सोमवार, 24 मई 2010

मूणत पर भी लगने लगा आरोप थोक दवा बाजार हुआ अभिशाप

शदाणी दरबार के पास बन रहे थोक दवा बाजार के निर्माण में पदाधिकारियों द्वारा किए जा रहे घपले को लेकर सदस्यों में भारी रोष है और अब तो नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत पर भी आरोपियों को संरक्षण देने का आरोप खुले आम लगाया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक मेडिकल व्यवसायियों ने थोक दवा बाजार बनाने शदाणी दरबार के पास 14 एकड़ जमीन ली थी तथा इसका अध्यक्ष भरत आजवानी और कोषाध्यक्ष जुगल किशोर चांडक को बनाया गया इसके साथ ही संस्था में विजय जादवानी, वासु जोतवानी, राजन सहित अन्य को कार्यकारिणी सदस्य बनाए गए।
बताया जाता है कि पहले तो निर्माण में विलंब को लेकर सदस्यों ने पदाधिकारियों को घेरना शुरू किया तब पता चला कि 14 की जगह सिर्फ 11 एकड़ में ही दवा बाजार बनाया जा रहा है और तीन एकड़ जमीन पदाधिकारियों ने न केवल अपने नाम पर रजिस्ट्री करा ली बल्कि उसे अनाप शनाप कीमत पर बेचने की कोशिश कर रहे हैं। सदस्यों को जब इस घपलेबाजी का पता चला तो वे बैठक बुलाने की मांग करने लगे और कुछ लोगों ने इसकी शिकायत रजिस्ट्रार फर्म एवं सोसायटी और राय सरकार से कर दी।
इधर उच्च स्तरीय शिकायत के डर से पदाधिकारियों ने स्वयं को बचाने हाथ-पैर मारना शुरु कर दिया और बताया जाता है कि उच्च स्तर पर दो करोड़ का लेन देन भी हो गया ताकि पदाधिकारियों को बचाया जा सके। इधर शिकायतकर्ताओं पर शिकायत वापस लेने का दबाव भी आने लगा। एक सदस्य ने तो नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत पर भरी बैठक में आरोप लगाया कि वे शिकायतकर्ताओं को शिकायत वापस लेने दबाव डाल रहे हैं।
इधर सदस्यों द्वारा पदाधिकारियों से हिसाब मांगे जाने पर उन्हें पैसा वापस लौटाने की धमकी दी जाती हैं चूंकि यहां की जमीन की कीमत दो-तीन गुणा बढ़ गई है इसलिए कई सदस्य खामोश हैं। इधर इस मामले को लेकर सदस्यों में भारी रोष है जबकि चर्चा इस बात की भी है कि ले-आऊट से लेकर पानी-बिजली सड़क के मामले में भी घपलेबाजी जमकर हुई है चूंकि पदाधिकारियों ने उच्च स्तरीय लेन देन कर लिया है इसलिए भी कार्रवाई नहीं हो रही है और सदस्यों की बढ़ती-नाराजगी की वजह से कभी भी कोई अनिष्ट होने की संभावना भी जताई जा रही है। बहरहाल थोक दवा बाजार मामले में मंत्री का नाम आने से विवाद गहराने लगा है और उच्च स्तर पर धमकी-चमकी के चलते सदस्यों में भारी नाराजगी है।

रविवार, 23 मई 2010

पैसे ने हर लिबास को उजला बना दिया , अच्छे-बुरे की तो आज पहचान खो गई

वैसे तो यह बात राजनीति में यादा सटिक है लेकिन इन दिनों पत्रकारिता के क्षेत्र में भी यही सब लागू होने लगा है। मिशन से व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता को सरकार अब भी रुपया दो रुपया फीट में जमीनें क्यों दे रही है यह तो वही जाने लेकिन जमीन की बढ़ती कीमत की वजह से इस व्यवसाय में ऐसे लोग भी आ गए हैं जिनकी पृष्ठभूमि शर्मनाक है और जिनके लिए पैसा ही ईमान है।
छत्तीसगढ क़ी पत्रकारिता का भी यही हाल होता जा रहा है। अखबार के धंधे में आने वाले चेहरों को पहचानना मुश्किल होता जा रहा है कि वे इस मिशन से क्या हासिल करना चाहते हैं। अब तो अखबार मालिकों ने सरकार के मंत्रियों की तर्ज पर सरकारी संपदा पर हाथ साफ करना शुरू कर दिया है अपनी पहुंच और प्रभाव के बल पर खदाने हथियायी जा रहे हैं। अखबार के लिए मिली जमीन पर दुकानें या व्यवसायिक काम्पलेक्स खड़े किए जा रहे हैं और पत्रकारिता के नाम पर विज्ञापन परोसे जा रहे हैं। खबरों के नाम पर सूचनाएं दी जा रही है। ऐसे में कलंकित होते पत्रकारिता को बचाना कितना मुश्किल है कहा नहीं जा सकता।
और अंत में...
अपने को प्रतिष्ठित और सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार कहते नहीं थकने वाले एक अखबार के संपादक ने पिछले दिनों परिशिष्ठ के लिए जनसंपर्क विभाग के अधिकारी के सामने गिड़-गिड़ाते रहा और अब यह अधिकारी उसके गिड़-गिड़ाने का किस्सा सुना मजा ले रहे हैं।

शुक्रवार, 21 मई 2010

कथनी और करनी

छत्तीसगढ़ सरकार की कथनी और करनी का अंतर अब तो साफ-साफ दिखने लगा है। इन दिनों छत्तीसगढ़ भयावह गर्मी से जूझ रहा है। पानी को लेकर सब तरफ त्राहि मचा हुआ है। पार्षद की हालत खराब है और लोग निगम पर पानी के लिए टूट पड़े हैं। सीमित संसाधनों में पानी की आपूर्ति तो की जा रही है लेकिन गिरते जल स्तर ने आम आदमी का होश उड़ा दिया है लेकिन सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है। प्रदेश के मुखिया डा. रमन सिंह पानी के लिए चिंता करते नहीं थक रहे हैं लेकिन वे भी दूसरे नेताओं की तरह सिर्फ बयानबाजी पर उतारू है और वास्तविकता इससे परे हैं और यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में राजधानी में जीवन यापन करना कठिन हो जाएगा लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है। राजधानी की इस विषय स्थिति पर न तो कोई कार्ययोजना ही तैयार की जा रही है और न ही पर्यावरण प्रेमी ही इस दिशा में काम कर रहे हैं।
पर्यावरण प्रेमी तो बरसात आते ही दो-चार दर्जन वृक्ष लगाकर सरकारी ग्रांट लेने खाना पूर्ति कर लेते हैं सिर्फ बरसात के दिनों में वृक्ष लगाने से राजधानी में पानी की समस्या या प्रदूषण से मुक्ति मिल जाने की सोच ने ही राजधानीवासियों को गर्मी में बदहाल कर रही है। वास्तव में सरकार इस बारे में गंभीर है तो उसे न केवल राजधानी बल्कि छत्तीसगढ क़े सभी जिला मुख्यालयों के लिए कार्य योजना तैयार करना होगा। सरकार सबसे पहले यह तय कर ले कि वह तालाबों और कृषि भूमि को बर्बाद होने नहीं देगी। इस पर कड़ा कानून बनाया जाना चाहिए अन्यथा आने वाले दिनों में जो भयावहता दिखाई देगी उसकी कल्पना करना ही बेमानी है।
गांवों में तो तालाबों खुदवाई जा रही है लेकिन शहर के तालाबों को पाटकर सरकार क्या करना चाहती है वह तो वही जाने लेकिन पर्यावरण के हिमायती भी सरकारी ग्रांट के लालच में तालाबों को पटते चुपचाप देख रही है। राजधानी में पहले भी रजबंधा तालाब, लेंडी तालाब सहित दर्जनभर तालाबें पाटी जा चुकी है और इसका दुष्परिणाम आज शहर वाले भोग रहे हैं। इन दिनों गौरव पथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब और एक मंत्री की जमीन के नाम पर आमापारा स्थित कारी तालाब पाटा जा रहा है महाराज बंध तालाब तो एक भाजपा नेता ही पाट कर प्लाटिंग कर रहा है लगता है इन तालाबों को पाटने वालों को अपनी आने वाली पीढ़ी की चिंता नहीं है। अपनी चिंता में वे इसी तरह तालाब पाटते रहे तो आने वाली पीढ़ियां नारकीय जीवन जीने मजबूर होगी जो आप और हम सब के बच्चे होंगे।

खनिज के चेक पोस्ट से हर माह होती है लाखों कमाई

डेढ़ सौ रुपए प्रति ट्रक में अवैध परिवहन
छत्तीसगढ़ में खनिज विभाग के अफसर इन दिनों अवैध परिवहन की आड़ में लाखों रुपए महिना कमा रहे हैं। इस विभाग के मंत्री डॉ. रमन सिंह को इस बात की फुरसत ही नहीं है कि अवैध परिवहन को रुकवाये। उल्टे अफसर उनके नाम से भी वसूली कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में मची राम नाम की लूट से खनिज विभाग के अफसर लाल हो रहे हैं और सरकार को करोड़ों-अरबों रुपए का चूना लगाया जा रहा है। बेतरतीब अवैध उत्खनन से गांव वालों की नाराजगी अलग दिखलाई पड़ रही है। रायपुर जिले में अवैध उत्खनन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है इसमें मुख्य रुप से वर्मा बंधुओं और कुलजीत मंजीत जैसे नाम आम लोगों की जुबान पर चढने लगा है जो प्रति ट्रक डेढ़ सौ रुपए देकर अवैध परिवहन करते हैं और यह सब खेल रात के अंधेरे में किया जाता है।
खनिज विभाग के सूत्रों के मुताबिक राजधानी में अवैध परिवहन रोकने मुख्यत: आठ पोस्ट है जिनमें जोरा, माना, पिरदा, उरला, मुरा, कचना मंदिर हसौद शामिल हैं राजधानी में मांग को देखते हुए खनिज विभाग ने अवैध परिवहन रोकने इन आठों स्थानों पर बकायदा सुरक्षा गार्ड बैठाये हैं लेकिन ये अवैध परिवहन रोकने की बजाय प्रति ट्रक डेढ़ सौ रुपए वसूल कर अवैध परिवहन को बढ़ावा दे रहे हैं।
बताया जाता है कि हर रोज रात के अंधेरे में डेढ़ दो सौ ट्रकों से अवैध परिवहन हो रहा है और खनिज अधिकारियों को इससे हो रही मोटी कमाई की वजह से कोई कुछ नहीं कर रहा है। हालत यह है कि यह बात सभी जानते हैं कि न वर्मा बंधुओं की खदानें हैं और न ही कुलजीत-मंजीत की ही खदाने हैं लेकिन इसके बाद भी इनके द्वारा बड़े पैमाने पर परिवहन कराया जा रहा है। सूत्रों की माने तो इस अवैध परिवहन से खनिज अफसरों को 25 से तीस लाख रुपए महीना मिलता है और इतनी बड़ी राशि के कारण ही अवैध परिवहन को अनुमति दी जाती है।
इधर खनिज विभाग की इस नीति से पट्टाधारी खदान वाले नाराज हैं लेकिन वे चाहकर भी खनिज विभाग के इस खेल का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। एक खदान मालिक का तो कहना है कि जितने बड़े पैमाने पर यहां भर्राशाही और लूट खसोट की जा रही है वैसा किसी विभाग में नहीं होता। यहीं नहीं खदान मालिकों को आए दिन तरह-तरह से प्रताड़ित किए जाते हैं जबकि अवैध रुप से खनिज बेचने वालों को संरक्षण दिया जाता है।बहरहाल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग में ही चल रहे लूट-खसोट को लेकर कई तरह की चर्चा है और ऊपर तक पैसा पहुंचाने की चर्चा ने उनकी छवि पर भी दाग लगाना शुरु कर दिया है और यही हाल रहा तो सरकार को कभी भी भारी मुसिबतों का सामना करना पड़ सकता है।

मंगलवार, 18 मई 2010

नक्सली नहीं ये आतंकवादी है सेना ही एकमात्र विकल्प

6 माह के बाद फिर बैठे सरकार
छत्तीसगढ़ में 50 हजार से अधिक लोग शिविर में रह रहे हैं। आम लोगों को भेड़ बकरियों की तरह काटे जा रहे हैं लगभग पांच सौ गांव उजड़ गए और इसके बाद भी नक्सलियों को आतंकवादी नहीं कहना राजनेताओं की भयंकर भूल है। अब तो इन आतंकवादियों के खिलाफ सेना ही विकल्प है और इस देश हित के लिए रमन सरकार को 6 माह के लिए हट जाना चाहिए ताकि केन्द्र सरकार राष्ट्रपति शासन लागू कर इन आतंकवादियों कि नेस्तनाबूत कर सके इसके बाद पुन: रमन सरकार को गद्दी सौंप दें।
यह कहना है आम लोगों का। बुलंद छत्तीसगढ़ द्वारा पूरे प्रदेश में कराए गए इस सर्वे के नतीजे स्पष्ट है कि आम लोग क्या चाहते हैं। पूरे प्रदेश में लगभग 17 हजार लोगों से हुई बातचीत में यह बात तो सामने आई ही साथ ही लोगों में इस मामले में की जा रही राजनीति को लेकर बेहद गुस्सा है और वे इस काम में जितनी जल्दी हो सके सैनिक कार्रवाई चाहते हैं।
पिछले 5 साल में जिस पैमाने पर पुलिस कर्मी मारे गए है वह साबित करता है कि अगर सरकार ने इस मामले की गंभीरता को कार्यरुप में नहीं बदला तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी और यदि शहरी क्षेत्रों तक इन कथित नक्सलियों की पहुंच हो गई तो स्थिति की भयावकता का अंदाजा लगाना मुश्किल है।
जल संसाधन जमीन जैसे प्रभावी नारे को लेकर नक्सलवाड़ी से शुरु हुए आंदोलन आज की स्थिति में विशुध्द रुप से आतंकवाद का रुप ले चुकी है। जिसका मुकाबला करने में राय सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है और जब कोई राय सरकार ऐेसे मामले में फेल हो जाए तो उसे बने रहने का अधिकार किस तरह से है यह समझ से परे है। इस तरह के विचार के बीच बस्तर-सरगुजा, नांदगांव जैसे जिलों के लोगों ने तो सरकार तक भंग कर सैनिकों को उतारने की पहल की है।
नक्सली नहीं आतंकवाद हैं !
बुलंद छत्तीसगढ़ के द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में मुख्यत: दस सवाल पूछे गए थे जिनमें 99 प्रतिशत लोगों ने नक्सली आंदोलन को आंदोलन मानने से ही इंकार कर दिया। उनका कहना था कि ये नक्सली नहीं हैं बल्कि नक्सली की आड़ में आतंकवादी हैं जिनका एक मात्र उद्देश्य खून करना और पैसा इकट्ठा करना है।
बातचीत नहीं कार्रवाई हो
इसी तरह हमारा दूसरा सवाल था कि क्या इनसे बात की जानी चाहिए इस पर भी आम लोगों की तीखी प्रतिक्रिया थी उनका मानना है कि बंदूक पकड़कर बातें नहीं की जा सकती। बातचीत में समय नहीं गंवाना चाहिए बल्कि सीधी कार्रवाई की जरूरत है।
सकरार पूरी तरह फेल
जिस प्रदेश में साढ़े पांच सौ गांव उजड़ गए हो और पचास हजार से अधिक लोग शिविरों में रहने मजबूरर हो और आए दिन कत्लेआम मचा हो वहां की सरकार को सक्षम मानना सबसे बड़ी भूल होगी। सरकार भले ही दावा करता रहे लेकिन आंकड़े झूठ नहीं बोलते। कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि यदि डॉ. रमन सिंह सरकार इस प्रदेश के हिंचचिंतक हैं तो वे स्वयं आगे आकर 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन की पहल कर सेना की मांग करे और फिर इस समस्या के हल होते ही पुन: सत्ता में बैठ जाए।
राजनीति न हो...
इस मामले में राजनीति से आम लोग बेहद दुखी हैं उनका कहना है कि हर हादसे के बाद कांग्रेसी-भाजपाई राजनीति करते नहीं थकते। गड़े मुर्दे उखाड़ने की बजाय आतंक के खिलाफ सभी जुट जाए।
आतंकवादी कार्रवाई को
कायरना कहना गलत
सर्वे में कथित नक्सलियों द्वारा सीआरपीएफ या पुलिस पर हमले को कायरना कहने पर भी लोगों को आपत्ति है और इसे अपनी कमजोरी छुपाने का बयान माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि हर हादसे के बाद सत्ता दल घटना को कायरना करार देते हैं जबकि वे दमदारी से हत्या पर हत्या कर आतंक मचा रहे हैं और सरकार कायर की तरह सिर्फ बयानबाजी कर रही है।
इसी तरह सर्वे में आदिवासियों की परम्परा, खान-पान, रहन-सहन को लेकर भी सवाल पूछे गए और ऐसे सवालों पर लोगों ने उनकी बेहतर जिन्दगी के लिए उपाय करने की बात कही। शिविर की बजाय गांव बसाने की वकालत की गई। सड़कों का जाल के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी की वकालत की गई।

मंगलवार, 11 मई 2010

मीडिया पर मीडिया

परदे बचा न पायेंगे अब घर के आबरू
इस दौर में हवाओं की भी नियत खराब है
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का एक नाम था लेकिन राय बनने के बाद जिस तेजी से सरकारों ने विज्ञापन का चारा डाला है उससे मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि अखबारों में अब खबरें नहीं होती लेकिन जिस तरह से खबरों को मैनेज किया जा रहा है वह आम लोगों के समझ में भी आने लगा है। वैसे तो जनसंपर्क विभाग का काम सरकार और जनता के बीच सेतु का है लेकिन इन दिनों जनसंपर्क का पूरा ध्यान मीडिया मैनेजमेंट पर जा टिका है और वे इसमें भी कमाई का जरिया निकाल लेते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के बाहर से प्रकाशित होने वाले टुटपुंजिए पत्र-पत्रिकाओं को भी मोटी राशि वाले विज्ञापन दिए जाते हैं और इसके एवज में कमीशन लिए जाते हैं।
सरकारी विज्ञापन लेने की होड़ में अखबारों को जनसंपर्क के जाल में फंसा रखा है। अब न पहले जैसी खोजी पत्रकारिता होती है और न ही घटना के बाद किश्तों में छपने वाले फॉलोअप स्टोरी ही दिखाई पड़ता है। एक समय था जब रायपुर के अखबारों व उनके पत्रकारों के आगे बड़े-बड़े नेता-अधिकारी तक अपना सिर झुकाते थे अब तो जमाना बदल गया है। भैय्या शब्द की लाचारी ने रिश्ते जोड़ दिए हैं और रिश्ते जुड़ने के बाद खबर की बात ही बेमानी हो जाती है। बड़े अखबारों ने तो परिशिष्ट के बहाने विज्ञापन बटोरना शुरु कर दिया है। मंत्रियों को छोटे-छोटे कार्यक्रमों में बुलाए जाने लगे है ऐसे में पत्रकारिता की विश्वसनियता पर सवाल उठे भी तो क्या। धंधा अच्छा चलना चाहिए।
और अंत में....
पिछले दिनों स्कूल के पैसे से अखबार निकालने वाले ने दूसरे अखबार वाले से कहा आपका अखबार हमारे यहां तभी छपेगा जब आप अपने यहां के अमूक कर्मचारी को हटाओगें उसके लड़के को हम हटा रहे हैं।

मंदिर-आदिवासियों की जमीन हड़पने में सरकार की चुप्पी!

घोटालेबाजों का जमाना महाधिवक्ता है सुराना - 8
सुराना परिवार द्वारा श्री हनुमान मंदिर की जमीन और आदिवासियों की जमीन हड़पने के मामले में सरकार की चुप्पी आश्चर्यजनक है और कहा जा रहा है उच्च राजनैतिक पहुंच के चलते ही इस मामले पर कार्रवाई नहीं की जा रही है जबकि प्रथम दृष्टया ही अपराध बनता है।
छत्तीसगढ़ को लुटने की साजिश में वैसे तो कई नेता अधिकारी और मंत्री तक शामिल है लेकिन महाधिवक्ता जैसे पद पर बैठने वाले देवराज सुराना और उसके परिवार पर जिस तरह से आरोप लगे हैं उसके बाद तो इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की जरूरत है लेकिन आश्चर्य का विषय तो यह है कि जांच की बात तो दूर उन्हें महाधिवक्ता बना दिया गया। ऐसे में सरकार के रवैये का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
इधर गोपियापारा में जब श्री हनुमान मंदिर की जमीन के बिक्री को लेकर बात की गई तो लोगों में आक्रोश साफ झलक रहा था। मंदिरों की जमीन बचाने में लगे श्री ठाकुर ने कहा कि सरकार कानून तो बना देती है लेकिन कार्रवाई नहीं करती अभी भी साजिशपूर्वक मंदिरों की जमीनें बेची जा रही है। नागरिकदास मठ की जमीन तो साजिशपूर्वक एक संस्था को ही दी जा रही है जिसका हम विरोध करते हैं। वहीं अजय अग्रवाल ने कहा कि महाधिवक्ता पद एक गरिमामय पद हैं और ऐसे जगह पर विवादास्पद व्यक्तियों को बिठाया जाना ठीक नहीं है जबकि सरकार को चाहिए कि वे ऐसे विवादास्पद व्यक्तियों से इस्तीफा ले ले।इसी तरह आदिवासी की जमीन हड़पने के मामले में भी शासन प्रशासन की भूमिका संदिग्ध है और इस मामले में भी लीपापोती का केल जमकर खेला गया। बहरहाल महाधिवक्ता देवराज सुराना के विवादास्पद मामले की शहर में कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है जमीन व्यवसाय से जुड़े सुराना परिवार के कई और मामले सामने आएंगे।