गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

स्वामी भक्ति के मायने

कहते है स्वामी भक्ति में कुत्ते से कोई मुकाबला नहीं है, वैसे कई लोग घोड़े को भी उदाहरण के रुप में प्रस्तुत करते हैं लेकिन वर्तमान में राजनैतिक दलों के नेताओं में स्वामीभक्ति की होड़ मची है। स्वामी भक्ति में लोग इतने अंधे हो गए हैं कि उनके सामने देश-धर्म और समाज तक बौना हो गया है।
हाल ही में कांग्रेस के हाईकमान के जन्मदिवस पर छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों ने स्वामीभक्ति की होड़ में तिरंगे के अपमान से भी परहेज नहीं किया। कांग्रेस भवन में बाकायदा ऐसा केक बनवाकर चाकू चलाया गया जो तिरंगे का प्रतिरुप था। कभी देश प्रेम में कांग्रेस का कहीं कोई मुकाबला नहीं था। कांग्रेस का निर्माण ही भारत को अंग्रेजी दास्तां से मुक्ति दिलाने की गई थी लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस में व्यक्तिवाद इतना हावी हो गया कि देश समाज धर्म सभी गौण हो गए। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में देश प्रेमी मौजूद नहीं है। आज भी देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले लोग हैं लेकिन पैसा इस कदर हावी है कि सारी बातें गौण हो जाती है।
ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेसियों ने तिरंगे का अपमान पहली बार किया हो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मेहतर लाल साहू ने निधन पर भी इसी तरह का कृत्य किया गया था। तब पुलिस ने तत्परता दिखलाकर जुर्म दर्ज भी किया था। लेकिन इस बार प्रशासन ने कोई रूचि नहीं दिखाई उल्टे जब शहर के पुलिस कप्तान ही यह कहने लगे हो कि शिकायत मिलेगी तभी जुर्म दर्ज होगा। शर्मनाक और हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? पुलिस की दोगलाई पहली बार उजागर नहीं हुई है। इससे पहले शहर के नामी हीरा ग्रुप के दीपावली में बांटे कार्पोरेट गिफ्ट में तो देश का नक्शा ही त्रुटिपूर्ण था तब भी शासन की ओर से कोई पहल नहीं हुई। धन बल और कुर्सी बल के आगे किस तरह से छत्तीसगढ़ का शासन बेबस है यह इस दो उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। ताजा मामला तो स्वामी भक्ति की पराकाष्ठा है। ऐसा नहीं है कि स्वामी भक्ति का उदाहरण सिर्फ कांग्रेस में ही है। भाजपा में भी स्वामी भक्ति दिखाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक सुचिता, सादगी की वकालत करने वाले भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी के पुत्र की शादी का आयोजन लोकतंत्र में किस तरह से स्वीकार योग्य है यह तो भाजपा ही जाने लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार में बड़े-बड़े ओहदे में बैठे लोगों ने इस विवाह समारोह में जो स्वामी भक्ति दिखाई वह आम लोगों में शर्मनाक ढंग से चर्चा में है।
दरअसल सत्ता और धन ने राजनैति· दलों से जुड़े लोगों को इस हद तक पागल कर दिया है कि उनके लिए नैतिकता छूत हो गई है। विवादों में रहना उनके लिए शगल है और हर हाल में मीडिया में बने रहने की भूख ने अच्छे-बुरे का लिहाज ही छोड़ दिया है। प्रशासन भी इस हद तक अपनी जमीर बेचने में लगा है जैसे उसके लिए नौकरी ही सब कुछ है लेकिन जो लोग इसकी परवाह नहीं करते वे समझ लें कि इस देश के लोगों ने देर से ही सही लालू-पासवान या मुलायम-वीसी शुक्ल या अजीत जोगी तक को असहाय कर दिया है। नैतिकता अब भी है और इसकी परवाह नहीं करने वालों को धूल में मिलना ही होता है।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

मिला मौका, मारा चौका

 छत्तीसगढ़ के अखबारों में इन दिनों जबरदस्त प्रतिस्पर्धा चल रही है। एक दूसरे से आगे नि·लने की होड़ के बीच दैनिक भास्कर और पत्रिका में जंग छिड़ चुका है। कौन आगे है यह आम जनता समझ भी रही है लेकिन एक दूसरे के खिलाफ कोई मौका नहीं छोडऩे की हठ ने पाठकों को नई खुशी दी है। दैनिक भास्कर का नाम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आते ही पत्रिका की बांहे खिल गई उसने भी मसालेदार खबर तैयार की और दैनिक भास्कर ग्रुप और रमेश अग्रवाल के इस तरह से कपड़े उतारे मानों वे दूध के धूले हो। पत्रिका किस तरह से दूध का धूला है यह तो वही जाने लेकिन भास्कर फिलहाल चुप है। तूफान के पूर्व की शांति।
विज्ञापन और आत्मा
पिछले दिनों कलकत्ता से आए कुछ लोगों ने प्रेस क्लब में संगोष्ठि रखी कि मीडिया ने विज्ञापन के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। आयोजकों को उम्मीद थी कि इस बहस का असर होगा लेकिन यहां के संपादक कम खाटी नहीं है वे यह साबित करने में लगे रहे कि विज्ञापन का दबाव होता जरूर है पर इतना नहीं कि आत्मा बिक जाए।
रंगा-बिल्ला की करतूत
कहते हैं शहर का सर्वाधिक प्रसारित इस अखबर में जब से बिहारी बाबूओं ने डेरा जमाया है तब से ठेके में चले जाने की चर्चा आम हो गई है अब तो इस अखबार के रिपोर्टर तक हैरान है कि सरकार तो छोडि़ए पैसे वाले कांग्रेसियों के खिलाफ भी खबर नहीं छापी जा रही है सीधे सौदा किए जा रहे हैं।
असहायों से भी कमाई
कभी आयुर्वेद का प्रचार करते करते अखबार लाईन में आए इस मैनेजमेंट वाले का कोई जवाब नहीं है। सारा संसार अखबार में आते ही बड़े बड़ों से सेटिंग की और जब लगा कि मालिक निकालने वाले है तो अपनी दुनिया बसा ली। यहां भी वे अपनी हर·त से बाज नहीं आ रहे हैं कहते हैं अखबार का प्रभाव दिखा·र वह असहायों से कमाई की आकांक्षा पाले हुए है और इसके लिए अपनी पत्नी को हथियार बना रहे हैं।
पुसदकर का स्वदेश प्रेम
प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदvर ने स्वदेश ज्वाईन कर लिया है। संपादक बन गए है और समय भी देने की कोशिश में है पर कितना दिन। आखिर वहां भी तो एत से एत बरकर है।
और अंत में...
लोग जबरदस्ती जोसेफ जी का उदाहरण देते है अब पाण्डे जी भी आ गए हैं संदर्भ ग्रंथ लेकर।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं...

इन दिनों पूरे देश में 2जी स्पेक्ट्रम कांड को लेकर चर्चा है। साथ ही भ्रष्टाचार को लेकर हर कोई चिंतित है कि आखिर इस देश के ईमानदार लोग कहां चले गए। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली ने आम आदमी को निहायत स्वार्थी और डरपोक बना दिया है। जहां विरोध करने का माद्दा ही खत्म हो गया है।
पिछले दिनों काफी हाउस में चर्चा के दौरान मेरे मित्र उचित शर्मा ने कहा कि आम आदमी के पास टाईम नहीं है इसलिए तो वह जनप्रतिनिधि चुनता है ताकि आप लोग सुकून से जिन्दगी जी सके। लोकतंत्र की यह सबसे अच्छी बात भी यही है लेकिन जब पूरी सरकार और जनप्रतिनिधि ही भ्रष्ट होने लगे और उसे चलन या परम्परा का नाम दे दे तो फिर आम आदमी के पास रास्ता क्या रह जाता है। लेकिन रास्ता है और इसके लिए हमें अपनी मुंह देखी चरित्र को बदलना होगा। हमारी लड़ाई इसी की है कि आखिर सरकार शराब क्यों बेचे। और धर्म गुरु आम लोगों को समझाईश देने की बजाय उस सरकार का बहिष्कार करे तो ऐसे कृत्य कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में शराब की गंगा बह रही है यह बात सरकार में बैठे पक्ष-विपक्ष सभी लोग जानते हैं। आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में दुर्घटना से मरने वालों की संख्या या अपाहिज होने वाले प्रकरणों पर गौर करें तो 80 से 90 फीसदी मामलों में शराब सामने आ रही है इसी तरह घरेलू हिंसा से लेकर लूटपाट और हत्या जैसे मामले भी शराब की वजह से ही बढ़े हैं इसके बाद भी सरकार राजस्व की दुहाई देकर जगह-जगह शराब बेच रही है। सरकार का सबसे हास्यास्पद पक्ष यह है कि वह गुजरात के शराब बंदी को असफल कहती है और तस्करी की बात कहकर पूर्णत: शराबबंदी के खिलाफ खड़ा होती है लेकिन क्या यह पूरा सच है। नहीं। गुजरात में शराब तस्करी होती जरूर है लेकिन इस तरह की शराब 10 फीसदी से ज्यादा लोग नहीं पीते और वहां के आंकड़े बताते हैं कि शराब बंदी के बाद दुर्घटना से लेकर अपराध के आंकड़ों में जबरदस्त कमी आई है।
इसी तरह भ्रष्टाचार और घोटाले में भी सरकार की भूमिका से आम लोग खुश नहीं है। गलत लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने की इस परम्परा को बंद करनी चाहिए। आरोपितों को दंडित करने की बजाय पुरस्कृत करने की वजह से ही बाबूलाल अग्रवाल जैसे लोगों के हौसले बुलंद है। इसकी भारी कीमत सरकार को चुकानी पड़ेगी। विवादास्पद अधिकारियों को महत्वपूर्ण विभाग देने की बजाय उन्हें आफिस के काम में लगा देना चाहिए या ऐसे काम जहां न वित्तीय अधिकार हो और न ही वे आदेश देने के लायक रहे।
सुप्रीमकोर्ट की भूमिका को ले·र इन दिनों राजनेताओं से लेकर अधिकारियों में हड़·म्प मचा है लेकिन छत्तीसगढ़ में दूसरी ही परम्परा चल रही है। आईपीएस और आईएएस के मक्·डज़ाल में सरकार ऐसे उलझ गई है कि लोकतंत्र की बजाय राजशाही ज्यादा नजर आने लगा है। भ्रष्टाचार में लिप्त आईएएस लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया जा रहा है और ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जा रहा है। यदि इस परम्परा को बंद नहीं किया गया तो फिर ए· गांधी या चंद्रशेखर आजाद या भगत सिंह को पैदा होने से कौन रोक सकेगा। तब...

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

दोषी कौन ? मोहन या मूणत!

भ्रष्ट अधिकारियों का रौब, लोगों में आक्रोश
आयकर विभाग से लेकर आर्थिक अपराध ब्यूरों हो या अन्य जांच एजेंसियों ने जिस तरह से भ्रष्ट अधिकारियों का खुलासा किया है इसके बाद भी ये लोग पदों पर जमें है तो इसके लिए दोषी कौन है। राजधानी के दो-दो मंत्रियों के रहते भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई नहीं होना, क्या साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि कहीं न कहीं इसके लिए दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत का संरक्षण है। निगम इंजीनियर राठौर का मामला हो या निगम के दूसरे अफसरों का। आरोपों के बाद भी ये लोग अपने पदों पर जमें हुए हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस तेजी से विकास होने का दावा किया जा रहा है उससे कहीं अधिक तेजी से अफसरों का व्यक्तिगत विकास अधिक हुआ है। ताजा मामला नगर निगम के इंजीनियर एम.सी. राठौर के यहां पड़े छापे से पता चलता है। आर्थिक अपराध ब्यूरों ने इस इंजीनियर के घर व ठीकानों से ढाई करोड़ से ऊपर की अनुपातहीन संपत्ति जब्त की और आश्चर्य का विषय तो यह है कि अभी तक इस इंजीनियर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि यहां दो-दो मंत्री है और वे निगम क्षेत्र से ही विधायक बनते हैं। आम लोगों में हो रही तीखी प्रतिक्रिया के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि राठौर को कौन बचा रहा है। बृजमोहन अग्रवाल या राजेश मूणत? तेज तर्रार माने जाने वाले कमिश्नर ओपी चौधरी की इस मामले में चुप्पी रहस्यमय है। आर्थिक अपराध ब्यूरों की कार्रवाई के बाद सस्पेंड की उम्मीद तो की ही जा रही थी लेकिन सस्पेंड नहीं किए जाने पर आम प्रतिक्रिया है कि फिर इस तरह की एजेंसी का औचित्य ही क्या है।
इस बीच निगम के अन्य भ्रष्ट अधिकारियों को भी संरक्षण देने का आरोप मंत्रीद्वय पर लगाया जा रहा है। बताया जाता है कि बेक होल लोडर सप्लाई मामले में भी निगम के एक अफसर की भूमिका संदिग्ध रही है और यही वजह है कि इस अफसर को बचाने मामले की लीपीपोती की जा रही है। बताया जाता है कि अवैध काम्प्लेक्सों से लेकर अवैध निर्माण में निगम के कई अफसरों की सीधे जिम्मेदारी की शिकायत पर भी कार्रवाई नहीं होगा। क्या संरक्षण के दावों को झुठलाया जा सकता है। बहरहाल भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने को लेकर जिस तरह से बृजमोहन और मूणत पर छींटे लग रहे है वे आने वाले दिनों में भाजपा के लिए नई मुसीबत ला सकता है।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सजा के jishm न बेचें तो और क्या बेंचे,गरीब लोग हैं घर में दुकान रखते हैं

छत्तीसगढ rajya  बनने के बाद अखबारों की बाढ़ सी आ गई है। कई पत्रकार नौकरी करने की बजाय अपना अखबार निकाल रहे हैं तो राय सरकार की विज्ञापन नीति से प्रभावित होकर बड़े ग्रुप भी कूद गए हैं। अखबार क्या अच्छा खासा मनोरंजन का साधन बन गया है। खबरों के नाम पर सूचना या फिर ओब्लाईजेशन का नजारा ही अधिक दिखाई देने लगा है। सारे बड़े अखबार पेज मेकर के हवाले हैं। खबरें कैसे बननी है इसकी बजाय अखबार कैसे सजाए जाएं इस पर यादा ध्यान हैं। विज्ञापन बटोरने के अलावा लोग बनाने की तमन्ना भी यादा दिखलाई पड़ रहा है। ऐसे में पत्रकार से अखबार मालिक बने लोगों की अपनी पीड़ा है अच्छी खबरों के बाद भी पढ़ने वालों की कमी से जूझ रहे अखबार भी अब साज-साा पर जोर देने लगे हैं।
पिछला सप्ताह यानी काला सप्ताह
पिछले सप्ताह पुलिस ने दो पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की। दामू आम्बेडारे तो दामू बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए का गाना गाते घूम रहा है। बमुश्किल से जमानत मिलने के बाद प्रेस क्लब से निलंबित भी किए गए। 15 दिन के भीतर जवाब सही मिला तो ठीक वरना। दूसरा मामला धोखाधड़ी का है। हैलो रायपुर निकाल रहा मधुर को जमीन का कारोबार रास नहीं आया लोग दूसरा काम छोड़ अखबार निकाल रहे है और ये अखबार से दूसरे काम की ओर जा रहा है तो फंसना तो है ही।
छत्तीसगढ़ अब सुबह की ओर...
एक कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो इसे भूला नहीं कहते। सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ निकाल रहे सुनील कुमार अब सुबह का अखबार निकालने की कोशिश में है। इसे देर आए दुरुस्त आए भी कहा जा सकता है। अखबार भी अच्छा निकालों और दो घंटे में पढ़ाओं। यह अकल तो पहले आनी चाहिए थी। पर हाइवे का भूत अब जाकर उतरा है।
भास्कर की छटपटाहट
मीडिया जगत के इस नए छत्रप की दिक्कते बढ ग़ई है। अपनी जमीन में बनी बिल्डिंग को तोड़कर 14 मंडिला बनाने की कवायद में किराए के भवन में जाना पड़ा तो नेशनल लुक भी वहीं पहुंच गया और अब पत्रिका दुश्मन बन गया है। ऐसे में विज्ञापन दर कम करने की मजबूरी के बाद भी सर्कुलेशन कम होने लगे तो छटपटाहट स्वाभाविक है।
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी में
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी के प्रथम सप्ताह में कराए जाने की सुगबुगाहट शुरु हो गई है। इसके पहले मतदाता सूची और आडिट रिपोर्ट का काम चल रहा है। दावेदार भी अभी से गुणा-भाग करने लगे हैं।
और अंत में...
राजधानी की चिंता के साथ छत्तीसगढ़ में कदम रखने वाले पत्रिका का तेवर कहां है? यह सवाल करने वाले अब इसे उसके दुश्मन भास्कर से ही तुलना करने लगे है ''अरे यह तो दूसरा भास्कर है।''

सोमवार, 29 नवंबर 2010

जय बोलों बेईमान की...

सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार के वकील ने जिस बेहूदे ढंग से कहा कि किसी की नियुक्ति में ईमानदारी अंतिम योगय्ता है तो फिर नियुक्ति के लिए लोग नहीं मिलेंगे।
यह कथन उन लोगों के गाल पर तमाचा है जो लोग ईमानदारी को ही सर्वोपरि समझते हैं? और यदि सरकार को ही सर्वोपरि समझते हैं? और सरकार के वकील इस तरह की बात करें तो फिर यह अराजकता के सिवाय कुछ नहीं है। फिर काहे की सरकार, काहे की न्याय व्यवस्था और काहे का कानून?
केंद्र सरकार में जरा भी नैतिकता है तो उन्हें ऐसे वकीलों का लाइसेंस जब्त कर लेना चाहिए जो इस तरह की बात करता हो? सरकार और उसमें बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह दुनिया तभी कायम है जब ईमानदारी जिन्दा है।
ईमानदारी आम लोगों में अधिक है। नेता और अधिकारी भ्रष्ट हो चुके हैं और पदों में बेईमानों को बिठाया जा रहा है तो इसके लिए ईमानदारी को गाली देना कहां तक उचित है। बेईमान इसलिए बढ़े हैं क्योंकि हमारी व्यस्वथा ही ऐसी है।
एक जमाना था जब नैतिकता लोगों के रग-रग में बसी थी। छोटी सी भी खबर से नौकरी तक चली जाती थी। अब नौकरी का डर नहीं है, क्यों? इसलिए क्योंकि जनता ने जिस पर भरोसा किया व भी वेतनभोगी हो गए! उन्हें भी जनसेवा की आड़ में वेतनभत्ता और राजसी एय्याशी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में ही डा. रमन सिंह ने क्या कभी मंत्रालय में घूम कर देखा है कि दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कक्ष का द्वार को या भीतर के राजसी ढाढ को? ऐसे कैसे अनुमति दी जा सकती है?
क्या अखबारों में छप रहे भ्रष्टाचार की खबरों को सरकार ने संज्ञान में लेकर किसी तरह की कार्रवाई की। क्या किसी घोटाले में सचिव और मंत्रियों को जिम्मेदार ठहराया गया? बेशर्मी यहां है! और बेशर्मी तो तब बढ़ जाती है जब किसी मंत्री के गोंदिया में रहने वाले साले की संपत्ति 7 सालों में 70 गुणा बढ़ जाती है और इस पर भी कार्रवाई नहीं होती? बेशर्मा तब और बढ़ जाती है जब मंत्री बनते ही भाई संस्कृति विभाग में दलाली करने लगता है। अपने भाई को दलाल कहते सुनने के बाद भी शर्म नहीं आये तो इसे क्या कहा जा सकता है।
केंद्र सरकार के वकील को यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों ने ईमानदारी नहीं बरती होती तो आज वे वकील नहीं होते? ईमानदारी आज भी जिन्दा है तो सरकारें जिंदा हैं।
ये अलग बात है कि वेतन भोगी लोगोंमें बेईमानी यादा है इसकी वजह व्यवस्था का दोष है। पकड़े जाने के बाद भी नौकरी पर आंच नहीं आने की जटिलता से बेईमानों के हौसले बुलंद है।
छत्तीसगढ़ में ही आईएएस बाबूलाल अग्रवाल का क्या हुआ? मालिक मकबूजा कांड में वेतनवृध्दि प्रमोशन रुकने के बाद नारायण सिंह का क्या हुआ? ऐसे लोगों को प्रमोशन देने की कोशिश पर सरकार की चुप्पी क्या बेईमानों के हौसले नहीं बढ़ाती है। परिवहन इंस्पेक्टर विनय कुमार अनंत हो या डॉ. आदिले? सरकार प्रमाणित होने के बाद भी नौकरी से क्यों नहीं निकाल देती। यदि बेईमानों में खौफ नहीं होगा तो कैसे ईमानदार लोग सामने आयेंगे?
ऐसा नहीं है कि ईमानदार लोग आगे नहीं आते। ऐसे कई मामलों में वेतनभोगियों में भी हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी ईमानदारी में गुजार दी। अब तो यह जुमला भी सुनने को मिल जाता है कि ईमानदार वही है जिन्हें मौका नहीं मिला। इन सबसे बावजूद अब भी ईमानदारी कायम है और दुनिया भी!

शनिवार, 27 नवंबर 2010

बिहार का चुनाव परिणाम भाजपाईयों को भी चेतावनी ....

बिहार के चुनाव परिणाम यदि लालू और कांग्रेस के गाल पर तमाचा है तो भाजपा के लिए भी स्पष्ट चेतावनी है कि लोग हर हाल में शांति से जीवन जीना चाहते हैं। दो जून की रोटी और सुकून की नींद ही हमारी नई आजादी की लड़ाई का उद्देश्य है। बिहार में नीतिश कुमार की जीत हमारी इसी नई आजादी की जीत है। जहां कानून व्यवस्था मजबूत हो, विकास के द्वार खुल रहे और आप लोगों को बेहतर जीवन मिले।
बिहार के चुनाव परिणाम आने वाली राजनीति की दिशा तय करेगी। अब जाति और धर्म को राजनीतिक रूप देने की किसी भी कोशिश को जनता समझने लगी है। क्योंकि ये झगड़े सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम है और लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सरकार किसकी रहे वह तो बस अच्छी सरकार चाहती है। बिहार में न तो लालू का जाति वाला जादू चला और न ही कांग्रेस के राहुल का परिवारिक जादू ही काम आया। भाजपा के धर्म आधारित राजनीतिक को भी नीतिश कुमार ने पहले ही हाशिये में डाल रखा था। नरेन्द्र मोदी के कट्टर हिन्दुत्व के चेहरे को जिस बेबाकी से नीतिश कुमार ने नोचा था तभी से ही उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त हो गया था।
वे दिन अब लदने लगे हैं जब पारिवारिक पृष्ठभूमि मायने रखती थी। अब वे युवा पढ़-लिखकर नई सोच के साथ जीना पसंद करते हैं। हर जाति और हर धर्म के युवा एक छत के नीचे न केवल काम कर रहे हैं बल्कि अपनी जिन्दगी का सुख-दुख और यहां तक की पारिवारिक रिश्ते भी कायम कर रहे हैं। ऐसे में जाति और धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों की दुर्गत स्वाभाविक है।
नीतिश कुमार के पहले बिहारी शब्द से आम लोगों को चिढ़ होने लगी थी। बिहार में माफियाओं का राज था। दिन ढलते ही दहशत के साये में जीते लोगों ने जब हिम्मत करके नीतिश को गद्दी पर बिठाया तो उन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभाई। कानून-व्यवस्था की लचर स्थिति को तो मजबूत किया ही गया। विकास के नये आयाम स्थापित किया। आम लोगों में व्याप्त भय को दूर करने का विश्वास ही उन्हे पुन: सत्तासीन किया है।
लालू की हरकत नौटंकी बन गई और राहुल का क्रेज भी यहां खत्म हो गया तो इसके पीछे नीतिश की वह सोच है जिसमें भाजपा के नरेन्द्र मोदी जैसे चेहरे को भी वे बर्दाश्त नहीं करते। भाजपा भले ही इस जीत में अपना श्रेय ढूंढ़ रही हो लेकिन सच्चाई वह भी जानती है कि यदि नीतिश की राह पर वे नहीं चले होते तो वह भी आज लालू-पासवान और कांग्रेस के साथ खड़ी होती।
नई आजादी की लड़ाई ऐसे ही सरकार के लिए हैं जहां भय, भूख और भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है। सरकार भी ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। विकास की सारी सुविधाएं शहरों में ही देने की बजाय गांवों में भी पहुंचे। बिसलरी पीने वाले नेता-अधिकारी गांव वालों को तो कम से कम सहज रूप से पीने का पानी पहुंचाये। उद्योगों को पानी और बिजली की वकालत करने वाले खेतों को पानी पहुंचाने का काम करें। स्वास्थ्य सुविधा गांव-गांव तक पहुंचे और माफियाओं के खिलाफ कड़ा कानून बने।
गृह निर्माण मंडल का राविप्रा जैसी संस्थानों में एक व्यक्ति एक मकान के सिध्दांत को लागू करें। इसमें न केवल अपना मकान का सपना पूरा होगा बल्कि सस्ते दर में मकान उपलब्ध हो जायेंगे।
छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी बिहार चुनाव के परिणाम चुनौती है। वहां माफिया भाये तो यहां डेरा डालने लगे है। बिहार में नीतिश ने अपहरण फिरौती करने वालों को जेल में डाल दिया तो यहां वारदात बढ़ रही है। कृषि जमीन और सरकार जमीनों को विकास के नाम पर बंदरबांट करना बंद करना होगा और दमदार मंत्री, भ्रष्ट मंत्री और ऐसे ही अधिकारियों पर नकेल कसनी होगी।