शुक्रवार, 11 मई 2012

टोल प्लाजा की जिद...


टोल प्लाजा के निर्माण को लेकर सरकार के बेवजह जिद से महौल खराब होने लगा है। यह सच है कि टोल प्लाजा निगम सीमा के बाहर होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का भी इस बारे में गाईड लाईन स्पष्ट है इसके बाद भी सरकार टोल प्लाजा  को निगम सीमा में क्यों स्थापित करने में अड़ी हुर्ई है यह समझ से परे है।
टोल प्लाजा का निगम सीमा में निर्माण का न केवल वहां के लोग बल्कि आम जनता भी विरोध कर रही है। पिछले 6 माह से इसका विरोध चल रहा है लेकिन सरकार के जिद के चलते यह आन्दोलन का रुप लेने लगा है। कल सुंदर नगर के पास निर्माणाधीन स्थल पर जो हुआ उसके बाद तो तय है कि यहां टोल प्लाजा को लेकर लोग नाराज है और सरकार का इसी तरह का अडिय़ल रुप रहा तो बेवजह आन्दोलन होगा और आम आदमी को परेशानी होगी।
यह सर्वविदित है कि जिस जगह सुंदरनगर और चंगोराभाठा के बीच टोल प्लाजा का निर्माण करने की स्वीकृति दी गई है वह न केवल नियमों के विपरित है बल्कि इससे इस राह से गुजरने वालों को परेशानी होगी। सच यह भी है कि टोल प्लाजा की वजह से वातावरण भी खराब होगा जो ठीक नहीं है।
जिस जगह कर टोल प्लाजा बनाने की अनुमति दी जा रही है वह 6 वार्डो के  लाख भर लोगों के लिए मुसिबत का सबब होगा और इसके चलते आय दिन झगड़ा-झंझट से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में सरकार की जिद आश्चर्यजनक है।
हम यहां इस पर चर्चा करना नहीं चाहते कि टोल प्लाजा के निर्माण का यह निर्णय ठेकेदार को फायदा  पहुंचाने के लिए किया गया है या ठेकेदार के पैसों की वजह से यह निर्णय आया है। हम यहां केवल नियमों की बात कर रहे है और यहां टोल प्लाजा के निर्माण से होने वाली परेशानियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे है।
कुम्हारी के पहले स्थित टोल प्लाजा को लेकर क्या कुछ नहीं हुआ है। कलेक्टर को अपमानित किया गया तो सांसद सरोज पाण्डे के लोगों को तोडफ़ोड़ का सहारा लेना पड़ा ऐसे में निगम सीमा के अंदर जब टोल प्लाजा होगा तो इस तरह की घटनाओं को रोक पाना मुश्किल होगा जो आय दिन पुलिस के लिए सिरदर्द साबित होगा और कानून व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
इतना ही नहीं इसके विरोध मेें जब आन्दोलन होंगे तो यह बेवजह परेशानी वाला होगा। सिर्फ एक जिद वह भी नियमों के विपरित को लेकर प्रभावित वार्डों के लाख भर लोगों को आन्दोलन के लिए उकसाना ठीक नहीं है। वैसे भी सरकार का काम आम लोगों के हितों को देखना है और जब आम लोग ही इसके खिलाफ हो तब भला नियमो से परे जाकर टोल प्लाजा का निर्माण गलत है।
                

गुरुवार, 10 मई 2012

स्लाटर हाउस बनते अस्पताल...


राजधानी के एस्कार्ट हार्र्ट सेंटर में एक बार फिर पैसों के लिए शव को बंधक बनाया गया। यह खबर जितना विचलित करने वाला है उतना ही शर्मनाक भी है। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते अस्पतालों में ही नहीं डाक्टरों की सोच मे भी तब्दिली आई है और कर्ज लेकर अस्पताल में सुविधाओं का विस्तार ने संवेेदनाओं को किनारे कर दिया।
कहने को तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक से एक बड़े अस्पताल है लेकिन इनमें सरकार का कहीं नियत्रंण नहीं होने की वजह से यह स्लाटर हाउस में तब्दिल होने लगा है। डाक्टरों को सिर्फ पैसा दिखाई दे रहा है और सेवा के इस पेशे ने पूरी तरह व्यवसायिक रुप ले लिया है।
हालत यह हैै कि अपनी कमाई के चक्कर में सरकारी अस्पताल के डाक्टर भी मरीजों को स्लाटर हाउस में भेज रहे है और इस सब खेल को जानते हुए भी प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग खामोश है।
हम यहां पहले ही कह चुके है कि निजी अस्पतालों को लेकर कड़े कानून बनाने की जरूरत है यह सच हैै कि सभी डाक्टर संवेदनहीन नहीं होते और न ही कोई मरीजों को जानबुझकर मारता है लेकिन यहां सवाल मरीजों को बचाने तक सीमित नहीं है इनकी वजह से मरीज के परिजनों का जीते जी मर जाने का है।
ईलाज के नाम पर लूट-खसोट की जो परम्परा राजधानी व छत्तीसगढ़ में चल रही वह ठीक नहीं है मरीज के अस्पताल पहुंचते ही लूट-खसोट की जो रणनीति बनाई गई है उस पर सरकारी नियत्रंण की जरूरत है। जांच के नाम से लूट की शुरुआत एडमिट करने के बाद और उपचार के  बाद भी जारी रहता है। कमीशनखोरी इस तरह हावी है कि वेश्याओं के दलाल भी शरमा जाए। लेबोरेटरी में कमीशन, खुन में कमीशन ,दवाईयों में कमीशन की वजह से ईलाज का 75 फीसदी खर्च तो कमीशन खोरी में ही चला जाता है ऐसे में एक आम आदमी के लिए यह स्लाटर हाउस से कम कैसे हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि राजधानी के सभी डाक्टर या पैथालॉजी लैब वाले लूट-खसोट में लगे है यहां वन्दना ग्रुप के गंगा डायग्नोस्टिक सेंटर जैसी संस्थाएं  भी है जो 75 फीसदी छूट के साथ जांच रिपोर्ट दे रहे है वह भी उच्च स्तरीय मशीन के साथ काम कर रहे है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कमीशनखोरी में लगे डाक्टरों को तो अपने बताये लैब की रिपोर्ट ही चाहिए। दवाईया भी खुद का मेडिकल स्टोर्स से ही होना चाहिए।
कमाई के फेर में मरीज के परिजनों की जान लेने पर आमदा इन नर्सिंग होम या बड़े अस्पतालों के खिलाफ सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी ही चाहिए ताकि सेवा के इस क्षेत्र की पवित्रता बनी रहे।
                                                

बुधवार, 9 मई 2012

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे...


यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अपने करतूत पर परदा डालने की कोशिश में लगे पीएससी यानि लोक सेवा आयोग के पदाधिकारी मीडिया पर दोषारोपण नहीं करते। संघ से सूची जारी करने का प्रयास ये कर रहे है, मुरली मनोहर जोशी से रिश्तेदारी ये निभा रहे है, उत्तरप्रदेश के सवाल ये कर रहे है गलत मॉडल उत्तर ये जारी कर रहे है और मीडिया पर आरोप लगा रहे है कि ये लोग नकारात्मक खबर छाप रहे है जिससे पीएससी की छवि धूमिल हो रही है।
पीएससी अपने किये पर परदा डालने जिस तरह से मीडिया पर दोषारोपण कर रही है वह कहीं उचित नहीं है।
छत्तीसगढ़ में आयोजित पीएससी की परीक्षा एक बार फिर विवाद में है। विवाद की वजह यहां बैठे लोग है जो शायद कसम खा चुके है कि वे अपनी मनमानी करेंगे? पीएससी के अध्यक्ष डॉ. जोशी  तो पहले से ही विवाद में है और मामला यहां तक जा पहुंचा है कि पीएससी की सूची इस बार संघ तय करेगी। कल के प्रश्नपत्र के  बाद तो यह तय ही हो चुका है कि छत्तीसगढ़ की लोगों की उपेक्षा राज बनने के बाद भी जारी है। शासन-प्रशासन में बैठे लोग नहीं चाहते है कि यहां के युवाओं को नौकरी मिले और यहां के युवाओं की षडयंत्रपूर्वक उपेक्षा की जा रही है।
हमें ये नहीं लगता कि इन गलतियों को सुधारा जाना चाहिए जिस तरह की गलतियां हुई है इसके बाद तो परीक्षा रद्द कर दोषियों कर कड़़ी करवाई की जरूरत है।
इस सरकार में तो अधिकारियों की करतूत किसी से भी छिपा नहीं है । चोरी और सीना जोरी के तर्ज पर आंख दिखाने से कभी गुरेज नहीं किया।  ऐसे कई मामले है जब भ्रष्टाचार के आरोपियों को सरकार ने संरक्षण देकर अपनी गोद में बिठाया है।
पीएससी के मामले में हमारा मानना है कि छत्तीसगढ़ के युवाओं के साथ जिस तरह से षडयंत्र हुआ है इसकी न केवल उच्चस्तरीय जांच की जरूरत है बल्कि जिम्मेदारी तय कर कड़ी सजा देने की भी जरूरत है। आखिर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही प्रदेश में साजिशपूर्वक नकारा गया तो वे कहां जायेंगे।
राज हमारा, फिर नौकरी दूसरों के लिए तय हो यह उचित नहीं है। हमने कल इसी जगह पर साफ कहा था कि छत्तीसगढ़ के युवाओं के उपेक्षा ऐसे ही होती रही तो राज-ठाकरे जैसे लोगों को सर उठाने का मौका मिलेगा जो सरकार के     लिए भी ठीक नहीं है। इसलिए अब भी समय है सरकार को पूरी परीक्षा रद्द कर नये सिरे से परीक्षा आयोजित करवाना चाहिए ।
                             

मंगलवार, 8 मई 2012

फिर रद्द क्यों नहीं...


अब तो यह तय हो चुका है कि पीएससी की परीक्षा में छत्तीसगढिय़ों को किनारे करने की साजिश हुई है और इस खेल में सत्ता में बैठे धुरंधरो से लेकर संघ के लोग भी शामिल है। ऐसी परीक्षाएं रद्द हो जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में सालों बाद हुए पीएससी की परीक्षा को लेकर रोज नये खुलासे हो रहे है और सरकार में बैठे लोग केवल तमाशा देख रहे है यह डॉ. रमन सिंह का कौन सा सुराज है,किस तरह की राजनीति है या किस तरह से सत्ता का संचालन है यह तो वही जाने लेकिन यह स्थिति ठीक नहीं है। और इस मामले में तत्काल निर्णय लिए जाने की जरुरत है।
हम पहले ही यहां लिख चुके है कि छत्तीसगढ़  राज की मांग का आधार सिर्फ भौगोलिक बंटवारा या राज्य का विकास ही नहीं था। छत्तीसगढिय़ों की घोर उपेक्षा के चलते राज की मांग उठी थी। बिजली हमारी लेकिन कटौति का सामना हमें करना पड़ता था। नौकरी में शेष मध्यप्रेदश को प्राथमिकता दी जाती थी और आम छत्तीसगढिय़ों के उपेक्षा के कारण ही राज की मांग हुई। लेकन राज बनने के बाद भी यहां बैठी सरकार छत्तीसगढिय़ों की उपेक्षा करते रही तो इसे कब तक बर्दास्त किया जा सकता है।
हम फिर कह रहे हैं कि हम राज ठाकरे जैसे आंदोलनों के समर्थक नहीं है और न ही हिंसा में ही हमारा विश्वास है इसलिए हम चाहते है कि चुनी हुई सरकारे इस बात का ध्यान रखे की उनसे ऐसी कोई गलती न हो जिससे राज ठाकरे के समर्थन करने वालों को मौका मिले।
यह ठीक है कि भारतीय जनता पार्टी को लोगों ने सत्ता में बिठाया है और उन्हें अपने हिसाब से सरकार चलाने का अधिकार भी है लेकिन इस अधिकार का गलत इस्तेमाल कर इस शंात प्रदेश में आग लगाने का काम न करे। लगातार उपेक्षा से इस तरह से लोगों को सर उठाने का मौका मिलेगा जो छत्तीसगढ़ के लिए ठीक नहीं है। सरकार को तो उसी दिन पीएससी अध्यक्ष से सवाल जवाब करना था जब वे संघ के दफ्तर में पहुंच गए थे लेकिन विधानसभा में यह कहकर पल्ले झाड़ लिया गया कि कोई कहीं भी आ जा सकता है और लोगों की दुविधा बनी रही। इस तरह के जवाब के कारण ही उन लोगों का साहस बढ़ा, और आज स्थिति सबके सामने है कि किस तरह के अपने खास लोगों को परीक्षा में पास कराने के लिए एक प्रदेश विशेष के ऐसे सवाल पुछे गये जिनका वहीं के लोगों का वास्ता है।
कोयले की कालिख में पूति सरकार एलेक्स मेनन को लेकर अभी कटघरे में है ऐसे में पीएससी परीक्षा को लेकर उठे विवाद का शीघ्र निपटारा नहीं हुआ तो स्थिति बिगड़ सकती है।
               

सोमवार, 7 मई 2012

क्या इसलिए राज बना...


छत्तीसगढ़ राज्य की मांग की मूल वजह ही यहां के लोगों की उपेक्षा रही है लेकिन लगता है कि सरकार ने यह तय कर रखा है कि वह यहां के लोगों की उपेक्षा करेगी। शिक्षाकर्मियों की भर्ती से लेकर अब पीएससी परीक्षा से यह तय हो गया है कि छत्तीसगढ़ राज तो बन गया है लेकिन यहां के लोगों की उपेक्षा जारी है।
वैसे तो पीएससी की परीक्षा तब विवाद में आ गई थी जब इसके अध्यक्ष डॉ. जोशी ने संघ कार्यालय में दस्तक दी थी तब यह कहा जाने लगा था कि इस बार पीएससी में उत्तीर्ण की सुची संघ कार्यालय से होगी और प्रश्नपत्र में जिस तरह के उत्तरप्रदेश के सवाल शामिल हुए है उसके बाद तो यह तय हो चुका है कि छत्तीसगढ़ की उपेक्षा जारी है।
सिर्फ नौकरी ही नहीं और भी उदाहरण है जहां छत्तीसगढिय़ों के साथ अन्यायपूर्ण निर्णय लिये जा रहे हैं। उद्योगों के नाम पर किसानों की जमीने छीनी जा रही है। सलवा जुडूम के नाम पर आदिवासियों के गांव उजाड़े गये। और राजनीति से लेकर प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी चुन-चुन कर छत्तीसगढिय़ों को किनारे किया गया।
सरकार बनाने किये गये वादे आज तक पूरे नहीं हुए और सिंचाई,बिजली,पानी ,स्वास्थ्य सुविधाओं को जानबुुझकर रोका गया। नौकरी में तो जिस तरह से उपेक्षा हुई है वह अंयंत्र कही देखने को नहीं मिलेगा।
मुख्यमंत्री निवास को लेकर मंत्रालय  तक छत्तीसगढिय़ों की घोर उपेक्षा के चलते आम छत्तीसगढि़य़ा ठगा महसूस कर रहा है। अपने ही राज में दोयम दर्जे की स्थिति बन गई है ।
हमने इसी जगह पर पहले भी कहा था कि सरकार में बैठे लोगों का यह षडयंत्र चल रहा तो आने वाले दिनों में यह शांत प्रदेश अपनी पहचान खो देगा। विकास के नाम पर लुट-खसोट अब बर्दास्त से बाहर होने लगी है। कानून सिर्फ गरीबों के लिए रह गया है। आम छत्तीसगढिय़ा दो जून के रोटी जद्दोजहद में लगा है ऐसे में सरकार यह जान ले कि यह स्थिति ठीक नहीं है। और इसका आने वाले दिनों में गंभीर दुष्परिणाम भुगतना पड़ सकता है।
इन सब बातों से हमारे कतई मतलब नहीं है कि दूसरे प्रदेश के लोगों को यहां काम करने का अधिकार नहीं है और न ही हम बालठाकरे या राजठाकरे जैसे स्थिति से इत्तफाक रखते हैं। हम सिर्फ यह चाहते है कि सरकार की प्राथमिकता यहां के लोगों के लिए होनी चाहिए ताकि विघन संतोषियों को सर उठाने का मौका न मिले।
                

रविवार, 6 मई 2012

फांसी पर चढ़ा दो...


अन्ना हजारे ने कह दिया कि यदि अभिषेक सिंघवी सीडी कांड में दोषी पाये जाते है तो उन्हें फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। रामदेव बाबा के सांसदों को जाहिल कहने के बाद अन्ना हजारे के इस बयान से पता नहीं कितने लोग सहमत होंगे लेकिन लोकतंत्र में ऐसी भाषाओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अन्ना का यह बयान सिर्फ अपनी वाहवाही के लिए है तो हमें कुछ नहीं कहना है लेकिन एक गांधीवादी के रुप में अपने छवि बनाने वाले अन्ना की इस सोच को हम आतंकवाद या कट्टर वाद या तालिबान की तरह मानते है जिन्हें अपने दुश्मनों को मारने में कोई संकोच नहीं होता।
कट्टर वाद ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है और यह तानाशाही है। इस तरह की सोच से समाज और देश को नुकसान होगा। यह सही है कि अन्ना की जनलोकपाल बिल को लेकर कांग्रेस का प्रबल विरोध है और इसकी वजह से अन्ना हजारे नाराज भी है लेकिन नाराजगी को फांसी के हद तक ले जाना किसी भी हाल में सही नहीं हैै।
अन्ना हजारे ये भूल रहे हैं कि उनकी छवि ईमानदार, गांधीवादी छवि है जहां हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। और अन्ना के  जनलोकपाल बिल का सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भाजपा सहित तमाम पार्टीयां भी विरोध कर रही है ऐसे में मनु सिंघवी को फांसी पर लटका देने की सार्वजनिक बयानबाजी से कांग्रेस विरोधी जरुर खुश हो सकते है लेकिन इस तरह की भाषा का लोकतंत्र मे कहीं स्थान नहीं है। आज जब पूरी दुनिया फांसी चढ़ाये जाने को लेकर खिलाफत में लगी है और इस तरह की सजा पर बंदिश की मांग उठ रही है तब अन्ना हजारे की सोच कितना सही है इस पर  बहस तक नहीं होना चाहिए। यह सच है कि भ्रष्टाचार की वजह से आज एक बड़ा वर्ग अपने मूल अधिकार से वंचित हुआ है। अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ी है और मंहगाई से जीना आम आदमी का मुहाल हो गया है,बावजूद फांसी पर लटकाने की बात बेहद ही गैर जिम्मेदाराना है।
हमने पहले ही कहा है कि गाली देने या सड़क पर चिल्लाने से भीड़ जुट जाती है लेकिन यह भीड़ केवल तमाशाबीन होती है। बड़े लोगों के लिए यह चेतावनी है कि वे  अपनी भाषा को संयमित रखे, क्योंकि उनके बहुत से लोग प्रशंसक होते है यदि उनके प्रशंसक भी  उन्हीं के भाषा को बोलते हुए एक कदम आगे बढ़कर काम करे तो फिर कानून व्यवस्था की स्थिति क्या होगी? इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर अन्ना-बाबा कौन सा देश का हित का काम करना चाहते है और जो लोग इसकी पीठ पर सवार होकर राजनैतिक रोटी सेेंक रहे है वे भूल रहे है कि इससे उनका भी नुकसान हो सकता है।
                                  

शनिवार, 5 मई 2012

बदलती सोच...


एक समय था जब मोहल्ले में किसी की अर्थी उठती थी तो उस मोहल्ले के विवाह समारोह में भी इसका असर होता था। लेकिन अब समय बदल गया है तभी तो कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई पर आतिशबाजी हुई और मिठाईयां बांटी गई। लेकिन उन शहीद हुए दो गार्डों की याद किसी ने नहीं की जिनकी तेरहवीं भी पूरी नहीं हो पाई थी।
 मरने वाले तो मर गये उनके लिए अपनी खुशियां क्यों छोड़े की तर्ज पर जिस तरह से खुशियां मनाई गई वह कितना उचित है यह विवाद का विषय है। लेकिन भारतीय परंपरा की दुहाई देने वाले भी जब इस तरह की खुशियां में शामिल हो जाये तब यह मान लेना चाहिए कि यहां अब भी बड़े छोटे का भेद कायम है? कलेक्टर बड़े लोग होते है,वे जिले के राजा होते है और सिपाही, उनकी क्या हैसियत होती है? उनके लिए कोई अपना आंसु बहाकर अपना समय क्यों खराब करे। जो जिन्दा है उन्हीं से तो काम पड़ता है। खुशियां मनाने वालों को इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी सुहाग उजड़ गई और किसने अपना बेटा खो दिया।
मुझे राजकपुर की श्री 420 फिल्म का वह सीन आज भी याद है। जब बम्बई पहुंचने पर राजकपुर केले के छिलके पर पैर आ जाने पर गिर जाता है तब एक डायलॉग सामने आता है यह बाम्बे है यहां गिरने वालों को कोई उठाता नहीं है लोग हंसते है।
एलेक्स पाल मेनन की रिहाई निश्चित रुप से सुकून देने वाली खबर है लेकिन उनका क्या जिन्हें नक्सलियों ने मार डाला। एलेक्स पाल एक अच्छे कलेक्टर होंगे लेकिन क्या बाकि कलेक्टर बेकार है। क्या बाकी कलेक्टरों को गरीबों से कोई मतलब नहीं है या क्या आईएएस व आईपीएस केवल अमीरों के हितों के लिए काम करते है फिर यह अलग से तमगा क्यों?  क्या आईएएस-आईपीएस की नियुक्ति सरकार के जनकल्याणकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनानो नहीं होती फिर एलेक्स इनसे अलग कैसे हो गये। समय ने देखा है कि कैसे गरीबों का मसीहा बनकर इसी प्रदेश में कितने आईएएस-आईपीएस ने करोड़ो रुपये कमायें है। और यह भी देखा है कि हम लोगों ने अपने पाप धोने अस्पताल से लेकर दूसरे धर्मार्थ कामों मे अपना योगदान दिया है। इसमें उन लोगों की गलती मै नहीं देखता जिन्होंंने कलेक्टर की रिहाई पर आतिशबाजी की। दरअसल अब दुनिया बदल रही हैै। रिश्ते टूट रहे है। तत्कालिन लाभ प्राथमिकता हो चुकी है तब उन शहीद हुए दो गार्डों की तेरहवी से ज्यादा कलेक्टटर की रिहाई मायने रखती है।