रायपुर जिले में खनिज से लाखों रुपए के राजस्व का चूना लगा रहे खनिज अधिकारियों ने मंजीत, शर्मा, कुलदीप जैसे लोगों के चल रहे अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनसे अवैध वसूली कर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं जबकि अवैध कार्यों में लिप्त लोग यह दावा करते नहीं थकते कि उनके द्वारा स्क्वाड तक को पैसा दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभाग की यह कहानी नई नहीं है। कहानी का नयापन यह है कि इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। खनिज विभाग में चल रहे लूट-खसोट को लेकर रोज नई कहानी सामने आने लगी है। सालों से राजधानी में पदस्थ अफसरों के वरदहस्त ने अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन करने वालों को इतना ताकतवार बना दिया है कि कई कर्मचारी तो कार्रवाई करने तक से डरते हैं।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि जिले में दर्जनभर से अधिक क्रेशर अवैध ढंग से संचालित है और इन अवैध क्रेशरों के एवज में अधिकारियों को बड़ी रकम भी मिलती है। हालत यह है कि अवैध क्रेशर के संचालन से हर साल सरकार को लाखों-करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि हो रही है इसके बाद भी इन अवैध क्रेशरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना आश्चर्यजनक है।
बताया जाता है कि खनिज विभाग में बैठे कई अधिकारियों के संरक्षण में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन से होने वाली अवैध कमाई इतनी यादा है कि ऊपर तक एक बड़ी रकम पहुंचाई जाती है इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही है। बहरहाल खनिज विभाग के लूट खसोट की शिकायत मुख्यमंत्री से किए जाने के बाद कार्रवाई नहीं होते देख कई लोग आश्चर्यचकित हैं।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शनिवार, 29 मई 2010
शुक्रवार, 28 मई 2010
सरकार कहां है...
छत्तीसगढ़ के लोग इन दिनों चौतरफा मार झेल रहे है। एक समूचा इलाका आतंकवादियों से त्रस्त है तो पुलिस विभाग इस इलाके में नौकरी करना पसंद नहीं करता। राजधानी सहित छत्तीसगढ़ का शहरी क्षेत्र पानी के लिए तरस रहा है और किसानों की हालत बद से बदतर होते जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
सरकार कहां है...
छत्तीसगढ़ के लोग इन दिनों चौतरफा मार झेल रहे है। एक समूचा इलाका आतंकवादियों से त्रस्त है तो पुलिस विभाग इस इलाके में नौकरी करना पसंद नहीं करता। राजधानी सहित छत्तीसगढ़ का शहरी क्षेत्र पानी के लिए तरस रहा है और किसानों की हालत बद से बदतर होते जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
राय बनने के बाद जिस तेजी से विकास के सपने देखे गए थे वह सपने छिन्न-भिन्न होने लगे है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है सिवाय सरकारी खजाने को लूटने की। मंत्री से लेकर अफसरों में इस बात की होड़ मची है कि वे किस तरह से अपनी जेबें गरम करें और इससे यादा दुखद खबर और क्या हो सकती है कि प्रतिपक्ष भी पैसा कमाने में लग गया है और उनके नेता इतना पैसा कमा रहे हैं जितना वे अपने शासनकाल में नहीं कमा रहे थे।
चौतरफा बदहवास छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सरकार के काम काज दिखलाई पड़ रहे हैं उससे आने वाले दिनों में आम लोगों को जीवन चलाना दूभर होता चला जाएगा। छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सली आतंकवाद चरम पर है। बस्तर सहित नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में कत्ले आम मचा हुआ है। सैकड़ों गांव उजड़ रहे हैं और हजारों लोग शिविरों में जीने मजबूर है। इसके बाद भी राय सरकार हर घटना के बाद सिर्फ बयानबाजी करते नहीं थकती। बकौल दिग्विजय सिंह इस मामले में डा. रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। डा. रमन सिंह ने केन्द्र से जो मांगा पैसा फोर्स सब कुछ दिया गया लेकिन घटनाएँ बढ़ती जा रही है।
भले ही दिग्विजय सिंह के बयान को राजनैतिक करार दिया जाए लेकिन क्या यह सच नहीं है कि डा. रमन सिंह के सत्ता में काबिज होने के बाद से आतंकवादी घटनाओं में वृध्दि हुई है। क्या सरकार की रणनीति फेल हुई है। जिसका खामियाजा सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब भी समय है इस मामले में राय सरकार ठोस योजना बनाएं या फिर इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर पुलिस व अन्य फोर्सों को अधिकार दें। मानवाधिकार की चिंता वे करते हैं जो कमजोर होते हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान में हमले के दौरान क्या कुछ नहीं किया। सिर्फ दोषारोपण की राजनीति से काम नहीं चलेगा। यदि भाजपाई यही कहते रहें कि यह कांग्रेस के सरकारों की देन है तो इससे समस्या हल नहीं होने वाली है। यदि यह उनकी देन है तो उजड़ते गांव और बसते शिविर किसी देन है।
नक्सली अब आंदोलन नहीं आतंकवाद का रुप ले चुकी है और सरकार व उनकी पार्टी कम से कम इन्हें आतंकवाद कहना शुरु कर दें। वोटर लिस्ट के आधार पर पहचान देखी जाए और बारुदी सुरंग हटाने के उपाय ढूंढे जाने चाहिए। सिर्फ केन्द्र सरकार पर मोहताज रहना भी उचित नहीं है और यदि केन्द्र को लेकर राजनीति करनी हो तो 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करवाकर सेना का प्रस्ताव भेजें और आतंकवादियों के नेस्तानाबूत होने के बाद सत्ता में बैठ जाए। लेकिन राजनीति करने वालों को इसकी परवाह कहां है कि वे आम लोगों के हित में गद्दी छोड़ने की हिम्मद करें यही वजह है कि इस नए नवेले राय के विकास में बाधा बढ़ते ही जा रही है।
गुरुवार, 27 मई 2010
मुख्यमंत्री के नाक के नीचे घपलेबाजी , आडिटर ने संवाद की गड़बड़ी खोली
प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह भले ही अपने को कितना ही पाक-साफ बता लें लेकिन उनके अपने ही विभाग संवाद में जिस तरह से करोड़ों रुपए की घपलेबाजी की गई है उसका खुलासा आडिट रिपोर्ट से हो रहा है और अब तो सीधे मुख्यमंत्री पर उंगली उठाई जाने लगी है और कहा जा रहा है कि सरकारी खजाने को लुटने की इस साजिश में डॉ. रमन सिंह भी साथ में हैं।
छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क में लूट खसोट की घटना नई नहीं है संवाद बनते ही जिस तरह से किराये के भवन के नाम पर सरकारी खजानों को लुटा गया वह किसी से छिपा नहीं है तब से आज तक संवाद का प्रभार सुखदेव कुरोटी के पास है कभी विज्ञापन के कमीशन तो कभी प्रचार सामग्री में घपलेबाजी को लेकर चर्च में रहे संवाद में इन दिनों इस बात की भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल सरकार को सौ करोड़ से ऊपर का चुना लगाया जा रहा है।
ताजा मामला संवाद के चाटर्ड एकाउण्टेन्ट योति अग्रवाल एंड कंपनी की रिपोर्ट है सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इस रिपोर्ट में सी.ए. ने संवाद में चल रहे गड़बड़ियों का खुलासा किया है। संवाद के फिल्म सेक्शन में ही करोड़ों रुपए की गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। बिल नम्बर 661 और 874 में नवा अंजोर को ढाई लाख और 15 लाख का भुगतान किया गया है। यह डाकुमेंट्री फिल्म बनाने संजीवनी एग्रो विजन इंटरप्राइजेस को दिया गया जो एक कलेक्टर के साले की बताई जाती है। इस पर सीए ने आपत्ति की है।
सूत्रों ने बताया कि इस मामले में संवाद ने न तो डीएवीपी रेट का ही ध्यान रखा। बताया जाता है कि कलेक्टर की सिफारिश पर ही गई इस कार्य की गुणवत्ता भी खराब रही है और इसे लेकर विवाद भी हो चुका है। सीए ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जब यह संस्था रजिस्ट्रर्ड ही नहीं था तब इसे किस तरह से इतनी बड़ी राशि का काम दिया गया और भुगतान किया गया।
बताया जाता है कि संवाद में इस घपलेबाजी की चर्चा जोरों पर है और अधिकारियों की मुख्यमंत्री से सेटिंग की बात भी कही जा रही है। बहरहाल संवाद में घपलेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और इस लूट-खसोट में उच्च स्तरीय मिलीभगत को लेकर आम लोगों में कई तरह की चर्चा है।
छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क में लूट खसोट की घटना नई नहीं है संवाद बनते ही जिस तरह से किराये के भवन के नाम पर सरकारी खजानों को लुटा गया वह किसी से छिपा नहीं है तब से आज तक संवाद का प्रभार सुखदेव कुरोटी के पास है कभी विज्ञापन के कमीशन तो कभी प्रचार सामग्री में घपलेबाजी को लेकर चर्च में रहे संवाद में इन दिनों इस बात की भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल सरकार को सौ करोड़ से ऊपर का चुना लगाया जा रहा है।
ताजा मामला संवाद के चाटर्ड एकाउण्टेन्ट योति अग्रवाल एंड कंपनी की रिपोर्ट है सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इस रिपोर्ट में सी.ए. ने संवाद में चल रहे गड़बड़ियों का खुलासा किया है। संवाद के फिल्म सेक्शन में ही करोड़ों रुपए की गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। बिल नम्बर 661 और 874 में नवा अंजोर को ढाई लाख और 15 लाख का भुगतान किया गया है। यह डाकुमेंट्री फिल्म बनाने संजीवनी एग्रो विजन इंटरप्राइजेस को दिया गया जो एक कलेक्टर के साले की बताई जाती है। इस पर सीए ने आपत्ति की है।
सूत्रों ने बताया कि इस मामले में संवाद ने न तो डीएवीपी रेट का ही ध्यान रखा। बताया जाता है कि कलेक्टर की सिफारिश पर ही गई इस कार्य की गुणवत्ता भी खराब रही है और इसे लेकर विवाद भी हो चुका है। सीए ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जब यह संस्था रजिस्ट्रर्ड ही नहीं था तब इसे किस तरह से इतनी बड़ी राशि का काम दिया गया और भुगतान किया गया।
बताया जाता है कि संवाद में इस घपलेबाजी की चर्चा जोरों पर है और अधिकारियों की मुख्यमंत्री से सेटिंग की बात भी कही जा रही है। बहरहाल संवाद में घपलेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और इस लूट-खसोट में उच्च स्तरीय मिलीभगत को लेकर आम लोगों में कई तरह की चर्चा है।
हज कमेटी और वक्फ बोर्ड के पदाधिकारियों की मनमानी
हटाने असंतुष्टो ने खोला मोर्चा
भाजपा के सत्ता में आते ही हज कमेटी, वक्फ बोर्ड, मदरसा बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया था लेकिन अब सालों से एक ही पद पर बैठे लोगों की मनमानी को लेकर बगावत शुरू हो गया है और सुन्नी मुस्लिम मंच ने तो इन पदाधिकारियों की मनमानी की शिकायत राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी और मुख्यमंत्री रमन सिंह से करते हुए इन्हें हटाने की मांग तक कर डाली है।
सूत्रों ने बताया कि सालों से एक ही पद पर बैठे इन पदाधिकारियों की मनमानी से मुस्लिम समाज में रोष व्याप्त है जिसके चलते मुस्लिम समाज को जोड़ने की कार्रवाई तक बाधित हुई है। सुन्नी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष नासिर खान कादरी ने तो यहां तक कहा कि जो लोग पदों पर बैठे हैं वे अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं उन्हें समाज की भलाई से कोई लेना देना नहीं है। कादरी ने अपने शिकायत पत्र में यह भी कहा कि उर्दू गर्ल्स हाईस्कूल में पढ़ाई का स्तर ऊंचा उठाने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। जबकि हज हाउस के निर्माण नहीं होने के लिए यही सब पदाधिकारी दोषी है।
भाजपा के सत्ता में आते ही हज कमेटी, वक्फ बोर्ड, मदरसा बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया था लेकिन अब सालों से एक ही पद पर बैठे लोगों की मनमानी को लेकर बगावत शुरू हो गया है और सुन्नी मुस्लिम मंच ने तो इन पदाधिकारियों की मनमानी की शिकायत राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी और मुख्यमंत्री रमन सिंह से करते हुए इन्हें हटाने की मांग तक कर डाली है।
सूत्रों ने बताया कि सालों से एक ही पद पर बैठे इन पदाधिकारियों की मनमानी से मुस्लिम समाज में रोष व्याप्त है जिसके चलते मुस्लिम समाज को जोड़ने की कार्रवाई तक बाधित हुई है। सुन्नी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष नासिर खान कादरी ने तो यहां तक कहा कि जो लोग पदों पर बैठे हैं वे अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं उन्हें समाज की भलाई से कोई लेना देना नहीं है। कादरी ने अपने शिकायत पत्र में यह भी कहा कि उर्दू गर्ल्स हाईस्कूल में पढ़ाई का स्तर ऊंचा उठाने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। जबकि हज हाउस के निर्माण नहीं होने के लिए यही सब पदाधिकारी दोषी है।
बुधवार, 26 मई 2010
सूर्या फाउण्डेशन के बहाने छत्तीसगढ में घुसपैठ, भाजपाई त्रस्त
वैसे तो सत्ता आते ही नए-नए कबूतरों का दिखाई देना नया नहीं है लेकिन छत्तीसगढ़ में सूर्या फाउण्डेशन ने संगठन से लेकर सत्ता तक जिस तरह से घुसपैठ किया है उससे स्थानीय भाजपाई न केवल त्रस्त है बल्कि कभी भी कोई अनहोनी हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
कहने को तो सूर्या फाउण्डेशन जे.पी. अग्रवाल की संस्था है लेकिन कहा जाता है कि यह महज दिखावा है। वास्तव में सूर्या फाउण्डेशन प्रदेश भाजपा में ताकतवार माने जाने वाले नेता की करतूत है जिसके सहारे सत्ता और संगठन को काबू में रखने की रणनीति बनाई गई है। सूत्रों ने बताया कि सूर्या फाउण्डेशन ने छत्तीसगढ़ के सभी भाजपा कार्यालयों और मंत्रियों के बंगलों में अपने लोगों को बिठाने के अलावा गांव-गांव में कार्यकर्ताओं की एक ऐसी फौज खड़ी की जा रही है जिससे स्थानीय विधायकों या भाजपा पदाधिकारियों में नकेल कसी जा सके।
राजधानी के ही एकात्म परिसर में तीन-चार युवक सूर्या फाउण्डेशन के हैं और ये सभी दूसरे प्रांतों के हैं। इनके द्वारा सालों से भाजपा कार्यालय में काम कर रहे कार्यकर्ताओं को अपमानित किए जाने की चर्चा से स्थानीय भाजपाईयों में जबरदस्त रोष व्याप्त है। बताया जाता है कि कभी भाजपा कार्यालय में काम की अधिकता की वजह से दोपहर का भोजन खा लेने वाले कार्यकर्ताओं को अब यहां दुत्कारा जाता है और किसे क्या बोला जाना है प्रेस को कैसे बयान जारी किए जाने हैं यह सब भी सूर्या फाउण्डेशन ही तय करता है।
बहरहाल भाजपा में आए सूर्या फाउण्डेशन के जीन से कई लोग भयभीत है और कहा जाता है कि अधिकारों को लेकर इनमें कई बार विवाद भी हो चुका है और यही स्थिति रही तो कभी भी कोई बड़ी घटना हो सकती है।
कहने को तो सूर्या फाउण्डेशन जे.पी. अग्रवाल की संस्था है लेकिन कहा जाता है कि यह महज दिखावा है। वास्तव में सूर्या फाउण्डेशन प्रदेश भाजपा में ताकतवार माने जाने वाले नेता की करतूत है जिसके सहारे सत्ता और संगठन को काबू में रखने की रणनीति बनाई गई है। सूत्रों ने बताया कि सूर्या फाउण्डेशन ने छत्तीसगढ़ के सभी भाजपा कार्यालयों और मंत्रियों के बंगलों में अपने लोगों को बिठाने के अलावा गांव-गांव में कार्यकर्ताओं की एक ऐसी फौज खड़ी की जा रही है जिससे स्थानीय विधायकों या भाजपा पदाधिकारियों में नकेल कसी जा सके।
राजधानी के ही एकात्म परिसर में तीन-चार युवक सूर्या फाउण्डेशन के हैं और ये सभी दूसरे प्रांतों के हैं। इनके द्वारा सालों से भाजपा कार्यालय में काम कर रहे कार्यकर्ताओं को अपमानित किए जाने की चर्चा से स्थानीय भाजपाईयों में जबरदस्त रोष व्याप्त है। बताया जाता है कि कभी भाजपा कार्यालय में काम की अधिकता की वजह से दोपहर का भोजन खा लेने वाले कार्यकर्ताओं को अब यहां दुत्कारा जाता है और किसे क्या बोला जाना है प्रेस को कैसे बयान जारी किए जाने हैं यह सब भी सूर्या फाउण्डेशन ही तय करता है।
बहरहाल भाजपा में आए सूर्या फाउण्डेशन के जीन से कई लोग भयभीत है और कहा जाता है कि अधिकारों को लेकर इनमें कई बार विवाद भी हो चुका है और यही स्थिति रही तो कभी भी कोई बड़ी घटना हो सकती है।
मंगलवार, 25 मई 2010
हत्या का आरोपी अजय मंत्री का खास,पर्यटन में यही करते है सब कुछ पास
पर्यटन का पीआरओ असली एमडी?
छत्तीसगढ़ पुलिस का इससे दुखद पहलू और क्या होगा कि एय्याशी के लिए ले गए कालगर्ल योति की हत्या करने का आरोपी अजय श्रीवास्तव न केवल प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग पर्यटन में न केवल पीआरओ है बल्कि उसकी एमडी से यादा चलती है?
छत्तीसगढ़ में राजनैतिक संरक्षण में फल-फूल रहे अपराधियों की यह एक उदाहरण मात्र है। पूरे मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि इस मामले में शामिल कई लोग तो उसी समय एफआईआर से नाम कटवाने में सफल हो गए थे लेकिन जिन तीन लोगों को योति कदम नामक कालगर्ल का हत्यारा बताया गया था उनमें राजू, संजीव चौबे और अजय श्रीवास्तव के नाम थे इसमें से अजय श्रीवास्तव को फरार बताया गया है।
घटना के संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार गुढियारी निवासी उमा गुप्ता के अड्डे से आधा दर्जन युवकों ने योति कदम नामक कालगर्ल को एय्याशी के लिए ले गए थे पुलिस के एफआईआर के मुताबिक इस युवती से आरोपियों का विवाद हुआ और खाना खाने के दौरान युवती भाग गई। इसके बाद आरोपियों ने उसकी खोजबीन की और युवती के मिलने पर उसे कार से कुचलकर मार डाला। घटना राजू, संजीव चौबे एवं अजय श्रीवास्तव द्वारा किया गया। अपराध क्रमांक 7099 में दर्ज कर अजय श्रीवास्तव को फरार बताते हुए बाद में प्रस्तुत करने की बात एफआईआर में की गई है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि अजय श्रीवास्तव तब दुग्ध संघ के कर्मचारी थे और उन्हें राजनैतिक दबाववश गिरफ्तार करने से पुलिस बचती रही। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि तब भी अजय श्रीवास्तव की भारी पहुंच रही लेकिन वे अन्य लोगों की तरह किस्मतवाले नहीं थे इसलिए एफआईआर से नाम नहीं हटवा पाए। इधर इस मामले में पुलिस की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे है कि अय्याशी के बाद हत्या जैसे जघन्य मामले के आरोपी को 11 साल बाद भी पुलिस क्यों गिरफ्तार नहीं कर रही है।
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे सुलझे हुए मंत्री को क्या इस बात की जानकारी नहीं है कि जिसे वे अपना खास बनाए हुए हैं वह हत्या जैसे जघन्य मामले का आरोपी है और यदि यह जानते हुए भी उसे पर्यटन में लाया गया है तो अपराधियों को संरक्षण देने के आरोप से वे कैसे बच सकते हैं। इस संदर्भ मामले में पुलिस ने किस तरह दबाव में हत्याकांड के आरोपी को नहीं पकड़ पाई यह भी जांच का विषय है और इस सबका खुलासा उच्चस्तरीय जांच या फिर सीबीआई जांच से ही संभव हो पाएगा।
इस मामले में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने कहा कि बगैर मंत्री के जानकारी के यह सब नहीं हो सकता। बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से नेतागिरी करते हैं उससे नहीं लगता कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं होगी कि अजय श्रीवास्तव हत्याकांड का फरार आरोपी है और इस आरोपी को जानबूझकर संरक्षण दिया गया। डॉ. हरितवाल ने तो अजय श्रीवास्तव को तत्काल हटाने की मांग करते हुए सीबीआई जांच की मांग भी की है उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ धारा 302, 201 और 34 का मामला दर्ज हो वह नौकरी करते हुए कैसे फरार रह सकता है। इधर इस मामले की अदालती कार्रवाई की जानकारी नहीं हो पाई है जबकि अजय श्रीवास्तव से इस बारे में जानकारी लेने या उनके पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन वे ऑफिस में उपलब्ध नहीं थे।
छत्तीसगढ़ पुलिस का इससे दुखद पहलू और क्या होगा कि एय्याशी के लिए ले गए कालगर्ल योति की हत्या करने का आरोपी अजय श्रीवास्तव न केवल प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग पर्यटन में न केवल पीआरओ है बल्कि उसकी एमडी से यादा चलती है?
छत्तीसगढ़ में राजनैतिक संरक्षण में फल-फूल रहे अपराधियों की यह एक उदाहरण मात्र है। पूरे मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि इस मामले में शामिल कई लोग तो उसी समय एफआईआर से नाम कटवाने में सफल हो गए थे लेकिन जिन तीन लोगों को योति कदम नामक कालगर्ल का हत्यारा बताया गया था उनमें राजू, संजीव चौबे और अजय श्रीवास्तव के नाम थे इसमें से अजय श्रीवास्तव को फरार बताया गया है।
घटना के संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार गुढियारी निवासी उमा गुप्ता के अड्डे से आधा दर्जन युवकों ने योति कदम नामक कालगर्ल को एय्याशी के लिए ले गए थे पुलिस के एफआईआर के मुताबिक इस युवती से आरोपियों का विवाद हुआ और खाना खाने के दौरान युवती भाग गई। इसके बाद आरोपियों ने उसकी खोजबीन की और युवती के मिलने पर उसे कार से कुचलकर मार डाला। घटना राजू, संजीव चौबे एवं अजय श्रीवास्तव द्वारा किया गया। अपराध क्रमांक 7099 में दर्ज कर अजय श्रीवास्तव को फरार बताते हुए बाद में प्रस्तुत करने की बात एफआईआर में की गई है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि अजय श्रीवास्तव तब दुग्ध संघ के कर्मचारी थे और उन्हें राजनैतिक दबाववश गिरफ्तार करने से पुलिस बचती रही। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि तब भी अजय श्रीवास्तव की भारी पहुंच रही लेकिन वे अन्य लोगों की तरह किस्मतवाले नहीं थे इसलिए एफआईआर से नाम नहीं हटवा पाए। इधर इस मामले में पुलिस की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे है कि अय्याशी के बाद हत्या जैसे जघन्य मामले के आरोपी को 11 साल बाद भी पुलिस क्यों गिरफ्तार नहीं कर रही है।
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे सुलझे हुए मंत्री को क्या इस बात की जानकारी नहीं है कि जिसे वे अपना खास बनाए हुए हैं वह हत्या जैसे जघन्य मामले का आरोपी है और यदि यह जानते हुए भी उसे पर्यटन में लाया गया है तो अपराधियों को संरक्षण देने के आरोप से वे कैसे बच सकते हैं। इस संदर्भ मामले में पुलिस ने किस तरह दबाव में हत्याकांड के आरोपी को नहीं पकड़ पाई यह भी जांच का विषय है और इस सबका खुलासा उच्चस्तरीय जांच या फिर सीबीआई जांच से ही संभव हो पाएगा।
इस मामले में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री डॉ. निरंजन हरितवाल ने कहा कि बगैर मंत्री के जानकारी के यह सब नहीं हो सकता। बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से नेतागिरी करते हैं उससे नहीं लगता कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं होगी कि अजय श्रीवास्तव हत्याकांड का फरार आरोपी है और इस आरोपी को जानबूझकर संरक्षण दिया गया। डॉ. हरितवाल ने तो अजय श्रीवास्तव को तत्काल हटाने की मांग करते हुए सीबीआई जांच की मांग भी की है उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ धारा 302, 201 और 34 का मामला दर्ज हो वह नौकरी करते हुए कैसे फरार रह सकता है। इधर इस मामले की अदालती कार्रवाई की जानकारी नहीं हो पाई है जबकि अजय श्रीवास्तव से इस बारे में जानकारी लेने या उनके पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन वे ऑफिस में उपलब्ध नहीं थे।
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