शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

स्थापना पर मुक्तिमोर्चा का कार्यकर्ता सम्मेलन 1 को

 छत्तीसगढ राय स्थापना के उपलक्ष्य में मूल निवासी मुक्ति मोर्चा के द्वारा त्रिवेणी भवन बिलासपुर में प्रांतीय कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया है। यह जानकारी मोर्चा के अध्यक्ष गोपाल ऋषिकर भारती एवं सचिव महिला प्रभाग श्रीमती उषा आफले ने दी।

बेहतर स्वास्थ्य, रोजगार एवं बुनियादी सुविधओं की गारंटी पर आधारित छत्तीसगढ़ को प्रबुध्द आदर्श राय बनाने की दिशा में चलाए जा रहे अभियान के अंतर्गत कार्यकर्ताओं को जानकारी दी जाएगी। छत्तीसगढ़ राय निर्माण आंदोलन के प्रणेता एवं प्रथम जेल यात्री गुरुघासीदास जयंती के जन्मदाता स्वर्गीय नुकूल ढीढी (मंत्री जी) को मरणोपरान्त छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित करने की मांग की जाती है। छत्तीसगढ़ में डा. बाबा साहब अम्बेडकर की विचार धारा आंदोलन तथा उनके संगठनों को स्थापित करने वाले नेतृत्वकर्ता नुकूल ढीढी जी थे। उन्हाेंने 1951 से ही छत्तीसगढ़ राय के प्रयत्न करना प्रारंभ किया सन् 1961 में आल इंडिया रिपब्लिकन पार्टी छत्तीसगढ़ राय शाखा का गठन किया था। दिनांक 13 दिसंबर 1970 को रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के बैंगलोर राष्ट्रीय अधिवेशन में पृथक छत्तीसगढ़ राय निर्माण का प्रस्ताव पारित करवाएं। दिनांक 27 अक्टूबर 1972 को रायपुर जिला कचहरी के समक्ष आंदोलन करते हुए 19 साथियों के साथ जेल भेजे गए। 31 अक्टूबर को रिहा किए गए। उनके 45 साथियों को महासमुंद में सुखरु प्रसाद बंजारे एवं भागवत कोसरिया के साथ गिरफ्तार किया गया। दिनांक 18 दिसंबर 1938 को छत्तीसगढ़ के ग्राम भोरिंग में गुरु घासीदास की जयंती का प्रथम आयोजन किया वे छत्तीसगढ़ में इस जयंती के जन्मदाता थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित अनेकों पार्टियों के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया जा रहा है, जिनमें मुंबई के पूर्व सांसद एवं रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास आठवले छत्तीसगढ़ विकास पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद पी.आर. खुंटे सहित सामाजिक सांस्कृतिक नेताओं द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

यह तो भाजपाई राजनीति की दोगलाई है...

क्वींस बेटन के स्वागत को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बहिष्कार कर दिया तो छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वागत पर कूद गए थे। एक ही पार्टी के दो मुख्यमंत्रियों का यह खेल किस श्रेणी में जाता है यह तो वही जाने लेकिन आम लोगों में इस खेल को दोगलाई बताया जा रहा है।
वैसे तो धर्म की राजनीति कर सत्ता तक पहुंची भारतीय जनता पार्टी के सिध्दांत क्या हैं यह कोई नहीं जानता। कुर्सी के लिए राम तक को त्यागने के आरोप से ग्रसित भाजपा के नेता धारा 370 से लेकर एक विधान तक को भूल चुके हैं। ऐसे में समय-समय पर बदलते सिध्दांत ने भाजपा को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला दिल्ली में होने वाले कामनवेल्थ गेम का है। अपने-अपने हितों के हिसाब से भाजपाई इस मामले में राग अलाप रहे हैं। इस मामले में भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी क्या सोचता है किसी को पता नहीं है।
भाजपा की हालत यह है कि कोई नेता नहीं है या फिर सत्ता और पदों में बैठे सभी नेता है जो अपने हितों के लिए नए-नए सिध्दांत गढ़ रहे हैं। क्वीस बेंटन के मामले में तो भाजपा की जितनी छिछालेदर हो रही है उतनी कभी नहीं हुई। छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जहां क्वीस बेटन के स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखा था तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह यह कहकर क्वींस बेटन के कार्यक्रम का बहिष्कार कर गए कि उन्हें इसमें गुलामी दिखाई देती है जबकि उसके मंत्रिमंडल के सदस्य स्वागत कर रहे हैं।
भाजपा नेता यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि सबकी अपनी सोच है लेकिन आम लोगों में जबरदस्त प्रतिक्रिया है। यही वजह है कि राम मंदिर मामले में भी सत्ता पाते ही यही रणनीति अख्तियार की गई थी। अब तो उसके देश प्रेम के मुद्दे पर ही सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में कांग्रेसी यह कहें कि आजादी की लड़ाई में भाजपाई दूर क्यों थे तो किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए?
रीमेक नहीं मौलिक बने छत्तीसगढ फ़िल्में
तपेश जैन
रायपुर। ''सास गारी देबे, ननद चुटकी लेबे, ससुरार गेंदा फूल'' हिन्दी फिल्म दिल्ली-6 में शामिल किए गए इस गाने ने छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कायन करने के साथ ही छत्तीसगढ़ी फिल्मों का भी नया जीवनदान दिया है। गाना सुपरहिट हुआ तो देश का ध्यान छत्तीसगढ़ी पर आकर्षित हुआ और सन् 2003 के बाद मरणासन् छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग को जैसे जीवनदान मिल गया। सन् 2009 में लंबे समय के बाद रिलीज हुई तीजा के लुगरा की आंशिक सफलता ने सतीश जैन को पुन: फिल्म बनाने प्रेरित किया और उन्होंने मया का निर्माण कर यह साबित किया कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों के दर्शक है और अच्छी फिल्में लाभ प्रदान कर सकती है। इस मामले में डीजीटल टेक्नोलॉजी ने भी बड़ी भूमिका अदा की है। गौरतलब है कि पूर्व में बनी छत्तीसगढी फ़िल्मों की पिक्चर और वॉयल क्वालिटी ठीक नहीं होने से भी कारी जैसी अच्छी फिल्म नहीं चल पाई थी। सस्ती डिजीटल टेक्नोलॉजी ने न केवल पिक्चर की गुणवत्ता में सार्थक परिवर्तन आया बल्कि आवाज भी स्पष्ट हो गई। लेकिन मया की सफलता के बाद जो छत्तीसगढ़ फिल्म निर्माण की भेड़चाल शुरु हुई और बालीवुड फिल्मों के रीमेक के साथ नकल की परंपरा ने तीस से भी यादा असफल फिल्मों ने एक बार फिर इस बात पर चिंतन के लिए प्रेरित किया है कि दर्शक बालीवुड की नकल नहीं बल्कि मौलिक कहानियों पर आधारित फिल्में पसंद करते है और उन्हें अपनी भाषा में स्थानीय मनोरंजन के तत्व चाहिए। घिसे पिटे फार्मूले की हिन्दी फिल्मों की रीमेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में फ्रेम दर फ्रेम नकल यह दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मौलिक कहानियों का अभाव है और जो फिल्में बना रहे है उनका उद्देश्य कुछ और है। इस वजह से सन् 2000 के बाद बनी 30 से 40 फ्लाप फिल्मों ने मार्केट खराब कर दिया था। अब पुन: ऐसी स्थिति बन रही है कि कोई भी बिना तकनीक और फिल्म की भाषा शैली समझे मैदान में उतर गया है।
मया के बाद कुछेक फिल्मों ने एक-दो दिन बाद ही दम तोड़ दिया। प्रदर्शन के कुछ शो बाद ही दर्शकों को यह पता चल गया कि मस्ती के लिए फिल्म बनाई गई है। देखा जाए तो अभी तक एक भी ऐसी छत्तीसगढ़ी फिल्म नहीं बनी है जो अपनी कथा वस्तु की वजह से लोकप्रिय हुई हो। इन फिल्मों में फूहड़ हास्य और अश्लीलता का प्रयोग भी किया गया लेकिन सफल नहीं हो सका है। भोजपुरी फिल्मों की तरह छत्तीसगढ़ में द्विअर्थी संवाद और गाने पसंद नहीं किए जाते है इसलिए अच्छा तो यही होगा कि फिल्म का शिल्प समझकर छत्तीसगढ़ की ही मौलिक कहानियों पर फिल्में बने, नहीं तो पुन: इसका भविष्य अंधकार में होगा।

मोहन से भरोसा टूटा अन्य मंत्री भी लगे प्रचार में

भटगांव उपचुनाव

भाजपा की मुसिबत बढ़ी, चावल-दारू भारी पड़ा
 भटगांव उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की मुसीबत बढ़ते ही जा रही है। चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग और गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। वहीं प्रभारी बनाए गए पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की छवि ने भी भाजपा को सकते में ला दिया है। एन वक्त पर प्रभारी हटाने से विरित असर पडने की संभावना के चलते अब भाजपा ने दूसरे मंत्रियों को भी यहां जिम्मेदारी दे दी है।
छत्तीससगढ़ के भटगांव विधानसभा के लिए हो रहे उपचुनाव को लेकर जबरदस्त होड़ है। भाजपा ने जहां सरकार की पूरी ताकत को झोंक दिया है वहीं कांग्रेस भी कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती। भाजपा के लिए यह उपचुनाव तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। वर्तमान में भाजपा के सिर्फ 47 विधायक है जो बहुमत से एक-दो सीट ही अधिक है ऐसे में यह चुनाव हारने पर डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है। वैसे रमन सिंह ने यह चुनाव जीतने के लिए यहां से श्रीमती रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट ही नहीं बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाकर तिकड़म से वोट बटोरने का संकेत दिया है।
बताया जाता है कि भाजपा ने यह नहीं सोचा था कि हाय हलो की छवि वाले बृजमोहन अग्रवाल पर लगे आरोप भी यहां मुद्दे बन जाएंगे। बताया जाता है कि घटिया सड़क निर्माण से लेकर पर्यटन विभाग में हुए घोटाले ने तो बृजमोहन अग्रवाल को परेशान किया ही है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी भी यहां मुद्दा बनता जा रहा है। चूंकि बृजमोहन अग्रवाल के पास शिक्षा विभाग भी है ऐसे में स्कूलों में शिक्षकों की कमी यहां प्रमुख मुद्दा बन सकता है।
बताया जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल को लेकर चल रही चर्चा ने क्षेत्र के भाजपाईयों के होश उड़ा दिए हैं और इसकी खबर जब संगठन व सरकार को हुई तो आनन-फानन में अन्य मंत्रियों को भी जिम्मेदारी दे दी गई है ताकि इसका प्रभाव कम किया जा सके। बताया जाता है कि पूर्व अध्यक्ष शिवप्रताप की खामोशी ने तो भाजपा को बेचैन किया ही है चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग को प्रभावित करने नई रणनीति बनाई जा रही है। बताया जाता है कि दो रुपया किलो चावल योजना ने मध्यम वर्ग को सर्वाधिक हलाकान किया है। न घर के लिए और न ही खेती के लिए ही मजदूर मिल रहे हैं कई लोग तो महंगाई को ही इसकी वजह बता रहे हैं।
वहीं गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से भी महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे में आदिवासियों की उपेक्षा भी आदिवासी क्षेत्रों में मुद्दा बनता जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी यू.एस. सिंहदेव को मिल रहे व्यापक समर्थन और कांग्रेसियों की एकता ने भी भाजपा को नए सिरे से रणनीति बनाने मजबूर कर दिया है। बहरहाल यह कहा जा रहा है कि यदि कांग्रेसियों ने यह सीट जीत ली तो डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

दल बदल कानून से पाटिर्यों में तानाशाही...

अटल सरकार ने जब दल बदल कानून लाया होगा तब उन्हें भी शायद इस बात की कल्पना नहीं रही होगी कि यह लोकतंत्र का हत्यारा साबित होगा? यदि दलबदल कानून का फायदा राजनैतिक दलों को मिला है तो इस कानून से जनता को सर्वाधिक नुकसान उठाना पड़ा है।
अटल सरकार ने यह कानून यह सोचकर लाया था कि इससे पार्टियाें में टूट नहीं होगी और पैसा खाकर निष्ठा बदलने की परम्परा भी खत्म हो जाएगी। दरअसल तोड़फोड़ की राजनीति का शिकार भी भाजपा सर्वाधिक हुई है और अन्य दल भी अपने विधायक-सांसदों से आशंकित रहते थे कि कब वे बिक न जाए। इस डर की वजह से लाया गया कानून आम लोगों के लिए कितना विभत्स हो गया है यह अब देखने को मिल रहा है।
रायों में तो मुख्यमंत्री खुलेआम दादागिरी कर रहे हैं उन्हें सिर्फ प्रदेश प्रभारी और हाईकमान को पटा कर रखना है बाकी जैसी मर्जी वैसा करो? इस कानून के चलते विधायकों-सांसदों की जमकर अनदेखी की जा रही है। विधायक जानते हैं कि मुख्यमंत्री की शिकायत करना ठीक नहीं है इसलिए वे खामोश रह जाते हैं और यादा शिकायत की तो पार्टी से हकाले भी जा सकते हैं। इतना ही नहीं अनाप-शनाप नियम बनाने में पार्टी व्हीप के नाम पर जिस तरह से जबरिया वोटिंग कराने का प्रावधान है वह आत्मा को मारने वाली है। गलत बातों का भी समर्थन करने की मजबूरी ने विधायक-सांसदों को इस कदर पार्टी का गुलाम बना दिया है कि पार्टी हित के आगे देश या प्रदेश का हित किनारे किया जाने लगा है।
यही नहीं मुख्यमंत्री चेहरा देखकर काम करने लगे हैं छत्तीसगढ़ में ही कई भाजपा विधायक है जो सरकार की करतूतों से नाराज हैं और वे इसलिए नहीं बोलते हैं कि उनके खिलाफ पार्टी कार्रवाई कर देगी? एक विधायक ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि किस तरह से अधिकारियों की मनमानी के चलते उनके क्षेत्र का विकास कार्य ठप्प पड़ गया है और उन्हें खामोश रहने धमकी दी जाती है। इस विधायक ने तो इस कानून के बनने के बाद पार्टी विधायकों व सांसदों की हालत दयनीय होने का दावा किया। यह स्थिति अमूमन सभी दलों में है। पार्टी के बाहर जाकर जनहित के मुद्दे उठाने पर विधायकी जाने वाले इस कानून को बदलने की मांग भी दबे जुबान में होने लगी है।
एक विधायक ने कहा कि इस कानून के कारण ही भ्रष्टाचार बढ़ी है। वेतन और जीवनभर मिलने वाले पेंशन के कारण पार्टियों से जुड़े रहने की मजबूरी ने आम लोगों के हितों पर कुठाराघात किया है। एक विधायक ने कहा कि ठीक है पार्टी का प्रभाव जीत का मार्ग प्रशस्त करती है लेकिन अब वह जमाना नहीं है कि पार्टी टिकिट दे और जीत जाए। स्वयं की छवि भी महत्वपूर्ण होती है ऐसे में पार्टी की दादागिरी तानाशाही तक जा पहुंची है। वास्तव में इस कानून ने जिस तरह से विधायकों और सांसदों को पार्टी का गुलाम बना दिया है उससे आने वाले दिनों में जनहित की बजाए राजनैतिक फायदे की बात ही अधिक होगी जो देश और समाज दोनों के लिए खतरा है।

एचआर प्रकरण की फाईल चोरी की एफआई आर कराने से कतरा रही है शिक्षा विभाग

एचआर प्रकरण की फाईल चोरी की एफआई आर कराने से कतरा रही है शिक्षा विभाग
 दंतेवाड़ा में शिक्षा अधिकारी के पद पर पदस्थ डॉ. एच.आर. शर्मा की फाईल चोरी का रहस्य गहराते जा रहा है। फाईल गुमने की जांच तो शुरु कर दी गई है लेकिन उच्च स्तरीय दबाव के चलते मामला पुलिस को सौंपने से शिक्षा विभाग कतरा रही है।
उल्लेखनीय है कि  डॉ. एच.आर. शर्मा के संविलियन को हाईकोर्ट द्वारा रद्द करने व निगम से सचिव एम.के. राउत द्वारा सेवा लौटाने की खबर छापी थी इससे उच्च स्तरीय दबाव पर कार्रवाई तो नहीं हुई उल्टे डा. एच.आर. शर्मा की फाईल शिक्षा विभाग से गायब हो गई। बताया जाता है कि फाईल गायब होने की खबर प्रसारित होने से शिक्षा विभाग में हड़कम्प मच गया है और उच्च स्तरीय दबाव के बाद भी फाईल गायब होने की जांच तो शुरु कर दी गई है लेकिन फाईल चोरी होने की एफआईआर नहीं कराई जा रही है।
ज्ञात हो कि भाजपा की पूर्व महिला सांसद के दबाव में संविलियन की कोशिश विफल होने के बाद भी डॉ. शर्मा की नियुक्ति शिक्षा विभाग में की गई है। यहीं नहीं शिक्षा विभाग में मूल रुप से नहीं होने के बाद भी डा. शर्मा को न केवल दंतेवाड़ा जिला शिक्षा अधिकारी बनाया गया है बल्कि परियोजना समन्वयक का भी चार्ज सौंपा गया है। इस विभाग के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल हैं जबकि तत्कालीन शिक्षा मंत्री हेमचंद यादव के भी पूर्व महिला सांसद के दबाव में विशेष रूचि लेने की चर्चा है। बताया जाता है कि वर्तमान शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी शिकायत के बाद भी कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं। जबकि तत्कालीन शिक्षा सचिव नंदकुमार परतो लेन-देन के आरोप लगे हैं। इधर यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है इससे शिक्षा विभाग पर भी दाग लगने लगा है।

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मोहन से भरोसा टूटा अन्य मंत्री भी लगे प्रचार में

भटगांव उपचुनाव
भाजपा की मुसिबत बढ़ी, चावल-दारू भारी पड़ा
 भटगांव उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की मुसीबत बढ़ते ही जा रही है। चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग और गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। वहीं प्रभारी बनाए गए पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की छवि ने भी भाजपा को सकते में ला दिया है। एन वक्त पर प्रभारी हटाने से विरित असर पडने की संभावना के चलते अब भाजपा ने दूसरे मंत्रियों को भी यहां जिम्मेदारी दे दी है।
छत्तीससगढ़ के भटगांव विधानसभा के लिए हो रहे उपचुनाव को लेकर जबरदस्त होड़ है। भाजपा ने जहां सरकार की पूरी ताकत को झोंक दिया है वहीं कांग्रेस भी कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती। भाजपा के लिए यह उपचुनाव तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। वर्तमान में भाजपा के सिर्फ 47 विधायक है जो बहुमत से एक-दो सीट ही अधिक है ऐसे में यह चुनाव हारने पर डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है। वैसे रमन सिंह ने यह चुनाव जीतने के लिए यहां से श्रीमती रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट ही नहीं बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाकर तिकड़म से वोट बटोरने का संकेत दिया है।
बताया जाता है कि भाजपा ने यह नहीं सोचा था कि हाय हलो की छवि वाले बृजमोहन अग्रवाल पर लगे आरोप भी यहां मुद्दे बन जाएंगे। बताया जाता है कि घटिया सड़क निर्माण से लेकर पर्यटन विभाग में हुए घोटाले ने तो बृजमोहन अग्रवाल को परेशान किया ही है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी भी यहां मुद्दा बनता जा रहा है। चूंकि बृजमोहन अग्रवाल के पास शिक्षा विभाग भी है ऐसे में स्कूलों में शिक्षकों की कमी यहां प्रमुख मुद्दा बन सकता है।
बताया जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल को लेकर चल रही चर्चा ने क्षेत्र के भाजपाईयों के होश उड़ा दिए हैं और इसकी खबर जब संगठन व सरकार को हुई तो आनन-फानन में अन्य मंत्रियों को भी जिम्मेदारी दे दी गई है ताकि इसका प्रभाव कम किया जा सके। बताया जाता है कि पूर्व अध्यक्ष शिवप्रताप की खामोशी ने तो भाजपा को बेचैन किया ही है चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग को प्रभावित करने नई रणनीति बनाई जा रही है। बताया जाता है कि दो रुपया किलो चावल योजना ने मध्यम वर्ग को सर्वाधिक हलाकान किया है। न घर के लिए और न ही खेती के लिए ही मजदूर मिल रहे हैं कई लोग तो महंगाई को ही इसकी वजह बता रहे हैं।
वहीं गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से भी महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे में आदिवासियों की उपेक्षा भी आदिवासी क्षेत्रों में मुद्दा बनता जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी यू.एस. सिंहदेव को मिल रहे व्यापक समर्थन और कांग्रेसियों की एकता ने भी भाजपा को नए सिरे से रणनीति बनाने मजबूर कर दिया है। बहरहाल यह कहा जा रहा है कि यदि कांग्रेसियों ने यह सीट जीत ली तो डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है।

निधि तिवारी हत्याकांड - मामला तूल पकड़ने लगा ...

सामाजिक संगठन भी आगे आये...
 जल विहार कालोनी में निधि तिवारी को उसके पति व ससुराल वालों द्वारा कथित मार डालने का मामला अब तूल पकडने लगा है। निधि के मायके वालों के साथ सामाजिक संगठनों के सामने आने से मामला गंभीर हो गया है। महिला आयोग ने भी इस मामले में रुचि दिखाने लगा है। प्रेस क्लब रायपुर में निधि के माता पिता परिजनों और जागरूक सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों द्वारा आयोजित पत्रकार वार्ता में इस विभत्स हत्याकांड का पर्दाफाश करते हुये बताया कि निधि तिवारी की जलविहार कालोनी रायपुर में गत दिनों संदेहास्पद स्थिति में हत्या कर दी गई थी। इस प्रकरण में निधिकी हत्या अत्यंत अमानवीय, विभत्स एवं दर्दनाक तरीके से की गई। पहले उसे जहर देकर मारने का प्रयास किया गया, ना मरने पर डंडा, राड से मारनें फिर भी ना मरने पर कई लोगों द्वारा उसे पकड़कर गला घोट कर मारा गया उसके बाद निधि पर मिट्टी तेल डालकर जला दिया गया। पोस्टमार्टम में निधि के पेट में जहर अथवा नशीला पदार्थ मिला, उसके शरीर पर अनेक चोटों के निशान थे तथा गले पर लिगेचर मार्क पाया गया, गले को बेदर्दी से घोंटकर अथवा दबा कर मारा गया। फिर उसके बाद उपरोक्त तरीके से की गई हत्या के साक्ष्य को मिटाने के लिये मृत निधि के शरीर को कुछ घंटे बाद मिट्टी तेल डालकर जला दिया गया ताकि उसकी मृत्यु का कारण ऐसा प्रतीत हो मानो निधि ने मिट्टी तेल डालकर आत्महत्या कर ली हो। ये तथ्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मौकाए वारदात, घटनास्थल के लिए गए फोटोग्राफ, पोस्टमार्टम स्थल में मृत निधि के लिए गए फोटो तथा विडियो रिकार्डिंग मृतका के द्वारा अपने माता पिता को लिखे गये पत्र जिसमें निधि ने अपने पति व ससुरालियों पर जान से मारने की साजिश की जानकारी एवं आशंका, जिसका मूल कारण पति राजेश तिवारी का अपनी विधवा भाभाी रेखा तिवारी से अवैध संबंध तथा बार-बार निधि पर मायके से रूपये मंगाये जाने का दबाव व शारीरिक तथा मानसिक प्रताड़ना ही है। पूर्व में प्रताड़ना के कारण निधि अपने मायके में 2 वर्षों तक थी। परिजनों ने बताया कि प्रारंभ से ही निधि के पति राजेश तिवारी, जेठ सुधीर तिवारी, जेठानी सन्नी तिवारी, विधवा जेठानी रेखा तिवारी, पंकज शुक्ला करीबी रिश्तेदार, मीनू अवस्थी ननंद, मकान मालकिन दर्शन कौर अहलूवालिया, उसकी बेटी नीरू एवं सिम्मी अहलूवालिया बेटा सोनू अहूवालिया तथा पड़ोस का कार चालक प्रदीप नायक, तत्कालीन थाना प्रभारी राजेश चौधरी एवं सहायक उपनिरीक्षक आर.एस. गिरी तेलीबांधा थाना और मेकाहारा के पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर चुरेन्द्र एवं डाक्टर मांझी की भूमिका अत्यंत संदिग्ध व आपत्तिजनक रही है। इन सबकी मिलीभगत से ही इस जघन्य हत्याकांड पर परदा डालते हुए उसे आत्महत्या निरूपित किया जा रहा है। उपरोक्त संदर्भ में मृतका निधि के पिता नेहरू नगर भिलाई निवासी सूर्यकांत शुक्ला, माता श्रीमती बेलारानी शुक्ला एवं मायके पक्ष के अन्य पीड़ित व दु:खित परिजनों ने पुलिस अधीक्षक रायपुर दीपांशु काबरा से मिलकर न्याय की गुहार की। महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, गृहमंत्री, प्रदेश एवं केन्द्र शासन, मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ एवं राष्ट्रपति महोदय के पास भी तत्संबंधी शिकायतें प्रेषित कर, उक्त प्रकरण की निष्पक्ष सीबीआई जांच कराने तथा उपरोक्त अपराधियों को गिरफ्तार कर पुलिस रिमांड में लेकर पूछताछ करने एवं कठोर सजा दिलाये जाने की मांग की है। भा.द.वि. की धारा 302 लगाकर हत्या का मुकदमा कायम करने तथा इस प्रकरण का रि-इन्वेस्टिीगेशन कराने की मांग की गई।
शिकायत की जांच में छत्तीसगढ़ प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती विभा राव ने दोनों पक्षों के लोगों को जांच हेतु 8 सितंबर को दुर्ग स्थित विश्राम भवन में उपस्थित होने को कहा था किंतु निधि तिवारी के ससुराल पक्ष से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ, अपितु निधि के मायके पक्ष के लगभग 25 सदस्यों ने महिला आयोग के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा और न्याय का गुहार लगाते हुए हत्या के समस्त साक्ष्यों को प्रस्तुत करके कहा कि वर्तमान में पति राजेश तिवारी के अलावा उपरोक्त हत्या एवं साक्ष्य मिटाने के अन्य आरोपी सहअभियुक्तों के विरूध्द पलिस द्वारा कोई प्रकरण दर्ज नहीं किया गया और न तो कोई कठोर कार्यवाही की गई, ना ही निधि के ससुराल वालों के किसी भी सदस्यों के कोई भी बयान लिये गये। ना ही निधि की ग्यारह वर्षीय अबोध बालिका रितिका तिवारी को उसके नाना नानी अथवा मामा-मामी से ही मिलने दिया जा रहा है। हत्या के बाद निधि के शव को गठरीनुमा हालत में (छुपाकर) ले जाते हुए महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती विभा राव ने स्वयं देखने की पुस्टि की हैं।
उन्होंने बताया कि तेलीबांधा पुलिस द्वारा जिला एवं सत्र न्यायालय के समक्ष जो चालान पेश किया गया उसमें मृतका निधि तिवारी की मौत से संबंधित घटनास्थल व पोस्टमार्टम स्थल में पुलिस द्वारा ली गई 43 फोटोग्राफ एवं विडियो रिकार्डिंग की सीडी प्रस्तुत नहीं की गई। यह प्रकरण सुनियोजित रूप से सोचविचार कर अनेक लोगों द्वारा इतनी जघन्य हत्या करके साक्ष्य मिटाने के लिये उसके शरीर को जलाकर नष्ट करने का है तथा कार्यवाही धारा 302 के तहत होनी चाहिये थी लेकिन पुलिस द्वारा धारा 306 लगाने के बाद धाराओं में फेरबदल कते हुए 498-ए तथा धारा 323 जैसी मामूली धाराएं लगाकर पुन: आरोपी राजेश तिवारी की जमानत हेतु आवेदन दिलाया गया जिसे माननीय जिला एवं सत्र न्यायालय रायपुर द्वारा पीड़ित पक्ष के विद्वान अधिवक्ता श्री विभाष तिवारी एवं शासकीय अभिभाषक श्री संतोष पाण्डेय के द्वारा कठोर आपत्ति जताते हुए साक्ष्य प्रस्तुत किये गए जिस पर विचार करने के पश्चात दोनों पक्षों के दलीलों को सुनकर माननीय न्यायाधीश श्री संदीप बक्शी ने आरोपी राजेश तिवारी की जमानत इस आधार पर खारिज करते हुए आदेश पारित कर कहा कि अभिलेख का अवलोकन करने से मृतका के परिजनों के बयान से य प्रतीत हो रहा है कि अभियुक्त का अपनी विवधा भाभी से गलत संबंध होने के कारण मृतका से तनावपूर्ण संबंध थे और अभियुक्त लगातार मृतका को मायके के रूपये पैसे लाने के लिए दबाव डालता रहा। इस संबंध में मृतका द्वारा अपने परिजनों को लिखा गया पत्र भी बरामद किया गया है। मृतका के पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डाक्टर ने मृतका के शरीर में चोटें पाई है अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता श्री फरहान द्वारा प्रस्तुत जमानत हेतु उक्त न्याय दृष्टांत अभी इस मामले में अभियुक्त को लाभ नहीं दे सकता क्योंकि माननीय उच्च न्यायालय ने साक्ष्य के उपरांत गुण दोष के आधार पर अपनी राय व्यक्त की है अत: अभियुक्त का जमानत आवेदन पूर्व में 6 अगस्त 2010 को गुण दोष के आधार पर निरस्त किया जा चुका है। माननीय सत्र न्यायाधीश ने कहा- यह मामला गंभीर प्रकृति का है अत: अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के प्रभाव एवं प्रकरण की परिस्थितियों को देखते हुए इस मामले में अभियुक्त को जमानत का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है फलस्वरूप जमानत के आवेदकअभियुक्त की ओर से प्रस्तुत आवेदन को आज दुबारा निरस्त किया जाता है।
पीड़ित पक्ष मृतका निधि तिवारी के पिता एस.के. शुक्ला, मां बेलारानी शुक्ला ने अत्यंत ही मार्मिक स्वर में कहा कि हमारी बेटी निधि को साजिश करके मारा गया और उसकी मृत्यु की सूचना हमें अथवा पुलिस को दिये बिना ही मृत्यु के साक्ष्य रफा दफा करते हुए उसके मृत शरीर को मेकाहारा के मरच्यूरी में ले जाकर जेठ सुधीर तिवारी, पंकजा शुक्ला, सन्नी तिवारी एवं रेखा तिवारी द्वारा रखवा दिया गया। इसी कारण मौकाये वारदात पर मृतका के शरीर का पुलिस द्वारा पंचनामा नहीं बनाया गया और अपराधियों द्वारा हत्या से संबंधित साक्ष्यों को आसानी से मिटाने का प्रयास किया गया। इस संबंध में मायके पक्ष ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि निधि की हत्या दूसरी जगह करके शव को कमरे में रखकर हत्या संबंधी साक्ष्यों को मिटाने के लिये जला दिया गया है, लेकिन पुलिस उनके इस दृष्टिकोण की ओर नहीं देख रही है जबकि पंचनामा के समय मृतका का बेडरूम पूरी तरह से अस्त व्यस्थ था।