छत्तीसगढ ही नहीं पूरे देशभर के भाजपाईयों ने महंगाई के खिलाफ दिल्ली में जुट गए। उनकी इस कार्रवाई से महंगाई पर कितना लगाम लग पाया यह तो वही जाने लेकिन नए नवेले अध्यक्ष नीतिन गडकरी की वजह से रैली में जरूर व्यवधान आ गया। उद्योगपति से भाजपा के प्रमुख पद पर पहुंचे नीतिन गडकरी के लिए गर्मी की चिलचिलाती धूप में कुछ करने का पहला मौका था लेकिन उनकी किस्मत दगा दे गई। वैसे भी महंगाई को लेकर कांग्रेस और भाजपा केवल राजनीति कर रही है। उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि महंगाई पर लगाम कसे।
यदि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार महंगाई पर इतनी चिंतित है तो वह छत्तीसगढ़ के लोगों का कुछ तो भला कर ही सकती है। महंगाई बढ़ने की मूल वजह को तलाशने की बजाय इस पर डॉ. रमन सिंह सरकार की राजनीति अंधेरगर्दी से कम नहीं है। क्या भाजपा सरकार यह बात भूल गई है कि यहां के अकूत संपदा के चलते इस देश का पहला टैक्स फ्री राय बनाने की चर्चा हो चुकी है। लेकिन शासन में आते ही अंधाधुंध भ्रष्टाचार ने इस राय को भी देश के दूसरे रायों की तरह ही संक्रमण दौर पर खड़ा कर दिया है।
वास्तव में महंगाई बढ़ने का आर्थिक सिध्दांत सच है कि मांग के अनुरूप पूर्ति नहीं होने की वजह से महंगाई बढ़ रही है लेकिन क्या सरकारों ने कभी चिंता की कि मांग इतनी क्यों बढ़ने लगी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में तो कम से कम कहा जा सकता है कि काले धन ने मांग और पूर्ति के सिध्दांत को डगमगा दिया है। छत्तीसगढ सरकार चाहे तो कुछ नियम कानून बनाकर राय में बढती महंगाई को कंट्रोल कर सकती है।
1. कृषि जमीनों के दूसरे किसी भी उपयोग पर प्रतिबंध लगा दे।
2. भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों और अधिकारियों की संपत्ति राजसात कर ले।
3. नई राजधानी के नाम पर फूंके जा रहे करोड़ों-अरबों रुपए को आम लोगों के फायदे के लिए लगाये।
4. सरकारी भवनों व बंगलाें, आवासों में हो रहे बिजली के खर्चों पर कटौती करें।
5. अधिकारियों व मंत्रियों के फिजूलखर्ची पर रोक लगाये।
6. पहले की तरह राशन दुकानों से सामग्री बेचे।
7. कालाबाजारी करने वालों को कड़ी सजा दिलवाये उनकी संपत्ति राजसात करें।
इसके अलावा भी कई उपाय है जो सरकारी स्तर पर किए जा सकते हैं।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
रविवार, 25 अप्रैल 2010
देश प्रेम का चेहरा लगाओं घपलेबाजी से पैसा कमाओं
तिरंगा लगाने के नाम पर युवाओं के आदर्श बनने वाले जिंदल उद्योग समूह के नवीन जिंदल का असली चेहरा धीरे-धीरे सामने आने लगा है। इसी दम पर सांसद की सीढ़ी का भी सफर तय कर चुके हैं लेकिन पैसा कमाने की भूख कहें या भाजपाई राज की सेटिंग कहें। जिस पैमाने पर रायगढ़ में इस उद्योग समूह ने खेल खेला है वह उसके देश प्रेम के ढकोसले को तो उजागर करता ही है मुख्य सचिव जाय. उमेन के नोटशीट ने रमन सरकार के चेहरे को भी आईना दिखा दिया है कि इस तरह से छत्तीसगढ़ को बड़े पैमाने पर लूटने का खेल चल रहा है।छत्तीसगढ़ में मची लूट खसोट की यह सबसे खतरनाक कड़ी है बालको हादसे का मामला हो या उद्योगों को जमीन हड़पने की छूट का मामला हो कहीं न कहीं सरकार के मुखिया की भूमिका संदिग्ध नजर आती है ऐसे
में जब बाढ़ ही खेत खाने लगे तो फसल रुपी आम छत्तीसगढ़िया के भविष्य को बर्बाद होने से कौन रोक सकता है। दरअसल यह सारा खेल अरबों रुपए का है जिसमें उर्जा विभाग अपने पास रखने वाले मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और जिंदल उद्योग समूह के एम.डी. के बीच हुई मुलाकात के बाद शुरु हुई। इस खेल में राय के लोगों को पॉवर कट का सामना करना पड़ा जबकि जिंदल पावर लिमिटेड को अरबों रुपए का फायदा हुआ।छत्तीसगढ़ राय ने यह नियम बनाया है कि बिजली उत्पादन करने वाले उद्योग सीएसईबी को ही बिजली देंगे। इसी नियम के अनुरूप मेसर्स जिंदल पॉवर लिमिटेड तमनार जिला रायगढ़ और छत्तीसगढ़ विद्युत बोर्ड के बीच एग्रीमेंट हुआ। इसके तहत जिंदल द्वारा कुल विद्युत उत्पादन का 37.5 प्रतिशत बिजली विद्युत मंडल को जिंदल द्वारा दिया जाना था। लेकिन यह सब नहीं हुआ। वास्तव में एग्रीमेंट के मुताबिक छत्तीसगढ़ विद्युत बोर्ड यह बिजली 2 रुपए 88 पैसे में खरीदी करती। इधर जिंदल ने वर्ष 2009 में 8028.02 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया और उसने छत्तीसगढ़ को केवल 1337.84 मिलियन यूनिट बिजली ही दिया जबकि कुल उत्पादन के हिसाब से छत्तीसगढ़ को 3015.50 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी थी। यानी 1672.66 मिलियन यूनिट बिजली छत्तीसगढ़ को कम मिली।
पूरा खेल
यहीं से शुरु हुआ। जिंदल ने 1672.66 मिलियन यूनिट बिजली छत्तीसगढ़ को देने की बजाय इसे दूसरे को बेच दिया। बताया जाता है कि वर्ष 2009 में बिजली बाहर बेचने का औसत दर 7-8 रुपए था इस लिहाज से जिंदल ने 4 रुपए प्रति यूनिट अधिक दर पर बिजली बेची जिससे उन्हें 700 करोड़ से अधिक का लाभ हुआ जबकि यही बिजली वह राय को बेचती तो उसे 2.99 प्रति यूनिट से पैसा मिलता।इस सारे खेल में किसकी भूमिका यह जांच का विषय है। एक तरफ प्रदेश में लोग बिजली संकट से जूझ रहे है और दूसरी तरफ जिंदल को बिजली खरीदने की बजाय उसे लाभ पहुंचाया जा रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि उर्जा विभाग मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास है तब यह सब हुअआ ऐसे में उनकी भूमिका को लेकर संदेह उठना स्वाभाविक है और करोड़ों में लेन देन के आरोप भी लग रहे हैं।उनकी भूमिका पर संदेह इसलिए भी उठता है कि मुख्य सचिव पी.जाय. उमेन ने अपने नोटशीट में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और जिंदल पॉवर लिमिटेड के एमडी नवीन जिंदल से हुई बैठक की बात लिखी है। इस पत्र में कई तरह के खुलासे हैं जो मुख्यमंत्री की भूमिका पर संदेह व्यक्त करने के लिए काफी है।
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
मंत्री परिवार की जमीन के बाद पेट्रोल पंप में रूचि

एक का उद्धाटन हुआ दूसरे की तैयारी
प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के परिजनों ने अब पेट्रोल पम्प के व्यवसाय में उतर गया है। चावल-दाल के धंधे के बाद मंत्री परिवार ने भाजपा शासन काल में जमीन का भी खूब कारोबार किया और अब जमीनी धंधे में मंदी को देखते हुए पेट्रोल पम्प के व्यवसाय में कदम रखा है। पहला पेट्रोल पम्प नई राजधानी में उद्धाटित हो गया है और दूसरा पम्प मंदिर हसौद में तैयार किया जा रहा है जिसका उद्धाटन एक-दो माह में किए जाने की खबर है।
छत्तीसगढ़ की भाजपाई राजनीति में बृजमोहन अग्रवाल का अपना रूतबा है और कहा तो यहां तक जाता है कि उनकी दबंगता का लोहा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी मानते हैं। यही वजह है कि भाजपा सरकार के सत्ता में आते ही बृजमोहन अग्रवाल को न केवल मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पद दिया गया बल्कि उनकी दबंगता का फायदा भी उनके समर्थकों ने खूब उठाया। चावल-दाल के पुस्तैनी धंधे की राजनीति में भी इस परिवार का दबदबा है यही वजह है कि राय बनने के बाद जब यहां के जमीनों की कीमत बढ़ने लगी तो मंत्री भाईयों की रूचि में जमीन के धंधे में होने लगी। हालांकि इसकी वजह से मंत्री भाईयों पर कई आरोप लगे और यहां तक कहा जाने लगा कि विवादास्पद जमीनों की खरीदी-बिक्री में भारी रूचि रही। डॉ. मल्होत्रा का मामला हो या समता कालोनी के महोबिया वकील की जमीन का मामला हो मंत्री भाई सुर्खियों में रहे।
इस बीच पर्यटन विभाग, शिक्षा विभाग और पीडब्ल्यूडी विभाग में जमकर घोटाले हुए इन घोटाले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की संलिप्तता तो सामने नहीं आई है लेकिन बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में जबरदस्त घपलेबाजी जनचर्चा का विषय है। इधर हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक जमीन के धंधे में लगातार हो रही मंदी और बदनामी की वजह से मंत्री परिवार ने पेट्रोल पम्प के धंधे में कदम रखा है। सूत्रों के मुताबिक बृजमोहन अग्रवाल के अनुजद्वय विजय और यशवंत अग्रवाल के नाम पेट्रोल पम्प का आबंटन हो चुका है।
बताया जाता है कि नई राजधानी के ग्राम चेरिया में आबंटित पेट्रोल पम्प का फरवरी माह में उद्धाटन हो चुका है। सादे समारोह में इस पम्प का उद्धाटन रामजी लाल अग्रवाल के हाथों हुआ और इसमें गिनती के लोगों को ही आमंत्रित किया गया था। सूत्रों के मुताबिक दूसरा पेट्रोल पम्प मंदिर हसौद गैस गोदाम के पास स्थित है यह अभी निर्माणाधीन है इसका उद्धाटन एक-दो माह में किए जाने की चर्चा है। मंत्री भाईयों के पेट्रोल पम्प व्यवसाय में कूदे जाने को लेकर कई तरह की चर्चा है।
प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के परिजनों ने अब पेट्रोल पम्प के व्यवसाय में उतर गया है। चावल-दाल के धंधे के बाद मंत्री परिवार ने भाजपा शासन काल में जमीन का भी खूब कारोबार किया और अब जमीनी धंधे में मंदी को देखते हुए पेट्रोल पम्प के व्यवसाय में कदम रखा है। पहला पेट्रोल पम्प नई राजधानी में उद्धाटित हो गया है और दूसरा पम्प मंदिर हसौद में तैयार किया जा रहा है जिसका उद्धाटन एक-दो माह में किए जाने की खबर है।
छत्तीसगढ़ की भाजपाई राजनीति में बृजमोहन अग्रवाल का अपना रूतबा है और कहा तो यहां तक जाता है कि उनकी दबंगता का लोहा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी मानते हैं। यही वजह है कि भाजपा सरकार के सत्ता में आते ही बृजमोहन अग्रवाल को न केवल मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण पद दिया गया बल्कि उनकी दबंगता का फायदा भी उनके समर्थकों ने खूब उठाया। चावल-दाल के पुस्तैनी धंधे की राजनीति में भी इस परिवार का दबदबा है यही वजह है कि राय बनने के बाद जब यहां के जमीनों की कीमत बढ़ने लगी तो मंत्री भाईयों की रूचि में जमीन के धंधे में होने लगी। हालांकि इसकी वजह से मंत्री भाईयों पर कई आरोप लगे और यहां तक कहा जाने लगा कि विवादास्पद जमीनों की खरीदी-बिक्री में भारी रूचि रही। डॉ. मल्होत्रा का मामला हो या समता कालोनी के महोबिया वकील की जमीन का मामला हो मंत्री भाई सुर्खियों में रहे।
इस बीच पर्यटन विभाग, शिक्षा विभाग और पीडब्ल्यूडी विभाग में जमकर घोटाले हुए इन घोटाले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की संलिप्तता तो सामने नहीं आई है लेकिन बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में जबरदस्त घपलेबाजी जनचर्चा का विषय है। इधर हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक जमीन के धंधे में लगातार हो रही मंदी और बदनामी की वजह से मंत्री परिवार ने पेट्रोल पम्प के धंधे में कदम रखा है। सूत्रों के मुताबिक बृजमोहन अग्रवाल के अनुजद्वय विजय और यशवंत अग्रवाल के नाम पेट्रोल पम्प का आबंटन हो चुका है।
बताया जाता है कि नई राजधानी के ग्राम चेरिया में आबंटित पेट्रोल पम्प का फरवरी माह में उद्धाटन हो चुका है। सादे समारोह में इस पम्प का उद्धाटन रामजी लाल अग्रवाल के हाथों हुआ और इसमें गिनती के लोगों को ही आमंत्रित किया गया था। सूत्रों के मुताबिक दूसरा पेट्रोल पम्प मंदिर हसौद गैस गोदाम के पास स्थित है यह अभी निर्माणाधीन है इसका उद्धाटन एक-दो माह में किए जाने की चर्चा है। मंत्री भाईयों के पेट्रोल पम्प व्यवसाय में कूदे जाने को लेकर कई तरह की चर्चा है।
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
अब गृहमंत्री की दमदारी कहां गई

क्यों नहीं हुआ अमितेष पर जुर्म दर्ज
वैसे तो छत्तीसगढ़ की राजनीति में अभी भी शुक्ल परिवार के वर्चस्व को नकारा नहीं जा सकता। इस परिवार के खिलाफ कार्रवाई करने से आज भी शासन-प्रशासन के हाथ-पैर फूलने लगते है। इसलिए सट्टा का मामला हो या बिजली चोरी का मामला पुलिस मकान मालिक शुक्ल पर कार्रवाई से अपने को दूर ही रखती है। जबकि किरायेदार की करतूतों पर मकान मालिकों के खिलाफ जुर्म दर्ज किया जाता है।
छत्तीसगढ सरकार और उसकी पुलिस के द्वारा किस तरह भेदभाव किया जाता है इसका ताजा उदाहरण पुराना बस स्टैण्ड स्थित होटल हेमटन का है जहां पुलिस ने पिछले हफ्ते क्रिकेट में सट्टा का भंड़ाफोड़ कर दो-तीन लोगों को गिरफ्तार किया था लेकिन पुलिस ने होटल मालिक की तरफ आंख उठाने की भी हिमाकत नहीं की। जबकि यहां की पुलिस ने किरायेदारों की करतूत पर मकान मालिकों के खिलाफ दर्जनभर से अधिक मामले बना चुकी है।
यही हाल पचपेढ़ी नाका स्थित नेस्ट बार का है यहां खुलेआम बिजली चोरी होती रही और जब मामला पकड़ाया तो यहां कार्रवाई के नाम पर अमितेष शुक्ल के समर्थक गौतम मिश्रा के खिलाफ ही कार्रवाई की गई। राजधानी पुलिस के इस रवैये से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शुक्ल परिवार का यहां कितना दबदबा है। इस मामले में जब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ की गई तो वे इसका जवाब देने से बचते रहे एक वरिष्ठ अधिकारी का तो यहां तक कहना था कि मुझे इस मामले में न घसीटों जिस थाने का मामला है वहीं पूछताछ करों।
बताया जाता है कि पुराना बस स्टैण्ड स्थित होटल हेमटन और पचपेढ़ी नाका स्थित नेस्ट बार की जगह का मालिक राजिम के विधायक अमितेष शुक्ल का है और इसे किराये पर दिया गया है। पुलिस के इस भेदभावपूर्वक कार्रवाई को लेकर कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि दोनों ही स्थानों पर असामाजिक तत्वों का जमावाड़ा होता है लेकिन पुलिस यहां जांच करने से घबराती है।
वैसे तो छत्तीसगढ़ की राजनीति में अभी भी शुक्ल परिवार के वर्चस्व को नकारा नहीं जा सकता। इस परिवार के खिलाफ कार्रवाई करने से आज भी शासन-प्रशासन के हाथ-पैर फूलने लगते है। इसलिए सट्टा का मामला हो या बिजली चोरी का मामला पुलिस मकान मालिक शुक्ल पर कार्रवाई से अपने को दूर ही रखती है। जबकि किरायेदार की करतूतों पर मकान मालिकों के खिलाफ जुर्म दर्ज किया जाता है।
छत्तीसगढ सरकार और उसकी पुलिस के द्वारा किस तरह भेदभाव किया जाता है इसका ताजा उदाहरण पुराना बस स्टैण्ड स्थित होटल हेमटन का है जहां पुलिस ने पिछले हफ्ते क्रिकेट में सट्टा का भंड़ाफोड़ कर दो-तीन लोगों को गिरफ्तार किया था लेकिन पुलिस ने होटल मालिक की तरफ आंख उठाने की भी हिमाकत नहीं की। जबकि यहां की पुलिस ने किरायेदारों की करतूत पर मकान मालिकों के खिलाफ दर्जनभर से अधिक मामले बना चुकी है।
यही हाल पचपेढ़ी नाका स्थित नेस्ट बार का है यहां खुलेआम बिजली चोरी होती रही और जब मामला पकड़ाया तो यहां कार्रवाई के नाम पर अमितेष शुक्ल के समर्थक गौतम मिश्रा के खिलाफ ही कार्रवाई की गई। राजधानी पुलिस के इस रवैये से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शुक्ल परिवार का यहां कितना दबदबा है। इस मामले में जब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ की गई तो वे इसका जवाब देने से बचते रहे एक वरिष्ठ अधिकारी का तो यहां तक कहना था कि मुझे इस मामले में न घसीटों जिस थाने का मामला है वहीं पूछताछ करों।
बताया जाता है कि पुराना बस स्टैण्ड स्थित होटल हेमटन और पचपेढ़ी नाका स्थित नेस्ट बार की जगह का मालिक राजिम के विधायक अमितेष शुक्ल का है और इसे किराये पर दिया गया है। पुलिस के इस भेदभावपूर्वक कार्रवाई को लेकर कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि दोनों ही स्थानों पर असामाजिक तत्वों का जमावाड़ा होता है लेकिन पुलिस यहां जांच करने से घबराती है।
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
दामाद की दमदारी , सरकारी की लाचारी
घोटालेबाजों का जमाना है महाधिवक्ता सुराना है- 5
जनसंघ की टिकिट से चुनाव लड़ चुके महाधिवक्ता देवराज सुराना ही नहीं उनके दामाद विजयचंद बोथरा भी दमदार है यही वजह है कि इनके परिवार के खिलाफ एक के बाद एक केस तो दर्ज हुए लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
मंदिर से लेकर आदिवासियों की जमीन हड़पने का मामला हो या श्रीमती चेतना सुराना का ही मामला हो पुलिस सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और सत्ता के प्रभाव में फर्जीवाड़ा जमकर चलता रहा। क्या अब भी सरकार इस मामले पर कार्रवाई की बजाय खामोश रहेगा।
दरअसल छत्तीसगढ क़ी भाजपाई राजनीति में सुराना परिवार का जबरदस्त दबदबा है और कहा जाता है कि इनके खिलाफ जुबान खोलने वालों की पार्टी में खैर नहीं। यही वजह है कि जब देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाया गया तब भी किसी ने विरोध नहीं किया और आज जब उन्हें लेकर पार्टी की बदनामी हो रही है तब भी कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। वास्तव में देवराज सुराना ही नहीं उनके परिवार के कवर्धा निवासी विजयचंद बोथरा भी दमदार हैं और कहा जाता है कि मुख्यमंत्री के गृह जिले के होने के कारण उनका डा. रमन सिंह से सीधे संबंध है और जिस व्यक्ति का मुख्यमंत्री से सीधे संबंध हो उसके खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद किया जाना निरर्थक माना जाता है यही वजह है कि बदनामी से कई भाजपाई दुखी तो हैं लेकिन वे अपना दुख दबी जबान में ही व्यक्त करते हैं।
बताया जाता है कि आदिवासियों की जमीनें फर्जी तरीके से खरीदने के मामले में न केवल विजयचंद बोथरा बल्कि उनके पुत्र विनित बोथरा तक शामिल हैं और इसी तरह इस बात की भी चर्चा है कि सुराना परिवार को उनके मामले से बचाने में बोथरा परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कवर्धा के इस प्रभावशाली बोथरा परिवार के भी अपने किस्से हैं और कहा जा रहा है कि सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी तक इस परिवार की पहुंच का लोहा मानते हैं और कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां भी इनके इशारे पर हुई हैं।
यही वजह है कि सुराना-बोथरा परिवार की पहुंच ने चेतना सुराना के मामले में पुलिस के हाथ पैर बांध दिए हैं। पुलिस इस्तेगासा तो पेश कर दी है लेकिन श्रीमती चेतना सुराना की अनुपस्थिति पर चुप्पी साध रखी है। चेतना सुराना मामले का सबसे दुखद पहलु तो यह है कि देवराज सुराना महाधिवक्ता है और शासन-प्रशासन को महाधिवक्ता से सलाह लेना होता है ऐसे में बहुत संभव है पुलिस खामोश रहे। बहरहाल सुराना-बोथरा परिवार की इस जुगलबंदी के किस्से आम लोगों में चर्चा का विषय है और यही हाल रहा तो सरकार को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
जनसंघ की टिकिट से चुनाव लड़ चुके महाधिवक्ता देवराज सुराना ही नहीं उनके दामाद विजयचंद बोथरा भी दमदार है यही वजह है कि इनके परिवार के खिलाफ एक के बाद एक केस तो दर्ज हुए लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
मंदिर से लेकर आदिवासियों की जमीन हड़पने का मामला हो या श्रीमती चेतना सुराना का ही मामला हो पुलिस सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और सत्ता के प्रभाव में फर्जीवाड़ा जमकर चलता रहा। क्या अब भी सरकार इस मामले पर कार्रवाई की बजाय खामोश रहेगा।दरअसल छत्तीसगढ क़ी भाजपाई राजनीति में सुराना परिवार का जबरदस्त दबदबा है और कहा जाता है कि इनके खिलाफ जुबान खोलने वालों की पार्टी में खैर नहीं। यही वजह है कि जब देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाया गया तब भी किसी ने विरोध नहीं किया और आज जब उन्हें लेकर पार्टी की बदनामी हो रही है तब भी कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। वास्तव में देवराज सुराना ही नहीं उनके परिवार के कवर्धा निवासी विजयचंद बोथरा भी दमदार हैं और कहा जाता है कि मुख्यमंत्री के गृह जिले के होने के कारण उनका डा. रमन सिंह से सीधे संबंध है और जिस व्यक्ति का मुख्यमंत्री से सीधे संबंध हो उसके खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद किया जाना निरर्थक माना जाता है यही वजह है कि बदनामी से कई भाजपाई दुखी तो हैं लेकिन वे अपना दुख दबी जबान में ही व्यक्त करते हैं।
बताया जाता है कि आदिवासियों की जमीनें फर्जी तरीके से खरीदने के मामले में न केवल विजयचंद बोथरा बल्कि उनके पुत्र विनित बोथरा तक शामिल हैं और इसी तरह इस बात की भी चर्चा है कि सुराना परिवार को उनके मामले से बचाने में बोथरा परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कवर्धा के इस प्रभावशाली बोथरा परिवार के भी अपने किस्से हैं और कहा जा रहा है कि सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी तक इस परिवार की पहुंच का लोहा मानते हैं और कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां भी इनके इशारे पर हुई हैं।
यही वजह है कि सुराना-बोथरा परिवार की पहुंच ने चेतना सुराना के मामले में पुलिस के हाथ पैर बांध दिए हैं। पुलिस इस्तेगासा तो पेश कर दी है लेकिन श्रीमती चेतना सुराना की अनुपस्थिति पर चुप्पी साध रखी है। चेतना सुराना मामले का सबसे दुखद पहलु तो यह है कि देवराज सुराना महाधिवक्ता है और शासन-प्रशासन को महाधिवक्ता से सलाह लेना होता है ऐसे में बहुत संभव है पुलिस खामोश रहे। बहरहाल सुराना-बोथरा परिवार की इस जुगलबंदी के किस्से आम लोगों में चर्चा का विषय है और यही हाल रहा तो सरकार को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
जल स्तर गिरने की चिंता आखिर कौन करें?
आमापारा बाजार के पीछे का तालाब पाटा जा रहा
यह राजधानी के भू-माफियाओं की साजिश है या एक प्रभावशाली मंत्री की करतूत यह तो जांच का विषय है लेकिन आमापारा बाजार के पीछे स्थित तालाब को जिस तेजी से पाटने की कार्रवाई की जा रही है उससे राजधानी के गिरते जल स्तर से चिंतित लोगों में बेचैनी है और वे शीघ्र ही इस संबंध में महापौर से चर्चा कर तालाब को पाटने की बजाय उसके सौंदर्यीकरण के लिए चर्चा करेंगे।
कभी राजधानी रायपुर
तालाबों का शहर हुआ करता था लेकिन सरकारी अधिकारियों और भू-माफियाओं की साजिश ने शहर के तालाबों को लिलना शुरु कर दिया। अवैध कब्जों के अलावा धन्ना सेठों को तालाब पाटकर जमीनें दी गई जिसका परिणाम है कि रायपुर का जल स्तर तेजी से गिरा है बल्कि यहां के लोग भीषण गर्मी से भी परेशान है। पटवा शासनकाल में सरोवर हमारी धरोहर का नारा देकर तालाबों को संरक्षित करने का प्रयास किया गया लेकिन राय बनने के बाद हाल के सालों में भू-माफियाओं की नजर फिर तालाब पर पड़ने लगी है। बताया जाता है कि निगम अधिकारियों से सांठगांठ कर अवैध कब्जे करवाना और तालाब पटवाने में लगे भू-माफियाओं के षड़यंत्र का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
बताया जाता है कि इन दिनों नगर निगम रायपुर आमापारा बाजार के पीछे स्थित कारी तालाब को पाटने में अपना दिमाग दौड़ा रहा है। इस सबके पीछे प्रदेश सरकार के एक दमदार मंत्री और कुछ भू-माफियाओं का हाथ बताया जा रहा है। यदि हमारे भरोसेमंद सूत्रों पर गौर करें तो आमापारा स्थित घासीदास प्लाजा के
पीछे की जमीनों को एक मंत्री के भाई और कुछ भू-माफियाओं द्वारा खरीदी जा चुकी है और इन लोगों ने साजिशपूर्वक निगम को तालाब पाटने दबाव बनाया। इसके तहत रोज शहरभर के कचरों को तालाब में फेंका जा रहा है और जिस तेजी से तालाब पाटने की कार्रवाई की जा रही है उससे आश्चर्य नहीं की माह दो माह में तालाब पाट दिए जाएंगे।
बताया जाता है कि राजधानी के मध्य स्थित इस बेशकीमती जमीन पर भी कई लोगों की नजर है और बहुत संभव हो निगम यहां कोई काम्प्लेक्स खड़ा करें। इधर पर्यावरण को लेकर चिंता जताने वाले निगम के इस तालाब पाटने की कार्रवाई से अपने को आश्चर्यजनक रुप से दूर रखा है जबकि बजरंग नगर, शिवनगर और खपराभट्ठी के लोग तालाब पाटने का विरोध कर रहे हैं। एक तरफ राजधानी पेयजल संकट से जूझ रहा है ऐसे में शहर के तालाबों को पाटना कहां तक उचित है जबकि निगम इसके सौंदर्यीकरण में ध्यान देकर इस क्षेत्र की खूबसूरती बढ़ा सकती है। बहरहाल तालाब पाटने को लेकर मंत्री की रूचि की वजह से लोग सामने नहीं आ रहे हैं और दबी जुबान पर इसकी चर्चा चल रही है।
यह राजधानी के भू-माफियाओं की साजिश है या एक प्रभावशाली मंत्री की करतूत यह तो जांच का विषय है लेकिन आमापारा बाजार के पीछे स्थित तालाब को जिस तेजी से पाटने की कार्रवाई की जा रही है उससे राजधानी के गिरते जल स्तर से चिंतित लोगों में बेचैनी है और वे शीघ्र ही इस संबंध में महापौर से चर्चा कर तालाब को पाटने की बजाय उसके सौंदर्यीकरण के लिए चर्चा करेंगे।
कभी राजधानी रायपुर
तालाबों का शहर हुआ करता था लेकिन सरकारी अधिकारियों और भू-माफियाओं की साजिश ने शहर के तालाबों को लिलना शुरु कर दिया। अवैध कब्जों के अलावा धन्ना सेठों को तालाब पाटकर जमीनें दी गई जिसका परिणाम है कि रायपुर का जल स्तर तेजी से गिरा है बल्कि यहां के लोग भीषण गर्मी से भी परेशान है। पटवा शासनकाल में सरोवर हमारी धरोहर का नारा देकर तालाबों को संरक्षित करने का प्रयास किया गया लेकिन राय बनने के बाद हाल के सालों में भू-माफियाओं की नजर फिर तालाब पर पड़ने लगी है। बताया जाता है कि निगम अधिकारियों से सांठगांठ कर अवैध कब्जे करवाना और तालाब पटवाने में लगे भू-माफियाओं के षड़यंत्र का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।बताया जाता है कि इन दिनों नगर निगम रायपुर आमापारा बाजार के पीछे स्थित कारी तालाब को पाटने में अपना दिमाग दौड़ा रहा है। इस सबके पीछे प्रदेश सरकार के एक दमदार मंत्री और कुछ भू-माफियाओं का हाथ बताया जा रहा है। यदि हमारे भरोसेमंद सूत्रों पर गौर करें तो आमापारा स्थित घासीदास प्लाजा के
पीछे की जमीनों को एक मंत्री के भाई और कुछ भू-माफियाओं द्वारा खरीदी जा चुकी है और इन लोगों ने साजिशपूर्वक निगम को तालाब पाटने दबाव बनाया। इसके तहत रोज शहरभर के कचरों को तालाब में फेंका जा रहा है और जिस तेजी से तालाब पाटने की कार्रवाई की जा रही है उससे आश्चर्य नहीं की माह दो माह में तालाब पाट दिए जाएंगे।बताया जाता है कि राजधानी के मध्य स्थित इस बेशकीमती जमीन पर भी कई लोगों की नजर है और बहुत संभव हो निगम यहां कोई काम्प्लेक्स खड़ा करें। इधर पर्यावरण को लेकर चिंता जताने वाले निगम के इस तालाब पाटने की कार्रवाई से अपने को आश्चर्यजनक रुप से दूर रखा है जबकि बजरंग नगर, शिवनगर और खपराभट्ठी के लोग तालाब पाटने का विरोध कर रहे हैं। एक तरफ राजधानी पेयजल संकट से जूझ रहा है ऐसे में शहर के तालाबों को पाटना कहां तक उचित है जबकि निगम इसके सौंदर्यीकरण में ध्यान देकर इस क्षेत्र की खूबसूरती बढ़ा सकती है। बहरहाल तालाब पाटने को लेकर मंत्री की रूचि की वजह से लोग सामने नहीं आ रहे हैं और दबी जुबान पर इसकी चर्चा चल रही है।
छोटों की लड़ाई, जनसंपर्क में मलाई
वैसे तो कोई अखबार छोटा-बड़ा नहीं होता यह बात जिसके बारे में खबर छपती है उससे पूछा जा सकता है लेकिन छत्तीसगढ़ में जनसंपर्क विभाग ऐसा विभाग है जो अखबारों को छोटे-बड़े में नापता है। छत्तीसगढ़ जनसंपर्क ने अखबारों की मुख्यत: तीन श्रेणी बनाई है पहला नेशनल, भले ही प्रदेश के बाहर से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं का सुर्कुलेशन हजार-पांच सौ हो या छत्तीसगढ में 200 प्रतियां ही क्याें न बिकती हो वह नेशनल हो जाता है और उसे उसी ढंग से महत्व दिया जाता है। दूसरी श्रेणी में नवभारत, भास्कर, नई दुनिया जैसे अखबार होते हैं और तीसरी श्रेणी सांध्य दैनिकों या राय में छपने वाली साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक पत्र-पत्रिकाओं की है।
नेशनल हो या दूसरी श्रेणी के अखबार इन्हें जनसंपर्क विभाग से कभी दिक्कत नहीं होती और यदि हुई भी तो वे सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंच जाते हैं लेकिन जनसंपर्क विभाग का रवैया तीसरी श्रेणी मानी जाने वाली पत्र-पत्रिकाओं के साथ इसी श्रेणी की होती है सरकार भी ऐसे लोगों के लिए कोई नीति नहीं बनाती परिणाम स्वरुप ये लोग सेटिंग में लग जाते हैं। आपस में लड़ाई भी इनमें यादा है इसलिए जनसंपर्क कुछ को दाना डाल अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। प्रदर्शन विज्ञापन इन्हें दिया जाता है वह भी 3-5 हजार में यदि किसी ने थोड़ी ताकत दिखाई तो दस हजार तक पहुंचा जा सकता है। ऐसे छोटे अखबार वाले जो जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की चमचागिरी नहीं कर पाते वे अब एक मंच की तलाश में लगे हैं ताकि कोई विज्ञापन नीति बनाई जा सके।
और अंत में....
जनसंपर्क के नियमित सूची से हकाले गए एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक बेहद दुखी है और वे इस बारे में जनसंपर्क का पोल खोलने में इधर उधर खबर के लिए भटक रहे हैं ऐसे में विभाग में एक जगह उन्हें सलाह मिली कुछ नहीं कर पाओगे पैसा ऊपर तक पहुंचता है।
नेशनल हो या दूसरी श्रेणी के अखबार इन्हें जनसंपर्क विभाग से कभी दिक्कत नहीं होती और यदि हुई भी तो वे सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंच जाते हैं लेकिन जनसंपर्क विभाग का रवैया तीसरी श्रेणी मानी जाने वाली पत्र-पत्रिकाओं के साथ इसी श्रेणी की होती है सरकार भी ऐसे लोगों के लिए कोई नीति नहीं बनाती परिणाम स्वरुप ये लोग सेटिंग में लग जाते हैं। आपस में लड़ाई भी इनमें यादा है इसलिए जनसंपर्क कुछ को दाना डाल अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। प्रदर्शन विज्ञापन इन्हें दिया जाता है वह भी 3-5 हजार में यदि किसी ने थोड़ी ताकत दिखाई तो दस हजार तक पहुंचा जा सकता है। ऐसे छोटे अखबार वाले जो जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की चमचागिरी नहीं कर पाते वे अब एक मंच की तलाश में लगे हैं ताकि कोई विज्ञापन नीति बनाई जा सके।
और अंत में....
जनसंपर्क के नियमित सूची से हकाले गए एक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक बेहद दुखी है और वे इस बारे में जनसंपर्क का पोल खोलने में इधर उधर खबर के लिए भटक रहे हैं ऐसे में विभाग में एक जगह उन्हें सलाह मिली कुछ नहीं कर पाओगे पैसा ऊपर तक पहुंचता है।
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