राज्य बनने के पहले भोपाल के पत्रकारों और पत्रकारिता की स्थिति को लेक रायपुर में अक्सर निंदा की जाती थी कि वहां किस तरह की पत्रकारिता होती है कैसे पत्रकार दो-पांच के लिए मंत्रियों और अधिकारियों से सेटिंग कर लेते हैं।
छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद एक-दो साल तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मत्था बदल अखबार से लेकर मंत्रियों व अधिकारियों के दलाली करते पत्रकार नजर आने लगे हैं। पिछले दिनों एक अखबार में जब एक अधिकारी के खिलाफ लगातार खबरें छपने लगी तो साप्ताहिक निकालने वाले अखबार के कथित पत्रकार ने खबर रूकवाने सौदेबाजी की और सेटिंग के एवज में न केवल अधिकारी से पैसे लिए बल्कि पत्रकार से भी कमीशन ले लिया। सौदा भी बड़ा नहीं था लेकिन इसकी चर्चा काफी हाउस तक जा पहुंचा है।
छत्तीसगढ में चल रहे इस दलाली और सेटिंग के खेल में कुछ प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार भी शामिल है कुछ इश्योरेंस पालिसी बेच रहे हैं तो कुछ काम ले रहे हैं। इस पत्रकार के द्वारा तो एक मंत्री से भी सेटिंग कर खबर रुकवाने का काम करने की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। पत्रकारिता के इस नए परिवादी से आम लोगों का कितना भला होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन नेताओं और अधिकारियों की डकैती जोर-शोर से चल पड़ी है।
और अंत में...
प्रतिष्ठित माने जाने वाले एक अखबार के पत्रकार को एक अधिकारी की खबर लग गई। पहले उसने उससे खबर पर चर्चा की और उठते हुए एक पॉलिसी थमा दी।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शनिवार, 12 जून 2010
शुक्रवार, 11 जून 2010
विकास या विनाश
पर्यावरण की चिंता में दुबले हो रहे लोगों के लिए यह खबर और भी दुखदायी होगी कि मोवा से विधानसभा के बीच सड़क चौड़ीकरण के नाम से डेढ़ हजार से अधिक पेड़ काट डाले गए। यह पेड़ तब काटे जा रहे थे जब प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह के द्वारा शिवनाथ नदी को बचाने फावड़ा उठाया जा रहा था। छत्तीसगढ़ को वन प्रदेश कहने वालों के लिए यह दुखद स्थिति है कि सरकार विकास के नाम पर विनाश करने में लगी है। उसके पास आने वाले पीढ़ी को सुखद जिंदगी देने की कोई योजना नहीं है वह तो सिर्फ अपने राजनैतिक फायदे के लिए ही कार्य करती है। फावड़ा उठाया फोटो खिंचवाया काम खत्म। पिछले 6 सालों में रमन सरकार की पर्यावरण के क्षेत्र में यही भूमिका रही है।
राजधानी के ही आमापारा स्थित कारी तालाब को बचाने कितने ही बार अपील की जा चुकी है लेकिन सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है वह तो गौरव पथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब को पटवा रही है। विधानसभा मार्ग को चौड़ा करने डेढ-दो हजार वृक्ष काट डाले गए और इसमें भी सबसे दुखद पहलु यह है कि हर साल सैकड़ों वृक्ष लगाने का दावा करने वाले समाजसेवी भी इस बारे में खामोश है। सरकार बेशक सड़क चौड़ी कराये, तालाबों का सौंदर्यीकरण करें लेकिन वह यह ध्यान रखे कि इससे पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचेगा और इसकी भरपाई के उपाय भी सरकार को करने चाहिए। सड़कें किसी भी राय के विकास की कहानी कहती है लेकिन यदि हम विकास के नाम पर अप्रैल में ही 45 डिग्री पारे का तपन झेलते रहे तो ऐसा विकास किस काम का है।
क्या विधानसभा मार्ग के चौड़ीकरण में वृक्षों को काटना जरूरी था? और यदि वृक्ष हटाना जरूरी था तब इन वृक्षों को काटने की बजाय इसे आसपास की सरकारी जमीनों पर क्यों नहीं रोपा गया। सरकार की नीतियां यदि पर्यावरण को लेकर इस तरह लापरवाह रही तो फिर वे समाज प्रेमी कहां है जो हर साल पर्यावरण दिवस के दिन पर्यावरण बचाने के नाम पर अखबारों में फोटो छपवाते रहते हैं। क्या उनकी जिम्मेदारी अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए इतना भी नहीं है कि वे तालाब पाटे जाने या वृक्ष काटे जाने का विरोध तक कर सके।
आश्चर्य विषय तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भी है। वे तक ऐसे मामले में चुप बैठे हैें। क्या ऐसी खामोशी छत्तीसगढ़ के पर्यावरण बिगाड़ने में उन्हें देषी नहीं ठहराती। अब भी समय है पर्यावरण के हिमायती चाहे तो एक ठोस नीति के लिए सरकार पर दबाव बनाए अन्यथा छत्तीसगढ़ में चल रहे विनाश लीला आम लोगों का जीवन दूभर कर देगी और इस अंधेरगर्दी के लिए आने वाली पीढ़ी से सिर्फ गाली ही मिलेगी?
राजधानी के ही आमापारा स्थित कारी तालाब को बचाने कितने ही बार अपील की जा चुकी है लेकिन सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है वह तो गौरव पथ के नाम पर तेलीबांधा तालाब को पटवा रही है। विधानसभा मार्ग को चौड़ा करने डेढ-दो हजार वृक्ष काट डाले गए और इसमें भी सबसे दुखद पहलु यह है कि हर साल सैकड़ों वृक्ष लगाने का दावा करने वाले समाजसेवी भी इस बारे में खामोश है। सरकार बेशक सड़क चौड़ी कराये, तालाबों का सौंदर्यीकरण करें लेकिन वह यह ध्यान रखे कि इससे पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचेगा और इसकी भरपाई के उपाय भी सरकार को करने चाहिए। सड़कें किसी भी राय के विकास की कहानी कहती है लेकिन यदि हम विकास के नाम पर अप्रैल में ही 45 डिग्री पारे का तपन झेलते रहे तो ऐसा विकास किस काम का है।
क्या विधानसभा मार्ग के चौड़ीकरण में वृक्षों को काटना जरूरी था? और यदि वृक्ष हटाना जरूरी था तब इन वृक्षों को काटने की बजाय इसे आसपास की सरकारी जमीनों पर क्यों नहीं रोपा गया। सरकार की नीतियां यदि पर्यावरण को लेकर इस तरह लापरवाह रही तो फिर वे समाज प्रेमी कहां है जो हर साल पर्यावरण दिवस के दिन पर्यावरण बचाने के नाम पर अखबारों में फोटो छपवाते रहते हैं। क्या उनकी जिम्मेदारी अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए इतना भी नहीं है कि वे तालाब पाटे जाने या वृक्ष काटे जाने का विरोध तक कर सके।
आश्चर्य विषय तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भी है। वे तक ऐसे मामले में चुप बैठे हैें। क्या ऐसी खामोशी छत्तीसगढ़ के पर्यावरण बिगाड़ने में उन्हें देषी नहीं ठहराती। अब भी समय है पर्यावरण के हिमायती चाहे तो एक ठोस नीति के लिए सरकार पर दबाव बनाए अन्यथा छत्तीसगढ़ में चल रहे विनाश लीला आम लोगों का जीवन दूभर कर देगी और इस अंधेरगर्दी के लिए आने वाली पीढ़ी से सिर्फ गाली ही मिलेगी?
गुरुवार, 10 जून 2010
जमकर पैसा खिलाओं,अवैध निर्माण कराओं
एमजीरोड में अवैध निर्माण से परिवार परेशान
क्या राजधानी में नियम कानून के मायने बदल गए हैं या पैसा या पहुंच वालों के सामने निगम प्रशासन पंगु बन गया है। यह सब नामदेव परिवार की व्यथा के रुप में सामने आई है। यह परिवार अवैध निर्माण और अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ चिखता रहा लेकिन निगम के अधिकारियों के कान संजय जादवानी के रुपयों ने ऐसा भर दिया था कि न अवैध निर्माण रुका और न ही निगम के किसी अफसर पर कार्रवाई ही हुई।
जब राजधानी का यह आलम है तो प्रदेश का हाल क्या होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसकी शिकायत नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत से भी की गई लेकिन वहां भी कुछ नहीं हुआ सब जगह जांच का नाम लिया गया और मामले को दबा दिया गया। इस तरह के अवैध निर्माण तो निगम के अफसरों के संरक्षण में नया नहीं है और इसका पता तब लगता है जब निर्माण पूरा हो जाता है लेकिन इस मामले में तो शिकायत के बाद भी अवैध निर्माण होता रहा।
निगम में जब सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाया गया तो पता चला कि आवासीय क्षेत्र में यह व्यवसायिक प्रतिष्ठान बन गया और जोन कमिश्नर ने स्वीकार किया कि यह निर्माण त्रटिपूर्ण है। इसके बाद भी यह निर्माण हटाया नहीं जा रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस अवैध निर्माण के चलते नामदेव परिवार का जीना दूभर हो गया है। जबकि सूचना अधिकारी जोन क्रमांक 7 ने भी स्वीकार किया है कि निगम ने संजय जादवानी को केवल प्रथम तल के निर्माण की अनुमति दी है द्वितीय तल का निर्माण पूरी तरह अवैध है।
हालत यह है कि इस अवैध निर्माण से पीढित नामदेव परिवार ने मुख्यमंत्री तक को शिकायत की है लेकिन संजय की पहुंच के आगे सब बेकार हो रहा है और पीड़ित पक्ष अब न्यायालय की शरण में जाने मजबूर है। बहरहाल इस संबंध में मंत्री और कमिश्नर तक पैसा पहुंचाने की चर्चा है और यही स्थिति रही तो नए महापौर किरणमयी नायक पर भी उंगली उठ सकती है।
क्या राजधानी में नियम कानून के मायने बदल गए हैं या पैसा या पहुंच वालों के सामने निगम प्रशासन पंगु बन गया है। यह सब नामदेव परिवार की व्यथा के रुप में सामने आई है। यह परिवार अवैध निर्माण और अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ चिखता रहा लेकिन निगम के अधिकारियों के कान संजय जादवानी के रुपयों ने ऐसा भर दिया था कि न अवैध निर्माण रुका और न ही निगम के किसी अफसर पर कार्रवाई ही हुई।
जब राजधानी का यह आलम है तो प्रदेश का हाल क्या होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसकी शिकायत नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत से भी की गई लेकिन वहां भी कुछ नहीं हुआ सब जगह जांच का नाम लिया गया और मामले को दबा दिया गया। इस तरह के अवैध निर्माण तो निगम के अफसरों के संरक्षण में नया नहीं है और इसका पता तब लगता है जब निर्माण पूरा हो जाता है लेकिन इस मामले में तो शिकायत के बाद भी अवैध निर्माण होता रहा।
निगम में जब सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाया गया तो पता चला कि आवासीय क्षेत्र में यह व्यवसायिक प्रतिष्ठान बन गया और जोन कमिश्नर ने स्वीकार किया कि यह निर्माण त्रटिपूर्ण है। इसके बाद भी यह निर्माण हटाया नहीं जा रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस अवैध निर्माण के चलते नामदेव परिवार का जीना दूभर हो गया है। जबकि सूचना अधिकारी जोन क्रमांक 7 ने भी स्वीकार किया है कि निगम ने संजय जादवानी को केवल प्रथम तल के निर्माण की अनुमति दी है द्वितीय तल का निर्माण पूरी तरह अवैध है।
हालत यह है कि इस अवैध निर्माण से पीढित नामदेव परिवार ने मुख्यमंत्री तक को शिकायत की है लेकिन संजय की पहुंच के आगे सब बेकार हो रहा है और पीड़ित पक्ष अब न्यायालय की शरण में जाने मजबूर है। बहरहाल इस संबंध में मंत्री और कमिश्नर तक पैसा पहुंचाने की चर्चा है और यही स्थिति रही तो नए महापौर किरणमयी नायक पर भी उंगली उठ सकती है।
बुधवार, 9 जून 2010
बाबूलाल दमदार,लाचार है सरकार!
ऐसे फैसलों से ही ईमानदार होते हैं हताश
वैसे तो पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि आईएएस बाबूलाल अग्रवाल साफ बच निकलेंगे। अपनी दमदारी का लोहा मनवा चुके पूर्व कृषि सचिव बाबूलाल को जिस तरह से निलंबित करने में सरकार ने विलंब किया था उतनी ही जल्दी आनन फानन में बहाली का आदेश भी निकाल दिया। प्रदेश सरकार के इस निर्णय ने एक बार फिर ईमानदारों में हताशा पैदा हुई है वहीं बाबूलाल अग्रवाल की दमदारी भी सामने आई है।
कभी स्वास्थ्य सचिव रहे बाबूलाल अग्रवाल के कार्यकाल में हुए घपले की कहानी अभी लोग ठीक से भूले भी नहीं थे और उन पर होने वाली कार्रवाई से निगाह भी नहीं हटी थी कि उनकी बहाली आदेश ने आम लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि आखिर सरकार को हो क्या गया है। राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा अचानक सत्ता पाते ही कैसे बदल गई।
बाबूलाल अग्रवाल के निवास में जब आयकर विभाग ने छापे की कार्रवाई की तब देर है अंधेर नहीं का राग अलापने वाले भी सरकार के इस फैसले से हतप्रभ है। तब आयकर विभाग ने बाबूलाल अग्रवाल पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बनाया था दो-चार सौ करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति का दावा किया गया और कहा जाने लगा था कि बाबूलाल अग्रवाल का बच पाना आसा नहीं है। हालांकि अंदेशा तब भी था कि अपनी पहुंच और ताकत के बल पर राज करने वालों पर कार्रवाई आसान नहीं है।
इधर पता चला है कि उच्च स्तरीय राजनैतिक दबाव के चलते सरकार ने निर्णय लिया है इसके लिए मध्यप्रदेश में भाजपा विधायक ने भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा की थी और मुलाकात भी कराई थी। कहा जाता है कि सरकार पर भाजपा के ही राष्ट्रीय नेताओं का जबरदस्त दबाव था और इसके चलते ही यह तय माना जा रहा था कि बाबूलाल अग्रवाल की बहाली शीघ्र हो जाएगी। इधर सरकार के इस फैसले से आम आदमी में तीखी प्रतिक्रिया व्याप्त है और कहा जा रहा है कि इससे सरकार की छवि पर भी विपरित प्रभाव पड़ने वाला है।
गौरतलब है कि इस छापे में आयकर दस्ते ने श्री अग्रवाल व उनके परिजनों के यहां से 70 करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित संपत्ति का खुलासा किया था। 4 फरवरी से 7 मार्च तक आयकर दस्ते की जांच में पारिवारिक व्यवसाय में श्री अग्रवाल के निवेश के भी दस्तावेज जब्त किए थे। इससे उन पर अपनी आय से अधिक अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के भी आरोप लगाए थे। आयकर विभाग की फौरी रिपोर्ट के आधार पर राय शासन ने 12 फरवरी को एक आदेश जारी कर श्री अग्रवाल को निलंबित कर दिया था। इसके बाद से श्री अग्रवाल अपनी बहाली के लिए प्रयासरत थे। उनकी बहाली में छापे को लेकर आयकर विभाग की मुकम्मल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था। इस रिपोर्ट के लिए आयकर विभाग की लंबी जांच प्रक्रिया जारी थी। 90 दिनों के भीतर राय सरकार को आयकर रिपोर्ट के हवाले से श्री अग्रवाल को आरोप पत्र दिया जाना था। जो संभव नहीं हो पाया। इसे देखते हुए राय सरकार ने अपनी तरफ से (बिना आयकर रिपोर्ट के) जांच शुरु करते हुए श्री अग्रवाल से अघोषित व आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूछताछ की थी। इस पर श्री अग्रवाल ने मय दस्तावेज अपनी आय व चल अचल संपत्ति का ब्यौरा के साथ अपनी बहाली के लिए राय शासन को आवेदन भी प्रस्तुत किया था। जवाब के परीक्षण के बाद राय शासन ने गुरुवार को श्री अग्रवाल का निलंबन खत्म कर सेवा में बहाल कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक श्री अग्रवाल को राजस्व मंडल बिलासपुर में सदस्य नियुक्त किया गया है। इन्हें मिलाकर राजस्व मंडल में दो सदस्य हो गए हैं। श्री अग्रवाल के अलावा आर.सी. सिन्हा भी सदस्य है। बहरहाल अग्रवाल की बहाली ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल तो उठाये ही है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यह कदम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला होगा।
वैसे तो पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि आईएएस बाबूलाल अग्रवाल साफ बच निकलेंगे। अपनी दमदारी का लोहा मनवा चुके पूर्व कृषि सचिव बाबूलाल को जिस तरह से निलंबित करने में सरकार ने विलंब किया था उतनी ही जल्दी आनन फानन में बहाली का आदेश भी निकाल दिया। प्रदेश सरकार के इस निर्णय ने एक बार फिर ईमानदारों में हताशा पैदा हुई है वहीं बाबूलाल अग्रवाल की दमदारी भी सामने आई है।
कभी स्वास्थ्य सचिव रहे बाबूलाल अग्रवाल के कार्यकाल में हुए घपले की कहानी अभी लोग ठीक से भूले भी नहीं थे और उन पर होने वाली कार्रवाई से निगाह भी नहीं हटी थी कि उनकी बहाली आदेश ने आम लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि आखिर सरकार को हो क्या गया है। राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा अचानक सत्ता पाते ही कैसे बदल गई।
बाबूलाल अग्रवाल के निवास में जब आयकर विभाग ने छापे की कार्रवाई की तब देर है अंधेर नहीं का राग अलापने वाले भी सरकार के इस फैसले से हतप्रभ है। तब आयकर विभाग ने बाबूलाल अग्रवाल पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बनाया था दो-चार सौ करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति का दावा किया गया और कहा जाने लगा था कि बाबूलाल अग्रवाल का बच पाना आसा नहीं है। हालांकि अंदेशा तब भी था कि अपनी पहुंच और ताकत के बल पर राज करने वालों पर कार्रवाई आसान नहीं है।
इधर पता चला है कि उच्च स्तरीय राजनैतिक दबाव के चलते सरकार ने निर्णय लिया है इसके लिए मध्यप्रदेश में भाजपा विधायक ने भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा की थी और मुलाकात भी कराई थी। कहा जाता है कि सरकार पर भाजपा के ही राष्ट्रीय नेताओं का जबरदस्त दबाव था और इसके चलते ही यह तय माना जा रहा था कि बाबूलाल अग्रवाल की बहाली शीघ्र हो जाएगी। इधर सरकार के इस फैसले से आम आदमी में तीखी प्रतिक्रिया व्याप्त है और कहा जा रहा है कि इससे सरकार की छवि पर भी विपरित प्रभाव पड़ने वाला है।
गौरतलब है कि इस छापे में आयकर दस्ते ने श्री अग्रवाल व उनके परिजनों के यहां से 70 करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित संपत्ति का खुलासा किया था। 4 फरवरी से 7 मार्च तक आयकर दस्ते की जांच में पारिवारिक व्यवसाय में श्री अग्रवाल के निवेश के भी दस्तावेज जब्त किए थे। इससे उन पर अपनी आय से अधिक अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के भी आरोप लगाए थे। आयकर विभाग की फौरी रिपोर्ट के आधार पर राय शासन ने 12 फरवरी को एक आदेश जारी कर श्री अग्रवाल को निलंबित कर दिया था। इसके बाद से श्री अग्रवाल अपनी बहाली के लिए प्रयासरत थे। उनकी बहाली में छापे को लेकर आयकर विभाग की मुकम्मल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था। इस रिपोर्ट के लिए आयकर विभाग की लंबी जांच प्रक्रिया जारी थी। 90 दिनों के भीतर राय सरकार को आयकर रिपोर्ट के हवाले से श्री अग्रवाल को आरोप पत्र दिया जाना था। जो संभव नहीं हो पाया। इसे देखते हुए राय सरकार ने अपनी तरफ से (बिना आयकर रिपोर्ट के) जांच शुरु करते हुए श्री अग्रवाल से अघोषित व आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूछताछ की थी। इस पर श्री अग्रवाल ने मय दस्तावेज अपनी आय व चल अचल संपत्ति का ब्यौरा के साथ अपनी बहाली के लिए राय शासन को आवेदन भी प्रस्तुत किया था। जवाब के परीक्षण के बाद राय शासन ने गुरुवार को श्री अग्रवाल का निलंबन खत्म कर सेवा में बहाल कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक श्री अग्रवाल को राजस्व मंडल बिलासपुर में सदस्य नियुक्त किया गया है। इन्हें मिलाकर राजस्व मंडल में दो सदस्य हो गए हैं। श्री अग्रवाल के अलावा आर.सी. सिन्हा भी सदस्य है। बहरहाल अग्रवाल की बहाली ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल तो उठाये ही है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यह कदम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला होगा।
नक्सलियों से सिर्फ भरमार ,क्यों खेलती है सरकार!
नक्सलियों को बड़ा आतंकवादी मानने वाले प्रदेश के मुखिया ने क्या कभी यह सोचा है कि नक्सलियों से मुठभेड़ के बाद हथियार के नाम पर सिर्फ भरमार बंदूक ही क्यों बरामद होती है जबकि दूसरी तरफ नक्सलियों के अत्याधुनिक हथियार से लैस बताया जाता है। इसके पीछे सरकार और पुलिस की मंशा की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ इन दिनों नक्सली आतंकवाद की चपेट में है कभी सिर्फ पुलिस को निशाना बनाने वाले लोग अब आम लोगों की जान के पीछे पड़ गए है और यह सरकार की दिवालिया पन नहीं तो और क्या है कि मुखबीर के नाम पर आम लोगों की हत्या करने पर भी कभी यह नहीं कहा गया कि वे आम आदमी को कत्लेआम कर रहे हैं।
80 के दशक से छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या ने घर करना शुरु किया तब पूर्ववर्ती सरकारों ने इसे सामाजिक समस्या का हवाला देकर इसे नजरअंदाज किया धीरे-धीरे नक्सली ताकतवर होते गए और आज समूचे बस्तर में उनकी सकरार कही जाए तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी। इन सबके बीच सरकार और पुलिस की भूमिका भी कई मामले में संदेहास्पद रही है। सरकार और पुलिस ही दावा करती है कि नक्सली अत्याधुनिक हथियारों से लैस है लेकिन पिछले 5-6 सालों में नक्सली मुठभेड़ से बरामद हथियारों की पड़ताल करे तो कुछ एक मामले को छोड़कर कभी भी पुलिस ने मुठभेड़ के बाद आधुनिक हथियार बरामद करने की बात नहीं की।
इस संबंध में यह भी चर्चा है कि पुलिस जानबूझकर अपने पुराने स्टाक से भरमार बंदूक लाकर रख देती है और हथियार बरामद करने का दावा करती है। सूत्रों का दावा है कि यदि उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तो कई बातें सामने आएंगी। बहरहाल मुठभेड़ में सिर्फ भरमार बंदूकों की जब्ती को लेकर सवाल तो उठाए ही जा रहे है सरकार की भूमिका की भी जमकर आलोचना की जा रही है।
छत्तीसगढ़ इन दिनों नक्सली आतंकवाद की चपेट में है कभी सिर्फ पुलिस को निशाना बनाने वाले लोग अब आम लोगों की जान के पीछे पड़ गए है और यह सरकार की दिवालिया पन नहीं तो और क्या है कि मुखबीर के नाम पर आम लोगों की हत्या करने पर भी कभी यह नहीं कहा गया कि वे आम आदमी को कत्लेआम कर रहे हैं।
80 के दशक से छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या ने घर करना शुरु किया तब पूर्ववर्ती सरकारों ने इसे सामाजिक समस्या का हवाला देकर इसे नजरअंदाज किया धीरे-धीरे नक्सली ताकतवर होते गए और आज समूचे बस्तर में उनकी सकरार कही जाए तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी। इन सबके बीच सरकार और पुलिस की भूमिका भी कई मामले में संदेहास्पद रही है। सरकार और पुलिस ही दावा करती है कि नक्सली अत्याधुनिक हथियारों से लैस है लेकिन पिछले 5-6 सालों में नक्सली मुठभेड़ से बरामद हथियारों की पड़ताल करे तो कुछ एक मामले को छोड़कर कभी भी पुलिस ने मुठभेड़ के बाद आधुनिक हथियार बरामद करने की बात नहीं की।
इस संबंध में यह भी चर्चा है कि पुलिस जानबूझकर अपने पुराने स्टाक से भरमार बंदूक लाकर रख देती है और हथियार बरामद करने का दावा करती है। सूत्रों का दावा है कि यदि उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तो कई बातें सामने आएंगी। बहरहाल मुठभेड़ में सिर्फ भरमार बंदूकों की जब्ती को लेकर सवाल तो उठाए ही जा रहे है सरकार की भूमिका की भी जमकर आलोचना की जा रही है।
सोमवार, 7 जून 2010
न्याय-मंदिर को भी नहीं बख्शा!

घोटालों की कहानी चढी लोगों की जुबानी
प्रदेश के दमदार माने जाने वाले पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागीय अफसरों ने बिलासपुर हाईकोर्ट के भवन निर्माण में भी लागत मूल्य बढाकर उच्च स्तर पर जमकर कमीशनखोरी की। मंत्री के संरक्षण में हुए इस काम में न्याय मंदिर को भी नहीं बख्शे जाने की चर्चा आम लोगों के जुबान पर है और इसे अतिवादी बताया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ पीडब्ल्यूडी विभाग में चल रहे कमीशनखोरी की कहानी अब आम लोगों तक पहुंच गई है। घोटाले से लेकर कमीशनखोरी से बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट भवन भी नहीं बच पाया है कहा जाता है कि जिस तरह से न्यू सर्किट हाउस को बनाने में घपलेबाजी की गई लगभग वही तरीका यहां भी अपनाया गया और ठेकेदारों से मिलीभगत कर शासन को करोड़ों रुपए का चुना लगाया गया है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पीडब्ल्यूडी विभाग ने हाईकोर्ट भवन बनाने की लागत में लगातार वृध्दि होते रही और कहा जाता है कि लागत मूल्य बढ़ाने के पीछे सीधे-सीधे डकैती रही है। न्याय मंदिर के भवन निर्माण में हुए इस घपलेबाजी पर तो यहां तक कहा जाता है कि इस मामले में उच्चस्तरीय लेन-देन हुआ है और करोड़ों रुपए की इस घपलेबाजी की जांच हुई तो कई बड़े मगरमच्छ जेल की सलाखों में जाएंगे।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ पीडब्ल्यूडी में जब से नए मंत्री ने पदभार संभाला है तभी से कमीशनखोरी बढ़ गई है और चहेते अफसरों को पदोन्नति देकर अनापशनाप काम कराया जाने लगा है। बताया जाता है कि प्राय: हर निर्माण का लागत मूल्य बढ़ाकर उच्च स्तर पर ठेकेदारों से मिलीभगत कर लाखों करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं और इसी कड़ी में न्याय मंदिर के भवन निर्माण पर भी खूब जेबें गरम की गई है। बहरहाल न्याय मंदिर के निर्माण में हुए इस घपलेबाजी पर आम प्रतिक्रिया यह है कि राम को नहीं छोड़ने वाले लोगों से और क्या उम्मीद की जा सकती है।
शुक्रवार, 4 जून 2010
मंत्री को फटकार,अफसर को दुलार!
वेयर हाउसिंग का उमेश अग्रवाल हैं ताकतवर
अनुमति के विदेश यात्रा पर गए खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले को मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के द्वारा फटकार लगाए जाने के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि विदेश यात्रा के सूत्रधार उमेश अग्रवाल को शासन द्वारा कुछ भी नहीं किया गया जबकि सचिव विवेक ढांड से भी जवाब तलब किए जाने की खबर है।
छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग में अफसरों की भर्राशाही का इससे दूसरा उदाहरण और क्या होगा कि मुख्यमंत्री के द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद भी वेयर हाउसिंग के खर्चे पर विदेश यात्रा की गई। बताया जाता है कि विदेश यात्रा को लेकर मुख्यमंत्री ने न केवल खाद्य मंत्री बल्कि सचिव को भी फटकार लगाई है लेकिन उमेश अग्रवाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि उनकी मनमानी की ढेरों शिकायतों मुख्मयंत्री तक की जा चुकी है।
सदैव चर्चा में रहे राय शासन के अफसर उमेश अग्रवाल जिनके कारनामों से छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन के कर्मचारी त्रस्त है। बताया जाता है कि उक्त अफसर का संपूर्ण सेवा काल विवादित ही रहा है, निगम के इस गरिमापूर्ण पद पर आने से पहले वे रायपुर जनपद के सी.ओ.के. पद पर अपनी हठी मानसिकता के कारण इतने अधिक विवादित रहे कि जनपद के त्रस्त कर्मचारियों को सड़क पर अआकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। जिसके कारण शासन को मजबूरन इन्हें सी.ओ. पद से हटाना पड़ा था।
जिस छत्तीसगढ़ राय में मुख्यमंत्री गरीबों एवं मैदानी स्तर के कर्मचारियों के उत्थान के लिए प्रत्यनशील है उन्हीं के शासनकाल में राय की एकमात्र स्टोरेज एजेन्सी के कर्मचारी प्रताड़ना एवं भय के साम्राय में जीवन काट रहे हैं जिसकी वास्तविक तस्वीर समय-समय पर बुलंद छत्तीसगढ़ में प्रकाशित की है। सूत्रों के मुताबिक अफसर की मनमानी से आश्चर्य होता है कि शाखा रायगढ़ एवं शाखा जगदलपुर में भारी मात्रा मे ंचावल के बोरे कम पाए गए परन्तु शाखा रायगढ़ के शाखा प्रबंधक को रायगढ़ से हटाकर पुन: अन्य शाखा पर प्रबंधक पदस्थ किया गया एवं शाखा जगदलपुर के शाखा प्रबंधक पर प्रभावशाली सांसद के दबाव में उमेश अग्रवाल द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि इस वर्ष के अलावा पूर्व वर्ष भी उक्त प्रबंधक द्वारा लगभग 1100 बोरी की अफरातफरी की गई थी आज भी उसे जगदलपुर शाखा पर प्रबंधक बना कर रखा गया है। यह भी एक मिसाल है कि शाखा अम्बिकापुर के घोटालेबाज प्रबंधक को मात्र दिखावे के लिए कुछ समय के लिए शाखा दुर्ग अटैच किया गया एवं शीघ्र ही उसे शाखा खरोरा पर प्रबंधक की हैसियत से नवाजा गया। जबकि नियमानुसार इस तरह के अपराधिक कृत्य करने वाले कर्मचारी को शाखा प्रबंधक जैसे जिम्मेदार पद से हमेशा के लिए पृथक कर दिया जाता है।
निरंकुशता एवं मनमानी की इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी कि निगम के प्रबंध संचालक के पद पर विराजित उक्त अफसर ने 18 मई को निगम के जिला शाखा प्रबंधकों की बैठक में खुला ऐलान किया कि मैं इस निगम से अपनी इच्छा से जाऊंगा कोई मेरी इच्छा के बगैर मुझे नहीं हटा सकता है। जो कि परोक्ष रुप में शाखा को खुली चुनौती का दर्जा रखती है। शासन के इस अफसर ने नवपदस्थ एवं अनुभवहीन तकनीकि सहायकों को जिनकी परिवीक्षा अवधि समाप्त नहीं हुई है तथा निगम में मात्र 8 माह पूर्व ही पदस्थ हुए है को विभि शाखाओं पर शाखा प्रबंधक बना कर पूर्व में पदस्थ अनुभवी एवं वरिष्ठ कर्मचारियों को जो कि शाखा प्रबंधक की हैसियत से कार्य कर रहे थे उन्हें नवपदस्थ तकनीकि सहायकों के अधीनस्थ कार्य करने का गैर जिम्मेदाराना आदेश जारी कर दिया गया है।
जहां पूरे प्रदेश में समस्त शासकीय एवं निगम मंडल के कर्मचारियों को छठवां वेतन दिया जा चुका है एवं एरियस की द्वितीय किश्त देने की घोषणा की जा चुकी है वहीं सदैव लाभ देने वाले इस निगम के कर्मचारियों को पुनरीक्षित वेतनमान का आदेश जारी करने के बाद भी नए वेतनमान से आज तक वेतन नही दिया गया है। प्रश्न यह उठता है कि निगम के प्रबंध संचालक के ऐसे कई मनमानीपूर्ण एवं तुगलकी रवैये को क्या शासन अंकुश लगा पाएगा। या राय के जिम्मेदार अफसरों को शासन ने मनमानी करने की खुली छूट एवं अभयदान दिया है। क्या ऐसे अफसरों के माध्यम से शासन की छवि विश्वसनीय एवं साफ-सुथरी रह सकती है। बहरहाल उमेश अग्रवाल को एक मंत्री का रिश्तेदार बताया जाता है और सिर्फ यही वजह से कार्रवाई नहीं होने को लेकर कर्मचारियों में रोष व्याप्त है।
अनुमति के विदेश यात्रा पर गए खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले को मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के द्वारा फटकार लगाए जाने के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि विदेश यात्रा के सूत्रधार उमेश अग्रवाल को शासन द्वारा कुछ भी नहीं किया गया जबकि सचिव विवेक ढांड से भी जवाब तलब किए जाने की खबर है।
छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग में अफसरों की भर्राशाही का इससे दूसरा उदाहरण और क्या होगा कि मुख्यमंत्री के द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद भी वेयर हाउसिंग के खर्चे पर विदेश यात्रा की गई। बताया जाता है कि विदेश यात्रा को लेकर मुख्यमंत्री ने न केवल खाद्य मंत्री बल्कि सचिव को भी फटकार लगाई है लेकिन उमेश अग्रवाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि उनकी मनमानी की ढेरों शिकायतों मुख्मयंत्री तक की जा चुकी है।
सदैव चर्चा में रहे राय शासन के अफसर उमेश अग्रवाल जिनके कारनामों से छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन के कर्मचारी त्रस्त है। बताया जाता है कि उक्त अफसर का संपूर्ण सेवा काल विवादित ही रहा है, निगम के इस गरिमापूर्ण पद पर आने से पहले वे रायपुर जनपद के सी.ओ.के. पद पर अपनी हठी मानसिकता के कारण इतने अधिक विवादित रहे कि जनपद के त्रस्त कर्मचारियों को सड़क पर अआकर विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। जिसके कारण शासन को मजबूरन इन्हें सी.ओ. पद से हटाना पड़ा था।
जिस छत्तीसगढ़ राय में मुख्यमंत्री गरीबों एवं मैदानी स्तर के कर्मचारियों के उत्थान के लिए प्रत्यनशील है उन्हीं के शासनकाल में राय की एकमात्र स्टोरेज एजेन्सी के कर्मचारी प्रताड़ना एवं भय के साम्राय में जीवन काट रहे हैं जिसकी वास्तविक तस्वीर समय-समय पर बुलंद छत्तीसगढ़ में प्रकाशित की है। सूत्रों के मुताबिक अफसर की मनमानी से आश्चर्य होता है कि शाखा रायगढ़ एवं शाखा जगदलपुर में भारी मात्रा मे ंचावल के बोरे कम पाए गए परन्तु शाखा रायगढ़ के शाखा प्रबंधक को रायगढ़ से हटाकर पुन: अन्य शाखा पर प्रबंधक पदस्थ किया गया एवं शाखा जगदलपुर के शाखा प्रबंधक पर प्रभावशाली सांसद के दबाव में उमेश अग्रवाल द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई जबकि इस वर्ष के अलावा पूर्व वर्ष भी उक्त प्रबंधक द्वारा लगभग 1100 बोरी की अफरातफरी की गई थी आज भी उसे जगदलपुर शाखा पर प्रबंधक बना कर रखा गया है। यह भी एक मिसाल है कि शाखा अम्बिकापुर के घोटालेबाज प्रबंधक को मात्र दिखावे के लिए कुछ समय के लिए शाखा दुर्ग अटैच किया गया एवं शीघ्र ही उसे शाखा खरोरा पर प्रबंधक की हैसियत से नवाजा गया। जबकि नियमानुसार इस तरह के अपराधिक कृत्य करने वाले कर्मचारी को शाखा प्रबंधक जैसे जिम्मेदार पद से हमेशा के लिए पृथक कर दिया जाता है।
निरंकुशता एवं मनमानी की इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी कि निगम के प्रबंध संचालक के पद पर विराजित उक्त अफसर ने 18 मई को निगम के जिला शाखा प्रबंधकों की बैठक में खुला ऐलान किया कि मैं इस निगम से अपनी इच्छा से जाऊंगा कोई मेरी इच्छा के बगैर मुझे नहीं हटा सकता है। जो कि परोक्ष रुप में शाखा को खुली चुनौती का दर्जा रखती है। शासन के इस अफसर ने नवपदस्थ एवं अनुभवहीन तकनीकि सहायकों को जिनकी परिवीक्षा अवधि समाप्त नहीं हुई है तथा निगम में मात्र 8 माह पूर्व ही पदस्थ हुए है को विभि शाखाओं पर शाखा प्रबंधक बना कर पूर्व में पदस्थ अनुभवी एवं वरिष्ठ कर्मचारियों को जो कि शाखा प्रबंधक की हैसियत से कार्य कर रहे थे उन्हें नवपदस्थ तकनीकि सहायकों के अधीनस्थ कार्य करने का गैर जिम्मेदाराना आदेश जारी कर दिया गया है।
जहां पूरे प्रदेश में समस्त शासकीय एवं निगम मंडल के कर्मचारियों को छठवां वेतन दिया जा चुका है एवं एरियस की द्वितीय किश्त देने की घोषणा की जा चुकी है वहीं सदैव लाभ देने वाले इस निगम के कर्मचारियों को पुनरीक्षित वेतनमान का आदेश जारी करने के बाद भी नए वेतनमान से आज तक वेतन नही दिया गया है। प्रश्न यह उठता है कि निगम के प्रबंध संचालक के ऐसे कई मनमानीपूर्ण एवं तुगलकी रवैये को क्या शासन अंकुश लगा पाएगा। या राय के जिम्मेदार अफसरों को शासन ने मनमानी करने की खुली छूट एवं अभयदान दिया है। क्या ऐसे अफसरों के माध्यम से शासन की छवि विश्वसनीय एवं साफ-सुथरी रह सकती है। बहरहाल उमेश अग्रवाल को एक मंत्री का रिश्तेदार बताया जाता है और सिर्फ यही वजह से कार्रवाई नहीं होने को लेकर कर्मचारियों में रोष व्याप्त है।
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