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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
सिंगापुर में हुआ ज्योतिष सम्मलेन
ज्योतिष सम्मलेन से लौटकर देवनारायण शर्मा ने बताया कि वंहा ज्योतिष का ज्यादा उपयोग बिजनेस के लिए करते है ,वहां की सरकार भवन निर्माण में वास्तु का ध्यान रखते है,सत्यविश्वास ने बताया रायपुर से २० ज्योतिष गए थे पुरे देश से १५० ज्योतिष गए थे
करे कोई... भरे कोई...
पिछले दिनों कश्मीर में वहां के नेता उमर अब्दुल्ला पर भीड़ में एक युवक ने जूता फेंक दिया। युवक तो पकड़ा ही गया साथ ही दो डीएसपी स्तर के अधिकारी भी निलंबित कर दिए गए। खबर इतनी ही नहीं है। इसके पहले भी देश-दुनिया में इस तरह की घटनाएं हुई है जब आम लोगों में से किसी ने इस तरह की हरकत की है। कानून कभी किसी को ईजाजत नहीं देता कि वह अपने साथ हो रहे अन्याय पर किसी जनप्रतिनिधि (वेतन भोगी) से इस तरह की हरकत करे। भारत में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था है और अब तो गांव-गांव से नेता पैदा हो रहे है। राजनैतिक दलदल में वे स्वयं के लिए जुगाड़ में लगे हैं और आम आदमी लगातार नारकीय जीवन जीने मजबूर है। इसके बाद भी कोई जूता फेंक कर मार दे तो भी वह अपराध ही है।
छत्तीसगढ़ के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आधे राज्य में शासन नहीं है। ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो यह स्थिति बढ़ ही सकती है। क्या सिर्फ दो रुपए किलो चावल या रोजगार गारंटी योजना से आम लोगों का भला हो सकता है? गांवों में शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य सुविधा नहीं है पीने और सिंचाई के पानी की सुविधा नहीं है और मुख्यमंत्री-मंत्री ही नहीं विधायक भी एयरकंडीशन में रह रहे हैं तब आम आदमी अपना गुस्सा कहां जाहिर करे।
हर बात में राजनीति ने आम लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बन है। आर्थिक रुप से पिछड़े इस राज्य के आम लोगों को मूलभूत सुविधा दिलाने की बजाय सरकार वल्र्ड रिकार्ड बनाने आमदा है कि उसकी राजधानी पूरी दुनिया में नए ढंग की सबसे खूबसूरत होगी? क्या इससे आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी? बल्कि इन वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की एशगाह खूबसूरत हो जाएगी। किसानों को अपना गांव छोडऩा पड़ रहा है और वे नए सिरे से अपना जीवन शुरु करने मजबूर है। एक बसी-बसाई परिवार गांव को उजाडक़र कोई कैसे सुख से रह सकता है। इसकी कल्पना किसी ने की है।
गांधी के इस देश में सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा रही है। धर्म की रक्षा के लिए यहां राम-कृष्ण का जन्म हुआ है। प्रभु ईशु, पैगम्बर से लेकर गुरुनानक महावीर और शंकराचार्य को मानने वालों के अलावा पत्थर भी पूजे जाते हैं तब भला कोई अपने जनप्रतिनिधि पर जूता क्यों उछाल रहा है? सब तरफ अपनी सुविधा बढ़ाने में लगे नौकरशाह और राजनेताओं के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का जूता फेंकना उदाहरण हो सकता है? जब तमाम लोग अपनी पीड़ा को व्यक्त करने लगेंगे तो क्या होगा? क्या इसकी कल्पना की गई है? यह हमारे धर्म में ही कहा गया है कि राजा परीक्षित चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी सर्पदंश के श्राप से नहीं बच सके थे। ऐसे में क्या आम लोगों के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले टैक्सों का हम अपने नही आम लोगों के हितों में कार्य करें।
समय किसी के लिए नहीं रुकता? और न ही पैसों से सुख ही खरीदा जा सकता है? इस सच्चाई के बाद भी पैसों के प्रति बढ़ती भूख का कारण विस्मयकारी है। लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर यह जवाबदारी है कि वह आम लोगों के प्रति न्याय करें। लेकिन अपने हितों के लिए जिस तरह से नेता कभी एक हो जाते हैं या कभी लडऩे लगते है उससे तो आम लोगों का ही नुकसान होना है और ऐसे में आम लोग चुनाव तक इंतजार करने की बजाय पहले ही सडक़ पर आ गए तो आप नौकरशाहों को निलंबित करते रहो, लोगों को जेल में ढूंसते रहो क्या फर्क पड़ेगा? आखिर अंग्रेज भी राज्य करने यही रणनीति अपना रहे थे।
छत्तीसगढ़ के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आधे राज्य में शासन नहीं है। ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो यह स्थिति बढ़ ही सकती है। क्या सिर्फ दो रुपए किलो चावल या रोजगार गारंटी योजना से आम लोगों का भला हो सकता है? गांवों में शिक्षा नहीं है, स्वास्थ्य सुविधा नहीं है पीने और सिंचाई के पानी की सुविधा नहीं है और मुख्यमंत्री-मंत्री ही नहीं विधायक भी एयरकंडीशन में रह रहे हैं तब आम आदमी अपना गुस्सा कहां जाहिर करे।
हर बात में राजनीति ने आम लोगों के जीवन को नारकीय बना दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य नया-नया बन है। आर्थिक रुप से पिछड़े इस राज्य के आम लोगों को मूलभूत सुविधा दिलाने की बजाय सरकार वल्र्ड रिकार्ड बनाने आमदा है कि उसकी राजधानी पूरी दुनिया में नए ढंग की सबसे खूबसूरत होगी? क्या इससे आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी? बल्कि इन वेतनभोगी जनप्रतिनिधियों की एशगाह खूबसूरत हो जाएगी। किसानों को अपना गांव छोडऩा पड़ रहा है और वे नए सिरे से अपना जीवन शुरु करने मजबूर है। एक बसी-बसाई परिवार गांव को उजाडक़र कोई कैसे सुख से रह सकता है। इसकी कल्पना किसी ने की है।
गांधी के इस देश में सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा रही है। धर्म की रक्षा के लिए यहां राम-कृष्ण का जन्म हुआ है। प्रभु ईशु, पैगम्बर से लेकर गुरुनानक महावीर और शंकराचार्य को मानने वालों के अलावा पत्थर भी पूजे जाते हैं तब भला कोई अपने जनप्रतिनिधि पर जूता क्यों उछाल रहा है? सब तरफ अपनी सुविधा बढ़ाने में लगे नौकरशाह और राजनेताओं के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का जूता फेंकना उदाहरण हो सकता है? जब तमाम लोग अपनी पीड़ा को व्यक्त करने लगेंगे तो क्या होगा? क्या इसकी कल्पना की गई है? यह हमारे धर्म में ही कहा गया है कि राजा परीक्षित चाक चौबंद व्यवस्था के बाद भी सर्पदंश के श्राप से नहीं बच सके थे। ऐसे में क्या आम लोगों के खून-पसीने की कमाई से मिलने वाले टैक्सों का हम अपने नही आम लोगों के हितों में कार्य करें।
समय किसी के लिए नहीं रुकता? और न ही पैसों से सुख ही खरीदा जा सकता है? इस सच्चाई के बाद भी पैसों के प्रति बढ़ती भूख का कारण विस्मयकारी है। लोकतंत्र के तीन स्तंभों पर यह जवाबदारी है कि वह आम लोगों के प्रति न्याय करें। लेकिन अपने हितों के लिए जिस तरह से नेता कभी एक हो जाते हैं या कभी लडऩे लगते है उससे तो आम लोगों का ही नुकसान होना है और ऐसे में आम लोग चुनाव तक इंतजार करने की बजाय पहले ही सडक़ पर आ गए तो आप नौकरशाहों को निलंबित करते रहो, लोगों को जेल में ढूंसते रहो क्या फर्क पड़ेगा? आखिर अंग्रेज भी राज्य करने यही रणनीति अपना रहे थे।
गुरुवार, 9 सितंबर 2010
क्यों ठंडा पड़ रहा युवाओं का खून...
इन दिनों पूरे देश में अजीब सा माहौल है। सांसद-विधायक अपना वेतन और सुविधा बढ़ाने में लगे हैं। भ्रष्ट होते नौकरशाह से आम आदमी त्रस्त है और सरकार उद्योगपतियों की जेब मे है उद्योगो के लिए जमीनें दी जा रही है अपनी सुविधा के लिए राजधानी बसाए जा रहे हैं और पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक हो गई है। शासकीय कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने में आमदा है और पूरी सरकार भ्रष्ट अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पर रख रही है और देश का युवा पढ़ाई और कमाई में सब कुछ ऐसा होम कर देना चाहता है मानों पैसा ही सब कुछ है?
इस स्थिति के खिलाफ न कोई विवेकानंद है और न महात्मा गांधी, विनोबा भावे। जिन्हें जनता चुन रही है वे ही जब अपनी सुविधा में मर रहे हो तो युवा किसे आदर्श बनाएं। एक जमाना था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ही नहीं देश के कई शहरों में छात्र नेताओं का बोलबाला था और उनके किसी भी बातों पर शासन-प्रशासन के होथ उड़ जाते थे। भ्रष्टाचारी अफसर हो या चरित्रहीन नेता सभी के मन में भय था कि गलत करने पर युवा छोड़ेंगे नहीं। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा पद्धति में जो बदलाव हुआ और युवाओं में एनएसयूआई, एबीवीपी या युवा ब्रिगेडरों ने पट्टा डालना शुरु किया तभी से इस देश में भ्रष्टाचार की एक नई ईबादत लिखी जा रही है। पहले पढ़ाई का बोझ और फिर पैसा कमाने की धुन ने समाज देश का सर्वाधिक अहित किया। शिक्षा के व्यवसायीकरण के चलते युवाओं की सोच भी व्यवसायिक हो गई।छत्तीसगढ़ में एक जमाना था जब महंगाई को लेकर छात्र नेता पिल पड़ते थे। गंदगी पर निगम अधिकारियों के मुंह पर कालिख से लेकर सांसद-विधायकों की धोती तक खोल दी जाती थी। अब यह सब कुछ नहीं दिखता। यह अच्छी बात भी है लेकिन इसका दुष्परिणाम सबके सामने है। भूमाफिया से लेकर भ्रष्ट नेता-अफसरों से आम आदमी त्रस्त है। राशन दुकान से लेकर शिक्षा तक में माफिया हावी है। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई का स्तर बदत्तर होता जा रहा है और शिक्षा मंत्री चंद रुपयों के लालच में विवादास्पद लोगों को प्रमुख पदों पर बिठा रहे हैं। ऐसे में शिक्षा किस तरह की होगी समझा जा सकता है। जो लोग सरकारी नौकरी में है वे सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की मांग कर रहे है। 58 से 60 हो चुका अब 62-65 की मांग है और यह मांग भी पूरी हुई तो लोगों को फिर नौकरी के लिए इंतजार करना पड़ेगा। लेकिन वे लोग भी खुलकर विरोध नहीं कर रहे है जो लोग निर्धारित आयु सीमा के करीब है। सरकारी सेवानिवृत्त को संविदा पर संविदा दिए जा रही है तब भी लोग चुप है।
उद्योगों के कारण शहर का पर्यावरण बर्बाद हो रहा है। खेत बंजर हो रहे हैं पानी जहरीला हो रहा है और सरकार इसके खिलाफ कार्रवाई की बजाय उद्योग के लिए किसानी जमीन अधिग्रहित कर रही है। छत्तीसगढ़ में तो आम चर्चा है कि भ्रष्टाचार चरम पर है गरीबों का चावल तक खाया जा रहा है और नौकरशाह मनमर्जी कर रहे है आईएएस बाबूलाल अग्रवाल हो या मालिक मकबूजा कांड के दोषी आईएएस नारायण सिंह सभी को प्रमुख पदों पर बिठाया जा रहा है।
एचआर प्रकरण की फाईल गायब,बिरजू के राम, बड़े बलवान
दंतेवाड़ा जिला शिक्षा अधिकारी डा. एच.आर. शर्मा की संविलियन से लेकर दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी के सफर की सरकारी फाईल गायब हो गई है। शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के वरदहस्त प्राप्त प्रो. एच.आर. शर्मा न केवल दमदार बताए जाते हैं बल्कि उनकी नियुक्ति पर ही सवाल उठाये गए हैं।
भाटापारा में असिटेंट प्रोफेसर रहे डा. एच.आर. शर्मा की दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्ति को अवैधानिक बताया जा हा है। इस संबंध में विस्तार से खबर भी प्रकाशित हुई है लेकिन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं सीएम हाउस से भी जबरदस्त सेटिंग की वजह से इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। हमारे अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हाईकोर्ट द्वारा डा. शर्मा के संविलियन को रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री हेमचंद यादव फिर बृजमोहन अग्रवाल की निजी रुप से रुचि लेने की वजह से वे अब भी दंतेवाड़ा में न केवल जिला शिक्षा अधिकारी बल्कि परियोजना समन्वयक के दोहरे पद पर पदस्थ हैं।
बताया जाता है कि कुछ आईएएस अधिकारियों की रूचि की वजह से उनकी नियुक्ति खाद्य निगम में भी की गई थी लेकिन जैसे ही इसकी जानकारी आईएएस एम.के. राउत को हुई थी उन्होंने डा. शर्मा की नियुक्ति लौटा दी थी। चूंकि डा. शर्मा कोई मूल विभाग में पदस्थ नहीं है। इसलिए उन्हें दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी बना दिया गया और इतना ही नहीं उन्हें राजीव गांधी शिक्षा मिशन में भी प्रभार दे दिया गया।
डा. शर्मा के प्रति भाजपा सरकार के मंत्रियों की क्या रूचि है यह तो वहीं जाने लेकिन जब डा. शर्मा के खिलाफ जाच की बात हुई तो फाईल ही गायब होने की चर्चा है। बताया जाता है कि डेढ़ सौ पृष्ठ के नोट शीट के अलावा पीएससी से लेकर हाईकोर्ट के प्रमाणिक दस्तावेज वाले इस फाईल को गायब करा दिया गया है। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में जबरदस्त घपलेबाजी की जा रही है और एक बड़ा हिस्सा उच्च पदस्थ लोगों को पहुंचाया जाता है। इधर फाईल गायब होने को लेकर शिक्षा विभाग में जबरदस्त हडक़म्प है और इस मामले को दबाया जा रहा है।
भाटापारा में असिटेंट प्रोफेसर रहे डा. एच.आर. शर्मा की दंतेवाड़ा में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्ति को अवैधानिक बताया जा हा है। इस संबंध में विस्तार से खबर भी प्रकाशित हुई है लेकिन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं सीएम हाउस से भी जबरदस्त सेटिंग की वजह से इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। हमारे अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक हाईकोर्ट द्वारा डा. शर्मा के संविलियन को रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री हेमचंद यादव फिर बृजमोहन अग्रवाल की निजी रुप से रुचि लेने की वजह से वे अब भी दंतेवाड़ा में न केवल जिला शिक्षा अधिकारी बल्कि परियोजना समन्वयक के दोहरे पद पर पदस्थ हैं।
बताया जाता है कि कुछ आईएएस अधिकारियों की रूचि की वजह से उनकी नियुक्ति खाद्य निगम में भी की गई थी लेकिन जैसे ही इसकी जानकारी आईएएस एम.के. राउत को हुई थी उन्होंने डा. शर्मा की नियुक्ति लौटा दी थी। चूंकि डा. शर्मा कोई मूल विभाग में पदस्थ नहीं है। इसलिए उन्हें दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी बना दिया गया और इतना ही नहीं उन्हें राजीव गांधी शिक्षा मिशन में भी प्रभार दे दिया गया।
डा. शर्मा के प्रति भाजपा सरकार के मंत्रियों की क्या रूचि है यह तो वहीं जाने लेकिन जब डा. शर्मा के खिलाफ जाच की बात हुई तो फाईल ही गायब होने की चर्चा है। बताया जाता है कि डेढ़ सौ पृष्ठ के नोट शीट के अलावा पीएससी से लेकर हाईकोर्ट के प्रमाणिक दस्तावेज वाले इस फाईल को गायब करा दिया गया है। इधर हमारे सूत्रों ने बताया कि दंतेवाड़ा में नक्सलियों की आड़ में जबरदस्त घपलेबाजी की जा रही है और एक बड़ा हिस्सा उच्च पदस्थ लोगों को पहुंचाया जाता है। इधर फाईल गायब होने को लेकर शिक्षा विभाग में जबरदस्त हडक़म्प है और इस मामले को दबाया जा रहा है।
बुधवार, 8 सितंबर 2010
राजधानी की खबरें
तस्वीर की नजर में आज राजधानी
स्वक्छता अभियान को लेकर प्रशासकीय काम
साक्छरता के लिए बच्चो ने रैली निकाली
NSUI में चुनाव
बिकी तो नहीं ठेके पर चला गया...
नवभारत के मालिकों में इन दिनों बंटवारे को लेकर मीडिया जगत में जबदस्त चर्चा है। कभी रायपुर संभाल रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी का अब यहां से कोई लेना नहीं रहा तो चर्चा इस बात की है कि बंटवारे में मिले रायपुर नवभारत को समीर जी चलाना नहीं चाहते। जिंदल से जोगी तक खरीदने की चर्चा में अब यह चर्चा भी है कि रायपुर नवभारत ठेके पर चला गया है। ठेका कभी सूर्या में घपला करने वाले ने लिया है। मालिक को पैसे से मतलब है यह ठेकेदार सबको यही समझाकर विज्ञापन या नगद ले रहा है। सच्चाई तो समीर जी जाने। लेकिन जब बिल्डिंग की वैधता को लेकर ही तलवारें लटक रही हो तो बदनामी से काहे का डर वैसे भी एनबी प्लांटेशन के बाद भी क्या बिगड़ गया सरकार तो वैसे ही जेब में हैं।
भास्कर में भी बिहारी बाबूइन दिनों भास्कर के बिहारी बाबू की जबरदस्त चर्चा है। डीजी बिहारी हैं तो डर काहे का की तर्ज पर जब तक गोली मारने की धमकी से यहां कई लोग परेशान हैं और जब मालिक की नीति ही फूट डालो राज करों की हो तो विवाद कैसा? फिर कब तक सिर्फ बातों का जमा खर्च है गोली चली भी नहीं है तो शिकायतों पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं है।
सौम्या की छलांग
जनसंपर्क में अधिकारी रहे मिश्रा जी की बिटिया ने अपने ताऊ के अखबार से छुट्टी ले ली है जब भास्कर जैसा बैनर हो और वेतन भी 60 हजार हो तो कौन पूछता है वैसे भी घर की मुर्गी दाल बराबर मानी जाती है और कभी ऊंच-नीच हो भी गया तो ताऊ-पापा तो हैं ही।
दिवाकर की पीड़ा
गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य व समाज को बहुत कुछ दिया लेकिन दिवाकर मुक्तिबोध की पीड़ा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। भास्कर से जनधारा तक का सफर भारी पड़ रहा है। युगधर्म में चंगु-मंगु ने संपादकीय छुड़वा दी थी तो जनधारा में चहेती बिटिया ने अपमानित किया अब जब काम करना है तो इतना तो सहना ही पड़ेगा। भले ही कल का देवेन्द्र बड़ा पद ले ले।
देवेन्द्र खुश हुआ
नौकरी के लिए अच्छा पत्रकार होना जरूरी नहीं है। न ही खबरें लिखना ही जरूरी है। अधिकारियों से सेटिंग हो तो मालिक भी खुश रहता है। इस रणनीति पर चलने वाले खुश रहते हैं। हरिभूमि छोडक़र जनधारा पहुंचे देवेन्द्र कर अब अखबार का प्रकाशक-मुद्रक हो गया है तो खुश तो होगा ही।
यशवंत भास्कर में
कभी हरिभूमि रायपुर से हरिभूमि बिलासपुर पहुंचे यशवंत गोहिल इन दिनों बिलासपुर भास्कर पहुंच गए हैं। उनका सफर भास्कर तक ही है यह कहना कठिन है लेकिन सफर को लेकर बिलासपुर में जबरदस्त चर्चा है।
प्राण चड्डा और एसएमएस
भास्कर में सलाहकार संपादक रहे प्राण चड्डा अब यहां से रिटायर्ड हो गए हैं। ढलहा बनिया हलाये कन्हिया की तर्ज पर इन दिनों उनकी सुबह एसएमएस भेजने से शुरु होती है और रात गुडनाईट के एसएमएस से खत्म होती है। उनके एसएमएस भी निराले हैं पत्रकार तो डरने लगे है कि कहीं एसएमएस डिलिट नहीं हुआ तो क्या होगा इसलिए तत्काल डिलिट करते हैं ताकि घरवालों से तो बच सकें।
राजीव पहुंचे पत्रिका
सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ में अपनी फोटोग्राफी का रंग दिखा चुका बिहारी बाबू राजीव अब पत्रिका में चले गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ में वे परेशान थे। वजह तो मालिक जाने।
मधु बीमार
जनधारा और अग्रदूत की पत्रकारिता में नाम कमा चुके मधुसूदन शर्मा की तबियत इन दिनों बेहद खराब है। उनके स्वास्थ्य लाभ की हम सब कामना करते है। उन्हें पैरालिसिस अटैक के चलते नागपुर अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।
और अंत में...
शहर में भास्कर को मात देने के लिए आ रहे एक अखबार को जिस तरह का पत्रकार चाहिए वह मिल नहीं रहा है। या फिर पत्रकार ढूंढने वाले का चेहरा देख लोग भाग रहे हैं। यह सवाल इन दिनों मीडिया जगत में चर्चा में हैं।
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