शनिवार, 27 मार्च 2010

जो दिखता है वही बिकता है

अखबार की दुनिया भी अपनी तरह की दुनिया है। स्वयं को दिखाने की कोशिश में तामझाम के साथ-साथ अब ईनामी ड्रा भी निकाले जाते हैं ताकि पाठकों को खबर की बजाए ईनाम के लालच में अपना अखबार बेच सके।
राजधानी में तो इन दिनों गजब का नजारा है। नवभारत जैसे प्रतिष्ठित अखबार रीड एंड वीन के जरिये पाठक तक पहुंच रहा है। कभी छत्तीसगढ़ की धड़कन माने जाने वाला यह अखबार भी अब अपने प्रतिद्वंदियों से भयभीत है तो इसकी वजह अखबार का बाजारीकरण है।
दैनिक भास्कर तो तंबोला के जादू से अखबार बेचने आमदा है जबकि दैनिक भास्कर की टीम तोड़कर नए कलेवर में निकलने वाले अखबार नेशनल लुक को भी खबरों से यादा रद्दी इकट्ठा करने में भरोसा है वह तो पुराना एक माह का पेपर लाने पर 90 रुपए तक दे रहा है।
बाजारीकरण के इस दौड़ में हर चीज को बिकाऊ मानने वाले इन अखबारों को मालूम है कि सिर्फ अखबार बेचकर पैसा नहीं कमाया जा सकता। जितना अखबार बिकेगा उतना विज्ञापन मिलेगा और यही असली कमाई है।
इसलिए अखबार बेचने के लिए राजधानी के अखबारों में ऐसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। वैसे भी अखबार अब पूरी तरह से व्यवसायिक हो चुका है और एक अच्छे दुकानदार की तरह अखबारों में भी ऐसी खबरें कम ही छपती है जिससे सरकार रूपी मजबूत ग्राहक नाराज हो जाए।
सरकार में बैठे लोगों के लूटखसोट या फिर गलत कामों पर भी अखबार खामोश रहे या बड़े इंडस्ट्रीज में होने वाली घटना पर नाम नहीं छापना अब आम बात हो गई है और जब अखबारों में खबरें न हो तो ग्राहकों को पटाने सेल तो लगाने ही पड़ेंगे और जब पूरा जमाना ही दिखता है तो बिकता है वाली हो तो फिर अखबार के धंधेबाज इससे दूर कैसे रह सकते है।
इसलिए राजधानी के अखबार भी ग्राहकों को छोटे-छोटे ईनाम देकर सरकार से बड़ी राशि लूटने में लगे हैं। ऐसे ईनामी ड्रा लॉटरी के श्रेणी में नहीं आते क्योंकि ये नगद नहीं होते और न ही सीधे तौर पर टिकिट बेची जा रही है कहना मुश्किल है। अब ईनाम के लालच में कोई 10-20 अखबार खरीदे भी तो यह उसकी ही गलती है।
और अंत में....
नगर निगम चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को छोड अन्य प्रत्याशियों की पीड़ा रही कि भले ही वे चुनाव जीतने में सक्षम है लेकिन मीडिया उन्हें कवर नहीं किया अब भला ऐसे प्रत्याशियों को कोई कैसे समझाये कि सिर्फ दमदार होने से काम नहीं चलेगा। मालदार भी होना पड़ेगा।

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

अल्ट्राटेक : चोरी और सीना जोरी

0 खिलाफ छापा तो नोटिस भिजवाई
यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे या चोरी और सीना जोरी की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना हिरमी स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी में व्याप्त अनियमितता की खबर पर अल्ट्राटेक प्रबंधक इस तरह नहीं बौखलता और नोटिस नहीं भेजता।
वैसे तो अल्ट्राटेक सीमेंट संयंत्र को लेकर पूरा हिरमी क्षेत्र व्यथित है और हमें समय-समय पर क्षेत्रिय जनप्रतिनिधियों सरपंच, जनपद सदस्य, आम लोगों के अलावा यहां कार्यरत कर्मचारियों ने लिखित में शिकायत की है कि किस तरह से अल्ट्राटेक की वजह से पूरे क्षेत्र में प्रदूषण व्याप्त है। आम लोगों का जीना दूभर करने वाले इस संयंत्र ने लोगों को नौकरी देने की शर्त पर उनकी जमीनें हड़प ली और नौकरी देने वाले जमीन मालिकों को सीधे काम कराने की बजाय ठेकेदारों के पास भेज दिया गया। यहीं नहीं नौकरी से निकालने की कहानी तो एक दम आम है और इसे लेकर लोगों में भारी रोष व्याप्त है लोग यहां आए दिन आंदोलन पर उतारू है और सरकार भी आम लोगों की बजाय प्रबंधन तंत्र पर यादा भरोसा करती है।
जिस संतराम वर्मा को नोटिस में अपराधिक कृत्य में संलग्न रहने की बात कही गई है उसके खिलाफ कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है जिसे लेकर संतराम वर्मा शीघ्र ही मानहानि का दावा ढोकने वाले है।
कंपनी ने प्रदूषण से ही इंकार किया है लेकिन हमें गांव वालों व जनप्रतिनिधियों ने लिखित में शिकायत की है कि संयंत्र के प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
जहां तक हमने अल्ट्राटेक की दादागिरी से सरकार की खामोशी की बात कही है तो यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि उद्योगपतियों की दादागिरी से आम आदमी त्रस्त है और सरकार में बैठे अधिकारी व मंत्री आम लोगों के दुखदर्द की बजाय उद्योगपतियों की सुनता है इसका अनेक उदाहरण है कि किस तरह से आज तक जमीन छीने जाने वाले लोग मुआवजा के लिए भटक रहे हैं।
अल्ट्राटेक के खिलाफ कई तरह की शिकायत है और यहां संयंत्र के विस्तार के नाम पर किस तरह से वृक्षों की बलि दी गई वह किसी से छिपा नहीं है। संयंत्र प्रबंधक की दादागिरी की चर्चा तो क्षेत्र में इस तरह से है कि लोगों का अब कानून से विश्वास ही उठने लगा है।
अल्ट्राटेक प्रबंधक की तरफ से नोटिस जारी कर मानहानि का दावा किया जा रहा है जबकि हमने हर खबरों पर आम लोगों की प्रतिक्रिया ली है और इसी प्रतिक्रिया या शिकायत के आधार पर आंखों देखी खबरें प्रकाशित की है।
बहरहाल प्रबंधक तंत्र ने जिस तरह से नोटिस भेजकर खबरों पर दबाव बनाने की कोशिश की है उससे बुलंद छत्तीसगढ़ के हौसले और बढ़े हैं और आम लोगों के हितों को लेकर खबरों का प्रकाशन होता रहेगा।

बेवजह छेड़छाड़ के जुर्म में फंसा दिया

यह पुलिसिया गुण्डागर्दी का नमूना नहीं तो और क्या है। पुलिस ने सुभाष नगर निवासी नरेन्द्र साहू को गिरफ्तार कर एक रात जेल में गुजारने मजबूर कर दिया। अब युवक अपने खिलाफ लगे छेड़छाड़ के आरोप से मुक्त होने न्याय मांग रहा है लेकिन सरकार के मुखिया ने भी आंखे फेर ली है।
इस संबंध में सुभाष नगर निवासी नेरन्द्र साहू ने बताया कि मैं बी.ए. प्रथम वर्ष का छात्र हूं और 3 मई 2007 को दुर्ग पुलिस ने उसे किसी सुषमा वर्मा नामक युवती से छेड़छाड़ के जुर्म में गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया। हालांकि दूसरे दिन उसकी जमानत हो गई और 19 जुलाई 2007 को प्रकरण नस्तीबध्द भी हो गया।
नेरन्द्र साहू का कहना है कि उसने इस घटना के बाद सुषमा वर्मा की खोज की लेकिन न तो इस युवती का ही पता चला और न ही इस मामले का गवाह आनंद सेन का ही पता चला है। इस वजह से मेरी भारी बदनामी हुई और मुझे शर्मिन्दगी भी उठानी पड़ी। नरेन्द्र साहू का कहना है कि इस प्रकरण की जांच कर दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर मैने एसपी, कलेक्टर, गृहमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को आवेदन दिया है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
एक सामान्य आदमी के जीवन के साथ खेलने वालों के खिलाफ सरकार की चुप्पी आश्चर्यजनक है। नरेन्द्र साहू का कहना है कि वे न्याय के लिए तब तक लड़ते रहेंगे जब क उन्हें न्याय नहीं मिल जाता।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

एक ल मां एक ल मौसी

तभे राज ठाकरे के जमन होथे...
अइसने फैसला ल तो कहिथे एक ला मां अऊ एक ल मौसी। तभे सरकार का एक कोती किसान मन के जमीन ल कौड़ी के मोल खरीदे बर अपन डंडा चलावत हे त दूसर डहार कमल विहार योजना के जमीन मालिक ल अरबपति बनावत हे। सरकार के अइसने फैसला के कारण राज ठाकरे पैदा होथे नहीं त उड़ीसा असन भगाव अभियाव चलथे।
छत्तीसगढ़ सरकार हा अधिकारी कर्मचारी अऊ अपन सुविधा बर राजधानी के बनावत हे। राजधानी बनाय बर छत्तीसगढ़ के किसान मन के जमीन ल कौड़ी मोल खरीदत हे। जेन किसान नई बेचन कहात हे तेन मन ल डंडा के बल म जमीन छोड़े बर मजबूर करत हे। जब उहां के जमीन के कीमत 25-30 लाख रुपया एकड़ हे तब भला किसान मन ह 7-9 लाख रुपया एकड़ म बेचे बर कइसे तैयार होही। लेकिन सरकार ह अपन दमनकारी नीति ले किसान मन जमीन बेचे बर मजबूर करत हे।
दूसर कोती सरकार ह कमल विहार योजना लाए हे ये योजना म जउन मन के जमीन ह आही ओखर विकास करके 16 आना में 6 आना जमीन वापस दे दिये जाही। यानी भर्रा जमीन ल लेके बाहरा बना के दीही केहे जाय त गलत नई होवय।
आखिर सरकार के योजना ह अइसे कइसे बनथे के किसान मन के जमीन के कौड़ी दाम अऊ सेठ मन के जमीन के करोड़ो दाम। हमर खबरची के अनुसार सरकार ह जेन ढंग ले किसान मन उपर अत्याचार करत हे ये हा सिर्फ उदाहरण भर हे के कइसे सरकार एक ला मां एक ला मौसी करत हे जबकि सरकार के नजर हर आदमी बर सामान होना चाही।
हमर सूत्र के अनुसार त कमल विहार योजना ह भाजपाई भू-माफिया मन के हित ल देख के बनाय गेहे। यदि 6 आना जमीन विकास करके वापिस करही त कमल विहार ह खाली दू आना जगह म बनही अऊ बाकी जमीन ह त नाली-सड़क गार्डन, मंदिर अऊ गरीब मन के मकान म निकल जाही। यानी दू आना जमीन म कमल विहार बनाय बर सेठ मन के 6 आना जमीन के विकास करे जात हे।
सवाल ये नोहय के सेठ मन के जमीन ला सरकार ह विकास करके देवत हे सवाल ये हे के भू-माफिया मन के जमीन ल सरकार ह काबर विकास करत हे। सवाल यहू हे के आखिर राजधानी के किसान मन ह का पाप करे हे के उंखर जमीन कौड़ी के मोल अऊ सेठ मन के जमीन अरबों मं।
आखिर सरकार ह ये दू योजना म भेदभाव काबर करत हे। सबले पहीली तो हमर खबरची के अनुसार जेन जगह में कमल विहार योजना लाय जात हे उहां राजधानी के एक मंत्री के रिश्तेदार अऊ समर्थक मन के जमीन हे अऊ उही मन ल सरकार के माध्यम से मदद करत हे। यहू नहीं कई झन भाजपा नेता मन के इहां भारी जमीन हे अऊ कमल विहार योजना ह आम आदमी बर के बजाय अइसने मंत्री समर्थक मन बर लाय जात हे।
ये मामला ल लेके किसान मन भारी गुस्सा हे अऊ कमल विहार योजना के खिलाफ आंदोलन करे के धमकी घलो देवत हे।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

घोटालेबाजों का जमाना,महाधिवक्ता है सुराना

आरएसएस का संस्कार या सुराना का प्रभाव...
यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संस्कार है या भारतीय जनता पार्टी का कारनामा है यह तो आम जनता तय करेगी लेकिन प्रदेश के महाधिवक्ता के पद पर जिस देवराज सुराना को बिठाया गया है उनके ही नहीं उनके परिवार जनों के खिलाफ लगभग दर्जनभर से अधिक मामले हैं। मंदिर की जमीन से लेकर आदिवासियों की जमीन हथियाने के अलावा अपने जनसंघी प्रभाव का उपयोग कर काम करवाने वाले व्यक्ति को सरकार कैसे महाधिवक्ता बना दी यह तो वही जाने लेकिन ऐसे व्यक्ति के महाधिवक्ता बनने से क्या कुछ हो रहा होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छाया में रहे देवराज सुराना राजधानीवासियों के लिए अपरिचित नाम नहीं है। राजधानी वासियों के बीच उनकी पहचान जनसंघी के अलावा एक वकील की भी है लेकिन अब हम अपने पाठकों को बताना चाहते हैं कि जनसंघ के सेवाभाव के पीछे देवराज सुराना और उनके परिजनों का कारनामा कितना भयावह है कि ऐसे व्यक्ति को महाधिवक्ता जैसे जिम्मेदार पद पर बिठाना कितना घातक हो सकता है। देवराज सुराना और उनके पुत्रद्वय आनंद सुराना, सुरेन्द्र सुराना, पुत्रवधु श्रीमती चेतना सुराना, दामाद विजयचंद सुराना यानी परिवार के अमूमन सभी लोगों पर मंदिर की जमीन, आदिवासियों की जमीन सहित अन्य आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाने सरकार ने इस घपलेबाजी को नजरअंदाज तो किया ही है संवैधानिक नियमों की भी अनदेखी की गई है। संविधान के अनुच्छेद 165(1) के अनुसार प्रत्येक राय का रायपाल उसी व्यक्ति को महाधिवक्ता बनाता है जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित होता है। ऐसे में 82 साल के व्यक्ति को महाधिवक्ता बनाना स्पष्ट करता है कि किस तरह से आरएसएस या भाजपा के प्रभाव में देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाया गया है। जबकि नियमानुसार 62 साल से अधिक उम्र का व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने का पात्र नहीं है।
देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाने में आरएसएस या भाजपा की भूमिका की चर्चा बाद में की जाएगी। यहां हम उनके व उनके परिजनों के कृत्यों पर प्रकाश डालेंगे तथा हम अपने पाठकों को यह भी बताएंगे कि किस तरह से देवराज सुराना के परिवार की नानेश बिल्डर्स से अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और कैसे कलेक्टर से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके प्रभाव में अनैतिक कार्य किया। दरअसल देवराज सुराना और उनके परिवार तब विवाद में आए जब इनकी कंपनी नानेश बिल्डर्स से प्राईवेट लिमिटेड ने गोपियापारा स्थित श्री हनुमान मंदिर की भाठागांव स्थित बेशकिमती जमीन को खरीदा। कहा जाता है कि इस जमीन की फर्जी तरीके से दो रजिस्ट्री कराई गई। इसमें भारतभूषण नामक फर्जी सर्वराकार से दस्तखत कराए गए। इस फर्जी रजिस्ट्री की जानकारी होने पर जब हिन्दू महासभा ने आपत्ति की तो जोगी शासन काल में सन् 2001 में इस पर रोक लगा दी गई। इसके बाद जैसे ही भाजपा की सरकार सत्ता में आई देवराज सुराना पर अपने प्रभाव में इस विक्रय पत्रों को 17-3-04 को पंजीयन करा लिया। इस भूमि को क्रय करने के लिए देवराज सुराना के खाते से दो लाख देवराज सिंह सुराना एचयूएफ के खाते से दो लाख 51 हजार से निकालकर 8 मार्च 2001 को नानेश बिल्डर्स के खाते में जमा किए गए।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि 2001 में तत्कालीन कलेक्टर ने हिन्दू महासभा की शिकायत पर की गई जांच रपट में यह लिखा है कि यह भूमि श्री हनुमान मंदिर प्रबंधक कलेक्टर रायपुर के नाम दर्ज होने के कारण विक्रय योग्य नहीं है। जांच प्रतिवेदन में मुख्यालय उपपंजीयक एवं तत्कालीन तहसीलदार रायपुर के विरुध्द कार्यवाही किया जाना बताया गया है एवं जिला पंजीयक रायपुर को लिखा है कि भविष्य में अग्रिम आदेश तक कोई रजिस्ट्री ना किया जाए।
बताया जाता है कि 2004 में अपने प्रभाव पर इस जमीन की रजिस्ट्री कराने के बाद जब विवाद बढ़ता दिखा तो नानेश बिल्डर्स ने यह जमीन रवि वासवानी और सुशील अग्रवाल रामसागरपारा को बेच दी। इस पर जब हिन्दू महासभा ने पुन: आपत्ति की तो तहसीलदार ने नामांतरण रोक दिया है और जब मामला उलझता दिखा तो विक्रय की गई जमीन का नानेश बिल्डर्स ने आश्चर्यजनक रुप से अपने नाम पर डायवर्सन करा लिया। यानी जमीन बेचने के बाद किस तरह से डायवर्सन की कार्रवाई की गई होगी समझा जा सकता है। जबकि अब भी भू-अभिलेखों में सुशील अग्रवाल एवं रवि वासवानी वगैरह का नाम भूमि स्वामी के रुप में दर्ज है। इतना सब कुछ होने के बाद भी इन्हें महाधिवक्ता कैसे बनाया गया यह समझा जा सकता है।

उद्योगपतियों की सरकार

छत्तीसगढ सरकार क्या आम लोगों की सरकार है? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि छत्तीसगढ में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। सब तरफ राम नाम की लूट मची है। सरकार में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारी मनमानी पर उतारू है यहां तक कि विधानसभा में भी प्रश्नों के जवाब ठीक से नहीं दिए जा रहे हैं और सारा खेल एक सोची समझी रणनीति के तहत चल रहा है ताकि उद्योगपतियों को अधिकधिक लाभ मिले।
सरकार की स्थिति तो गृहमंत्री ननकीराम कंवर के अलग-अलग समय पर दिए दो बयानों से लगाया जा सकता है पहला बयान गृहमंत्री ने मुख्यमंत्री के गृह जिले में जाकर पुलिस कप्तान को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहा। यह किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया यह बताने की जरूरत नहीं है लेकिन विधानसभा में उनका यह कहना कि पुलिस वाले दस हजार रुपया महिना लेकर शराब वालों के लिए काम करते हैं यह सरकार के लिए डूब मरने वाली बात है। इतना ही नहीं है पूरा मामला। दरअसल राज्य बनने के बाद यहां की प्रचुर धन संपदा को लुटने में सरकार ने जिस तरह से उद्योगपतियों को सहयोग किया है वैसा आजादी के बाद किसी भी प्रदेश में नहीं हुआ होगा। जिंदल से लेकर बालको और अल्ट्राटेक से लेकर दूसरे उद्योगपतियों की मनमानी से आए दिन अखबार रंगे पड़े हैं। यहां तक कि बालको में हुई चिमनी कांड भी ऐसी जमीन पर हुई जो बालको ने कब्जा कर रखी है। शायद यहीं वजह है कि अजीत प्रमोद कुमार जोगी यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर सरकार अनिल अग्रवाल से डरती क्यों हैं।
दो चार सौ फुट जमीन पर कब्जा कर अपना आशियाना बनाने वालो पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार उद्योगों द्वारा अवैध कब्जे की गई हजारों एकड़ जमीन को लेकर क्यों खामोश है। क्या इसके एवज में मुख्यमंत्री से लेकर अन्य मंत्री व सरकारी अधिकारी को लाखों रुपए दिए गए हैं। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा कि वह उद्योगपतियों की मनमानी पर क्या इसलिए चुप है क्योंकि वहां से उन्हें पैसे मिल रहे हैं? आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए बैठी सरकार को क्या यह नहीं पता है कि उद्योगपतियों की मनमानी से आम आदमी प्रदूषण की वजह से बीमार हो रहा है और उनके गुण्डे आम लोगों को पीट रहे हैं।
क्या सरकार को खबर है कि उसके दर्जनभर से अधिक आईएएस अधिकारियों ने मौली श्री विहार में अपने बंगलों को इन्हीं उद्योगपतियों को लाखों रुपए किराए पर दे रखा है। एक साधारण आदमी भी समझ सकता है कि कोई किसी के 15-20 हजार किराये वाली जगह को एक लाख रुपए किराये में क्यों ले रहा है फिर यह बात सरकार के समझ में क्यों नहीं आ रहा है। क्या ऐसा नहीं है कि इन उद्योगपतियों ने प्रदेश के इन आईएएस अधिकारियों को ओब्लाईज् कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। उद्योगों को जिस पैमाने पर जमीन दी जा रही है और उन्हें जमीन कब्जा करने की छूट दी जा रही है क्या यह किसी अंधेरगर्दी से कम है। गरीबों के नाम पर दिए जाने वाले चावल क्या राईस मिलरों व धन्ना सेठों के गोदाम में नहीं जा रहा है। चौतरफा भ्रष्टाचार ने छत्तीसगढ क़ी वित्तीय स्थिति को डगमगा दिया है और सरकार ने इस पर अंकुश नहीं लगाया तो इसके दुखद परिणाम आना तय है।

क्या पैसा खिलाकर जाति प्रमाण पत्र बनाया गया है...



छत्तीसगढ में सत्ता के बल पर अधिकारियों से अनैतिक कार्य कराया जा रहा है। वामन राव लाखे वार्ड के पार्षद विजेता मन्नु यादव को पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र दिलाने में तो ऐसी ही भूमिका नजर आ रही है और ऐसा नहीं है तो अधिकारी पैसा खाकर किसी को भी जाति प्रमाण पत्र दे रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय दूरसंचार विभाग में सामान्य वर्ग से टेलीफोन मैकेनीक के पद पर कार्य कर रहे दयालदास मोहरे की पुत्री विजेता यादव को पार्षद चुनाव लड़ने तीन दिन में पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। चूंकि विजेता ने प्रेम विवाह मन्नु यादव से किया है और उसे भाजपा ने टिकिट दी थी। इसलिए सारा खेल आनन-फानन में हुआ।
इस मामले का सबसे रोचक पहलू तो यह है कि विजेता के भाई सुनील को जाति प्रमाण पत्र के लिए दिया आवेदन यह कहकर खारिज किया गया कि मोहारे जाति को छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जाति का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यह बात सुप्रीमकोर्ट ने भी तय कर दिया है कि प्रेम विवाह के बाद भी युवती की जाति नहीं बदलेगी। इस नियम के बाद भी यहां विजेता यादव को किस बिना पर पिछड़े वर्ग का जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया यह आसानी से समझा जा सकता है। बहरहाल इस मामले में कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी ने याचिका दायर भी कर दी है और देखना है कि सत्ता के गलियारे में इसकी क्या प्रतिक्रिया होती है।