शनिवार, 25 सितंबर 2010

भटगांव में भाजपा फंसी

भाजपा के लिए मुसीबत बनी, चावल, दारु और भ्रष्टाचार
1 अक्टूबर को मतदान 4 को गणना
 भटगांव उपचुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही खंदक की लड़ाई अंतिम चरण पर पहुंच गई है। कांग्रेस ने जहां जबरदस्त एकता का परिचय दिया है तो भाजपा अभी तक आम लोगों को विकास के मायने समझाने में ही उलझी हुई है जबकि चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग और गांव-गांव में बिक रहे शराब के अलावा सड़क और स्कूलों की दुर्दशा के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी यहां प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है।
वैसे तो भटगांव उपचुनाव के परिणाम को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही संशय की स्थिति में है। वैशालीनगर विस चुनाव के साथ रायपुर बिलासपुर और राजनांदगांव नगर निगम चुनाव में बुरी तरह पीट चुकी भाजपा के लिए इस सीट को जीतना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके परिणाम डॉ. रमन सिंह के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है। आदिवासियों की बड़ी तादात के अलावा राज परिवार के प्रभाव ने सत्ता के प्रकरण को यहां जिस तरह से नेस्ताबूत किया है उससे भाजपाई खेमें में हड़कम्प मचा हुआ है। कहा जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल का पिछले दिनों प्रचार कार्य छोड़कर बीच में रायपुर आना और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात करने की वजह बताती है कि भटगांव में जो कुछ चल रहा है वह भाजपा के हित में नहीं है।
वैसे भी भाजपा ने शिवप्रताप सिंह की पार्टी में वापसी मजबूरी में कराया है लेकिन चुनाव लड़ने वाले उसके बेटे की स्थिति स्पष्ट नहीं है ऐसे में आदिवासी वोट को लेकर संशय कायम है। दूसरी तरफ सरकार के चावल योजना से मध्यम वर्ग पूरी तरह त्रस्त है क्याेंकि इस योजना से मजदूरों की किल्लत भुगतना पड़ रहा है ऐसे में मध्यव वर्ग का भाजपा को कितना साथ मिलेगा कहना मुश्किल है। जबकि रोजगार गारंटी योजना के मजदूरों को महिनों से भुगतान नहीं होने का मामला भी तूल पकड़ता जा रहा है। इधर गांव-गांव में बिक रहे अवैध शराब से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश देखा जा रहा है जबकि बदतर सड़कों के अलावा बदहाल स्कूलों पर पीडब्ल्यूडी व शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को जवाब देते नहीं बन रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस में जबरदस्त एकता दिखाई देने लगा है हालांकि कांग्रेसियों ने सत्ता का दुरुपयोग का आरोप लगाकर भाजपा को बांधने की कोशिश भी की है ऐसे में यदि सत्ता विरोधी मत का प्रयोग अधिकाधिक हुआ तो कांग्रेसी एक बार फिर खुश हो सकते हैं।

ये है राजधानी

मेट्स और लॉ कॉलेज स्टूडेण्ट होटल बेबीलॉन में जिस  तरह से पेश आये उससे लगा की मेरा शहर भी अब मुंबई से कम नहीं है .







वाईस ऑफ छत्तीसगढ़ में इस्माईल दरबार आएंगे

 शुभम संस्थान द्वारा आयोजित वाइस ऑफ छत्तीसगढ़ का फाईनल 24 अक्टूबर को होगा। इसमें फाईनल पहुंचे 15 गायक अपने प्रतिभा का जलवा दिखाएंगे। कार्यक्रम में मशहूर संगीतकार इस्माईल दरबार ने आने की स्वीकृति दे दी है। यह जानकारी संस्था प्रमुख महुआ मजूमदार ने दी।

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

फिर वेतन बढ़ने का मौसम आया...

वैसे तो सरकारी विज्ञापन से ही नहीं सेटिंग करके जमीन से लेकर खदान लेने वाले अखबार मालिक अपने पत्रकारों व दूसरे मीडिया कर्मियों को फूटी कौड़ी देना पसंद नहीं करते लेकिन जब भी नए ग्रुप की आमद होती है वे भीतर तक डर जाते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी में यही सब कुछ हो रहा है। पत्रिका, राज एक्सप्रेस सहित कई नए अखबार के आमद ने प्रतिष्ठित अखबारों को भीतर तक हिला दिया है। तोड़फोड़ से भयभीत अखबार मालिक अब पत्रकारों की खुशामद में लग गए हैं। दैनिक भास्कर को पत्रिका से सर्वाधिक खतरा महसूस होने लगा है इसलिए उसने अपने यहां के पत्रकारों ही नहीं अन्य कर्मचारियों का वेतन बढ़ा दिया है। बावजूद टूटन जारी है।
भास्कर के मार्केटिंग वाले पत्रिका पहुंचे...
दैनिक भास्कर ने अपने कर्मचारियों का वेतन तो बढ़ा दिया है लेकिन लगता है पत्रिका को चैन नहीं है वह भास्कर से दुश्मनी भुनाने में लगा है। सर्कुलेशन, संपादकीय व विज्ञापन विभाग में तोड़फोड़ के बाद उसे मार्केटिंग में भी तोड़फोड़ में सफलता मिल गई है। भास्कर के मार्केटिंग के सौरभ श्रीवास्तव, आदर्श पाठक, देवेश नगड़िया और आदित्य पत्रिका पहुंच गए हैं।
मनोज हरिभूमि छोड़ नई दुनिया में...
हरिभूमि का फोटो ग्राफर मनोज साहू को नई दुनिया रास आने लगा है। नई दुनिया यादा वेतन देकर मनोज को अपने यहां बुला लिया। कहा जा रहा है कि हरिभूमि में वैसे भी मनोज परेशान था।
भाई खुश हुआ...
वैसे तो इन भाई फोटो ग्राफरों का सभी मजाक उड़ाते है। अच्छी तस्वीरें खींचने के बावजूद उन्हें अब तक तवाों नहीं मिल रही थी। वेतन की कमी अलग रही ऐसे में पत्रिका में जोर लगाना ही था और वे सफल भी हो गए। अब इन्हें झमरु-डमरु कहो या त्रिलोचन-हीरा मानिकपुरी कह लो। दिन तो बहुर ही गए।
वाह पाण्डे जी
हरिभूमि में क्राईम-क्राईम खेलने वाले सतीश पाण्डे ने ऊंची-छलांग लगा ली है। पहले हल्ला मचाया कि पत्रिका में जा रहा हूं पहले ही दहशत में रहे हिमांशु ने उसकी तनख्वाह तीन हजार बढ़ा दी। अभियान सफल रहा।
इलेक्ट्रानिक में दारू वालों की आमद...
लंबी खामोशी के बाद एक फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया में हलचल होने लगी है। जी-24 के गिरते ग्राफ ने इसके मालिक को एम चैनल में पार्टनरशिप लेने मजबूर किया तो मंजित अमोलक जैसे दारु वाले इस व्यवसाय में कदम रखने लगे हैं। भास्कर का क्या वह तो 51 प्रतिशत में स्वयं है बाकी 49 में कोई भी खेल।
और अंत में...
जब से जनसंपर्क का कार्यभार अमन सिंह ने संभाला है तभी से संवाद व जनसंपर्क के भ्रष्ट अधिकारी सक्रिय हो गए हैं। वे आपस में यही चर्चा कर रहे हैं कि कैसे साहब को अपनी करनी छुपायें और खुश करने कौन सा गिफ्ट दें।

स्थापना पर मुक्तिमोर्चा का कार्यकर्ता सम्मेलन 1 को

 छत्तीसगढ राय स्थापना के उपलक्ष्य में मूल निवासी मुक्ति मोर्चा के द्वारा त्रिवेणी भवन बिलासपुर में प्रांतीय कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया है। यह जानकारी मोर्चा के अध्यक्ष गोपाल ऋषिकर भारती एवं सचिव महिला प्रभाग श्रीमती उषा आफले ने दी।

बेहतर स्वास्थ्य, रोजगार एवं बुनियादी सुविधओं की गारंटी पर आधारित छत्तीसगढ़ को प्रबुध्द आदर्श राय बनाने की दिशा में चलाए जा रहे अभियान के अंतर्गत कार्यकर्ताओं को जानकारी दी जाएगी। छत्तीसगढ़ राय निर्माण आंदोलन के प्रणेता एवं प्रथम जेल यात्री गुरुघासीदास जयंती के जन्मदाता स्वर्गीय नुकूल ढीढी (मंत्री जी) को मरणोपरान्त छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित करने की मांग की जाती है। छत्तीसगढ़ में डा. बाबा साहब अम्बेडकर की विचार धारा आंदोलन तथा उनके संगठनों को स्थापित करने वाले नेतृत्वकर्ता नुकूल ढीढी जी थे। उन्हाेंने 1951 से ही छत्तीसगढ़ राय के प्रयत्न करना प्रारंभ किया सन् 1961 में आल इंडिया रिपब्लिकन पार्टी छत्तीसगढ़ राय शाखा का गठन किया था। दिनांक 13 दिसंबर 1970 को रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के बैंगलोर राष्ट्रीय अधिवेशन में पृथक छत्तीसगढ़ राय निर्माण का प्रस्ताव पारित करवाएं। दिनांक 27 अक्टूबर 1972 को रायपुर जिला कचहरी के समक्ष आंदोलन करते हुए 19 साथियों के साथ जेल भेजे गए। 31 अक्टूबर को रिहा किए गए। उनके 45 साथियों को महासमुंद में सुखरु प्रसाद बंजारे एवं भागवत कोसरिया के साथ गिरफ्तार किया गया। दिनांक 18 दिसंबर 1938 को छत्तीसगढ़ के ग्राम भोरिंग में गुरु घासीदास की जयंती का प्रथम आयोजन किया वे छत्तीसगढ़ में इस जयंती के जन्मदाता थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित अनेकों पार्टियों के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया जा रहा है, जिनमें मुंबई के पूर्व सांसद एवं रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास आठवले छत्तीसगढ़ विकास पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद पी.आर. खुंटे सहित सामाजिक सांस्कृतिक नेताओं द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

यह तो भाजपाई राजनीति की दोगलाई है...

क्वींस बेटन के स्वागत को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बहिष्कार कर दिया तो छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वागत पर कूद गए थे। एक ही पार्टी के दो मुख्यमंत्रियों का यह खेल किस श्रेणी में जाता है यह तो वही जाने लेकिन आम लोगों में इस खेल को दोगलाई बताया जा रहा है।
वैसे तो धर्म की राजनीति कर सत्ता तक पहुंची भारतीय जनता पार्टी के सिध्दांत क्या हैं यह कोई नहीं जानता। कुर्सी के लिए राम तक को त्यागने के आरोप से ग्रसित भाजपा के नेता धारा 370 से लेकर एक विधान तक को भूल चुके हैं। ऐसे में समय-समय पर बदलते सिध्दांत ने भाजपा को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला दिल्ली में होने वाले कामनवेल्थ गेम का है। अपने-अपने हितों के हिसाब से भाजपाई इस मामले में राग अलाप रहे हैं। इस मामले में भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी क्या सोचता है किसी को पता नहीं है।
भाजपा की हालत यह है कि कोई नेता नहीं है या फिर सत्ता और पदों में बैठे सभी नेता है जो अपने हितों के लिए नए-नए सिध्दांत गढ़ रहे हैं। क्वीस बेंटन के मामले में तो भाजपा की जितनी छिछालेदर हो रही है उतनी कभी नहीं हुई। छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जहां क्वीस बेटन के स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखा था तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह यह कहकर क्वींस बेटन के कार्यक्रम का बहिष्कार कर गए कि उन्हें इसमें गुलामी दिखाई देती है जबकि उसके मंत्रिमंडल के सदस्य स्वागत कर रहे हैं।
भाजपा नेता यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि सबकी अपनी सोच है लेकिन आम लोगों में जबरदस्त प्रतिक्रिया है। यही वजह है कि राम मंदिर मामले में भी सत्ता पाते ही यही रणनीति अख्तियार की गई थी। अब तो उसके देश प्रेम के मुद्दे पर ही सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में कांग्रेसी यह कहें कि आजादी की लड़ाई में भाजपाई दूर क्यों थे तो किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए?
रीमेक नहीं मौलिक बने छत्तीसगढ फ़िल्में
तपेश जैन
रायपुर। ''सास गारी देबे, ननद चुटकी लेबे, ससुरार गेंदा फूल'' हिन्दी फिल्म दिल्ली-6 में शामिल किए गए इस गाने ने छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति की पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कायन करने के साथ ही छत्तीसगढ़ी फिल्मों का भी नया जीवनदान दिया है। गाना सुपरहिट हुआ तो देश का ध्यान छत्तीसगढ़ी पर आकर्षित हुआ और सन् 2003 के बाद मरणासन् छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग को जैसे जीवनदान मिल गया। सन् 2009 में लंबे समय के बाद रिलीज हुई तीजा के लुगरा की आंशिक सफलता ने सतीश जैन को पुन: फिल्म बनाने प्रेरित किया और उन्होंने मया का निर्माण कर यह साबित किया कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों के दर्शक है और अच्छी फिल्में लाभ प्रदान कर सकती है। इस मामले में डीजीटल टेक्नोलॉजी ने भी बड़ी भूमिका अदा की है। गौरतलब है कि पूर्व में बनी छत्तीसगढी फ़िल्मों की पिक्चर और वॉयल क्वालिटी ठीक नहीं होने से भी कारी जैसी अच्छी फिल्म नहीं चल पाई थी। सस्ती डिजीटल टेक्नोलॉजी ने न केवल पिक्चर की गुणवत्ता में सार्थक परिवर्तन आया बल्कि आवाज भी स्पष्ट हो गई। लेकिन मया की सफलता के बाद जो छत्तीसगढ़ फिल्म निर्माण की भेड़चाल शुरु हुई और बालीवुड फिल्मों के रीमेक के साथ नकल की परंपरा ने तीस से भी यादा असफल फिल्मों ने एक बार फिर इस बात पर चिंतन के लिए प्रेरित किया है कि दर्शक बालीवुड की नकल नहीं बल्कि मौलिक कहानियों पर आधारित फिल्में पसंद करते है और उन्हें अपनी भाषा में स्थानीय मनोरंजन के तत्व चाहिए। घिसे पिटे फार्मूले की हिन्दी फिल्मों की रीमेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में फ्रेम दर फ्रेम नकल यह दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मौलिक कहानियों का अभाव है और जो फिल्में बना रहे है उनका उद्देश्य कुछ और है। इस वजह से सन् 2000 के बाद बनी 30 से 40 फ्लाप फिल्मों ने मार्केट खराब कर दिया था। अब पुन: ऐसी स्थिति बन रही है कि कोई भी बिना तकनीक और फिल्म की भाषा शैली समझे मैदान में उतर गया है।
मया के बाद कुछेक फिल्मों ने एक-दो दिन बाद ही दम तोड़ दिया। प्रदर्शन के कुछ शो बाद ही दर्शकों को यह पता चल गया कि मस्ती के लिए फिल्म बनाई गई है। देखा जाए तो अभी तक एक भी ऐसी छत्तीसगढ़ी फिल्म नहीं बनी है जो अपनी कथा वस्तु की वजह से लोकप्रिय हुई हो। इन फिल्मों में फूहड़ हास्य और अश्लीलता का प्रयोग भी किया गया लेकिन सफल नहीं हो सका है। भोजपुरी फिल्मों की तरह छत्तीसगढ़ में द्विअर्थी संवाद और गाने पसंद नहीं किए जाते है इसलिए अच्छा तो यही होगा कि फिल्म का शिल्प समझकर छत्तीसगढ़ की ही मौलिक कहानियों पर फिल्में बने, नहीं तो पुन: इसका भविष्य अंधकार में होगा।

मोहन से भरोसा टूटा अन्य मंत्री भी लगे प्रचार में

भटगांव उपचुनाव

भाजपा की मुसिबत बढ़ी, चावल-दारू भारी पड़ा
 भटगांव उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की मुसीबत बढ़ते ही जा रही है। चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग और गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। वहीं प्रभारी बनाए गए पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की छवि ने भी भाजपा को सकते में ला दिया है। एन वक्त पर प्रभारी हटाने से विरित असर पडने की संभावना के चलते अब भाजपा ने दूसरे मंत्रियों को भी यहां जिम्मेदारी दे दी है।
छत्तीससगढ़ के भटगांव विधानसभा के लिए हो रहे उपचुनाव को लेकर जबरदस्त होड़ है। भाजपा ने जहां सरकार की पूरी ताकत को झोंक दिया है वहीं कांग्रेस भी कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती। भाजपा के लिए यह उपचुनाव तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। वर्तमान में भाजपा के सिर्फ 47 विधायक है जो बहुमत से एक-दो सीट ही अधिक है ऐसे में यह चुनाव हारने पर डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है। वैसे रमन सिंह ने यह चुनाव जीतने के लिए यहां से श्रीमती रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट ही नहीं बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को प्रभारी बनाकर तिकड़म से वोट बटोरने का संकेत दिया है।
बताया जाता है कि भाजपा ने यह नहीं सोचा था कि हाय हलो की छवि वाले बृजमोहन अग्रवाल पर लगे आरोप भी यहां मुद्दे बन जाएंगे। बताया जाता है कि घटिया सड़क निर्माण से लेकर पर्यटन विभाग में हुए घोटाले ने तो बृजमोहन अग्रवाल को परेशान किया ही है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी भी यहां मुद्दा बनता जा रहा है। चूंकि बृजमोहन अग्रवाल के पास शिक्षा विभाग भी है ऐसे में स्कूलों में शिक्षकों की कमी यहां प्रमुख मुद्दा बन सकता है।
बताया जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल को लेकर चल रही चर्चा ने क्षेत्र के भाजपाईयों के होश उड़ा दिए हैं और इसकी खबर जब संगठन व सरकार को हुई तो आनन-फानन में अन्य मंत्रियों को भी जिम्मेदारी दे दी गई है ताकि इसका प्रभाव कम किया जा सके। बताया जाता है कि पूर्व अध्यक्ष शिवप्रताप की खामोशी ने तो भाजपा को बेचैन किया ही है चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग को प्रभावित करने नई रणनीति बनाई जा रही है। बताया जाता है कि दो रुपया किलो चावल योजना ने मध्यम वर्ग को सर्वाधिक हलाकान किया है। न घर के लिए और न ही खेती के लिए ही मजदूर मिल रहे हैं कई लोग तो महंगाई को ही इसकी वजह बता रहे हैं।
वहीं गांव-गांव में बिकते अवैध शराब से भी महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे में आदिवासियों की उपेक्षा भी आदिवासी क्षेत्रों में मुद्दा बनता जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी यू.एस. सिंहदेव को मिल रहे व्यापक समर्थन और कांग्रेसियों की एकता ने भी भाजपा को नए सिरे से रणनीति बनाने मजबूर कर दिया है। बहरहाल यह कहा जा रहा है कि यदि कांग्रेसियों ने यह सीट जीत ली तो डॉ. रमन सिंह की मुसीबत बढ सकती है।