमदारी को इंडिया टुडे ने भी माना है भले ही कांग्रेसी न माने। सर्वे रिपोर्ट को लेकर डॉ. रमन सिंह के असरदार के पक्ष में जो बाते कही गई है उसमें दो रुपया किलो चावल का भी जिक्र है जो डॉक्टर रमन सिंह की लोकप्रियता का संवाहक बताया गया है।
हम यहां सर्वे के आधार को चुनौती नहीं दे रहे हैं बल्कि असरदार की परिभाषा को लेकर सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में डॉ. रमन सिंह असरदार इसलिए भी हैं क्योंकि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री है। दरअसल असरदार की परिभाषाएं अब बदल गई है। नरेन्द्र मोदी क्यों असरदार है और फूलनदेवी क्या बगैर असरदार के चुनाव जीत सकती है। यूपी-बिहार में तो अपराधियों की जीत ही उनके असरदार होने का ईशारा करती है।
छत्तीसगढ में राजनैतिक परिस्थिति भले ही भाजपा के अनुकूल न हो लेकिन कांग्रेस के बिखराव ने उन्हें कुर्सी पर तो बिठा ही दिया है। रोज नए-नए घोटाले की कहानी बाहर आ रही है और मंत्रियों पर खुलेआम कमीशन लेने के आरोप लग रहे हैं। आरोप तो यहां तक है कि मुख्यमंत्री का न प्रशासन पर पकड़ है न शासन पर पकड़ है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपनी मनमानी कर रहे हैं और विधानसभा तक को झूठी जानकारी दी जाती है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ में शासन-प्रशासन का क्या हाल है रही बात डॉ. रमन सिंह को चुनौती का तो वह तो कहीं नहीं दिखलाई पड़ता। इसकी वजह उनकी प्रशासनिक छवि है जो अधिकारियों और मंत्रियों को मनमानी करने की छूट देता है।
यह सर्वमान्य सिध्दांत है कि आप जब किसी के गलत कार्यों का विरोध नहीं करेंगे तो आपका कोई विरोध क्यों करेगा हालांकि राजनीति में महत्वाकांक्षा भी मायने रखता है तो बृजमोहन अग्रवाल को छोड़ रमन सिंह के लिए कहीं कोई दिक्कत नहीं है और डॉ. रमन सिंह ये बात जानते हैं इसलिए उन्होंने प्रदेश के कुल बजट का 20 फीसदी हिस्सा बृजमोहन अग्रवाल के पाले में कर दिया है ताकि उनका ध्यान कुर्सी की बजाय पैसे पर लगा रहे। बहरहाल सर्वे रिपोर्ट ने कांग्रेसियों के कान खड़े कर दिए है और देखना है कि इंडिया टुडे के इस सर्वे रिपोर्ट का कांग्रेस के अंदरूनी राजनीति में क्या असर डालता है।
मांढर कालेज में मनमानी,अफसरों की मेहरबानी

ठाकुर होने का फायदा उठाकर मांढर स्थित महाविद्यालय के संचालक अशोक सिंह ने कॉलेज में हुए घपलों की लीपापोती शुरु कर दी है। कहा जाता है कि उनके प्रभाव में आकर आदिम जाति विभाग और मंत्रालय में बैठे अफसरों ने उन्हें क्लीन चीट देने की योजना तक बना ली है।
मांढर कॉलेज में हो रहे घपलों पर विस्तार से प्रकाश डाला था और सूचना के अधिकार के तहत मिले सबूतों से स्पष्ट है कि यहां कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। आरक्षित बच्चों की फीस जिस तरह से कॉलेज संचालकों द्वारा हड़पा जा रहा है वह आश्चर्यजनक है। हालात यह है कि इस मामले में शिकायकर्ताओं को जांच अधिकारियों द्वारा सेंटिंग कर लेने के लिए प्रेरित किया जाता है इसी से समझा जा सकता है कि कॉलेज प्रबंधकों ने किस पैमाने पर यहां गोलमाल किया है।
बताया जाता है कि कॉलेज में हुए घपलेबाजी से प्राचार्य को अलग रखा गया है और इसकी उच्च स्तरीय जांच हुई तो यह भी सामने आ सकता है कि किस तरह से प्राचार्य के नाम पर दूसरे लोगों ने हस्ताक्षर कर राशि हड़प की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2006-07 शिक्षा सत्र में ध्रुवकुमार वर्मा प्राचार्य थे लेकिन छात्रवृत्ति रिकार्ड में अशोक सिंह ने हस्ताक्षर किए है। इसी तरह वर्ष 2007-08 व 2008-09 में 1 ही नाम से बीए, बीकॉम, पीजीडीसीए और डीसीए कोर्स की 1 साल में 3 बार छात्रवृत्ति निकाली गई है और आश्चर्य का विषय है कि इस सारे मामले की शिकायत उच्च स्तर पर की गई है और बकायदा शिकायतकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत कॉपी निकालकर जांचकर्ताओं और मुख्यमंत्री तक को कॉपी दी है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है पता तो यहां तक चला है कि ठाकुर होने का प्रभाव डालकर इस मामले को दबाने की कोशिश चल रही है।
मांढर कॉलेज में हो रहे घपलों पर विस्तार से प्रकाश डाला था और सूचना के अधिकार के तहत मिले सबूतों से स्पष्ट है कि यहां कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। आरक्षित बच्चों की फीस जिस तरह से कॉलेज संचालकों द्वारा हड़पा जा रहा है वह आश्चर्यजनक है। हालात यह है कि इस मामले में शिकायकर्ताओं को जांच अधिकारियों द्वारा सेंटिंग कर लेने के लिए प्रेरित किया जाता है इसी से समझा जा सकता है कि कॉलेज प्रबंधकों ने किस पैमाने पर यहां गोलमाल किया है।
बताया जाता है कि कॉलेज में हुए घपलेबाजी से प्राचार्य को अलग रखा गया है और इसकी उच्च स्तरीय जांच हुई तो यह भी सामने आ सकता है कि किस तरह से प्राचार्य के नाम पर दूसरे लोगों ने हस्ताक्षर कर राशि हड़प की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2006-07 शिक्षा सत्र में ध्रुवकुमार वर्मा प्राचार्य थे लेकिन छात्रवृत्ति रिकार्ड में अशोक सिंह ने हस्ताक्षर किए है। इसी तरह वर्ष 2007-08 व 2008-09 में 1 ही नाम से बीए, बीकॉम, पीजीडीसीए और डीसीए कोर्स की 1 साल में 3 बार छात्रवृत्ति निकाली गई है और आश्चर्य का विषय है कि इस सारे मामले की शिकायत उच्च स्तर पर की गई है और बकायदा शिकायतकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत कॉपी निकालकर जांचकर्ताओं और मुख्यमंत्री तक को कॉपी दी है लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है पता तो यहां तक चला है कि ठाकुर होने का प्रभाव डालकर इस मामले को दबाने की कोशिश चल रही है।
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
बेबस गृहमंत्री , मदमस्त सरकार

एक तरफ देश की आधी आबादी महिला बिल को लेकर फूले नहीं समा रही है तो दूसरी तरफ यही आधी आबादी छत्तीसगढ़ में नासूर बन चुके शराब को बंद करने आंदोलनरत है। शराब के दुष्परिणामों का सर्वाधिक शिकार होने वाली इस आधी आबादी को छत्तीसगढ़ में छला जा रहा है। जगह-जगह वैध और अवैध भट्ठियों के जल ने महिलाएं ही नहीं युवाओं को भी बीमा कर दिया है ऐसे में प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम कंवर का विधानसभा में स्वीकारोक्ति कि धाने वाले दस हजार रुपया महिना लेकर उन्हीं का कहा मानते है। सरकार के लिए शर्म की बात नहीं तो और क्या है। शराब लॉबी का यह समनांतर प्रशासन क्या अंधेरगर्दी नहीं है।
सरकार पर खासकर डॉ. रमन सिंह की सरकार पर यह आरोप नया नई है कि यह उद्योगपतियों और शराब माफियाओं की सरकार है और सरकार ने कभी भी इस पर अपना पक्ष नहीं रखा। शराब बंदी पर वह जरूर कहते रहती है कि यह राजस्व का मामला है। पीढ़ी खत्म कर देने वाली इस भयावह शराब के राजस्व से सरकार चले यह अंधेरगर्दी के सिवाय कुछ नहीं है। विधानसभा में गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने जिस बेबाकी से अपनी बेबसी व्यक्त की है वह सभ्य समाज के लिए सोचनीय विषय है सोचनीय विषय तो सरकार के लिए है लेकिन वह शराब माफियाओं के पैसों में दब गई है इसलिए शराब दुकानों की खिलाफत करने वालों को ही प्रताड़ित किया जाता है। समूचे छत्तीसगढ़ में इन दिनों अजब तमाशा है। गांव-गांव में वैध-अवैध शराब खुले आम बिक रहे हैं और इसके विरोध करने वालों को शराब माफियाओं के गुण्डे और पुलिस मिलकर पिट रहे हैं। इतनी अंधेरगर्दी के बाद भी शराब को लेकर सरकार का राजस्व प्रेम अंधेरगर्दी के सिवाय कुछ नहीं है।
अब जब महिला बिल पास हो चुका है छत्तीसगढ़ सरकार को भी शराब के संबंध में निर्णय लेने की जरूरत है। उसे तय करना ही होगा कि किस जनसंख्या के अनुपात में शराब भट्ठी या दुकानें कितनी खोली जा सकती है। उसे तय करना ही होगा कि बड़े शहरों में दो-चार से यादा दुकानें न खुले। उसे यह भी तय करना होगा कि शराब माफिया और पुलिस के गठजोड़ से कोई गांव बर्बाद न हो जाए। संस्कृति को नष्ट होने से नहीं बचाने का मतलब ही अंधेरगर्दी है। गृहमंत्री ननकीराम कंवर की बेबसी के बाद भी सरकार ने निर्णय नहीं लिया और नई-नई दुकाने खोलने का लाइसेंस देते रहा तो इस प्रदेश का विकास थम जाएगा। इस प्रदेश का युवा बर्बाद हो सकता है और घर-परिवार बिखर जाएगा। सिर्फ राजस्व के लिए पूरी पीढ़ी को दांव पर लगाने की कोशिश ही सबसे बड़ी अंधेरगर्दी है।
महिला संगठनों में खासकर पूनम साहू जो पेशे से वकील भी हैं उनका कहना है कि सरकार ही नहीं चाहती कि लोग मिल जुलकर रहे और अपनी हक की लड़ाई व सरकार के करतूतों का सामूहिक विरोध करें इसलिए सरकारें जानबूझकर लोगों को शराब पीने के लिए प्रेरित कर रही है। पूनम जी इन दिनों शराब के खिलाफ प्रखरता से आवाज उठा रही हैं वह कहती है इसकी वजह से सबसे यादा महिलाएं प्रताड़ित है। वह यह भी कहती हैं कि सरकार पूर्ण शराब बंदी लागू करें और हमें उग्र आंदोलन के लिए मजबूर न करें। ऐसी कितनी ही पूनम है जो अब आवाज बनने जा रही है इसलिए सरकार दूसरे की नहीं तो कम से कम अपने गृहमंत्री की बेबसी को देखकर फैसला ले।
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