सतनाम धर्मसेना ने इस साल रावण नहीं जलाने का आह्वान करते हुए पर्चे बांटना शुरु किया है और इसके विरोध में कवर्धा के धर्मसेना खड़ी हो गई है।
सतनाम धर्म सभा के अध्यक्ष केवल प्रकाश सतनामी के द्वारा वितरित पर्चे में कहा गया है कि रावण ने मनुवादी व्यवस्था को तोडऩे का कार्य किया है इसलिए रावण को पूजा जाना चाहिए। उन्होंने सतनामी समाज सहित आम लोगों से अपील की है कि इस बार दशहरे में रावण का वध न करो और न ही रावण का पुतला दहन करो।
हमारे कवर्धा संवाददाता के मुताबिक इस पर्चे का धर्मसेना ने सख्त विरोध किया है और ऐसे पर्चे बांटे जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शनिवार, 28 अगस्त 2010
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
बृजमोहन ने दी छूट और हरे राम ने की लूट
दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में लूट
यह प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी नहीं तो और क्या है कि जिस व्यक्ति का किसी भी सरकारी विभाग में सेवा नहीं है और जिसके संविलियन को हाईकोर्ट तक ने अवैध करार दिया और पीएससी ने तीन बार टर्न कर दिया ऐसे व्यक्ति को न केवल दंतेवाड़ा जिला का शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि शिक्षा मिशन का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। बात इतनी ही नहीं है यहां चल रहे लूट-खसोट का यह आलम है कि नक्सली भी शरमा जाए।
कहा जाता है कि शिक्षा विभाग देश का भावी पीढ़ी तैयार करता है और जब इस विभाग को ही जब भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया जाए तो भावी पीढ़ी कैसे होगी इसकी कल्पना से ही होश उड़ जाते है। वैसे इस विभाग में शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से दमदारी दिखा रहे हैं और तमाम भ्रष्ट और विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है वह आने वाले समय के लिए घातक माना जा रहा है। तवारिस और बाम्बरा जैसे लोगों को तवज्जों दिए जाने के बाद सिंह जैसों को अपने बंगले में बिठाने के लिए चर्चित शिक्षा विभाग इन दिनों दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी एचआर शर्मा की कारगुजारियों और मंत्री के संरक्षण के कारण चर्चा में है।
एचआर शर्मा को दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ शिक्षा मिशन में जिला परियोजना समन्वयक का प्रभार भी दिया गया है। वक्त पढऩे पर राजनैतिक निष्ठा बदलने के आरोपित एचआर शर्मा कभी कवर्धा में असिसेंट प्राध्यापक रहे हैं। बताया जाता है कि तब इनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी और इसी के चलते इनके संविलियन का प्रयास कांग्रेस विधायक ने की थी लेकिन यह हो नहीं पाया और सत्ता बदलते ही इनके संविलियन का प्रयास भाजपा की महिला पूर्व सांसद ने की और इस तात्कालिन सांसद के चुनाव के लिए फंड भी दिया गया। इस प्रयास के चलते ही शिक्षा विभाग के आवेदन पर पीएससी ने 3 सामान्य पद में से एक पद विलोपित कर दिया था। कहा जाता है कि खेल यही से शुरु हुआ और जब एचआर शर्मा यानी हरेराम शर्मा की फाईल पहुंची तो पता चला कि उनका संविलियन ही अवैध है और भर्ती नियम 1982 की कंडिका 4 की अनदेखी की गई है और संविलियन किया गया है।
बताया जाता है कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने संविलियन रद्द कर दिया। इस सबके बाद भी वे दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी बनाए गए। नागरिक आपूर्ति निगम से हकाले जाने की अपनी कहानी है। दंतेवाड़ा में जिस पैमाने पर घपलेबाजी हो रहे हैं उसे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए हैं जिसमें स्कूल भवन ढहाने से लेकर केश पेमेंट की लंबी दस्तान है। बताया जाता है कि इस सबकी शिकायत शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यपाल तक की जाती रही है लेकिन नामालूम कारणों से कार्रवाई टलते रही है। बहरहाल दंतेवाड़ा शिक्षा और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल इन मामलों में चर्चा में है देखना है मुख्यमंत्री इस मामले में क्या करते हैं?
यह प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी नहीं तो और क्या है कि जिस व्यक्ति का किसी भी सरकारी विभाग में सेवा नहीं है और जिसके संविलियन को हाईकोर्ट तक ने अवैध करार दिया और पीएससी ने तीन बार टर्न कर दिया ऐसे व्यक्ति को न केवल दंतेवाड़ा जिला का शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि शिक्षा मिशन का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। बात इतनी ही नहीं है यहां चल रहे लूट-खसोट का यह आलम है कि नक्सली भी शरमा जाए।
कहा जाता है कि शिक्षा विभाग देश का भावी पीढ़ी तैयार करता है और जब इस विभाग को ही जब भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया जाए तो भावी पीढ़ी कैसे होगी इसकी कल्पना से ही होश उड़ जाते है। वैसे इस विभाग में शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल जिस तरह से दमदारी दिखा रहे हैं और तमाम भ्रष्ट और विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है वह आने वाले समय के लिए घातक माना जा रहा है। तवारिस और बाम्बरा जैसे लोगों को तवज्जों दिए जाने के बाद सिंह जैसों को अपने बंगले में बिठाने के लिए चर्चित शिक्षा विभाग इन दिनों दंतेवाड़ा के जिला शिक्षा अधिकारी एचआर शर्मा की कारगुजारियों और मंत्री के संरक्षण के कारण चर्चा में है।
एचआर शर्मा को दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ शिक्षा मिशन में जिला परियोजना समन्वयक का प्रभार भी दिया गया है। वक्त पढऩे पर राजनैतिक निष्ठा बदलने के आरोपित एचआर शर्मा कभी कवर्धा में असिसेंट प्राध्यापक रहे हैं। बताया जाता है कि तब इनकी निष्ठा कांग्रेस के प्रति थी और इसी के चलते इनके संविलियन का प्रयास कांग्रेस विधायक ने की थी लेकिन यह हो नहीं पाया और सत्ता बदलते ही इनके संविलियन का प्रयास भाजपा की महिला पूर्व सांसद ने की और इस तात्कालिन सांसद के चुनाव के लिए फंड भी दिया गया। इस प्रयास के चलते ही शिक्षा विभाग के आवेदन पर पीएससी ने 3 सामान्य पद में से एक पद विलोपित कर दिया था। कहा जाता है कि खेल यही से शुरु हुआ और जब एचआर शर्मा यानी हरेराम शर्मा की फाईल पहुंची तो पता चला कि उनका संविलियन ही अवैध है और भर्ती नियम 1982 की कंडिका 4 की अनदेखी की गई है और संविलियन किया गया है।
बताया जाता है कि मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने संविलियन रद्द कर दिया। इस सबके बाद भी वे दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी बनाए गए। नागरिक आपूर्ति निगम से हकाले जाने की अपनी कहानी है। दंतेवाड़ा में जिस पैमाने पर घपलेबाजी हो रहे हैं उसे सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए हैं जिसमें स्कूल भवन ढहाने से लेकर केश पेमेंट की लंबी दस्तान है। बताया जाता है कि इस सबकी शिकायत शिक्षा मंत्री से लेकर राज्यपाल तक की जाती रही है लेकिन नामालूम कारणों से कार्रवाई टलते रही है। बहरहाल दंतेवाड़ा शिक्षा और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल इन मामलों में चर्चा में है देखना है मुख्यमंत्री इस मामले में क्या करते हैं?
गुरुवार, 26 अगस्त 2010
नवभारत का कारनामा, किसमें है दम
पैसा पटाया नहीं बिल्डिंग बना दी
लगता है छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज नहीं है और यदि कही सरकार है भी तो वह केवल बड़े लोगों के मुठ्ठी में कैद है। अपने को तुरम खां कहने वाले मंत्री और छोटे-छोटे लोगों के कब्जों पर बुलडोजर चलाने वाले भी बड़े लोगों की जेबों में समा गए है। तभी तो सरकार को नियम कानून की सीख देने वाला नवभारत स्वयं ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रजबंधा मैदान में अपनी बिल्डिंग खड़ा कर लेता है और पूरा शासन-प्रशासन नपुसंक की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठा है। तब न तो उन्हें नियम कानून ही नजर आता है और न ही इसमें कोई अपराध ही नजर आता है।
महिनेभर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार पर टिप्पणी की थी कि आधे राज्य में शासन ही नहीं है तब कांग्रेसी भी चुप रह गए थे लेकिन अब इसकी जमीनी सच्चाई सामने आने लगी है कि सरकार किनके द्वारा चुनी जाती है और वह किसके हित के लिए काम करती है। मीडिया भी सरकार के गलत नीतियों की आलोचना करने से क्यों परहेज करती है।
दरअसल बेशकीमती जमीनों के बंदरबाट में जिस तरह से मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया भागीदार बनते जा रही है उससे सरकार को मनमानी करने की छूट मिली हुई है। रायपुर में भी दो-पांच सौ छपने वाले अखबारों को भी जिस तरह से कौड़ी के मोल जमीन दी गई है और इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है वह सरकार और उसके पूरे कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है कि किस तरह से गलत लोगों को सरकार संरक्षण दे रही है। यहां हम छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत को आबंटित जमीन और उस पर किए गए अवैधानिक निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने दैनिक नवभारत को 1985-86 में रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नम्बर 9, प्लांट नंबर 1 में से रकबा 60750 वर्ग फीट जमीन प्रेस स्थापना के लिए स्वीकृत की थी। इस घोषणा के साथ ही नवभारत को अग्रिम आधिपत्य मिल गया था और शासन ने निर्देश दिया था कि निर्धारित राशि पटाए जाने पर ही पट्टा निष्पादन किया जाए लेकिन नवभारत ने राज्य बनने के बाद तक न तो पैसा पटाया और न ही उसे पट्टा ही दिया गया। बावजूद नवभारत की बिल्डिंग बन गई। अब सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत को किस नियम के तहत बिल्डिंग बनाने की अनुमति दी गई। क्या बिल्डिंग का नक्शा पास कराया गया और नक्शा किस नियम के तहत पास किया गया। किस अधिकारी ने पास किया। इस समय इस निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई। ऐसे कितने ही सवाल है जो आम आदमी के जेहन में उठ रहे हैं। क्या नवभारत का इतना प्रभाव है कि किसी सरकार ने नियम विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ कार्रवाई नहीं की या सरकार सिर्फ बड़े लोगों का संरक्षक बनकर रह गई है।
ऐसे कई मामले हैं जो सरकार और नवभारत के सांठगांठ की कहानी को उजागर करता है। सब कुछ गलत फिर भी सरकार की तरफ से एडवांश? भू-उपयोग भी गलत होता रहा सरकार खामोश रही। एमजी रोड से लेकर मालवीय रोड, जीई रोड में कितने बार अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई। क्या सरकार अब भी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली रहेगी जो अपने प्रभाव और पैसों से गलत करे रहेगें।
लगता है छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज नहीं है और यदि कही सरकार है भी तो वह केवल बड़े लोगों के मुठ्ठी में कैद है। अपने को तुरम खां कहने वाले मंत्री और छोटे-छोटे लोगों के कब्जों पर बुलडोजर चलाने वाले भी बड़े लोगों की जेबों में समा गए है। तभी तो सरकार को नियम कानून की सीख देने वाला नवभारत स्वयं ही नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए रजबंधा मैदान में अपनी बिल्डिंग खड़ा कर लेता है और पूरा शासन-प्रशासन नपुसंक की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठा है। तब न तो उन्हें नियम कानून ही नजर आता है और न ही इसमें कोई अपराध ही नजर आता है।
महिनेभर पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार पर टिप्पणी की थी कि आधे राज्य में शासन ही नहीं है तब कांग्रेसी भी चुप रह गए थे लेकिन अब इसकी जमीनी सच्चाई सामने आने लगी है कि सरकार किनके द्वारा चुनी जाती है और वह किसके हित के लिए काम करती है। मीडिया भी सरकार के गलत नीतियों की आलोचना करने से क्यों परहेज करती है।
दरअसल बेशकीमती जमीनों के बंदरबाट में जिस तरह से मीडिया खासकर प्रिंट मीडिया भागीदार बनते जा रही है उससे सरकार को मनमानी करने की छूट मिली हुई है। रायपुर में भी दो-पांच सौ छपने वाले अखबारों को भी जिस तरह से कौड़ी के मोल जमीन दी गई है और इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है वह सरकार और उसके पूरे कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है कि किस तरह से गलत लोगों को सरकार संरक्षण दे रही है। यहां हम छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत को आबंटित जमीन और उस पर किए गए अवैधानिक निर्माण की चर्चा कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने दैनिक नवभारत को 1985-86 में रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक नम्बर 9, प्लांट नंबर 1 में से रकबा 60750 वर्ग फीट जमीन प्रेस स्थापना के लिए स्वीकृत की थी। इस घोषणा के साथ ही नवभारत को अग्रिम आधिपत्य मिल गया था और शासन ने निर्देश दिया था कि निर्धारित राशि पटाए जाने पर ही पट्टा निष्पादन किया जाए लेकिन नवभारत ने राज्य बनने के बाद तक न तो पैसा पटाया और न ही उसे पट्टा ही दिया गया। बावजूद नवभारत की बिल्डिंग बन गई। अब सवाल यह उठता है कि आखिर नवभारत को किस नियम के तहत बिल्डिंग बनाने की अनुमति दी गई। क्या बिल्डिंग का नक्शा पास कराया गया और नक्शा किस नियम के तहत पास किया गया। किस अधिकारी ने पास किया। इस समय इस निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई। ऐसे कितने ही सवाल है जो आम आदमी के जेहन में उठ रहे हैं। क्या नवभारत का इतना प्रभाव है कि किसी सरकार ने नियम विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ कार्रवाई नहीं की या सरकार सिर्फ बड़े लोगों का संरक्षक बनकर रह गई है।
ऐसे कई मामले हैं जो सरकार और नवभारत के सांठगांठ की कहानी को उजागर करता है। सब कुछ गलत फिर भी सरकार की तरफ से एडवांश? भू-उपयोग भी गलत होता रहा सरकार खामोश रही। एमजी रोड से लेकर मालवीय रोड, जीई रोड में कितने बार अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला तब किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई। क्या सरकार अब भी ऐसे लोगों के हाथों की कठपुतली रहेगी जो अपने प्रभाव और पैसों से गलत करे रहेगें।
बुधवार, 25 अगस्त 2010
देश का खजाना खाली, दलों में हरियाली
इन दिनों पूरे देश में यह बहस चल रही है कि सांसदों के वेतन भत्ते बढऩा चाहिए या नहीं बढऩा चाहिए। हमने आम आदमियों के बीच यह सवाल उठाया तो अब तक हमें एक भी व्यक्ति नहीं मिला जिन्होंने सांसदों के वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी पर सहमत हो। आखिर सांसद और विधायकों को वेतन क्यों? क्या जनसेवा के बदले मेवा वे सरकारी खजानों से कब तक लेते रहेंगे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि जिंदल से लेकर हेमामालिनी तक को वेतन भत्ते और पेंशन चाहिए?
सांसद-विधायक अब पूरी तरह से व्यवसायी हो चुके हैं। समाज सेवा के बदले उन्हें मोटी तनख्वाह चाहिए और पेंशन भी चाहिए? ऐसा तो यह देश कतई नहीं था। फिर आजादी के सिर्फ 63 साल में ऐसा क्या हो गया कि सांसद विधायक नौकरों की तरह वेतन के लिए इतने लालायित हैं? आम लोगों ने तो कभी नहीं चाहा कि उनके जनप्रतिनिधि वे व्यक्ति बने जिनके लिए वेतन सर्वोच्च प्राथमिकता है और जिन लोगों को अपनी सेवा करानी होती है वे अपने हैसियत के अनुसार नौकर रख लेते हैं। ऐसे में आम आदमी के गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मिल बांटकर डकारने की इस कोशिश को क्या कहेंगे।
दुखद स्थिति तो यह है कि अपने को समाजसेवी कहने वाले सैकड़ों सांसदों और हजारों विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं है जो वेतन भत्ते या पेंशन नहीं लेने की घोषणा कर दे। 'माल ए मुफ्त दिल ए बेरहम' की तर्ज पर हम दो चार साल में वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी के लिए जरूर ये लोग लामबंद हो जाते हैं तब न पार्टी प्रतिद्वंद्विता ही आड़े आती है और न ही सिद्धांत मायने रखते हैं। आज भी इस देश में ऐसी पीढ़ी मौजूद है जो बगैर वेतन के समाजसेवा में लगे हैं। राजनीतिक दल ऐसे लोगों को अपनी पार्टियों में शामिल ही नहीं करना चाहते? हमारे बहुत से मित्र सांसद-विधायक है? उनका कहना है कि ऐसी घोषणाएं करने पर पार्टी निकाल बाहर करेगी? क्योंकि अमूमन सभी पार्टियों में यह परिपाटी है कि सांसद-विधायक अपने वेतन का एक हिस्सा पार्टी फंड में दे। पार्टी फंड में पैसा जमा होते होते यह स्थिति है कि पार्टियों के पास इफरात धन संपत्ति जमा हो गई है और देश खोखला होता जा रहा है।
कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा हो या लोकदल, जनता दल आप किसी भी पार्टी का नाम ले लिजिए। इनकी चली तो पार्टी कार्यालय के नाम पर सरकारी जमीनों का जमकर बंदरबाट हुआ। जिला या प्रदेश स्तर तो छोड़ दिजिए कस्बों तक में कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीनें इन राजनैतिक दलों को दी गई। देश की इस विषम स्थिति में जब आम आदमी को दो वक्त का खाना ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। पीने का पानी नहीं मिल रहा है और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में दुरस्थ अंचल के लोग बेमौत मारे जा रहे हैं तब भला हमारे सांसदों की वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए तीन-पांच करना निकृष्ठता नहीं तो और क्या है?
हमारा यह महाअभियान ऐसे ही अंधेरगर्दी के खिलाफ है। हम चाहते हैं सांसदों-विधायकों के वेतन-पेंशन बंद हो और जिन्हें डाक्टरों ने समाजसेवा करने कहा है वे बगैर वेतन का समाजसेवा करे। हम आम लोगों में यही जागरूकता पैदा कर रहे हैं कि वे अब ऐसे लोगों को ही अपना प्रतिनिधि चुने जो वेतन पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें।
सांसद-विधायक अब पूरी तरह से व्यवसायी हो चुके हैं। समाज सेवा के बदले उन्हें मोटी तनख्वाह चाहिए और पेंशन भी चाहिए? ऐसा तो यह देश कतई नहीं था। फिर आजादी के सिर्फ 63 साल में ऐसा क्या हो गया कि सांसद विधायक नौकरों की तरह वेतन के लिए इतने लालायित हैं? आम लोगों ने तो कभी नहीं चाहा कि उनके जनप्रतिनिधि वे व्यक्ति बने जिनके लिए वेतन सर्वोच्च प्राथमिकता है और जिन लोगों को अपनी सेवा करानी होती है वे अपने हैसियत के अनुसार नौकर रख लेते हैं। ऐसे में आम आदमी के गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मिल बांटकर डकारने की इस कोशिश को क्या कहेंगे।
दुखद स्थिति तो यह है कि अपने को समाजसेवी कहने वाले सैकड़ों सांसदों और हजारों विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं है जो वेतन भत्ते या पेंशन नहीं लेने की घोषणा कर दे। 'माल ए मुफ्त दिल ए बेरहम' की तर्ज पर हम दो चार साल में वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी के लिए जरूर ये लोग लामबंद हो जाते हैं तब न पार्टी प्रतिद्वंद्विता ही आड़े आती है और न ही सिद्धांत मायने रखते हैं। आज भी इस देश में ऐसी पीढ़ी मौजूद है जो बगैर वेतन के समाजसेवा में लगे हैं। राजनीतिक दल ऐसे लोगों को अपनी पार्टियों में शामिल ही नहीं करना चाहते? हमारे बहुत से मित्र सांसद-विधायक है? उनका कहना है कि ऐसी घोषणाएं करने पर पार्टी निकाल बाहर करेगी? क्योंकि अमूमन सभी पार्टियों में यह परिपाटी है कि सांसद-विधायक अपने वेतन का एक हिस्सा पार्टी फंड में दे। पार्टी फंड में पैसा जमा होते होते यह स्थिति है कि पार्टियों के पास इफरात धन संपत्ति जमा हो गई है और देश खोखला होता जा रहा है।
कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा हो या लोकदल, जनता दल आप किसी भी पार्टी का नाम ले लिजिए। इनकी चली तो पार्टी कार्यालय के नाम पर सरकारी जमीनों का जमकर बंदरबाट हुआ। जिला या प्रदेश स्तर तो छोड़ दिजिए कस्बों तक में कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीनें इन राजनैतिक दलों को दी गई। देश की इस विषम स्थिति में जब आम आदमी को दो वक्त का खाना ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। पीने का पानी नहीं मिल रहा है और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में दुरस्थ अंचल के लोग बेमौत मारे जा रहे हैं तब भला हमारे सांसदों की वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए तीन-पांच करना निकृष्ठता नहीं तो और क्या है?
हमारा यह महाअभियान ऐसे ही अंधेरगर्दी के खिलाफ है। हम चाहते हैं सांसदों-विधायकों के वेतन-पेंशन बंद हो और जिन्हें डाक्टरों ने समाजसेवा करने कहा है वे बगैर वेतन का समाजसेवा करे। हम आम लोगों में यही जागरूकता पैदा कर रहे हैं कि वे अब ऐसे लोगों को ही अपना प्रतिनिधि चुने जो वेतन पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें।
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
कांग्रेस-भाजपा में सांठ-गांठ
परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ को लेकर लालू-मुलायम और वाम दलों ने खूब हंगामा किया। इस सांठ-गांठ के चलते गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बचाने का भी आरोप है? क्या सचमुच कांग्रेस और भाजपा में इस तरह की सांठ-गांठ हो रही है। हालांकि यह सत्य है कि राजनीति में न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही दुश्मन। खासकर अपने हितों के लिए सांसद और विधायक कितने नीचे गिर सकते हैं यह इस देश के आम लोगों ने बहुत नजदीक से देखा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।
लोग मरते हैं तो मर जाएं सांसद-विधायकों को पैसा चाहिए
आजादी के 63 साल बाद भी आम आदमी को पीने का पानी तक नहीं मिल रहा है, शिक्षा और चिकित्सा सुविधा का भगवान ही मालिक है। लोग दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और इस देश के सांसदों और विधायकों को 16 हजार रुपए महिना भी कम पड़ रहा है। इस शर्मनाक स्थिति को रोका नहीं गया तो न नेताओं को कोई पिटने से बचा पाएगा और न ही लोगों को सडक़ों पर उतरने से कोई सरकार रोक पाएगी।
जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इस देश के सांसदों व विधायकों ने अपनी सुविधा बढ़ाने आम लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया है। रोजमर्रा की चीजे सिर्फ महंगी इसलिए हुई है क्योंकि इस पर भारी भरकम टैक्स लागू है और इस टैक्स में से बड़ी राशि सांसदों-विधायकों के वेतन भत्ते और पेंशन में चले जाते हैं। जिस देश के आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उस देश के सांसद और विधायक अपनी सुविधाओं में कटौती कराने की बजाए सुविधाएं बढ़ाने लड़ रहे हो इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी?
क्या किसी सरकार ने कभी सोचा है कि उसके राज में हर व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा और पानी की सुविधाएं उपलब्ध है। भोजन तो दूर की बात है। इस देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां ये तीन मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को पूरी तरह मिल रही हो। जब आजादी के 63 साल बाद भी ये तीन चीजें आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी है तो फिर इन्हें वेतन किस बात का? सिर्फ एय्याशी या लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करने का?
सवाल यह नहीं है कि सांसदों-विधायकों का वेतन क्यों नहीं बढ़े? बल्कि अब आम आदमी यह सवाल करने लगा है कि इन्हें आखिर वेतन ही क्यों दिया जाए? जब सवाल करने पैसे ये लेते हैं? सवाल नहीं करने के पैसे ये लेते हैंं? उद्योगों के हित में नीति बनाते समय पैसे ये खाते है? कब किसका टैक्स बढ़ाना है घटाना है के एवज में पैसे का लेनदेन होता है और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान इन्हें जब भत्ते दिए जाते है तब वेतन क्यों।
क्या आम आदमी इस बात से अनभिज्ञ है कि पांच सौ पैतालीस सांसदों में से तीन सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति है? इन्हें वेतन की जरूरत क्यों और किसलिए दी जानी चाहिए? आम लोगों के खून पसीने की कमाई पर अपना हित साधने की कोशिश अब बंद करनी ही होगी वरना इसका दुखद परिणाम भुगतने के लिए देश को तैयार होना होगा। इस देश का प्रति व्यक्ति की आय कितना है और नेताओं को कितना वेतन भत्ता सुविधा दिया जा रहा है? सकारी आंकड़े सच्चाई से कोसो दूर होता है और औसत के फेर में गरीब कैसे मरता है इसका उदाहरण है भारत का प्रति व्यक्ति आय। सरकारी आकड़े के मुताबिक भारत के प्रति व्यक्ति की आय लगभग 40 हजार रुपए वार्षिक है यानी महिने में तीन साढ़े तीन हजार रुपए। ऐसे में सांसदों-विधायकों को इससे ज्यादा वेतन की बात ही बेमानी है।
अब तो लोग आक्रोशित है और आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यदि बगैर वेतन के काम करने वाले लोग चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें ही जनता अपना वोट देगी और यह स्थिति बनने भी लगी है।
00मालामाल सांसद
0 पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति है।
0 देश के प्रधानमंत्री भी विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा।
0 तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनों अआय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
0 गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती लोगों के पास कितना पैसा यह किसी से छुपा नहीं।
00 मंत्री बनने के बाद यह मिलता है सांसदों को
0 टाइप 8 बंगला, राज्यमंत्रियों को टाइप 7 बंगला।
0 कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
0 मूल वेतन 16 हजार रुपए, भत्ता 1 हजार रुपए
0 संसदीय क्षेत्र भत्ता 20 हजार रुपए।
0 टेलीफोन : दो फोन और एक लाख 75 हजार फ्री कॉल।
0 हर साल ढाई हजार रुपए मोबाइल भत्ता।
0 मोबाइल हैंडसेट फ्री।
0 नि:शुल्क एयर टिकट।
0 परिवार के लिए साल में 48 यात्राएं।
0 जितना चाहें उतनी एसी कोच में यात्रा परिवार के साथ
स्टाफ : पर्सनल स्टाफ में इन लोगों की नियुक्ति किया जा सकता है।
एक प्राइवेट सेक्रेटरी, एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी, दो पर्सनल असिस्टेंट, एक हिन्दी स्टेनो, एक ड्राइवर, एक क्लर्क एक जमादार या चपरासी।
( यह केवल मंत्री का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है।)
जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इस देश के सांसदों व विधायकों ने अपनी सुविधा बढ़ाने आम लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया है। रोजमर्रा की चीजे सिर्फ महंगी इसलिए हुई है क्योंकि इस पर भारी भरकम टैक्स लागू है और इस टैक्स में से बड़ी राशि सांसदों-विधायकों के वेतन भत्ते और पेंशन में चले जाते हैं। जिस देश के आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उस देश के सांसद और विधायक अपनी सुविधाओं में कटौती कराने की बजाए सुविधाएं बढ़ाने लड़ रहे हो इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी?
क्या किसी सरकार ने कभी सोचा है कि उसके राज में हर व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा और पानी की सुविधाएं उपलब्ध है। भोजन तो दूर की बात है। इस देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां ये तीन मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को पूरी तरह मिल रही हो। जब आजादी के 63 साल बाद भी ये तीन चीजें आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी है तो फिर इन्हें वेतन किस बात का? सिर्फ एय्याशी या लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करने का?
सवाल यह नहीं है कि सांसदों-विधायकों का वेतन क्यों नहीं बढ़े? बल्कि अब आम आदमी यह सवाल करने लगा है कि इन्हें आखिर वेतन ही क्यों दिया जाए? जब सवाल करने पैसे ये लेते हैं? सवाल नहीं करने के पैसे ये लेते हैंं? उद्योगों के हित में नीति बनाते समय पैसे ये खाते है? कब किसका टैक्स बढ़ाना है घटाना है के एवज में पैसे का लेनदेन होता है और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान इन्हें जब भत्ते दिए जाते है तब वेतन क्यों।
क्या आम आदमी इस बात से अनभिज्ञ है कि पांच सौ पैतालीस सांसदों में से तीन सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति है? इन्हें वेतन की जरूरत क्यों और किसलिए दी जानी चाहिए? आम लोगों के खून पसीने की कमाई पर अपना हित साधने की कोशिश अब बंद करनी ही होगी वरना इसका दुखद परिणाम भुगतने के लिए देश को तैयार होना होगा। इस देश का प्रति व्यक्ति की आय कितना है और नेताओं को कितना वेतन भत्ता सुविधा दिया जा रहा है? सकारी आंकड़े सच्चाई से कोसो दूर होता है और औसत के फेर में गरीब कैसे मरता है इसका उदाहरण है भारत का प्रति व्यक्ति आय। सरकारी आकड़े के मुताबिक भारत के प्रति व्यक्ति की आय लगभग 40 हजार रुपए वार्षिक है यानी महिने में तीन साढ़े तीन हजार रुपए। ऐसे में सांसदों-विधायकों को इससे ज्यादा वेतन की बात ही बेमानी है।
अब तो लोग आक्रोशित है और आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यदि बगैर वेतन के काम करने वाले लोग चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें ही जनता अपना वोट देगी और यह स्थिति बनने भी लगी है।
00मालामाल सांसद
0 पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति है।
0 देश के प्रधानमंत्री भी विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा।
0 तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनों अआय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
0 गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती लोगों के पास कितना पैसा यह किसी से छुपा नहीं।
00 मंत्री बनने के बाद यह मिलता है सांसदों को
0 टाइप 8 बंगला, राज्यमंत्रियों को टाइप 7 बंगला।
0 कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
0 मूल वेतन 16 हजार रुपए, भत्ता 1 हजार रुपए
0 संसदीय क्षेत्र भत्ता 20 हजार रुपए।
0 टेलीफोन : दो फोन और एक लाख 75 हजार फ्री कॉल।
0 हर साल ढाई हजार रुपए मोबाइल भत्ता।
0 मोबाइल हैंडसेट फ्री।
0 नि:शुल्क एयर टिकट।
0 परिवार के लिए साल में 48 यात्राएं।
0 जितना चाहें उतनी एसी कोच में यात्रा परिवार के साथ
स्टाफ : पर्सनल स्टाफ में इन लोगों की नियुक्ति किया जा सकता है।
एक प्राइवेट सेक्रेटरी, एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी, दो पर्सनल असिस्टेंट, एक हिन्दी स्टेनो, एक ड्राइवर, एक क्लर्क एक जमादार या चपरासी।
( यह केवल मंत्री का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है।)
रविवार, 22 अगस्त 2010
क्या सांसदों -विधायकों को वेतन लेना चाहिए?
दो दिन से मै सो नहीं सका , लोग क्यों नहीं निकल रहें है विरोध करने ,क्या राजनीती सिर्फ पैसे कमाने का जरिया बन गया है, गाँधी के इस देश में ये क्या हो रहा है,कंहा है समाज सेवी लोग , मै ठेका ले रहा हूँ , जब तक इन लोगो का वेतन बंद नहीं होगा या जब तक ऐसे लोगो को जो वेतन न ले संसद में नहीं पहुचेंगे चैन से नहीं बैठूँगा ,
आइये मेरा साथ दीजिये ,मैंने राष्टपति को भी पत्र लिखा है ,
आइये मेरा साथ दीजिये ,मैंने राष्टपति को भी पत्र लिखा है ,
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
