तालाब पर हुआ है अतिक्रमण
छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों की करतूतें थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री पानी बचाने आंदोलन का आगुआ बने हैं दूसरी तरफ उन्हीं के मंत्री तालाब पाटने वाले को बचा रहे हैं। मामला सरजूबांधा तालाब पाटने का है। इस पर हुए अतिक्रमण को तोड़ने का आदेश तक हो गया है लेकिन अतिक्रमणकारी नवल किशोर अग्रवाल की पहुंच दमदार मंत्री तक है इसलिए निगम भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक लोहार चौक निवासी नवल किशोर अग्रवाल के द्वारा टिकरापारा स्थित सरयूबांधा तालाब में कब्जा किया है। इनके द्वारा यहां किए लम्बे चौड़े कब्जे में प्रिटिंग प्रेस चलाने की भी खबर है। बताया जाता है कि जब इसकी खबर पार्षद सतनाम सिंह को हुई और लोगों ने पार्षद से शिकायत करते हुए कार्रवाई की मांग की तो पार्षद ने इसकी शिकायत निगम आयुक्त से की।
इधर इस मामले में जोन 6 के तत्कालीन कमिश्नर ने 1 जून 2010 को पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर नवल किशोर अग्रवाल के कब्जे को हटाने पुलिस बल की मांग की। बताया जाता है कि जैसे ही अतिक्रमण हटाने की जानकारी नवल किशोर अग्रवाल को हुई उन्होंने दमदार मंत्री से एप्रोच किया और बताया जाता है कि दमदार मंत्री ने न केवल जोन कमिश्नर को हड़काया बल्कि पुलिस को भी फोन कर बल नहीं उपलब्ध कराने कह दिया।
इधर विभागीय मंत्री से भी नवलकिशोर अग्रवाल के संबंध की चर्चा है और लेन देन की चर्चा के बीच यह भी चर्चा है कि निगम ने अब इस अतिक्रमण को हटाने से पल्ला झाड़ लिया है। बताया जाता है कि इस मामले को लेकर टिकरापारा में जबरदस्त आक्रोश है। एक तरफ प्रदेश के मुखिया पानी बचाने की नाटकबाजी में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं शिवनाथ नदी का इंजीनियर की तरह हवाई सर्वेक्षण में लाखों रुपए फूंके जा रहे हैं और दूसरी तरफ राजधानी में तालाब पाटने में मंत्रियों की रूचि है। ज्ञात हो कि आमापारा स्थित कारी तााब को भी इसी दमदार मंत्री की वजह से पाटा जा रहा है जबकि तेलीबांधा से लेकर पुरानीबस्ती के तालाबों पर अतिक्रमण की अपनी कहानी है।
बहरहाल सरयूबांधा तालाब के कब्जे हटाने का मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय है। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री पानी बचाने के लिए भाषणबाजी बंद कर अपने मंत्रियों की करतूतों पर लगाम लगाए तो राजधानी के कई तालाब व बगीचे बच सकते हैं।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
गणित वालों को भी कम्पाउण्डर बना दिया
बाबूलाल अग्रवाल जब सचिव थे
जब बाबूलाल अग्रवाल स्वास्थ्य सचिव थे उन दिनों सीएमओ रही डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल में हुई घपलेबाजी परत दर परत खुलने लगे हैं। पैसा लेकर ऐसे 10 लोगों को कम्पाउण्डर बना दिया जो गणित संकाय के थे। जबकि विज्ञापन में बायो संकाय मांगा गया था।
आम लोगों के जीवन की देखरेख के लिए बने स्वास्थ्य विभाग में रमन सरकार की क्या मंशा रही है यह साफ तौर पर यहां हुई घपलेबाजी की परतें खुलने से सामने आने लगी है। स्वास्थ्य जैसे गंभीर विभाग में यह घपलेबाजी तब हुई जब वे व्यक्ति स्वास्थ्य सचिव थे जिन्हें सरकार ने आयकर विभाग के छापे के बाद बहाली में एक मिनट की भी देर नहीं की।
इस बार जो मामला सामने आया है वह विभाग द्वारा कम्पाउण्डर (फार्मेसिस्ट) के पदों पर भर्ती का है। वैसे तो यहां संविदा नियुक्ति से लेकर अनुकम्पा नियुक्तियां तक पैसे लिए बिना नहीं की जाती। बताया जाता है कि जब डॉ. किरण मल्होत्रा सीएमओ थी तब फार्मेसिस्ट में भर्ती का विज्ञापन निकाला गया था। विज्ञापन में जो शर्ते थी उसके मुताबिक बायोलॉजी के विद्यार्थी ही इसके लिए पात्र हो सकते थे लेकिन कहा जा रहा है कि जब नियुक्तियां दी गई तो 10 ऐसे लोगों को नौकरी दी गई जो गणित संकाय से थे। मामले की तब शिकायत भी हुई लेकिन उच्चस्तरीय लेन-देन कर मामला दबा लिया गया। एक बार यह मामला फिर खुलने लगा है और शीघ्र ही जांच कमेटी बनाए जाने की चर्चा है।
वैसे कर्मचारियों का कहना है कि यदि यहां की जांच करानी है तो उच्च स्तरीय कमेटी बनानी चाहिए जो सचिव बाबूलाल अग्रवाल और डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल की जांच करें। कर्मचारियों का दावा है कि यदि इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की जांच हुई तो कई लोग जेल के सलाखों के पीछे जाएंगे। शायद यही वजह है कि हर बार जांच की मांग तो होती है लेकिन पूरे मामले को दबा दिया जाता है। बहरहाल स्वास्थ्य विभाग के घपले परत दर परत खुलते जा रहे हैं और सरकार की इस ओर अनदेखी को लेकर आम लोगों में बेहद तीखी प्रतिक्रिया है।
जब बाबूलाल अग्रवाल स्वास्थ्य सचिव थे उन दिनों सीएमओ रही डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल में हुई घपलेबाजी परत दर परत खुलने लगे हैं। पैसा लेकर ऐसे 10 लोगों को कम्पाउण्डर बना दिया जो गणित संकाय के थे। जबकि विज्ञापन में बायो संकाय मांगा गया था।
आम लोगों के जीवन की देखरेख के लिए बने स्वास्थ्य विभाग में रमन सरकार की क्या मंशा रही है यह साफ तौर पर यहां हुई घपलेबाजी की परतें खुलने से सामने आने लगी है। स्वास्थ्य जैसे गंभीर विभाग में यह घपलेबाजी तब हुई जब वे व्यक्ति स्वास्थ्य सचिव थे जिन्हें सरकार ने आयकर विभाग के छापे के बाद बहाली में एक मिनट की भी देर नहीं की।
इस बार जो मामला सामने आया है वह विभाग द्वारा कम्पाउण्डर (फार्मेसिस्ट) के पदों पर भर्ती का है। वैसे तो यहां संविदा नियुक्ति से लेकर अनुकम्पा नियुक्तियां तक पैसे लिए बिना नहीं की जाती। बताया जाता है कि जब डॉ. किरण मल्होत्रा सीएमओ थी तब फार्मेसिस्ट में भर्ती का विज्ञापन निकाला गया था। विज्ञापन में जो शर्ते थी उसके मुताबिक बायोलॉजी के विद्यार्थी ही इसके लिए पात्र हो सकते थे लेकिन कहा जा रहा है कि जब नियुक्तियां दी गई तो 10 ऐसे लोगों को नौकरी दी गई जो गणित संकाय से थे। मामले की तब शिकायत भी हुई लेकिन उच्चस्तरीय लेन-देन कर मामला दबा लिया गया। एक बार यह मामला फिर खुलने लगा है और शीघ्र ही जांच कमेटी बनाए जाने की चर्चा है।
वैसे कर्मचारियों का कहना है कि यदि यहां की जांच करानी है तो उच्च स्तरीय कमेटी बनानी चाहिए जो सचिव बाबूलाल अग्रवाल और डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल की जांच करें। कर्मचारियों का दावा है कि यदि इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की जांच हुई तो कई लोग जेल के सलाखों के पीछे जाएंगे। शायद यही वजह है कि हर बार जांच की मांग तो होती है लेकिन पूरे मामले को दबा दिया जाता है। बहरहाल स्वास्थ्य विभाग के घपले परत दर परत खुलते जा रहे हैं और सरकार की इस ओर अनदेखी को लेकर आम लोगों में बेहद तीखी प्रतिक्रिया है।
बुधवार, 28 जुलाई 2010
सजायाफ्ता को बर्खास्त करने की बजाय बहाल कर दिया

ऐसी दमदारी तो सिर्फ
बृजमोहन के विभाग में ही
ऐसी दमदारी तो प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग में ही हो सकती है। जिस व्यक्ति को घूस लेने के आरोप में सजा सुनाई गई हो उसे बर्खास्त करने की बजाय शिक्षा विभाग ने बहाल कर दिया और अब जब मामला मुख्यमंत्री के जिले का हो तो क्या कहना।
मामला जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कवर्धा में रहे नेतराम वर्मा का है। नेतराम वर्मा को एंटी करप्शन ब्यूरो ने 31 जुलाई 2001 को दो हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। नेतराम वर्मा ने नरेन्द्र कुमार मिश्रा को पदोन्नति देने पैसे की मांग की थी।
इस मामले में 21 जुलाई 2008 को कवर्धा के विशेष न्यायाधीश ने नेतराम वर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अलग-अलग घटनाओं के तहत दोषी पाते हुए क्रमश: 6 माह और एक साल के सश्रम कारावास और दस हजार रुपए की सजा सुनाई थी। यह सजा साथ-साथ चलना था। सजा के बाद एंटी करप्शन ब्यूरों ने शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर नेतराम वर्मा को बर्खास्त करने की गुजारिश की।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि शिक्षा विभाग ने इस घूसखोर अधिकारी को बर्खास्त करने की बजाय इन्हें कोरिया जिले में प्राचार्य बना दिया। इस संबंध में जब संचालक लोक शिक्षण संचालनालय के.आर. पिस्दा से बात की तो उन्होंने कहा कि उनकी बहाली का निर्णय शासन स्तर पर किया गया है। इस संबंध में जब पतासाजी की तो विभाग में उच्च स्तर पर लेन-देन की चर्चा सामने आई और मंत्री पर भी आरोप लगाए गए।
दुनिया में अपनी तरह का मिसाल कायम करने वाले इस कारनामें से शिक्षा जैसे पवित्र संस्थानों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस मामले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
मत्स्य में भी चम्पू की चौधराहट

हाईकोर्ट द्वारा खारिज करने के बाद भी पदोन्नति दी जा रही
यह सरकार की मनमानी है या विभागीय मंत्री चन्द्रशेखर साहू का दंभ यह तो आम लोग ही जाने लेकिन कलेक्टर से लेकर संचालक तक ने जिन्हें अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया और हाईकोर्ट ने संविलियन की याचिका खारिज कर दी इन लोगों को न केवल परमानेंट नौकरी दी जा रही है बल्कि उन्हें प्रमोशन देने की तैयारी भी की जा रही है।
मामला मछली पालन विभाग का है। इस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की कहानी तो अलग ही है लेकिन जिस तरह से उच्च स्तर पर यहां मनमानी चल रही है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आश्चर्य का विषय तो यह है कि यहां चल रहे मनमानी को कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। बताया जाता है कि यहां एजेंसी के कर्मचारियों को जिस तरह से संविलियन किया गया वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।
सूत्रों के मुताबिक बी.के. शुक्ला और एम.डी. त्रिपाठी एजेंसी में मत्स्य पालन प्रसार कर्मचारी के रूप में पहले पदस्थ थे। इसके बाद जब एजेंसी बंद हुई तो इन्हें विभाग में संविदा कर्मी के रूप में रख लिया गया। इसके बाद इनका संविलियन का प्रयास हुआ और उच्च स्तर पर लेन-देन कर संविलियन कर दिया गया।
बताया जाता है कि लोकसेवा आयोग के द्वारा चयन के समय जब इन दोनों कर्मचारियों के नाम सामने आये तो कलेक्टर ने अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया चूंकि तब एजेंसी का चेयरमेन कलेक्टर होता है इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र के अभाव में इनका चयन नहीं होना था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक शुक्ला-त्रिपाठी की जोड़ी ने तब तत्कालीन संचालक एस.एन. चटर्जी से सांठ-गांठ कर अनुभव प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और इस मामले में बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चा है।
चूंकि एजेंसी के कर्मचारी मत्स्य विभाग का कर्मचारी नहीं हो सकता इसलिए संविलियन का मामला हाईकोर्ट चला गया और हाईकोर्ट ने 2242005 के द्वारा शुक्ला त्रिपाठी के संविलियन संबंधी मामला खारिज कर दिया। लेकिन इस मामले को छिपा दिया गया और इन्हें जानबूझकर शासन के कर्मचारियों को मिलने वाला समस्त लाभ दिया गया। इधर इतने लफड़े के बाद भी इन दोनों को पदोन्नति देने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि इस मामले में कृषि मंत्री की रूचि से रायपुर ही नहीं राजनांदगांव में भी जबरदस्त चर्चा है।
हमारे राजनांदगांव संवाददाता के मुताबिक एजेंसी के कर्मचारियों की संविलियन और पदोन्नति के मामले को लेकर यहां जबरदस्त चर्चा है और बताया जाता है कि कृषि मंत्री ने इन दोनों कर्मचारियों की शिकायत पर खामोशी ओढ़ ली है। बहरहाल मछली पालन विभाग में चल रहे इस घपले बाजी में मंत्री चन्द्रशेखर साहू का नाम सामने आने से जबरदस्त हड़कम्प है और आने वाले विधानसभा में भी यह मामला रंग ला सकता है।
यह सरकार की मनमानी है या विभागीय मंत्री चन्द्रशेखर साहू का दंभ यह तो आम लोग ही जाने लेकिन कलेक्टर से लेकर संचालक तक ने जिन्हें अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया और हाईकोर्ट ने संविलियन की याचिका खारिज कर दी इन लोगों को न केवल परमानेंट नौकरी दी जा रही है बल्कि उन्हें प्रमोशन देने की तैयारी भी की जा रही है।
मामला मछली पालन विभाग का है। इस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की कहानी तो अलग ही है लेकिन जिस तरह से उच्च स्तर पर यहां मनमानी चल रही है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आश्चर्य का विषय तो यह है कि यहां चल रहे मनमानी को कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। बताया जाता है कि यहां एजेंसी के कर्मचारियों को जिस तरह से संविलियन किया गया वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।
सूत्रों के मुताबिक बी.के. शुक्ला और एम.डी. त्रिपाठी एजेंसी में मत्स्य पालन प्रसार कर्मचारी के रूप में पहले पदस्थ थे। इसके बाद जब एजेंसी बंद हुई तो इन्हें विभाग में संविदा कर्मी के रूप में रख लिया गया। इसके बाद इनका संविलियन का प्रयास हुआ और उच्च स्तर पर लेन-देन कर संविलियन कर दिया गया।
बताया जाता है कि लोकसेवा आयोग के द्वारा चयन के समय जब इन दोनों कर्मचारियों के नाम सामने आये तो कलेक्टर ने अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया चूंकि तब एजेंसी का चेयरमेन कलेक्टर होता है इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र के अभाव में इनका चयन नहीं होना था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक शुक्ला-त्रिपाठी की जोड़ी ने तब तत्कालीन संचालक एस.एन. चटर्जी से सांठ-गांठ कर अनुभव प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और इस मामले में बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चा है।
चूंकि एजेंसी के कर्मचारी मत्स्य विभाग का कर्मचारी नहीं हो सकता इसलिए संविलियन का मामला हाईकोर्ट चला गया और हाईकोर्ट ने 2242005 के द्वारा शुक्ला त्रिपाठी के संविलियन संबंधी मामला खारिज कर दिया। लेकिन इस मामले को छिपा दिया गया और इन्हें जानबूझकर शासन के कर्मचारियों को मिलने वाला समस्त लाभ दिया गया। इधर इतने लफड़े के बाद भी इन दोनों को पदोन्नति देने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि इस मामले में कृषि मंत्री की रूचि से रायपुर ही नहीं राजनांदगांव में भी जबरदस्त चर्चा है।
हमारे राजनांदगांव संवाददाता के मुताबिक एजेंसी के कर्मचारियों की संविलियन और पदोन्नति के मामले को लेकर यहां जबरदस्त चर्चा है और बताया जाता है कि कृषि मंत्री ने इन दोनों कर्मचारियों की शिकायत पर खामोशी ओढ़ ली है। बहरहाल मछली पालन विभाग में चल रहे इस घपले बाजी में मंत्री चन्द्रशेखर साहू का नाम सामने आने से जबरदस्त हड़कम्प है और आने वाले विधानसभा में भी यह मामला रंग ला सकता है।
सोमवार, 26 जुलाई 2010
आदमखोर की राह
राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी वास्तव में महात्मा थे। तभी तो उनकी कही बात आज भी प्रासंगिक है। गांधी की जय जयकर अब भी होती है और होती रहेगी लेकिन उन्हें मानने वाले भी उनकी बातों पर एक फीसदी भी नहीं चलते ।
देश के लिए लंगोट में निकलकर उन्होंने भारतीयता की पहचान विश्व स्तर पर बनाई थी उनके कार्यो का लोहा आज भी उनके विरोधी मानते है। गांधी के देश में गांधी अनुयायी इस तरह हो जायेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनता की गाढ़ी कमाई को मिल बैठकर खाने की रणनीति की शुरूआत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब देश सेवा का दावा करने वाले सांसद-विधायकों ने अपने लिए वेतन-भत्तों के लिए कानून बना लिया।
पता नहीं इन्हें वेतन देने की सोच के पीछे कौन लोग थे लेकिन मेरा दावा है कि इसके पीछे वेतन भोगी कर्मचारी-अधिकारी जरूर रहे होंगे जिन्हें डर था कि यदि शेर को मानव खून नहीं मिलेगा तो वह आदम खोर नहीं बन सकेगा और जब नेता को वेतन की बीमारी लग जायेगी तो वह पैसों के पीछे भागेगा और नौकरशाह की राह आसान हो जायेगी। यही वजह है कि अब भी लोग अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की तारीफ करते नहीं थकते।
सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों को जो वेतन दिया जाता है उसे समझना जरूरी है। दरअसल शासन के पास पैसा आने के मोटे तौर पर दो ही साधन है। पहला साधन संपदा से और दूसरा साधन है आम लोगों पर लगाया जाने वाला टैक्स। इन्ही राशि से वेतन दिये जाते हैं।
एक गरीब से गरीब आदमी भी टैक्स देता है और इसे किस तरह से हमारे रक्षक दुरूपयोग कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। नेताओं को जनप्रतिनिधि कहना ही बेमानी है क्योंकि वह चुनाव जरूर जीतता है लेकिन उसे उसके काम के बदले वेतन दी जाती है और वेतन लेने वाला मालिक नहीं नौकर होता है और लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि वेतन लेने वाला नौकर तय करता है कि मालिक किस तरह से जिन्दगी जिए। यह तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। आम आदमी यह सोचकर विधायक-सांसद बनाते है कि ये लोग उनका स्तर सुधारेंगे लेकिन आजादी के 60 साल बाद भी लोगों को न पीने का पानी उपलब्ध है न चिकित्सा या शिक्षा सुविधा ही उपलब्ध है।
वेतन भोगी नेताओं-अधिकारियों का रहन-सहन आम आदमी से ऊचा होता जा रहा है और जो लोग अपना पेट काटकर इन्हें काम पर रखा है वे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। क्या यह हमारे सांसदों-विधायकों का दायित्व है कि संसद में बैठकर वे चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर केवल अपने हितों का कानून बनाये और जनता को प्रताड़ित करें।
हमारी लड़ाई इस व्यवस्था को बदलने की है हम चाहते हैं कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले वेतन व पेंशन से परहेज करें और जिस दिन जनप्रतिनिधि ऐसा कर पायेंगे वे भ्रष्टाचार को रोक लेंगे तब अकेले वेतन पाने वालों से वे काम ले सकेंगे अन्यथा मिल बांटकर खाने की रणनीति में आदमखोर होती व्यवस्था में रोज नए आदमखोर शेर पैदा होंगे जो अपनी भूख ही मिटाएगा। जनता जाये भाड़ में।
देश के लिए लंगोट में निकलकर उन्होंने भारतीयता की पहचान विश्व स्तर पर बनाई थी उनके कार्यो का लोहा आज भी उनके विरोधी मानते है। गांधी के देश में गांधी अनुयायी इस तरह हो जायेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनता की गाढ़ी कमाई को मिल बैठकर खाने की रणनीति की शुरूआत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब देश सेवा का दावा करने वाले सांसद-विधायकों ने अपने लिए वेतन-भत्तों के लिए कानून बना लिया।
पता नहीं इन्हें वेतन देने की सोच के पीछे कौन लोग थे लेकिन मेरा दावा है कि इसके पीछे वेतन भोगी कर्मचारी-अधिकारी जरूर रहे होंगे जिन्हें डर था कि यदि शेर को मानव खून नहीं मिलेगा तो वह आदम खोर नहीं बन सकेगा और जब नेता को वेतन की बीमारी लग जायेगी तो वह पैसों के पीछे भागेगा और नौकरशाह की राह आसान हो जायेगी। यही वजह है कि अब भी लोग अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की तारीफ करते नहीं थकते।
सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों को जो वेतन दिया जाता है उसे समझना जरूरी है। दरअसल शासन के पास पैसा आने के मोटे तौर पर दो ही साधन है। पहला साधन संपदा से और दूसरा साधन है आम लोगों पर लगाया जाने वाला टैक्स। इन्ही राशि से वेतन दिये जाते हैं।
एक गरीब से गरीब आदमी भी टैक्स देता है और इसे किस तरह से हमारे रक्षक दुरूपयोग कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। नेताओं को जनप्रतिनिधि कहना ही बेमानी है क्योंकि वह चुनाव जरूर जीतता है लेकिन उसे उसके काम के बदले वेतन दी जाती है और वेतन लेने वाला मालिक नहीं नौकर होता है और लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि वेतन लेने वाला नौकर तय करता है कि मालिक किस तरह से जिन्दगी जिए। यह तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। आम आदमी यह सोचकर विधायक-सांसद बनाते है कि ये लोग उनका स्तर सुधारेंगे लेकिन आजादी के 60 साल बाद भी लोगों को न पीने का पानी उपलब्ध है न चिकित्सा या शिक्षा सुविधा ही उपलब्ध है।
वेतन भोगी नेताओं-अधिकारियों का रहन-सहन आम आदमी से ऊचा होता जा रहा है और जो लोग अपना पेट काटकर इन्हें काम पर रखा है वे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। क्या यह हमारे सांसदों-विधायकों का दायित्व है कि संसद में बैठकर वे चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर केवल अपने हितों का कानून बनाये और जनता को प्रताड़ित करें।
हमारी लड़ाई इस व्यवस्था को बदलने की है हम चाहते हैं कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले वेतन व पेंशन से परहेज करें और जिस दिन जनप्रतिनिधि ऐसा कर पायेंगे वे भ्रष्टाचार को रोक लेंगे तब अकेले वेतन पाने वालों से वे काम ले सकेंगे अन्यथा मिल बांटकर खाने की रणनीति में आदमखोर होती व्यवस्था में रोज नए आदमखोर शेर पैदा होंगे जो अपनी भूख ही मिटाएगा। जनता जाये भाड़ में।
रविवार, 25 जुलाई 2010
लो खुद ही देख लो। रोम का जलना और नीरों का बांसुरी बजाना...
यह किस्सा बहुतों ने कईयों बार सुना होगा कि जब रोम जल रहा था तब नीरों जी चैन की बांसुरी बजा रहे थे। यह किस्सा फिर दोहराई जा रही है और छत्तीसगढ़ की राजधानी में यही सब हो रहा है। सफाई नहीं पानी नहीं बिजली नहीं और उपर से अधिकारियों के थोक में तबादले और एक तरफा कार्यभार छोड़ने के आदेश देकर बांसुरी बजाने मुरख विदेश चला गया। इन्होंने टिकरापारा से लेकर अवैध कालोनी में भी आग लगाई दवा बाजार भी इसकी आग से झुलस रहा है।
क्या मुरख को बांसुरी बजाने विदेश जाना जरूरी था जबकि बिरजू की बांसुरी का बेसुरा राग क्या कम पड़ गया था। बिरजू की बांसुरी के सुर में तो वैसे भी कांग्रेसी नाच रहे हैं। वे इस राग से इतने मतहोश है कि इस राग की कर्कशता इन्हें सुनाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी बिरजू को बांसुरी बजाने में महारत हासिल है। भाव मंगिमा ऐसी कि कोई भी तारीफ कर ले और जब बांसुरी से नगदी भी निकले तो कान में कर्कशता कहां सुनाई पड़ने वाली है।
महापौर किरणमयी नायक खुश थी कि मुरख-बिरजू की बांसुरी के प्रभावशाली तान के बाद भी वह चुनाव जीत गई लेकिन पंद्रह दिन में ही उन्हें पता चल गया कि बिरजू की बांसुरी का प्रभाव कांग्रेसियों पर किस कदर हावी है। अभी सभापति के हार से महापौर उबर भी नहीं पाई थी कि सामान्य सभा की बैठक, निगम अधिकारियों की ड्रामेबाजी से वे दुखी हो गई। आदमी जब कुछ अच्छा करना चाहे और उस पर बेवजह अंड़गा हो तो दुखी होना स्वाभाविक है।
एक तो निगम के पास वैसे ही फंड की कमी है तभी तो तात्यापारा से लेकर शारदा चौक के चौड़ीकरण का काम रुका हुआ है। ऐसे में सरकार पर जब कांग्रेसी महापौर वाले निगमों के लिए फंड नहीं देने के आरोपोें के साथ अधिकारियों के सहयोग नहीं करने का आरोप हो तो मामला गंभीर हो जाता है। राजधानीवासियों को पहले ही कौन सा सुख दे दिया है सरकार ने जो अब नए ड्रामेबाजी व राजनीति की जा रही है। गंदगी और बजबजाती नालियों से वैसे ही त्रस्त है लोग। पीने का पानी तक ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। निगम के कांक्रीट बिछाने वाली नीति ने यहां के पर्यावरण को पहले ही प्रदूषित कर दिया है अप्रैल में 45 का ताप भुगतना पड़ रहा है। बरसात में सड़कों-गलियों तक पानी भर जा रहा है। उल्टी दस्त जैसे मौसमी बीमारियां भुगतनी पड़ती है। क्या इसे शहर का जलना नहीं कहा जा सकता और ऐसे में जिम्मेदार लोग घुमने फिरने निकल जाए और अपना राग अलापे तो सम्राट नीरो की यादें ही ताज होगी।
भाजपा कांग्रेस बेशक राजनीति करें लेकिन अंधेरगर्दी न मचाये। शांत जनता को न कुरेदे। क्योंकि अब वो जमाना नहीं है कि नीरों चैन से बंशी बजा ले क्योंकि अब जनता भी पहले जैसी नहीं है वह बांसुरी बजाने वाले की बांसुरी तोड़ने की बजाय बजाने वाले को ही बजा देगी।
क्या मुरख को बांसुरी बजाने विदेश जाना जरूरी था जबकि बिरजू की बांसुरी का बेसुरा राग क्या कम पड़ गया था। बिरजू की बांसुरी के सुर में तो वैसे भी कांग्रेसी नाच रहे हैं। वे इस राग से इतने मतहोश है कि इस राग की कर्कशता इन्हें सुनाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी बिरजू को बांसुरी बजाने में महारत हासिल है। भाव मंगिमा ऐसी कि कोई भी तारीफ कर ले और जब बांसुरी से नगदी भी निकले तो कान में कर्कशता कहां सुनाई पड़ने वाली है।
महापौर किरणमयी नायक खुश थी कि मुरख-बिरजू की बांसुरी के प्रभावशाली तान के बाद भी वह चुनाव जीत गई लेकिन पंद्रह दिन में ही उन्हें पता चल गया कि बिरजू की बांसुरी का प्रभाव कांग्रेसियों पर किस कदर हावी है। अभी सभापति के हार से महापौर उबर भी नहीं पाई थी कि सामान्य सभा की बैठक, निगम अधिकारियों की ड्रामेबाजी से वे दुखी हो गई। आदमी जब कुछ अच्छा करना चाहे और उस पर बेवजह अंड़गा हो तो दुखी होना स्वाभाविक है।
एक तो निगम के पास वैसे ही फंड की कमी है तभी तो तात्यापारा से लेकर शारदा चौक के चौड़ीकरण का काम रुका हुआ है। ऐसे में सरकार पर जब कांग्रेसी महापौर वाले निगमों के लिए फंड नहीं देने के आरोपोें के साथ अधिकारियों के सहयोग नहीं करने का आरोप हो तो मामला गंभीर हो जाता है। राजधानीवासियों को पहले ही कौन सा सुख दे दिया है सरकार ने जो अब नए ड्रामेबाजी व राजनीति की जा रही है। गंदगी और बजबजाती नालियों से वैसे ही त्रस्त है लोग। पीने का पानी तक ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। निगम के कांक्रीट बिछाने वाली नीति ने यहां के पर्यावरण को पहले ही प्रदूषित कर दिया है अप्रैल में 45 का ताप भुगतना पड़ रहा है। बरसात में सड़कों-गलियों तक पानी भर जा रहा है। उल्टी दस्त जैसे मौसमी बीमारियां भुगतनी पड़ती है। क्या इसे शहर का जलना नहीं कहा जा सकता और ऐसे में जिम्मेदार लोग घुमने फिरने निकल जाए और अपना राग अलापे तो सम्राट नीरो की यादें ही ताज होगी।
भाजपा कांग्रेस बेशक राजनीति करें लेकिन अंधेरगर्दी न मचाये। शांत जनता को न कुरेदे। क्योंकि अब वो जमाना नहीं है कि नीरों चैन से बंशी बजा ले क्योंकि अब जनता भी पहले जैसी नहीं है वह बांसुरी बजाने वाले की बांसुरी तोड़ने की बजाय बजाने वाले को ही बजा देगी।
ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद
धमतरी। कुरुद तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत सेमरा के आश्रित ग्राम खपरी (सिलौटी) के ग्राम कोटवार खोरबहरा राम कोसरे का हुक्का-पानी ग्राम के उपसरपंच नारद साहू के निर्देशन में बंद करा दिया गया है। ग्राम कोटवार का कसूर केवल इतना है वह सतनामी समाज से तालुक्कात रखता है। सतनामी समाज ग्राम खपरी के समस्त समाज के व्यक्तियों के द्वारा अपने आरध्य देव श्री गुरुघासीदास जी का प्रतीक चिन्ह जैतखम्भ का निर्माण आपसी सहमति से किया गया है।
किन्तु द्वेषवश ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद करना स्वतंत्र भारत में न्याय संगत नहीं है। वर्तमान में गांव के उपसरपंच नारद साहू के निर्देशन में अवैध वसूली कर अतिक्रमण कराया जा रहा है। उपसरपंच ने ग्रामवासियों से निम्न रकम की मांग की है। चंद्रहास से 31 सौ रुपए, पिताम्बर से 35 सौ, रेणु से 18 सौ, भगवानी से 18 सौ, उत्तर से 32 सौ, गौतम से 28 सौ, मनोहर से 18 सौ, पुनीत से 21 सौ, इंद्रकुमार से 26 सौ, रामू से 21 सौ, चैतराम से 43 सौ, अनुज से 41 सौ तथा नारायण से 4 सौ एवं ग्राम के कोटवार खोरबहरा राम कोसरे से 52 सौ रुपए की मांग की गई थी जिस पर ग्राम कोटवार ने ऐतराज करते हुए अपने मंत्रालय 13 वर्ष पूर्व बने तोड़ने से असमर्थता जाहिर कर दिया। जिसके कारण शासकीय सेवा से बर्खास्त करने का डर दिखा कर उनके मूत्रालय को तुड़वाना पड़ेगा अन्यथा तुम्हारी नौकरी नहीं रहेगी। ग्राम कोटवार के द्वारा ऐसे प्रकरणों पर समानतापूर्वक विचार करने की बात कहने पर उनको नौकरी से निकालने की धमकी बार-बार दिया जा रहा है। इसी बीच सतनामी समाज ग्राम खपरी के द्वारा अपने ईष्टदेव का प्रतीक चिन्ह जैतखम्भ निर्माण किया गया। निर्माणाधीन रहते हुए इस पर किसी ने भी विरोध प्रकट नहीं किया किन्तु जबपूर्णत: निर्माण पूरा हो जाने एवं उस पर झंडा चढ़ जाने के उपरांत वहां के उपसरपंच द्वारा ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। इस स्वतंत्र भारत में जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। जहां सभी धर्म के अनुइयों का आपने धर्म को मानने एवं पूजने का अधिकार दिया जाता है। इस प्रकार का कृत्य इस देश की धर्मनिरपेक्षता सामाजिक सौहाद्रता को बिगाड़ता है। उपसरपंच का यह कारनामा भेदभाव, छुआछूत, आप्रश्यिता की भावनाओं को जन्म देता है। सतनामी समाज उस गांव में आजादी के पूर्व से कई पीढियों से निवासरत है वहां के ग्रामीणों के दुख-सुख में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देता आया है। किन्तु उपसरपंच नारद साहू के द्वारा विद्वेषवश अपने स्वार्थ सिध्दी के लिए किया गया कार्य अपनी पंचायत बाड़ी में एक छतर राज का सिक्का जमाने की पहल माना जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य पर सरपंच एवं पंचोगण ने अपनी अनिभिज्ञता जाहिर की है। जहां पर जैतखम्भ का निर्माण किया गया है। वह जगह 5 फीट-5 फीट का जगह है। वह पर ना किसी प्रकार का सरकारी योजना के तहत ना ही भवन निर्माण प्रस्तावित नहीं है ऐसे समाजद्रोही उपसरपंच नारद साहू पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाए। अन्यथा सतनामी समाज महासंघ एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण समिति के द्वारा उग्र आंदोलन की जाएगी। जिसकी जवाबदारी शासन की होगी इसी परिपेक्ष्य में सतनामी समाज महासंघ पाटन ब्लॉक के सचिव दिनेश कोसरे एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण महासभा जिला धमतरी के सचिव लादूराम कुर्रे के संयुक्त बयान से जारी किया गया है।
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धनेन्द्र साहू पर बेबुनियाद आरोप
अभनपुर। जनपद सदस्य शशिप्रकाश साहू ने बताया कि उस दिन वस्तुस्थिति की जगह खुद उपस्थित था ऐसी कोई बात नहीं हुआ है। जिसमें धनेन्द्र साहू ने किसी प्रकार गांव वालों को धमकी दिया है। जबकि गांव के दो-चार महिलाओं के साथ मंत्रीजी के परिवारवाले मानिकचौरी प्रवेशद्वार पर नहर पुल के पास गाड़ी के सामने धरने पर बैठ गए और उसे अंदर जाने नहीं दे रहे थे। पुलिस के उच्चाधिकारी के समझाइश के बाद धनेन्द्र साहू के साथ केवल पांच व्यक्तियों को मिलने दिया गया। धनेन्द्र साहू केवल यही मांग कर रहे थे कि मृतक परिवारवालों से मिलकर उसे केवल सांत्वना देना चाहते थे। क्योंकि मृतक परिवार कांग्रेस से जुड़े हुए थे। जबकि वस्तुस्थिति में भाजपा के आसपास के सैकड़ों कार्यकर्ता पहुंच गए और धनेन्द्र साहू वापस जाओ के नारे लगाने लगे और उसके सभी कार्यकर्ता वहीं हंगामा करने लगे। चूंकि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का संगठन चुनाव नजदीक है और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अभनपुर विधानसभा में अधिक से अधिक कांग्रेस से जुड़े हुए प्रतिनिधि चुनकर आए हैं। तो काग्रेस एवं धनेन्द्र साहू की साफ छवि में बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर उसके ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। भूपेश बघेल जी को गांव के अंदर प्रवेश करने ही नहीं दिया गया जिससे भूपेश बघेल मृतक परिवार से मिलने से पहले ही वहां से चले गए है।
किन्तु द्वेषवश ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद करना स्वतंत्र भारत में न्याय संगत नहीं है। वर्तमान में गांव के उपसरपंच नारद साहू के निर्देशन में अवैध वसूली कर अतिक्रमण कराया जा रहा है। उपसरपंच ने ग्रामवासियों से निम्न रकम की मांग की है। चंद्रहास से 31 सौ रुपए, पिताम्बर से 35 सौ, रेणु से 18 सौ, भगवानी से 18 सौ, उत्तर से 32 सौ, गौतम से 28 सौ, मनोहर से 18 सौ, पुनीत से 21 सौ, इंद्रकुमार से 26 सौ, रामू से 21 सौ, चैतराम से 43 सौ, अनुज से 41 सौ तथा नारायण से 4 सौ एवं ग्राम के कोटवार खोरबहरा राम कोसरे से 52 सौ रुपए की मांग की गई थी जिस पर ग्राम कोटवार ने ऐतराज करते हुए अपने मंत्रालय 13 वर्ष पूर्व बने तोड़ने से असमर्थता जाहिर कर दिया। जिसके कारण शासकीय सेवा से बर्खास्त करने का डर दिखा कर उनके मूत्रालय को तुड़वाना पड़ेगा अन्यथा तुम्हारी नौकरी नहीं रहेगी। ग्राम कोटवार के द्वारा ऐसे प्रकरणों पर समानतापूर्वक विचार करने की बात कहने पर उनको नौकरी से निकालने की धमकी बार-बार दिया जा रहा है। इसी बीच सतनामी समाज ग्राम खपरी के द्वारा अपने ईष्टदेव का प्रतीक चिन्ह जैतखम्भ निर्माण किया गया। निर्माणाधीन रहते हुए इस पर किसी ने भी विरोध प्रकट नहीं किया किन्तु जबपूर्णत: निर्माण पूरा हो जाने एवं उस पर झंडा चढ़ जाने के उपरांत वहां के उपसरपंच द्वारा ग्राम कोटवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। इस स्वतंत्र भारत में जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। जहां सभी धर्म के अनुइयों का आपने धर्म को मानने एवं पूजने का अधिकार दिया जाता है। इस प्रकार का कृत्य इस देश की धर्मनिरपेक्षता सामाजिक सौहाद्रता को बिगाड़ता है। उपसरपंच का यह कारनामा भेदभाव, छुआछूत, आप्रश्यिता की भावनाओं को जन्म देता है। सतनामी समाज उस गांव में आजादी के पूर्व से कई पीढियों से निवासरत है वहां के ग्रामीणों के दुख-सुख में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देता आया है। किन्तु उपसरपंच नारद साहू के द्वारा विद्वेषवश अपने स्वार्थ सिध्दी के लिए किया गया कार्य अपनी पंचायत बाड़ी में एक छतर राज का सिक्का जमाने की पहल माना जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य पर सरपंच एवं पंचोगण ने अपनी अनिभिज्ञता जाहिर की है। जहां पर जैतखम्भ का निर्माण किया गया है। वह जगह 5 फीट-5 फीट का जगह है। वह पर ना किसी प्रकार का सरकारी योजना के तहत ना ही भवन निर्माण प्रस्तावित नहीं है ऐसे समाजद्रोही उपसरपंच नारद साहू पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाए। अन्यथा सतनामी समाज महासंघ एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण समिति के द्वारा उग्र आंदोलन की जाएगी। जिसकी जवाबदारी शासन की होगी इसी परिपेक्ष्य में सतनामी समाज महासंघ पाटन ब्लॉक के सचिव दिनेश कोसरे एवं अखिल भारतीय सतनामी कल्याण महासभा जिला धमतरी के सचिव लादूराम कुर्रे के संयुक्त बयान से जारी किया गया है।
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धनेन्द्र साहू पर बेबुनियाद आरोप
अभनपुर। जनपद सदस्य शशिप्रकाश साहू ने बताया कि उस दिन वस्तुस्थिति की जगह खुद उपस्थित था ऐसी कोई बात नहीं हुआ है। जिसमें धनेन्द्र साहू ने किसी प्रकार गांव वालों को धमकी दिया है। जबकि गांव के दो-चार महिलाओं के साथ मंत्रीजी के परिवारवाले मानिकचौरी प्रवेशद्वार पर नहर पुल के पास गाड़ी के सामने धरने पर बैठ गए और उसे अंदर जाने नहीं दे रहे थे। पुलिस के उच्चाधिकारी के समझाइश के बाद धनेन्द्र साहू के साथ केवल पांच व्यक्तियों को मिलने दिया गया। धनेन्द्र साहू केवल यही मांग कर रहे थे कि मृतक परिवारवालों से मिलकर उसे केवल सांत्वना देना चाहते थे। क्योंकि मृतक परिवार कांग्रेस से जुड़े हुए थे। जबकि वस्तुस्थिति में भाजपा के आसपास के सैकड़ों कार्यकर्ता पहुंच गए और धनेन्द्र साहू वापस जाओ के नारे लगाने लगे और उसके सभी कार्यकर्ता वहीं हंगामा करने लगे। चूंकि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का संगठन चुनाव नजदीक है और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अभनपुर विधानसभा में अधिक से अधिक कांग्रेस से जुड़े हुए प्रतिनिधि चुनकर आए हैं। तो काग्रेस एवं धनेन्द्र साहू की साफ छवि में बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर उसके ऊपर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। भूपेश बघेल जी को गांव के अंदर प्रवेश करने ही नहीं दिया गया जिससे भूपेश बघेल मृतक परिवार से मिलने से पहले ही वहां से चले गए है।
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