अजय को डुबाया अब...!
छत्तीसगढ़ के दमदार माने जाने वाले पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का विवादों से पुराना नाता है इन दिनों उनके बंगले में आर.एन. सिंह का दबदबा है और कभी इनका दबदबा अजय चंद्राकर के बंगले में रहा है। पीएसी में चयन को लेकर विवाद में रहे आर.एन. सिंह इन दिनों अपने दबदबे से सुर्खियों में हैं।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो अफसरराज ही नहीं चल रहा है बल्कि दागी और विवादास्पद छवि के लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय भी दिया जा रहा है। दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग में सर्वाधिक दागी और विवादास्पद अधिकारियों का जमावड़ा है। दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी डा.एच. आर. शर्मा, श्रीमती आर.बाम्बरा, मैडम तवारिस, अजय श्रीवास्तव, एमजी श्रीवास्तव, सुब्रत साहू, एम.के. राउत के अलावा अब मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ आर.एन. सिंह का नाम भी विवादास्पद अधिकारियों में जुड़ गया है।
कहा जाता है कि जिन अधिकारियों को उनकी करतूतों के कारण बर्खास्त कर देना चाहिए उन लोगों को सरकार द्वारा प्रश्रय दिया जा रहा है। बताया जाता है कि पीएससी में चयन के दौरान आर.एन. सिंह भी सुर्खियों में रहे हैं। दरअसल सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी मिली है उसके तहत यह बात स्पष्ट होने लगा है कि आर.एन. शर्मा का चयन न केवल गलत ढंग से हुआ है बल्कि वे चयन के पात्र ही नहीं थे। सूत्रों के मुताबिक पीएससी चयन में लिे गए साक्षात्कार में आरएन शर्मा को आठवां स्थान मिला था और जब मेरिट बनी तो वे तीसरे नम्बर पर पहुंच गए। यह गोलमाल कहा और केसे हुआ यह जांच का विषय है। लेकिन कहा जाता है कि तब तत्कालीन मंत्री अजय चंद्राकर के बंगले में आर.एन. शर्मा को पदस्थ किया गया।
बताया जाता है कि अजय चंद्राकर को अपनी करतूत के कारण विधानसभा में हार का मुंह देखना पड़ा तब आर.एन. सिंह के लिए बृजमोहन अग्रवाल का दरबार सज गया। सूत्रों की माने तो श्री सिंह को बृजमोहन अग्रवाल के बंगले में पदस्थ करने में अजय चंद्राकर ने ही सिफारिश की थी। इधर आर.एन. सिंह के चयन को लेकर जब सवाल उठने लगे तो एक बार फिर मामले की लीपापोती की जा रही है। बताया जाता है कि इन दिनों मंत्री के बंगले में उनके व्यवहार को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और इसकी शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होने से मोहन समर्थक ही गड़े-मुर्दे उखाड़ने में लगे हैं। बहरहाल दागी और विवादास्पद अधिकारियों के जमावड़े ने एक बार फिर दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सुर्खियों में ला दिया है।
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रविवार, 17 अक्टूबर 2010
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
विवादास्पद आई पी एस विश्वरंजन
0 गृहमंत्री फूटी आंख नहीं भाते?
0 जातिवाद व क्षेत्रियता का आरोप?
0 नक्सली मामले में संदेहास्पद भूमिका?
0 साहित्यिक गतिविधियों पर अवैध वसूली?
छत्तीसगढ़ के डीजीपी यानी विश्वरंजन की विवादास्पद छवि के चलते न केवल सरकार की छवि खराब होने लगी है बल्कि पुलिस में गुटबाजी उभर कर सामने आई है। लगातार विवादों में रहना विश्वरंजन का शगल बन चुका है और अब तो उन्हें कारण बताओं नोटिस पर नोटिस जारी होने लगे हैं।
छत्तीसगढ क़े डीजीपी विश्वरंजन को गृहमंत्री ननकीराम कंवर फूटी आंख नहीं सुहाते खबर सिर्फ इतनी नहीं है। खबर इसके आगे की यह है कि डीजीपी विश्वरंजन पर अब गंभीर आरोप लगने लगे हैं और प्रदेश सरकार ने उन्हें दो मामलों में कारण बताओं नोटिस भी थमा दिया है। दरअसल डीजीपी विश्वरंजन की नियुक्ति के तरीके को लेकर शुरु हुआ विवाद ही प्रदेश सरकार खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए गले की हड्डी बन चुका है। कभी बस्तर और रायगढ़ में पदस्थ रहे डीजीपी विश्वरंजन को केन्द्र सरकार से विशेष अनुरोध कर यहां लाया गया। यदि विश्वरंजन के आने के बाद अपराध के आंकड़े पर नजर डाले तो हर क्षेत्र में अपराधों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी नजर आएगी। खासकर नक्सली और शहरी क्षेत्रों में लूट की वारदातों ने तो सरकार की नींद उठा दी है।
सर्वाधिक विवाद तो उनके प्रमोद वर्मा स्मृति साहित्यिक गतिविधियों की रही है। कार्यक्रम के लिए दबावपूर्वक वसूली की शिकायतों से तो थानेदार तक परेशान है और राजनांदगांव जिले में विनोद शंकर चौबे की शहादत के दौरान उनकी भूमिका और गतिविधियों को लेकर जबरदस्त विवाद रहा है। प्रदेश सरकार ने इस मामले में बढ़ती शिकायतों पर कितनी गंभीरता दिखाई है यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इस मामले में नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया गया है।
सिर्फ यही एक मामला नहीं है इसके अलावा गृहमंत्री ननकीराम कंवर से उनका विवाद भी सुर्खियों में रहा है। गृहमंत्री ने डीजीपी को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी भी कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र कवर्धा में एसपी को निकम्मा व कलेक्टर को दलाल कहने वाले गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने विधानसभा तक में पुलिस की गतिविधियों का भर्त्सना कर चुके हैं। इतना ही नहीं डीजीपी विश्वरंजन पर नक्सली मामले में भूमिका पर भी आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि बस्तर पदस्थापना के दौरान उनके कार्य को लेकर आलोचना भी हुई थी जबकि मुखबिरी व गोपनीय सैनिकों को दी जाने वाली रकमों को लेकर डीजीपी पर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
इधर पीएचक्यू में चल रहे गुटबाजी का असर भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर हुआ है। कहा जाता है बिहारी-यूपी की क्षेत्रियता वाली गुटबाजी के चलते पुलिस मुख्यालय में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस मामले में गृहमंत्री ननकीराम कंवर से शिकायत के बाद गृहमंत्री द्वारा जांच करवाने का फरमान जारी कर दिया गया है और श्री नवानी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि डीजीपी विश्वरंजन की गतिविधियों को सरकार को मुंह चिढ़ाने वाला बताया जा रहा है लेकिन कार्रवाई सिर्फ नोटिस व जांच तक ही सिमट गया है। इस संबंध में डीजीपी से जब संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। बहरहाल डीजीपी को नोटिस व उनके खिलाफ जांच के फरमान को लेकर सरकार की चौतरफा किरकिरी हो रही है। जो आने वाले दिनों में विवाद और भी बढ़ने की संभावना है।
0 जातिवाद व क्षेत्रियता का आरोप?
0 नक्सली मामले में संदेहास्पद भूमिका?
0 साहित्यिक गतिविधियों पर अवैध वसूली?
छत्तीसगढ़ के डीजीपी यानी विश्वरंजन की विवादास्पद छवि के चलते न केवल सरकार की छवि खराब होने लगी है बल्कि पुलिस में गुटबाजी उभर कर सामने आई है। लगातार विवादों में रहना विश्वरंजन का शगल बन चुका है और अब तो उन्हें कारण बताओं नोटिस पर नोटिस जारी होने लगे हैं।
छत्तीसगढ क़े डीजीपी विश्वरंजन को गृहमंत्री ननकीराम कंवर फूटी आंख नहीं सुहाते खबर सिर्फ इतनी नहीं है। खबर इसके आगे की यह है कि डीजीपी विश्वरंजन पर अब गंभीर आरोप लगने लगे हैं और प्रदेश सरकार ने उन्हें दो मामलों में कारण बताओं नोटिस भी थमा दिया है। दरअसल डीजीपी विश्वरंजन की नियुक्ति के तरीके को लेकर शुरु हुआ विवाद ही प्रदेश सरकार खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए गले की हड्डी बन चुका है। कभी बस्तर और रायगढ़ में पदस्थ रहे डीजीपी विश्वरंजन को केन्द्र सरकार से विशेष अनुरोध कर यहां लाया गया। यदि विश्वरंजन के आने के बाद अपराध के आंकड़े पर नजर डाले तो हर क्षेत्र में अपराधों में जबरदस्त बढ़ोत्तरी नजर आएगी। खासकर नक्सली और शहरी क्षेत्रों में लूट की वारदातों ने तो सरकार की नींद उठा दी है।
सर्वाधिक विवाद तो उनके प्रमोद वर्मा स्मृति साहित्यिक गतिविधियों की रही है। कार्यक्रम के लिए दबावपूर्वक वसूली की शिकायतों से तो थानेदार तक परेशान है और राजनांदगांव जिले में विनोद शंकर चौबे की शहादत के दौरान उनकी भूमिका और गतिविधियों को लेकर जबरदस्त विवाद रहा है। प्रदेश सरकार ने इस मामले में बढ़ती शिकायतों पर कितनी गंभीरता दिखाई है यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इस मामले में नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब किया गया है।
सिर्फ यही एक मामला नहीं है इसके अलावा गृहमंत्री ननकीराम कंवर से उनका विवाद भी सुर्खियों में रहा है। गृहमंत्री ने डीजीपी को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी भी कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र कवर्धा में एसपी को निकम्मा व कलेक्टर को दलाल कहने वाले गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने विधानसभा तक में पुलिस की गतिविधियों का भर्त्सना कर चुके हैं। इतना ही नहीं डीजीपी विश्वरंजन पर नक्सली मामले में भूमिका पर भी आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि बस्तर पदस्थापना के दौरान उनके कार्य को लेकर आलोचना भी हुई थी जबकि मुखबिरी व गोपनीय सैनिकों को दी जाने वाली रकमों को लेकर डीजीपी पर कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
इधर पीएचक्यू में चल रहे गुटबाजी का असर भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर हुआ है। कहा जाता है बिहारी-यूपी की क्षेत्रियता वाली गुटबाजी के चलते पुलिस मुख्यालय में कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस मामले में गृहमंत्री ननकीराम कंवर से शिकायत के बाद गृहमंत्री द्वारा जांच करवाने का फरमान जारी कर दिया गया है और श्री नवानी को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि डीजीपी विश्वरंजन की गतिविधियों को सरकार को मुंह चिढ़ाने वाला बताया जा रहा है लेकिन कार्रवाई सिर्फ नोटिस व जांच तक ही सिमट गया है। इस संबंध में डीजीपी से जब संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं हुए। बहरहाल डीजीपी को नोटिस व उनके खिलाफ जांच के फरमान को लेकर सरकार की चौतरफा किरकिरी हो रही है। जो आने वाले दिनों में विवाद और भी बढ़ने की संभावना है।
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
सरकारी जमीनों का बंदरबांट अब बंद करो...
जब से रमन सरकार सत्ता में आई है सरकारी जमीनों को बांटने में दस गुणा से यादा तेजी आई है। कभी उद्योगों के नाम पर तो कभी कस्बों या नई राजधानी के विस्तार के नाम पर सरकारी जमीनों को कौड़ियों के मोल हड़पा जा रहा है। यही स्थिति ही तो न चारागान के लिए जमीनें बचेंगी न ही खुली हवा में सांस लेने के लिए ही जमीन बचेंगी। कांक्रीट के जंगल ने पहले ही राजधानी रायपुर के लोगों को गर्मी में रहने मजबूर कर दिया है। ऐसे में सरकार शहर या उद्योगों की बजाय गांवों के विकास न कृषि के विकास पर सिर्फ इसलिए योजना नहीं बनाती क्योंकि इससे आम लोग ख्रुशहाल होंगे और फिर उनके भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति पर अंकुश लग जाएगी।
ताजा मामला राजधानी से लगे ग्राम अछोली का है। यहां श्मशान की जमीन एक उद्योगपति को आबंटित की जा रही है। लोग जब विरोध पर सड़कों तक आएं तब पता चला कि यहां की सरकारी जमीनों पर किस तरह से उद्योगपतियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। अवैध कब्जों में निश्चित रुप से पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की सहमति होगी अन्यथा पटवारियों व तहसीलदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती।
अब तो गृह निर्माण मंडल ने भी कस्बों में अपनी योजना को विस्तार करना शुरु कर दिया है और कस्बों की सरकारी जमीनों पर कांक्रीट के जंगल खड़ा किया जाने लगा है। गृह निर्माण मंडल के पदाधिकारी से लेकर इंजीनियरों ने एक साजिश के तहत पैसा कमाने का खेल खेला है। चूंकि निर्माण में भ्रष्टाचार और कमीशन का लंबा चौड़ा खेल है इसलिए शहर से कस्बों तक सरकारी जमीनों को हड़पा जा रहा है। पूरी सरकार इस खेल में शामिल है और छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को साजिश के तहत हड़पा जा रहा है। भाजपा सरकार में ही नहीं कांग्रेस ने भी कमोबेश यही काम किया है। विद्याचरण शुक्ल को अपोलो अस्पताल के लिए दी गई जमीन का क्या हुआ। किसी में हिम्मत है कि पूछा जा सके? और जब विद्याचरण शुक्ल अस्पताल के नाम पर जमीन हड़पने लगे तो फिर भाजपाई क्यों पीछे रहे इसलिए भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई देवेन्द्र अग्रवाल के साढू डॉ. सुनील खेमका को कौड़ी के मोल सरकारी जमीन देने का कोई कांग्रेसी कैसे विरोध कर सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल पर तो बंगले, प्रेस और पेट्रोल पम्प के नाम पर सरकारी जमीनों को लीज पर लेने का मामला सुर्खियों में रहा है।
अखबारों द्वारा सरकारी जमीनें जब हड़पी जाने लगी तो फिर चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर खेल को कौन रोक सकता है। लीज की जमीनें और उस पर अवैध निर्माण के खेल ने छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को तहस-नहस तो किया ही पर्यावरण को भी अच्छा नुकसान पहुंचाया है। खुली हवा में सांस लेने को दुर्लभ बनाते इन सरकारी योजनाओं पर आम आदमी केवल दुख जाहिर ही कर सकता है। हम सरकारी जमीन के ऐसे किसी भी बंदरबांट के विरोधी है यदि स्वयंसेवी संगठनों को भी ऐसे जमीनें दी जाती है तो वह भी गलत है और राजनैतिक पार्टियों को तो बिल्कुल भी सरकारी जमीनें नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवसाय का रुप ले चुकी राजनीति ने आम आदमी की बजाय अपने हितों को ही अधिक साधा है।
ताजा मामला राजधानी से लगे ग्राम अछोली का है। यहां श्मशान की जमीन एक उद्योगपति को आबंटित की जा रही है। लोग जब विरोध पर सड़कों तक आएं तब पता चला कि यहां की सरकारी जमीनों पर किस तरह से उद्योगपतियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। अवैध कब्जों में निश्चित रुप से पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की सहमति होगी अन्यथा पटवारियों व तहसीलदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती।
अब तो गृह निर्माण मंडल ने भी कस्बों में अपनी योजना को विस्तार करना शुरु कर दिया है और कस्बों की सरकारी जमीनों पर कांक्रीट के जंगल खड़ा किया जाने लगा है। गृह निर्माण मंडल के पदाधिकारी से लेकर इंजीनियरों ने एक साजिश के तहत पैसा कमाने का खेल खेला है। चूंकि निर्माण में भ्रष्टाचार और कमीशन का लंबा चौड़ा खेल है इसलिए शहर से कस्बों तक सरकारी जमीनों को हड़पा जा रहा है। पूरी सरकार इस खेल में शामिल है और छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को साजिश के तहत हड़पा जा रहा है। भाजपा सरकार में ही नहीं कांग्रेस ने भी कमोबेश यही काम किया है। विद्याचरण शुक्ल को अपोलो अस्पताल के लिए दी गई जमीन का क्या हुआ। किसी में हिम्मत है कि पूछा जा सके? और जब विद्याचरण शुक्ल अस्पताल के नाम पर जमीन हड़पने लगे तो फिर भाजपाई क्यों पीछे रहे इसलिए भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई देवेन्द्र अग्रवाल के साढू डॉ. सुनील खेमका को कौड़ी के मोल सरकारी जमीन देने का कोई कांग्रेसी कैसे विरोध कर सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल पर तो बंगले, प्रेस और पेट्रोल पम्प के नाम पर सरकारी जमीनों को लीज पर लेने का मामला सुर्खियों में रहा है।
अखबारों द्वारा सरकारी जमीनें जब हड़पी जाने लगी तो फिर चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर खेल को कौन रोक सकता है। लीज की जमीनें और उस पर अवैध निर्माण के खेल ने छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को तहस-नहस तो किया ही पर्यावरण को भी अच्छा नुकसान पहुंचाया है। खुली हवा में सांस लेने को दुर्लभ बनाते इन सरकारी योजनाओं पर आम आदमी केवल दुख जाहिर ही कर सकता है। हम सरकारी जमीन के ऐसे किसी भी बंदरबांट के विरोधी है यदि स्वयंसेवी संगठनों को भी ऐसे जमीनें दी जाती है तो वह भी गलत है और राजनैतिक पार्टियों को तो बिल्कुल भी सरकारी जमीनें नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवसाय का रुप ले चुकी राजनीति ने आम आदमी की बजाय अपने हितों को ही अधिक साधा है।
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
शिक्षा पर सवाल मोबाइल का कमाल
छत्तीसगढ़ में इन दिनों अपराध के ग्राफ में तेजी आई है। अनाप-शनाप पैसे कमाने की धुन ने जीवन स्तर को विवादित बना दिया है। सरकार के पास कोई योजना नहीं है और शिक्षा के सफल उद्योग के रुप में विकसित होने लगा है जहां पढ़ाई के अलावा झूठे-फरेब-छल और मौज-मस्ती अधिक होने लगी है। सरकार भी इन शिक्षण संस्थाओं पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। सर्वाधिक दुखद स्थिति पेट काटकर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाले पालकों की है। स्कूल फीस से लेकर बस और अन्य कार्यक्रमों में होने वाले खर्च ने पालकों की चिंता बढ़ा दी है और अभाव में अच्छी संस्थाओं में पढ़ने वाले मध्यम वर्ग के बच्चों में अपराध पनपते जा रहा है।
महंगी चाकलेट, मॉल और मोबाईल ने इस मध्यम वर्गीय बच्चों को एक नए अपराध में ढकेल दिया है जिसकी भयावकता की कल्पना से ही शरीर सिंहर जाता है। मेरे परिचित की एक बिटिया 11वीं कक्षा में एक नामी शिक्षा के लिए नामी संस्थान में भर्ती किया है। उसे मोबाइल भी दी गई ताकि आने जाने में कहीं दिक्कतें न हो। शुरु में तो सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा लेकिन जब वह मोबाइल से कुछ अधिक ही बातें करने लगी तो मेरे परिचित ने इसे गंभीरता से लिया सिर्फ 300 से 500 रुपए में इतनी लम्बी बात पर वे विचलित हुए और जब पता लगाया तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई पिछले 3-4 माह से उसके मोबाइल में ढाई-तीन हजार का रिचार्ज किया जा रहा था। उसने अपनी बिटिया से पूछा तो वह साफ मुकर गई। क्योंकि यह रिचार्ज उसके कथित फ्रेंड्स करवाते थे। यह स्थिति अमूमन शहर के अधिकांश छात्र-छात्राओं की है। अमीरजादों से दोस्ती और फिर आपस में लेन-देन ने शर्म-हया तक को बेच दिया है। मां-बाप अच्छी शिक्षा के फेर में महंगे संस्थानों में भर्ती कर मोबाइल देकर भूल जाते है और बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं।
इसके लिए शिक्षा पध्दति ही दोषी है मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप दोषी नहीं है लेकिन बेहतर शिक्षा को लेकर सरकार के रवैये की अनदेखी बेमानी होगी। हम सिर्फ मां-बाप को दोष देकर इससे मुक्ति नहीं पा सकते। छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही मैं ऐसे दर्जनों छात्र-छात्राओं को जानता हूं जिनके एक से अधिक लोगों से अंतरंग संबंध है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वे अच्छी शिक्षा की व्यवस्था तो करें लेकिन महंगे शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए। अन्यथा एक झूठ सौ झूठ बुलवाता है की कहावत की तरह एक अपराध किसी को भी अपराध के दलदल में ले जाने की कहावत तैयार हो जाएगी। मां-बाप भी अपने बच्चों पर नजर रखे। खासकर मोबाइल देने वाले मां-बाप समय-समय पर यह जरूर चेक करे कि रिचार्ज कितने का हो रहा है। क्योंकि झूठ सीखाने वाले इस मंत्र ने आदमी को संस्कार और नैतिकता से परे ढकेल रहा है और इसकी अनदेखी से गंभीर परिणाम आएंगे जो कलंक साबित हो सकते हैं।
महंगी चाकलेट, मॉल और मोबाईल ने इस मध्यम वर्गीय बच्चों को एक नए अपराध में ढकेल दिया है जिसकी भयावकता की कल्पना से ही शरीर सिंहर जाता है। मेरे परिचित की एक बिटिया 11वीं कक्षा में एक नामी शिक्षा के लिए नामी संस्थान में भर्ती किया है। उसे मोबाइल भी दी गई ताकि आने जाने में कहीं दिक्कतें न हो। शुरु में तो सब कुछ ठीक-ठाक चलने लगा लेकिन जब वह मोबाइल से कुछ अधिक ही बातें करने लगी तो मेरे परिचित ने इसे गंभीरता से लिया सिर्फ 300 से 500 रुपए में इतनी लम्बी बात पर वे विचलित हुए और जब पता लगाया तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई पिछले 3-4 माह से उसके मोबाइल में ढाई-तीन हजार का रिचार्ज किया जा रहा था। उसने अपनी बिटिया से पूछा तो वह साफ मुकर गई। क्योंकि यह रिचार्ज उसके कथित फ्रेंड्स करवाते थे। यह स्थिति अमूमन शहर के अधिकांश छात्र-छात्राओं की है। अमीरजादों से दोस्ती और फिर आपस में लेन-देन ने शर्म-हया तक को बेच दिया है। मां-बाप अच्छी शिक्षा के फेर में महंगे संस्थानों में भर्ती कर मोबाइल देकर भूल जाते है और बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं।
इसके लिए शिक्षा पध्दति ही दोषी है मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप दोषी नहीं है लेकिन बेहतर शिक्षा को लेकर सरकार के रवैये की अनदेखी बेमानी होगी। हम सिर्फ मां-बाप को दोष देकर इससे मुक्ति नहीं पा सकते। छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही मैं ऐसे दर्जनों छात्र-छात्राओं को जानता हूं जिनके एक से अधिक लोगों से अंतरंग संबंध है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वे अच्छी शिक्षा की व्यवस्था तो करें लेकिन महंगे शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए। अन्यथा एक झूठ सौ झूठ बुलवाता है की कहावत की तरह एक अपराध किसी को भी अपराध के दलदल में ले जाने की कहावत तैयार हो जाएगी। मां-बाप भी अपने बच्चों पर नजर रखे। खासकर मोबाइल देने वाले मां-बाप समय-समय पर यह जरूर चेक करे कि रिचार्ज कितने का हो रहा है। क्योंकि झूठ सीखाने वाले इस मंत्र ने आदमी को संस्कार और नैतिकता से परे ढकेल रहा है और इसकी अनदेखी से गंभीर परिणाम आएंगे जो कलंक साबित हो सकते हैं।
स्वराज दास की मनमानी की कहानी...
कुरेटी के कारनामों की कहानी अभी लोगों की जुबान से उतर भी नहीं पाई है कि जनसंपर्क के एक और अधिकारी स्वराज दास की मनमानी चर्चे में हैं। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के घर पदस्थ इस अधिकारी स्वराज दास पर अब अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मनमानी किए जाने को लेकर पत्र मिला है। पत्र को हम हू-बहू प्रकाशित नहीं कर सकते इसलिए उसके अर्थ ही प्रकाशित किए जा रहे हैं।
पत्र के अनुसार किसी समय अजीत जोगी के करीबी रहकर राजनीति का गुण सीखने वाले स्वराज दास ने अब जनसंपर्क में अपने प्रभाव के चलते राजनीति कर रहे हैं। चूंकि सचिव बैजेन्द्र कुमार जनसंपर्क से यादा पर्यावरण विभाग में यादा रूचि रखते हैं इसलिए भी यहां सब कुछ ठीक नहीं है। स्वराज दास जी जनसंपर्क के स्थापना व समाचार शाखा के भी प्रभारी है और उन पर पदोन्नति संबंधी फाईल दो सालों से रोक लेने का आरोप है। शासकीय कार्यक्रमों के कव्हरेज के लिए गाड़ी नहीं देकर कर्मचारियों को परेशान करने के अलावा संविदा कम्प्यूटर कर्मचारी को अनावश्यक परेशान करने का भी आरोप लगााया गया है। यही नहीं अखबारों को विलंब से समाचार भेजने व फोटोग्राफरों से दर्ुव्यवहार की भी शिकायत है।
पत्र के अनुसार मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने 27 सितम्बर 2008 की बैठक में संचालनालय व बड़े जिलों में फोटो ग्राफरों की सीधी भर्ती का निर्णय लिया था लेकिन जानबूझकर भर्ती नहीं की जा रही है जिसकी वजह से कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के कव्हरेज में दिक्कत आ रही है और अनुबंधित फोटोग्राफरों की सेवा ली जा रही है।
प्रताड़ित पत्रकार की पीड़ा
रामनगर से साप्ताहिक समाचार ओम दर्पण निकालने वाले पत्रकार ओम प्रकाश सिंह की पीड़ा यह है कि उसके साथ पुलिस वालों ने तो बदतमीजी की ही महिला सीएसपी श्वेता सिन्हा ने उन्हें एनकाउंडर करने की धमकी भी दी अब उन्हें झूठे केस में फंसा लेने का डर सता रहा है और उसने अपने साथ हुई घटना की शिकायत उच्चाधिकारियों से भी की है लेकिन कार्रवाई कोई नहीं कर रहा है।
चौथे स्तम्भ की शान
वफादार साथी द्वारा कथित रुप से प्रताड़ित होने वाले रेंजर एमआर साहू ने पत्रकार वार्ता लेकर अपनी आप बीती सुनाई है। श्री साहू का कहना है कि वे दुखी हैं एक तो नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उनके साथ गलत हो रहा है उनके साथ हो रहे गलत को छापने से चौथे स्तम्भ की शान बचाई जा सकती है।
और अंत में...
सीधे भास्कर के खिलाफ छापने वाली पत्रिका को अब सचेत होना होगा क्योंकि भास्कर भी बड़ी तैयारी में है और बलात छापने से भास्कर परहेज भी नहीं करने वाला है।
पत्र के अनुसार किसी समय अजीत जोगी के करीबी रहकर राजनीति का गुण सीखने वाले स्वराज दास ने अब जनसंपर्क में अपने प्रभाव के चलते राजनीति कर रहे हैं। चूंकि सचिव बैजेन्द्र कुमार जनसंपर्क से यादा पर्यावरण विभाग में यादा रूचि रखते हैं इसलिए भी यहां सब कुछ ठीक नहीं है। स्वराज दास जी जनसंपर्क के स्थापना व समाचार शाखा के भी प्रभारी है और उन पर पदोन्नति संबंधी फाईल दो सालों से रोक लेने का आरोप है। शासकीय कार्यक्रमों के कव्हरेज के लिए गाड़ी नहीं देकर कर्मचारियों को परेशान करने के अलावा संविदा कम्प्यूटर कर्मचारी को अनावश्यक परेशान करने का भी आरोप लगााया गया है। यही नहीं अखबारों को विलंब से समाचार भेजने व फोटोग्राफरों से दर्ुव्यवहार की भी शिकायत है।
पत्र के अनुसार मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने 27 सितम्बर 2008 की बैठक में संचालनालय व बड़े जिलों में फोटो ग्राफरों की सीधी भर्ती का निर्णय लिया था लेकिन जानबूझकर भर्ती नहीं की जा रही है जिसकी वजह से कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के कव्हरेज में दिक्कत आ रही है और अनुबंधित फोटोग्राफरों की सेवा ली जा रही है।
प्रताड़ित पत्रकार की पीड़ा
रामनगर से साप्ताहिक समाचार ओम दर्पण निकालने वाले पत्रकार ओम प्रकाश सिंह की पीड़ा यह है कि उसके साथ पुलिस वालों ने तो बदतमीजी की ही महिला सीएसपी श्वेता सिन्हा ने उन्हें एनकाउंडर करने की धमकी भी दी अब उन्हें झूठे केस में फंसा लेने का डर सता रहा है और उसने अपने साथ हुई घटना की शिकायत उच्चाधिकारियों से भी की है लेकिन कार्रवाई कोई नहीं कर रहा है।
चौथे स्तम्भ की शान
वफादार साथी द्वारा कथित रुप से प्रताड़ित होने वाले रेंजर एमआर साहू ने पत्रकार वार्ता लेकर अपनी आप बीती सुनाई है। श्री साहू का कहना है कि वे दुखी हैं एक तो नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उनके साथ गलत हो रहा है उनके साथ हो रहे गलत को छापने से चौथे स्तम्भ की शान बचाई जा सकती है।
और अंत में...
सीधे भास्कर के खिलाफ छापने वाली पत्रिका को अब सचेत होना होगा क्योंकि भास्कर भी बड़ी तैयारी में है और बलात छापने से भास्कर परहेज भी नहीं करने वाला है।
डाल्फीन स्कूल के शिक्षकों ने छात्र से की अप्राकृतिक कृत्य
एक शिक्षक गिरफ्तार, दो फरार
डाल्फिन इंटरनेशनल स्कूल भाटापारा के तीन शिक्षकों द्वारा एक नाबालिग छात्र से अप्राकृतिक कृत्य करने का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। इस मामले में एक शिक्षक आशीष प्रधान गिरफ्तार कर लिए गए हैं। जबकि दो शिक्षक फरार बताए जा रहे हैं। इस मामले का दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश मंत्री स्तर पर की गई जबकि स्कूल संचालक एक अखबार मालिक होने की वजह से भी मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है और फरार शिक्षकों को बचाया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि डाल्फिन इंटरनेशनल स्कूल द्वारा छत्तीसगढ़ के विभिन्न कस्बों व शहरों में स्कूल संचालित किया जा रहा है और 50 हजार दो 12वीं तक पढ़ों स्कीम भी चला रहा है। यही नहीं अधिकांश जगहों पर दूसरे शहर के लोगों की नियुक्ति की गई है। भाटापारा में संचालित डाल्फिन स्कूल में भी इसी तरह से दूसरे शहर के ही शिक्षकों की भर्ती की गई है जिन्हें सिर्फ पैसों से मतलब है। बताया जाता है कि भाटापारा में जिस बच्चे के साथ दूराचार किया गया वह प्रतिष्ठित परिवार का है इसलिए तत्काल एक शिक्षक आशीष प्रधान की धारा 37, 511 व 292 के तहत गिरफ्तार किया गया। जबकि दबाव में सहयोगी दो शिक्षकों को फरार होने का मौका दिया गया।
सूत्रों की माने तो शर्म की वजह से कुछ बच्चे सामने नहीं आ रहे हैं। बताया जाता है कि घर में समझा देने के नाम पर शिक्षकों द्वारा बच्चों को बुलाकर यह कृत्य किया गया और बच्चे ने जैसे ही इसकी जानकारी अपने परिजनों को दी तो वे सीधे पुलिस के पास जा पहुंचे और आनन-फानन में पुलिस को दबाव में कार्रवाई करनी पड़ी।
इधर इस मामले को लेकर भाटापारा में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है। सूत्रों के मुताबिक भाटापारा के लोगों ने बताया कि शिक्षकों से लेकर पूरा स्टाफ बाहरी है और अधिकांश कर्मचारी किराये का मकान लेकर अकेले रहते हैं। दरअसल घटना की प्रमुख वजह भी यही मानी जा रही है कि बाहरी शिक्षकों की वजह से ही इस तरह की घटनाएं हो रही है। दूसरी तरफ इस मामले में फरार शिक्षकों का बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो इन दोनों शिक्षकों को छुट्टी पर जाना बताया जा रहा है। इधर हमारे पुलिस सूत्रों ने बताया कि इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटाने एक मंत्री द्वारा थानेदार को फोन भी किया गया जबकि ऐसे घिनौने कृत्य पर डाल्फिन स्कूल के संचालक की भूमिका को भी शर्मनाक बताया जा रहा है। इधर डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे जबकि भाटापारा स्कूल के प्रचार्य की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
डाल्फिन इंटरनेशनल स्कूल भाटापारा के तीन शिक्षकों द्वारा एक नाबालिग छात्र से अप्राकृतिक कृत्य करने का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। इस मामले में एक शिक्षक आशीष प्रधान गिरफ्तार कर लिए गए हैं। जबकि दो शिक्षक फरार बताए जा रहे हैं। इस मामले का दुर्भाग्यजनक पहलू यह है कि पूरे मामले को दबाने की कोशिश मंत्री स्तर पर की गई जबकि स्कूल संचालक एक अखबार मालिक होने की वजह से भी मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है और फरार शिक्षकों को बचाया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि डाल्फिन इंटरनेशनल स्कूल द्वारा छत्तीसगढ़ के विभिन्न कस्बों व शहरों में स्कूल संचालित किया जा रहा है और 50 हजार दो 12वीं तक पढ़ों स्कीम भी चला रहा है। यही नहीं अधिकांश जगहों पर दूसरे शहर के लोगों की नियुक्ति की गई है। भाटापारा में संचालित डाल्फिन स्कूल में भी इसी तरह से दूसरे शहर के ही शिक्षकों की भर्ती की गई है जिन्हें सिर्फ पैसों से मतलब है। बताया जाता है कि भाटापारा में जिस बच्चे के साथ दूराचार किया गया वह प्रतिष्ठित परिवार का है इसलिए तत्काल एक शिक्षक आशीष प्रधान की धारा 37, 511 व 292 के तहत गिरफ्तार किया गया। जबकि दबाव में सहयोगी दो शिक्षकों को फरार होने का मौका दिया गया।
सूत्रों की माने तो शर्म की वजह से कुछ बच्चे सामने नहीं आ रहे हैं। बताया जाता है कि घर में समझा देने के नाम पर शिक्षकों द्वारा बच्चों को बुलाकर यह कृत्य किया गया और बच्चे ने जैसे ही इसकी जानकारी अपने परिजनों को दी तो वे सीधे पुलिस के पास जा पहुंचे और आनन-फानन में पुलिस को दबाव में कार्रवाई करनी पड़ी।
इधर इस मामले को लेकर भाटापारा में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है। सूत्रों के मुताबिक भाटापारा के लोगों ने बताया कि शिक्षकों से लेकर पूरा स्टाफ बाहरी है और अधिकांश कर्मचारी किराये का मकान लेकर अकेले रहते हैं। दरअसल घटना की प्रमुख वजह भी यही मानी जा रही है कि बाहरी शिक्षकों की वजह से ही इस तरह की घटनाएं हो रही है। दूसरी तरफ इस मामले में फरार शिक्षकों का बचाने का प्रयास किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो इन दोनों शिक्षकों को छुट्टी पर जाना बताया जा रहा है। इधर हमारे पुलिस सूत्रों ने बताया कि इस मामले को गुपचुप तरीके से निपटाने एक मंत्री द्वारा थानेदार को फोन भी किया गया जबकि ऐसे घिनौने कृत्य पर डाल्फिन स्कूल के संचालक की भूमिका को भी शर्मनाक बताया जा रहा है। इधर डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे जबकि भाटापारा स्कूल के प्रचार्य की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
वाह रे छग पुलिस
फरार फायनेंस कंपनी के संचालक
के खिलाफ जुर्म दर्ज करने
से कतरा रही है पुलिस
ऋषभ काम्पलेक्स में फर्जी फायनेंस कंपनी के संचालक शिवकुमार शर्मा व दुकान मालिक कथित पार्टनर मदनमोहन सेट्टी के खिलाफ जुर्म दर्ज करने से पुलिस अब भी कतरा रही है। जबकि कंपनी के खिलाफ लगभग 40 लोगों ने धोखाधड़ी की शिकायत की है।
वैसे भी छत्तीसगढ़ में जिस तरह से गृहमंत्री ननकीराम कंवर और डीजीपी विश्वरंजन की भूमिका रही है उसके बाद पुलिस थानों का भगवान ही मालिक है। स्वयं गृहमंत्री थानों को शराब माफिया के आगे बिक जाना बता चुके हैं। यही नहीं धनंजय सिंह परिहार के बार डांस से महिना लेना या तपन सरकार के पार्टनर को बचाना पुलिसिया करतूत बन चुकी है। ताजा मामला शिवकुमार शर्मा और दुकान मालिक मदनमोहन सेट्टी के वैष्णव फायनेंस कंपनी के द्वारा धोखाधड़ी का है। फायनेंस कंपनी द्वारा धोखाधड़ी की सूचना पर जिस तरह से शिवकुमार को छोड़ा गया उससे साढ़े तीन लाख रुपए लेकर मामले को रफा-दफा करने की कहानी सामने आई है।
इधर इस कहानी को इससे भी बल मिलता है कि लगभग 40 लोगों ने अपने साथ धोखाधड़ी करने की शिकायत मौदाहापारा थाने में की है लेकिन थाने में जांच के नाम पर जुर्म दर्ज ही नहीं किया है। दूसरी तरफ मामूली अपराधों में भी मकान मालिक के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस ने इस मामले में मकान मालिक मदनमोहन सेट्टी से पूछताछ की जरूरत भी नहीं समझी है जबकि शिकायत कर्ताओं ने मदनमोहन राये सेट्टी और उसके पुत्र कमल सेट्टी को पार्टनर बताया है। इधर यहां कार्यरत कर्मचारियों ने पुलिस को भी बताया है कि शिवकुमार शर्मा जब फरार हुए तब आफिस में मौजूद करीब ढाई लाख रुपए कमल सेट्टी द्वारा ले जाया गया। इतना सब कुछ होने के बाद भी पुलिस द्वारा अब तक किसी से भी पूछताछ नहीं करने पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। इधर इस मामले में एक निर्दलीय व एक भाजपा के पार्षद द्वारा थाने में दबाव बनाने की चर्चा है।
एक और कंपनी फरार...
इधर अभनपुर क्षेत्र में कार्यरत समाधान इंडिया फायनेंस के द्वारा भी लोगों से पैसा वसूलकर फरार होने की खबर है। शंकरदास गुप्ता (जयप्रकाश दास) सम्बलपुर उड़ीसा का निवासी है, जो छत्तीसगढ़ में समाधान इंडिया फायनेंस प्रा.लि. कंपनी के प्रभारी बतलाकर (बनकर) पूरे प्रदेश में घूम रहे थे और शरद कुमार मसीह जो कि कंपनी के इ.डी. के पोस्ट में थे, कमलेश्वर निर्मलकर रायपुर पचपेढ़ी नाका का निवासी है जिसका ससुराल शंकरनगर गौरव वाटिका मंदिर के पास आशीष डेनियल के यहां किराये से रहते हैं। ये दोनों युवकों ने कमलेश्वर निर्मलकर को 27 जून 2010 अभनपुर ब्लाक में ब्रांच मैनेजर के पद पर चयनित किया था और नियुक्ति पत्र बाद में देने का बात कहकर चले गए। इस दौरान लोगों से फाईनेंस करने के नाम से प्रोसेसिंग एवं डाक्यूमेंट चार्ज के नाम से एवं पर्सनल लोन हेतु 5150 रुपए प्रति व्यक्ति एवं ग्रुप लोन हेतु 550 रुपए प्रति व्यक्ति 10 लोगों के ग्रुप के हिसाब से समाधान इंडिया फायनेंस प्रा. लि. का ब्रांच अभनपुर नयापारा, राजिम, महासमुंद, बसना, पिथौरा, पाटन, भिलाई, रायपुर, धमधा इन सभी जगहाें पर आफिस खुला था और सभी ब्रांचों से लोन फाइनेंस करने हेतु पैसा लिया गया। अभनपुर ब्रांच से श्री कमलेश्वर निर्मलकर जो कि धमतरी रोड मंडी गेट के सामने थाना मोड अभनपुर का रहने वाला से 70 हजार रुपए, शंकरदास गुप्ता और शरद कुमार मसीह ने डी.ओ. आफिसर रायपुर में जमा करवाया। डी.ओ. आफिस श्री रामनगर एफ-2, जी-108 नंबर रुप में खुला था। शंकरदास गुप्ता का ठहरने का स्थान मौदाहापारा गुरु कृपा होटल में विगत 9 माह से रह रहा था। शंकरलाल गुप्ता ने 24 अगस्त 2010 को महासमुंद में 2.00 नगद और 6 लाख रुपए का चेक ब्रांच मैनेजर को दिया। 26 अगस्त 2010 को अभनपुर ब्रांच में पैसा देने का वादा किया था और अन्य ब्रांचों से रुपए लिए। 27 अगस्त 2010 को मालूम हुआ कि सभी चेक बाउंस हो गए हैं। शंकरदास गुप्ता और कुमार मसीह दोनों पिथौड़ा ब्रांच में लोन देना है करके और शरद कुमार मसीह को शंकर दास गुप्ता को आदमी प्लान करके घेरे में ले लिया व रास्ते में रुककर रुपए लेकर चले गए। 30 अगस्त 2010 तक मोबाइल नंबर 8018410092, 9589780517 नंबरों पर उन्होंने कहा कि हम आ रहे हैं लेकिन अब मोबाइल भी बंद है। दिल्ली या उड़ीसा से समाधान फाईनेंस प्रा.लि. कौन से संस्था के द्वारा अनुमति लिया था जिसकी पूर्ण जानकारी शरद कुमार मसीह रायपुर वाले के पास है, ऐसा बताया गया है। शरद कुमार मसीह पूरे छत्तीसगढ़ के प्रभारी के रुप में चुना गया और उसी के द्वारा बाकी व्यवस्था छत्तीसगढ़ के अंदर किया गया। अत: लोगों के साथ कूटरचित रुप से एवं लोगों को गलत जानकारी देकर समाधान फाइनेंस प्रा. लि. के द्वारा लोगों से पूरे क्षेत्र में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए वसूली कर चम्पत हो गए है। इनके द्वारा बताए गए मोबाइल नंबर से शरद मसीह से मोबाइल में बात करने पर पैसे वापस करने के संबंध में कहने से इन्होंने कहा कि हमारी काफी उंची सेटिंग है हम पैसा वापस नहीं करेंगे आप हमारा कुछ नहीं कर सकते।
के खिलाफ जुर्म दर्ज करने
से कतरा रही है पुलिस
ऋषभ काम्पलेक्स में फर्जी फायनेंस कंपनी के संचालक शिवकुमार शर्मा व दुकान मालिक कथित पार्टनर मदनमोहन सेट्टी के खिलाफ जुर्म दर्ज करने से पुलिस अब भी कतरा रही है। जबकि कंपनी के खिलाफ लगभग 40 लोगों ने धोखाधड़ी की शिकायत की है।
वैसे भी छत्तीसगढ़ में जिस तरह से गृहमंत्री ननकीराम कंवर और डीजीपी विश्वरंजन की भूमिका रही है उसके बाद पुलिस थानों का भगवान ही मालिक है। स्वयं गृहमंत्री थानों को शराब माफिया के आगे बिक जाना बता चुके हैं। यही नहीं धनंजय सिंह परिहार के बार डांस से महिना लेना या तपन सरकार के पार्टनर को बचाना पुलिसिया करतूत बन चुकी है। ताजा मामला शिवकुमार शर्मा और दुकान मालिक मदनमोहन सेट्टी के वैष्णव फायनेंस कंपनी के द्वारा धोखाधड़ी का है। फायनेंस कंपनी द्वारा धोखाधड़ी की सूचना पर जिस तरह से शिवकुमार को छोड़ा गया उससे साढ़े तीन लाख रुपए लेकर मामले को रफा-दफा करने की कहानी सामने आई है।
इधर इस कहानी को इससे भी बल मिलता है कि लगभग 40 लोगों ने अपने साथ धोखाधड़ी करने की शिकायत मौदाहापारा थाने में की है लेकिन थाने में जांच के नाम पर जुर्म दर्ज ही नहीं किया है। दूसरी तरफ मामूली अपराधों में भी मकान मालिक के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस ने इस मामले में मकान मालिक मदनमोहन सेट्टी से पूछताछ की जरूरत भी नहीं समझी है जबकि शिकायत कर्ताओं ने मदनमोहन राये सेट्टी और उसके पुत्र कमल सेट्टी को पार्टनर बताया है। इधर यहां कार्यरत कर्मचारियों ने पुलिस को भी बताया है कि शिवकुमार शर्मा जब फरार हुए तब आफिस में मौजूद करीब ढाई लाख रुपए कमल सेट्टी द्वारा ले जाया गया। इतना सब कुछ होने के बाद भी पुलिस द्वारा अब तक किसी से भी पूछताछ नहीं करने पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। इधर इस मामले में एक निर्दलीय व एक भाजपा के पार्षद द्वारा थाने में दबाव बनाने की चर्चा है।
एक और कंपनी फरार...
इधर अभनपुर क्षेत्र में कार्यरत समाधान इंडिया फायनेंस के द्वारा भी लोगों से पैसा वसूलकर फरार होने की खबर है। शंकरदास गुप्ता (जयप्रकाश दास) सम्बलपुर उड़ीसा का निवासी है, जो छत्तीसगढ़ में समाधान इंडिया फायनेंस प्रा.लि. कंपनी के प्रभारी बतलाकर (बनकर) पूरे प्रदेश में घूम रहे थे और शरद कुमार मसीह जो कि कंपनी के इ.डी. के पोस्ट में थे, कमलेश्वर निर्मलकर रायपुर पचपेढ़ी नाका का निवासी है जिसका ससुराल शंकरनगर गौरव वाटिका मंदिर के पास आशीष डेनियल के यहां किराये से रहते हैं। ये दोनों युवकों ने कमलेश्वर निर्मलकर को 27 जून 2010 अभनपुर ब्लाक में ब्रांच मैनेजर के पद पर चयनित किया था और नियुक्ति पत्र बाद में देने का बात कहकर चले गए। इस दौरान लोगों से फाईनेंस करने के नाम से प्रोसेसिंग एवं डाक्यूमेंट चार्ज के नाम से एवं पर्सनल लोन हेतु 5150 रुपए प्रति व्यक्ति एवं ग्रुप लोन हेतु 550 रुपए प्रति व्यक्ति 10 लोगों के ग्रुप के हिसाब से समाधान इंडिया फायनेंस प्रा. लि. का ब्रांच अभनपुर नयापारा, राजिम, महासमुंद, बसना, पिथौरा, पाटन, भिलाई, रायपुर, धमधा इन सभी जगहाें पर आफिस खुला था और सभी ब्रांचों से लोन फाइनेंस करने हेतु पैसा लिया गया। अभनपुर ब्रांच से श्री कमलेश्वर निर्मलकर जो कि धमतरी रोड मंडी गेट के सामने थाना मोड अभनपुर का रहने वाला से 70 हजार रुपए, शंकरदास गुप्ता और शरद कुमार मसीह ने डी.ओ. आफिसर रायपुर में जमा करवाया। डी.ओ. आफिस श्री रामनगर एफ-2, जी-108 नंबर रुप में खुला था। शंकरदास गुप्ता का ठहरने का स्थान मौदाहापारा गुरु कृपा होटल में विगत 9 माह से रह रहा था। शंकरलाल गुप्ता ने 24 अगस्त 2010 को महासमुंद में 2.00 नगद और 6 लाख रुपए का चेक ब्रांच मैनेजर को दिया। 26 अगस्त 2010 को अभनपुर ब्रांच में पैसा देने का वादा किया था और अन्य ब्रांचों से रुपए लिए। 27 अगस्त 2010 को मालूम हुआ कि सभी चेक बाउंस हो गए हैं। शंकरदास गुप्ता और कुमार मसीह दोनों पिथौड़ा ब्रांच में लोन देना है करके और शरद कुमार मसीह को शंकर दास गुप्ता को आदमी प्लान करके घेरे में ले लिया व रास्ते में रुककर रुपए लेकर चले गए। 30 अगस्त 2010 तक मोबाइल नंबर 8018410092, 9589780517 नंबरों पर उन्होंने कहा कि हम आ रहे हैं लेकिन अब मोबाइल भी बंद है। दिल्ली या उड़ीसा से समाधान फाईनेंस प्रा.लि. कौन से संस्था के द्वारा अनुमति लिया था जिसकी पूर्ण जानकारी शरद कुमार मसीह रायपुर वाले के पास है, ऐसा बताया गया है। शरद कुमार मसीह पूरे छत्तीसगढ़ के प्रभारी के रुप में चुना गया और उसी के द्वारा बाकी व्यवस्था छत्तीसगढ़ के अंदर किया गया। अत: लोगों के साथ कूटरचित रुप से एवं लोगों को गलत जानकारी देकर समाधान फाइनेंस प्रा. लि. के द्वारा लोगों से पूरे क्षेत्र में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए वसूली कर चम्पत हो गए है। इनके द्वारा बताए गए मोबाइल नंबर से शरद मसीह से मोबाइल में बात करने पर पैसे वापस करने के संबंध में कहने से इन्होंने कहा कि हमारी काफी उंची सेटिंग है हम पैसा वापस नहीं करेंगे आप हमारा कुछ नहीं कर सकते।
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