शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अंधेरगर्दी पर जीत...


विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने जिन कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था वे लोग इस अन्याय के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीत गये। हाईकोट ने विधानसभा अध्यक्ष श्री कौशिक के इस निर्णय को निरस्त कर इन कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि बर्र्खास्तगी किसी कर्मचारी के विरूद्ध कड़ी सजा है और वे लोग काम पर लौट आए थे तब उन्हें बर्खास्त करना उचित नहीं है।  न्यायालय के इस फैसले ने राज्य सरकार के लिए एक लाईन खींच दी है कि वे किसी के साथ इतना अन्याय न करे कि उसे कानून की सहायता लेनी पड़े। दरसल 29 अप्रैल 2011 में विधानसभा के कर्मचारियों ने विधानसभा के सचिव देवेन्द्र वर्मा के नादिरशाही और अपनी मांगो को लेकर हड़ताल पर चले गए थे। यह किसी से नहीं छिपा है कि देवेन्द्र वर्मा किस तरह से सचिव बने है। मध्यप्र्रदेश आबंटन के बाद भी वे छत्तीसगढ़ में किस तरह से जमे हुए है और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपो की भी कमी नहीं  है। सरकार का उन्हें पूरी तरह संरक्षण प्राप्त है और इसी के चलते देवेन्द्र वर्मा की दादागिरी चरम पर है। उनके कृत्यों से न केवल विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के विधायक भी परेशान है और कर्मचारियों को अपनी जूती की नोंक पर रखने का दावा शहर की चौराहों में चर्चा का विषय है। सहनशक्ति बर्दास्त के बाहर होने की वजह से ही यहां के कर्मचारियों ने आंदोलन शुरू किया लेकिन इस आंदोलन को कूचल दिया गया। सरकार ने इस आंदोलन को कूचलने एस्मा कानून का सहारा लिया जबकि तब न तो विधानसभा का सत्र चल रहा था और न ही कोई विपदा आ पड़ी थी। लेकिन देवेन्द्र वर्मा के करतूतो को उजागर करते इस आंदोलन को समाप्त करने एस्मा लगाया गया।  एस्मा के खौफ के आगे कर्मचारी नतमस्तक होकर काम पर लौंट गए चूंकि इन कर्मचारियों ने देवेन्द्र वर्मा से पंगा लिया इसलिए काम पर लौटने के बावजूद भी इन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इस अन्याय को लेकर कर्मचारी ने विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष के मंत्री, मुख्यमंत्री तक गए लेकिन उनकी इसलिए नहीं सुनी गई क्योंकि इन लोगों ने देवेन्द्र वर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला था। और कम कहीं सुनवाई नहीं हुई तब न्याय मंदिर का दरवाजा खटखटाया गया जहां देर ही सहीं अंधेर नहीं है और कर्मचारियों के पक्ष पर फैसला आया।  अब देखना यह है कि इस फैसले पर देवेन्द्र वर्मा की क्या प्रतिक्रिया होती है। क्या अन्याय के खिलाफ लडऩे वालों को कूचलने का कोई और रास्ता अख्तियार किया जाता  है।
 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

...का दमन!


 क्या अब भी भाजपा हाईकमान को नहीं दिखता कि छत्तीसगढ़ भाजपा में सत्ता के अन्यायपूर्ण निर्णय से निष्ठावान भाजपाई सहमें हुए है। वे खुश नही हैं। अनुशासन के डंडे से आखिर  कब तक हकाला जायेगा और सत्ता के लिए संगठन को सबको लेकर चलना होगा।
कोयला कि कालिख के बीच दो दिन चली भाजपाई चिंतन के बाद यही निष्कर्ष निकलकर बाहर आया कि सत्ता की दमदारी और हाईकमान  के संरक्षण ने प्रदेश भाजपा की एकता को तार -तार कर दिया हैं। दो दिन की बैठक को लेकर किसी में उत्साह ही नही था और इस बार भी उसी की चली जिसकी वजह से पर्चा फेंके जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बैैठक को लेकर खुद स्वीकार किया कि बैठक में मौजुद 40 फीसदी लोग आपस में बाते कर रहे हैं। 30 फीसदी सो रहे हैं और 10-15 फीसदी को मतलब ही नही हैं यानी 10-15 फीसदी वे लोग हैं जो सरकार के मलाईदार पदों पर बैठे हैं या जिन्हें सत्ता से सुख की प्राप्ती हो रही हैं।
   मुख्यमंत्री डॉ. सिंह के इस कथनी के बाद तो प्रदेश भााजपा की स्थिति खुद ब खुद स्पष्ट हो गई हैं। कांगे्रस की बढ़ती सक्रियता और भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार की बेचैनी जैसे-तैसे इस संकट से निपटने की हैं। यही वजह है की  बैठक में उन लोगों को बोलने तक नहीं दिया गया जिनसे थोड़ा भी खतरा था। पार्टी मंच से बात रखने  की वकालत करने वालों ने भी रमेश बैस, करूणा शुक्ला ,दिलीप सिंह जुदेव से जहमत नही उठाई

 इस दो दिन की बैठक औचित्य क्या था यह जुदेव के इस बयान से पता चलता है कि वे सो रहे थे। सबकुछ अपनी मर्जी से चलानी हैं तो फिर यह नौटंकी किसके लिए? यह एक ऐसा सवाल है जो भाजपा में फिर से तूफान खड़ा कर सकता हैं।
   केवल कमल मुख्यमंत्री या कांग्रेसियों से दूरी बनाकर चलने की कहानी से अब कार्यकर्ता उत्साहित नही होने वाले हैं। क्योकि आम कार्यकर्ता  यह समझ चुका हैं पर्चे की एक-एक बात सच हैं और सत्ता में ईमानदारों की भागीदारी   इस कॉकस के रहते नही होने वाली हैं।
रमेश बैस की पट्टा वाली टिप्पणी और दिलीप सिंह के बैठक में सोने की गुंज के बाद भी हाईकमान को लगता है कि छत्तीसगढ़ में सरकार  ठीक ठाक चल रही है तो हमें कुछ नही कहना हैं।  
                             
 क्या अब भी भाजपा हाईकमान को नहीं दिखता कि छत्तीसगढ़ भाजपा में सत्ता के अन्यायपूर्ण निर्णय से निष्ठावान भाजपाई सहमें हुए है। वे खुश नही हैं। अनुशासन के डंडे से आखिर  कब तक हकाला जायेगा और सत्ता के लिए संगठन को सबको लेकर चलना होगा।
कोयला कि कालिख के बीच दो दिन चली भाजपाई चिंतन के बाद यही निष्कर्ष निकलकर बाहर आया कि सत्ता की दमदारी और हाईकमान  के संरक्षण ने प्रदेश भाजपा की एकता को तार -तार कर दिया हैं। दो दिन की बैठक को लेकर किसी में उत्साह ही नही था और इस बार भी उसी की चली जिसकी वजह से पर्चा फेंके जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बैैठक को लेकर खुद स्वीकार किया कि बैठक में मौजुद 40 फीसदी लोग आपस में बाते कर रहे हैं। 30 फीसदी सो रहे हैं और 10-15 फीसदी को मतलब ही नही हैं यानी 10-15 फीसदी वे लोग हैं जो सरकार के मलाईदार पदों पर बैठे हैं या जिन्हें सत्ता से सुख की प्राप्ती हो रही हैं।
   मुख्यमंत्री डॉ. सिंह के इस कथनी के बाद तो प्रदेश भााजपा की स्थिति खुद ब खुद स्पष्ट हो गई हैं। कांगे्रस की बढ़ती सक्रियता और भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार की बेचैनी जैसे-तैसे इस संकट से निपटने की हैं। यही वजह है की  बैठक में उन लोगों को बोलने तक नहीं दिया गया जिनसे थोड़ा भी खतरा था। पार्टी मंच से बात रखने  की वकालत करने वालों ने भी रमेश बैस, करूणा शुक्ला ,दिलीप सिंह जुदेव से जहमत नही उठाई
  ...का दमन!
 इस दो दिन की बैठक औचित्य क्या था यह जुदेव के इस बयान से पता चलता है कि वे सो रहे थे। सबकुछ अपनी मर्जी से चलानी हैं तो फिर यह नौटंकी किसके लिए? यह एक ऐसा सवाल है जो भाजपा में फिर से तूफान खड़ा कर सकता हैं।
   केवल कमल मुख्यमंत्री या कांग्रेसियों से दूरी बनाकर चलने की कहानी से अब कार्यकर्ता उत्साहित नही होने वाले हैं। क्योकि आम कार्यकर्ता  यह समझ चुका हैं पर्चे की एक-एक बात सच हैं और सत्ता में ईमानदारों की भागीदारी   इस कॉकस के रहते नही होने वाली हैं।
रमेश बैस की पट्टा वाली टिप्पणी और दिलीप सिंह के बैठक में सोने की गुंज के बाद भी हाईकमान को लगता है कि छत्तीसगढ़ में सरकार  ठीक ठाक चल रही है तो हमें कुछ नही कहना हैं।  
                             

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

दूसरों को गाली देने से खुद के पाप नहीं धूलतेइन दिनों पूरे देश में राजनीति के मायने बदल गए हैं। किसी फिल्म में कादर खान ने राजनीति ने मायने बताए थे कि रा से राक्षस की तरह जनता को निकलने वाला यह तिकड़मबाज डायलॉक वर्तमान राजनीति में कितना फिट बैठता है यह तो जनता तय करेंगी। लेनिक जिसकी राजनीति इन दिनों चल रही है। वह घोर निराशाजनक है। चोरी और सिना जोरी की पराकाष्ठा पार कर रही है और आम आदमी इस स्थिति से हैरान है। छत्तीसगढ़ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के करीब राज्यसभा सदस्य अजय संचेती की कंपनी को कोल ब्लाक आबंटित करने के मामले में कुछ इसी तरह की राजनीति चल रही है।  कल तक सीएजी की रिपोर्ट को मुख्य हथियार बना कर केंद्र में कांग्रेस को घेरने वाली भारतीय जनता पार्टी आज छत्तीसगढ़ में सीएजी की रिपोर्ट को बेशर्मी पूर्वक नाकार रही है। सिर्फ नाकारा ही नहीं जा रहा है बल्कि कांग्रेस के करतूतो पर प्रहार कर अपनी करतूतों को छोटा बनाने का खेल खेला जा रहा है।
हम यह कतिये नहीं कह रहे है कि कांग्रेस के करतूतों पर पर्दा डाला जाए हमे तो सिर्फ यह कहना है कि दूसरे के पाप गिनाने से स्वयं के पाप न कम होते है और न ही धूल जाते है। कांग्रेस की करनी की वजह से ही छत्तीसगढ़ की जनता ने भाजपा को जिताया है। यह बात भाजपा को नहीं भूलनी चाहिए कि जनता सब देख रही है। कि किस तरह से छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार बढ़ा है। सरकार के अमूमन हर विभाग में अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार के किस्से रोज सुनाई पड़ रहे है आज जरूरत है इस स्थिति में सुुधार करने की लेकिन  उल्टा कांग्रेस को गरियाया जा रहा है। कांग्रेस की खामियां गिना कर सत्ता में आने के लिए भाजपा को चाल चेहरा और चरित्र को सुधारना होगा। सत्ता में आने से पहले दिये गये इस नारे का छत्तीसगढ़ में क्या हुआ है। किसी से छिपा नहीं है। चाल तो बिकाड़ा ही अब चेहरों पर भी कालिख पूतने लगी है जब चाल और चेहरे ठीक  न हो तो चरित्र पर उंगली उठाना स्वाभाविक है। भाजपा को समझना होगा कि राजनीति में सुचिता सिर्फ बोलने से नहीं होती है। जिसके लिए त्याग भी करने होते है और एक बार फिर एक बार यह बात दोहरा दूं कि दूसरे के पाप गिनाने से खुद के पाप कम नहीं होते।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

सरकार की शिकायत


पता नहीं छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? सब कुछ उल्टा-पुल्टा चल रहा हैं। कोयले की कालिख ने सरकार का हुलिया ही बिगाड़ दिया है। जिन   नौकरशाहों से काम लेने यहां की जनता ने जिस सरकार को चुना है उन्हें ही नौकरशाहों की शिकायत करनी पड़ रही है। नौकरशाह इस कदर हावी है कि सरकार के मुखिया तमाशाबीन बने हुए है। गृहमंत्री को वैसे तो मुख्यमंत्री के बाद सबसे ताकतवर माना जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ में उनकी स्थिति इतनी कमजोर है कि उन्हें अपने ही जिले के कलेक्टर की मुख्य सचिव से शिकायत करनी पड़ रही है। ये वहीं गृहमंत्री है जो कभी तख्ता पलटने का दंभ भरते थे। लेकिन अब लाचार है। मुख्यमंत्री के जिले में जाकर कलेक्टर को दलाल और एसपी को निकम्मा कहते हैं तो कभी डीजीपी पर क्रोध करते हैं। विधानसभा में थानों के शराब ठेकेदारों के हाथों बिकने की बात करते हैं। तब आम लोगों का यह सोचना लाजिमी है कि आखिर छत्तीसगढ़ में हो क्या रहा है।
गृहमंत्री के बयानों के बाद एक बात तो तय है कि यहां सरकार नौकरशाह चला रहे हैं? जिनके आगे किसी की नहीं चलती। यह जांच का विषय हो सकता है कि गृहमंत्री व अन्य मंत्रियों की लगातार शिकायतों के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खामोश क्यों हैं। नौकरशाहों को टाईट क्यों नहीं करते लेकिन इसके पीछे ही जनचर्चा सरकार व भाजपा दोनों के लिए खतरनाक है। जनचर्चा के मुताबिक गले तक भ्रष्टाचार और एक-दूसरे की पोल पट्टी जानने की वजह से यहां नौकरशाह हावी है?
इस जनचर्चा को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने मंत्रियों पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए। ये ठीक है कि नौकरशाह के भरोसे के बगैर सुचारू ढंग से काम नहीं हो सकता लेकिन भरोसे का मतलब स्वेच्छा चरिता की छूट नहीं होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री को भी नौकरशाहों की तरह अपने मंत्रियों पर भी भरोसा करना चाहिए क्योंकि मंत्रियों की छवि से ही सरकार की छवि बनती है और यदि अधिकारी मंत्रियों की नहीं सुनेंगे तो यह अच्छा संदेश नहीं होगा। गृहमंत्री के बयान के पीछे तो वजह को मुख्यमंत्री को भी समझना होगा।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

काट डालेंगे जुबां अब चुप भी रहो...


छत्तीसगढ़ में इन दिनों राजनैतिक गरमी उफान पर है। सीएजी की रिपोर्ट ने तो आग में घी का काम कर दिया है, सरकार अपनी मनमानी पर उतर आई है और भाजपा के नेताओं को गलत का विरोध करने से रोका जा रहा है। सरकार की वजह से पार्टी की छवि खराब हो रही है लेकिन अनुशासन के डंडे ने जुबान पर ताला जड़ दिया है। भाजपा के निष्ठावान नेताओं की बेचैनी देखते ही बन रही है और जिन्होंने बेशर्मी ओड़ रखी है उनसे कोई जब इस पर चर्चा करना चाहे तो वे यह कहकर अपनी बात रखते हैं कि आजकल तो सभी चोर हैं। या कांग्रेस ने कम लूटा है। या विरोधी कौन सा दूध का धूला है।
छत्तीसगढ़ में चल रहे इस राजनैतिक गरमी को लेकर एक वर्ग चिंतित है कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। कल तक सरकार के जिस मुखिया की छवि को लेकर दुनिया भर के दावे किये जाते थे अचानक वह इतना बदरंग कैसे हो गया। विरोधी तो हमेशा ही बोलते रहते है फिर ननकी राम कंवर, दिलीप सिंह जूदेव रमेश बैस से लेकर करुणा शुक्ला भी क्यों बोलने लगे हैं और जब ये बोल चुके तब इनका मुंह क्यों बंद कराया गया। शब्द जब मुंह से बाहर आ जाते हैं तब उसे लौटाया नहीं जा सकता लेकिन भारतीय राजनीति में बेशर्मी इस हद तक बढ़ गई है कि अपने कहे पर लीपापोती करने मीडिया पर दोष मढ़ दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी वर्तमान में जिस दौर से गुजर रही है वैसा  कभी नहीं हुआ। सत्ता के आगे संगठन नतमस्तक है और कुर्सी बचाने हाईकमान के नाजायज मांगे भी पूरी की जा रही है। आम कार्यकर्ता हताश होते जा रहे हैं और एक खास गुट को ही लाल बत्ती से लेकर दूसरे काम दिये जा रहे हैं। असंतोष हावी है लेकिन अनुशासन का डंडा इतना मजबूत कर दिया गया है कि आम कार्यकर्ता भी गलत को गलत नहीं कह पा रहा है। सरकार की मनमानी की वजह से शर्मिन्दगी भी तो कार्यकर्ताओं को ही उठानी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ भाजपा में भीतर ही भीतर सुलग रहे इस आग को बुझाने सब बड़ी सर्जरी की जरूरत आ पड़ी है। इसे पार्टी नेतृत्व को गंभीरता से सोचना होगा कि आखिर बेलगाम नौकर शाह भ्रष्ट सरकार और हताश कार्यकर्ता के सहारे चुनाव जीतना तो दूर जमानत बचा पाना मुश्किल होता है।

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

फिर निलंबन क्यों किया...


छत्तीसगढ़ सरकार ने राजस्व मंगल में हुए घपलेबाजी के लिए दोषी मानते हुए आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित किया था ओर पांच महीने बाद ही इस अधिकारी का निलंबन समाप्त कर दिया। इस आईएएस अधिकारी को सरकार ने जिस वजह से निलंबित कर रखा था वह स्थिति अभी भी वैसे की वैसी है। घपलेबाजी में सिर से पांव तक डूबी सरकार के पास किसी भी बात का जवाब नहीं है। बगैर कार्रवाई के अधिकारी मजे से काम कर रहे हैं।
दरअसल सरकार ने अपनी यह नीति बना रखी है कि घपलेबाजी में नाम कमाओं महत्वपूर्ण पद पाओं। राजस्व मंडल के जिस घोटाले के लिए आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित किया गया था वह  मामला बेहद गंभीर है। आदिवासियों की जमीन को बेचे जाने के इस मामले पर जब हल्ला हुआ तो आईएएस राधाकृष्णन् को निलंबित कर दिया गया और जब माहौल शांत हो गया तो निलंबन वापस।
सरकार का यह खेल आश्चर्यजनक ही नहीं दुर्भाग्यजनक है। जांच के नाम  पर कभी वह अधिकारियों को बचा ले जाता है तो कभी ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है। विवादास्पद अधिकारियों की फेहरिश्त लंबी होते जा रही है और सरकार कार्रवाई की बजाय लीपापोती में मशगुल है। रोगदा बांध के आरोपी जाय आम्मेन का मामला हो या मनोज डे से लेकर बाबूलाल अग्रवाल का मामला हो। बगैर जांच रिपोर्ट के महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से नवाजा जाना कितना उचित है और इसका क्या अर्थ लगाया जायेगा इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है।
छत्तीसगढ़ में जमीनों के घोटाले की स्थिति गंभीर है। उद्योगों से लेकर बिल्डर जमीन हडऩे में लगे हैं ऐसे में सरकार को इस पर गंभीरता से कार्रवाई करनी चाहिए। अदिवासियों की जमीन हस्तांतरण का मामला तो और भी गंभीर है। भोले-भाले आदिवासियों से कौडिय़ों के मोल जमीन खरीदकर लूटने का सिलसिला थम नहीं रहा है और उपर से सरकार कार्रवाई की बजाय आरोपियों को संरक्षण देने में लगी है।
आईएएस अधिकारी के निलंबन समाप्ति से कई सवाल खड़े हो गये हैं। कि आखिर सरकार को निलंबन समाप्त करने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? जबकि अभी तक इस मामले में पूरी तरह से न जांच हुई न कार्रवाई। बाबूलाल अग्रवाल का निलंबन भी ऐसे ही हड़बड़ी में किया गया था।

रविवार, 8 अप्रैल 2012

शुभ संकेत नहीं..


प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इन दिनों संकट में हैं। कांग्रेस ने यहां कोयले की कालिख पर मोर्चा खोल दिया है वहीं भाजपा में भी बगावत की चिंगारी फूटने लगी है। यह भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। पिछले 7-8 सालों से अपनी एकतरफा चला रहे डॉ. रमन सिंह के लिए यह चुनौती आसान नहीं है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा का जनाधार अब यदि कमजोर पड़ता जा रहा है तो इसकी वजह डॉ. रमन सिंह और उसकी पूरी टीम है। सत्ता में बैठे लोगों की लूट-खसोट की चर्चा चौक-चौराहों पर होने लगी है और जिन पर नकेल कसने की जिम्मेदारी है वे भी अपने करीबियों के माध्यम से ठेकेदारी में मशगूल हो तो फिर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं का गुस्सा स्वाभाविक है।
भाजपा में असंतोष तो तभी से दिखाई देने लगा था जब पहला गुमनाम पर्चा जारी हुआ लेकिन तब इसे यह कह कर हल्के में लिया गया कि यह रमन विरोधियों की चालबाजी है लेकिन एक के बाद एक पर्चे आते गये और एक के बाद एक घोटाले की कहानी भी आनी शुरू हो गई। असंतोष तब बढ़ गया जब सादगी के साथ जनसेवा का नारा अभिषेक के विवाह समारोह के रूप में बाहर आया। कार्यकर्ता दबी जुबान कहने लगे ऐसी शादी की क्या जरूरत थी। आखिर जनता में इसका क्या संदेश जायेगा। मुख्यमंत्री बनते ही डॉक्टर साहब के पास पैसा कहां से आ गया और कब तक चापूलसों को ही लालबत्ती दी जायेगी।
इस चर्चा को भी अनुशासन के डंडे ने बाहर आने से रोक दिया। मंत्रियों के खर्चे और अधिकारियों की मनमानी के किस्से आम लोगों तक पहुंचने लगे और जब सीएजी की रिपोर्ट ने सरकार की करतूत पर से परदा उठाया तो पार्टी कार्यकर्ताओं में बगावत की चिंगारी फूटने लगी। कांग्रेस के तेवर से भाजपा के हितचिंतकों में सरकार के प्रति गुस्सा दिखने लगा है। श्रीमती करुणा शुक्ला और रमेश बैस ने अपनी सरकार के बारे में इतना कहा कि विपक्ष के लिए भी नहीं किया जाता। कांग्रेस से तो भाजपा निपट लेने की तैयारी की कर सकती है लेकिन जब वे स्वयं सरकार के करतूतों से खुश नहीं है तब आधे अधूरे मन से कैसे मुकाबला होगा। सौदान सिंह से लेकर रामप्रताप और जयप्रकाश नड्डा से लेकर गडकरी पर जिस तरह से सरकार के सदुपयोग-दुरूपयोग की चर्चा छिड़ी है यह भाजपा के लिए शुभ संकेत कतई नहीं है।