मंगलवार, 15 मई 2012

राजधानी है भाई...


अब जाकर सही मायने में अपना रायपुर राजधानी बना है वरना रायपुर को जानता कौन है। नक्सली आतंक की घटना बस्तर में होता थी और लोग बेवजह रायपुर का नाम लेते है। नेशनल वालों को मालूम नहीं है कि रायपुर से बस्तर इतनी दूर है और वहां चल रहे नक्सली मार-काट का यहां कोई लेना देना नहीं है लेकिन वे तो पेले पड़े है।
रायपुर अब जाकर राजधानी का शक्ल अख्तियार कर रहा है। अब दूसरी राजधानी के तरह यहां भी गोलियां चलने लगी है। बलात्कार,लूट,डकैती,चोरी बढ़ गई है और अब हमे भी नेशनल खबर में आने से कोई नहीं रोक सकता।
नेशनल खबर में रायपुर को लाने के लिए राजधानी वासियों को सरकार और पुुलिस विभाग को धन्यवाद करना चाहिए लेकिन लोग बेवकूफ है बेवजह सरकार को कोस रहे है। कानून व्यवस्था को बदतर कहना सरकार को गाली देना है जबकि इसमें पुलिस का क्या दोष है। उनका सारा वक्त तो नेताओं और अधिकारियों की खुशामद में गुजर जाता है इस सबके बीच समय बचा तो यातायात सुधारने में लग जाता है। यातायात सुधारे जयेंगे तो वसूली भी जरूरी है आखिर सरकार इतनी तनख्वाह नहीं देती कि घर-परिवार चलाया जा सके।
आजकल बेवजह कोसने का चलन बढ़ गया है। हर आदमी अपना फ्रस्टेशन सरकार पर निकालता है और पुलिस तो मानों गाली खाने के लिए ही बना है। अपना फ्रस्टेशन निकालने में लोग भूल जाते है कि पुलिस के पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि नक्सलियों की हथियार तस्करी की खबर उसे लग जाये। और फिर भंडाफोड़ तो पुलिस ने ही किया चाहे वो हैदराबाद के ही क्यों न हो। लेकिन लोग यहां भी मीन मेख निकालने में लगे रहते है।
राजधानी वालों को समझना चाहिए कि यहां पुलिस का काम केवल जूआं सट्टा पकडऩा बस नहीं है या आपराधियों को पकडऩे बस का  काम नहीं है। राजधानी में जरूरी काम तो वीआईपी ड्यूटी का सफल संचालन है। और राजधानी की पुलिस का परफारमेन्स का जवाब नहीं है। दूसरी जगह मंत्री चप्पल खा रहे है हमारे यहां पुलिस के रहते किसी की मजाल नहीं है। रहा सवाल गोली,हत्या,लूट, डकैती का तो सबका एक साथ भंडाफोड़ कर देंगे कोई पकड़ में तो आये। राजधानी के साथ यह बुराई  आती ही है परेशान होने की जरूरत नहीं है। जब राजधानी मांगते समय नहीं सोचा तब अब क्यों जबरिया पुलिस को गाली दे रहे है।

सोमवार, 14 मई 2012

ये कैसा समझौता...


डॉ.रमन सिंह ने कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई में नक्सलियों से समझौते की जो कहानी सुनाई थी वह अब भी तार-तार हो गई है। झूठ सबके सामने है? और नक्सलियों की मार-काट जारी है। सरकार समझौैते के नाम पर माला जप रही है और आम आदमी सोचने मजबूर है कि समझौते क्या हुआ है। क्या सचमुच मेनन की रिहाई में के एवज में रूपयों का लेन देन हुआ है और मिशन 2013 के फतह का खेल हुआ है?
समझौता वार्ता के दौरान नक्सली हिंसा को यह कहकर टालने की कोशिश हुई कि सूचना नहीं पहुंंच पाने की वजह सेे सब हो रहा है लेकिन अब क्या हुआ? सरकार ने क्या समझौता कर लिया है कि कलेक्टर बस को छोड़ दो चाहे जिसे जैसा मारना चाहो छूट है। हम नहीं पकड़ेंगे? और पकड़ेंगे भी तो उन्हें छोड़ देंगे?
वास्तव में डॉ.रमन सिंह नक्सली मामले में पूरी तरह फेल हो चुके है। उनकी सत्ता में बैठने के बाद नक्सलियों ने न केवल अपने क्षेत्र का विस्तार किया है  बल्कि हिंसक वारदातों में भी बढ़ोतरी की है। सलवा जुडूम के बीमारी ने गांव के गांव उजाड़ दिये और डॉ.रमन सिंह व पूरी भाजपा अपनी कमजोरी छिपाने केन्द्र से गुहार लगाकर शब्दो को लच्छेदार चासनी में लपेट रही है।
कलेक्टर के अपहरण का ड्रामा अब खत्म हो चूका है। डॉ. रमन सिंह के सरकार का नया ड्रामा चल रहा है आबकारी एक्ट में बंद गुडिय़ारी के युवक को नक्सली समझौैैते के तहत छोडऩे ड्रामा भी खत्म हो गया है लेकिन नक्सली कोई ड्रामा नहीं कर रहे है वे लगातार मारकाट मचा रहे है। सरकार की नीति से पुलिस का मनोबल कम हुआ है।
ऐसी स्थिति में केन्द्र की खामोशी भी आश्चर्यजनक है। सिर्फ करोड़ो रुपये देकर ऐसा सरकार के  भरोसे जवानो और आम लोगों को छोड़ दिया है जो नक्सलियों को छोडऩे एवज में समझौते  कर रहे है। जान माल की हिफाजत करने में पूरी तरह से असक्षम सरकार के बारे में भी केन्द्र ही नहीं अब तो आम लोगों को भी सोचना होगा कि आखिर सरकार क्यों चूक रही है। इतने लोगो की मौत बाद भी सरकार केवल भाषणों में नक्सलियों से लडऩे का दावा कर रही है। आखिर नक्सली क्यों छोड़े जाने चाहिए? क्या जवानों की कुर्बानी व्यर्थ है या सरकार के कहने पर सलवा जुडूम चलाने वाले बेवकूफ थे। क्या सरकार पर भरोसा करना गलत है? यह सवाल अब चर्चाओं में है और इसका जवाब डॉ.रमन सिंह को देना ही होगा।
                   

रविवार, 13 मई 2012

सरकार और उद्योगपति...


छत्ततीसगढ़ में उद्योगपतियों की दादागिरी पर सरकार की खामोशी का क्या अर्थ है यह तो वही जाने लेकिन आम लोगों में जिस तरह से चर्चा है उसका लब्बोलुआब तो यहीं है कि जब आप गलत होंगे तो आप किसी को गलत करने से नहीं रोक सकते है न ही अच्छे कार्य के लिए दबाव भी बना  सकते है।
यहीं वजह है कि पैसों के दम पर उद्योगपति मनमानी कर रहे है और सरकार में बैठे अफसर-मंत्री उनके सामने दूम हिलाते नजर आ रहे है। छत्तीसगढ़ में उद्योगों के लिए रमन सरकार ने जिस तरह से जमीने व दूसरी सुविधाएं दी इसके एवज में उद्योगों ने इस प्रदेश को क्या दिया। इस पर यहां बाद में चर्चा करेंगे लेकिन राजधानी के  दर्जन भर तालाबों की सफार्ई व सौंदर्यीकरण से उद्योगों ने जिस तरह से मुंह मोड़ा है वह गाल में तमाचा मारने से कम नहीं है ।
राजधानी के तालाबों के सौंदर्यीकरण के इस योजना को उद्योगपतियों ने पलीता लगा दिया और आज तालाब के पास रहने वाले लोग परेशान है। उनकी निस्तारी की सुविधा भी सरकार नहीं कर पा रही है तालाबों की गंदगी बजबजाने लगी है और सरकार व नगर निगम यह सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठी है कि यह सब उद्योगपति करेंगे।
उद्योगपति के यह रूख के पीछे की कहानी क्या है यह तो सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि उसने सरकार से मिली सुविधा का नगद भुगतान कर दिया है इसलिए वे सरकार मेंं बैठे लोगों को आंख दिखाते है और अवैधानिक व आपराधिक कृत्य में लिप्त है।
छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन राज के आने के बाद उद्योगपतियों की दादागिरी व आपराधिक कृत्य किसी से छिपा नहीें है। अवैध निर्माण,अवैध उत्खनन,पेड़ों की कटाई,जमीन पर कब्जा और दादागिरी चरम पर है लेकिन सरकार को यह सब नहीं दिख रहा है। सरकार को यह सब क्यों नजर नहीं आ रहा है यह तो बाद की बात है। इतनी मनमानी के बाद सरकार जिस तरह से उद्योगों के लिए अपने बनाये कानून को नजरअंदाज या अवहेलना कर रही है यह साबित करता है कि पैसों की ताकत सरकार से बड़ी हो गई है। उद्योगों को जमीन देने जनसुनवाई के नौटंकी से लेकर बिजली बिल की वसूली और टेक्सों में माफी तक दी जाती है लेकिन इतनी सुविधा पाने के बाद भी राजधानी के तालाबों की सफाई जैसे काम में वह पीछे हट जाती है और सरकार के लोग गिड़गिड़ाते रहे तो ऐसी सरकार के होने या न होने का फायदा क्या है।
                               

शनिवार, 12 मई 2012

स्लाटर हाउस की मजबूरी


राज्य बनने के बाद नि:संदेह शहरी क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा बढ़ी है लेकिन रमन सरकार की अव्यवस्थित नीति के चलते आम आदमी स्लाटर हाउस में जाने के लिए मजबूर है। सरकार की चिकित्सा सुविधा अव्यवस्था का शिकार है और इसे दूर करने में रमन सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है।
राजधानी में कहने को तो मेकाहारा के साथ जिला अस्पताल व निगम द्वारा संचालित कई अस्पताल है लेकिन यहां अव्यवस्था का यह आलम है कि लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख करने मजबूर है। लाखो करोड़ों के उकरण लगाये गए है लेकिन डॉक्टरों  की रूचि सिर्फ समय काटने की है या फिर आने वाले मरीजों को कैसे निजी चिकित्सालय में भेजे इसी में रहता है। स्टाफ की कमी तो अपनी जगह है लेकिन निजी चिकित्सालयों से मिलने वाली मोटी कमीशन के चलते यहंा इतनी लापारवाही की जाती है कि मरता क्या न करता के तर्ज पर लोग स्लाटर हाउस की ओर रुख करते हैं। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ रायपुर में ही हो रहा है पूरे प्रदेश भर के जिला चिकित्सालयों व मेकाहारा व मेकाज मे भी यही हाल है। ऐसा नहीं है कि सरकार में बैठे लोगों को इसकी जानकारी नहीं है लेकिन निजी डाक्टरों से ईलाज कराने वाले अधिकारी व नेताओं को आम लोगों की फिक्र ही नहीं है। निजी अस्पपतालों में मची लूट से आम आदमी त्रस्त है लेकिन व्यवस्था सुधारने में सरकार का ध्यान ही नहीं है।
राजधानी में निजी चिकित्सालयों में मची लूट-खसोट का यह आलम है कि रोज कितने ही परिवार जीते जी मर जाने की स्थिति मे आ रहे है। कर्ज लेकर इलाज कराने के बाद भी डाक्टरों का रवैया जरा भी संवेदनशील नहीं है। रायपुर में डाक्टरी पेशा को जिस तरह से व्यवसायिक रुप देकर लूट की होड़ मची है वह अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। दवाई,जांच में भी कमीशन खोरी चरम पर है। कई एमआर तो इन डाक्टरों की करतूत का चौक-चौराहों पर जिस तरह से चर्चा करते है वह डाक्टरी पेशा के लिए कलंक से कम नहीं है। दवाई कंपनियों से दवाई लिखने के एवज में न केवल मनमाना कमीशन खोरी की जा रही है बल्कि सेम्पल की दवाई तक बेचने से गुरेज नहीं करते है।
सरकार के मुखिया डाक्टर होने के बाद भी जिस  तरह से सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था से मुह मोड़ रहे है वह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ऐसे में आम आदमी स्लाटर हाउस की ओर रुख करने मजबूर है।
                              

शुक्रवार, 11 मई 2012

टोल प्लाजा की जिद...


टोल प्लाजा के निर्माण को लेकर सरकार के बेवजह जिद से महौल खराब होने लगा है। यह सच है कि टोल प्लाजा निगम सीमा के बाहर होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का भी इस बारे में गाईड लाईन स्पष्ट है इसके बाद भी सरकार टोल प्लाजा  को निगम सीमा में क्यों स्थापित करने में अड़ी हुर्ई है यह समझ से परे है।
टोल प्लाजा का निगम सीमा में निर्माण का न केवल वहां के लोग बल्कि आम जनता भी विरोध कर रही है। पिछले 6 माह से इसका विरोध चल रहा है लेकिन सरकार के जिद के चलते यह आन्दोलन का रुप लेने लगा है। कल सुंदर नगर के पास निर्माणाधीन स्थल पर जो हुआ उसके बाद तो तय है कि यहां टोल प्लाजा को लेकर लोग नाराज है और सरकार का इसी तरह का अडिय़ल रुप रहा तो बेवजह आन्दोलन होगा और आम आदमी को परेशानी होगी।
यह सर्वविदित है कि जिस जगह सुंदरनगर और चंगोराभाठा के बीच टोल प्लाजा का निर्माण करने की स्वीकृति दी गई है वह न केवल नियमों के विपरित है बल्कि इससे इस राह से गुजरने वालों को परेशानी होगी। सच यह भी है कि टोल प्लाजा की वजह से वातावरण भी खराब होगा जो ठीक नहीं है।
जिस जगह कर टोल प्लाजा बनाने की अनुमति दी जा रही है वह 6 वार्डो के  लाख भर लोगों के लिए मुसिबत का सबब होगा और इसके चलते आय दिन झगड़ा-झंझट से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में सरकार की जिद आश्चर्यजनक है।
हम यहां इस पर चर्चा करना नहीं चाहते कि टोल प्लाजा के निर्माण का यह निर्णय ठेकेदार को फायदा  पहुंचाने के लिए किया गया है या ठेकेदार के पैसों की वजह से यह निर्णय आया है। हम यहां केवल नियमों की बात कर रहे है और यहां टोल प्लाजा के निर्माण से होने वाली परेशानियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे है।
कुम्हारी के पहले स्थित टोल प्लाजा को लेकर क्या कुछ नहीं हुआ है। कलेक्टर को अपमानित किया गया तो सांसद सरोज पाण्डे के लोगों को तोडफ़ोड़ का सहारा लेना पड़ा ऐसे में निगम सीमा के अंदर जब टोल प्लाजा होगा तो इस तरह की घटनाओं को रोक पाना मुश्किल होगा जो आय दिन पुलिस के लिए सिरदर्द साबित होगा और कानून व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
इतना ही नहीं इसके विरोध मेें जब आन्दोलन होंगे तो यह बेवजह परेशानी वाला होगा। सिर्फ एक जिद वह भी नियमों के विपरित को लेकर प्रभावित वार्डों के लाख भर लोगों को आन्दोलन के लिए उकसाना ठीक नहीं है। वैसे भी सरकार का काम आम लोगों के हितों को देखना है और जब आम लोग ही इसके खिलाफ हो तब भला नियमो से परे जाकर टोल प्लाजा का निर्माण गलत है।
                

गुरुवार, 10 मई 2012

स्लाटर हाउस बनते अस्पताल...


राजधानी के एस्कार्ट हार्र्ट सेंटर में एक बार फिर पैसों के लिए शव को बंधक बनाया गया। यह खबर जितना विचलित करने वाला है उतना ही शर्मनाक भी है। व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते अस्पतालों में ही नहीं डाक्टरों की सोच मे भी तब्दिली आई है और कर्ज लेकर अस्पताल में सुविधाओं का विस्तार ने संवेेदनाओं को किनारे कर दिया।
कहने को तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक से एक बड़े अस्पताल है लेकिन इनमें सरकार का कहीं नियत्रंण नहीं होने की वजह से यह स्लाटर हाउस में तब्दिल होने लगा है। डाक्टरों को सिर्फ पैसा दिखाई दे रहा है और सेवा के इस पेशे ने पूरी तरह व्यवसायिक रुप ले लिया है।
हालत यह हैै कि अपनी कमाई के चक्कर में सरकारी अस्पताल के डाक्टर भी मरीजों को स्लाटर हाउस में भेज रहे है और इस सब खेल को जानते हुए भी प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग खामोश है।
हम यहां पहले ही कह चुके है कि निजी अस्पतालों को लेकर कड़े कानून बनाने की जरूरत है यह सच हैै कि सभी डाक्टर संवेदनहीन नहीं होते और न ही कोई मरीजों को जानबुझकर मारता है लेकिन यहां सवाल मरीजों को बचाने तक सीमित नहीं है इनकी वजह से मरीज के परिजनों का जीते जी मर जाने का है।
ईलाज के नाम पर लूट-खसोट की जो परम्परा राजधानी व छत्तीसगढ़ में चल रही वह ठीक नहीं है मरीज के अस्पताल पहुंचते ही लूट-खसोट की जो रणनीति बनाई गई है उस पर सरकारी नियत्रंण की जरूरत है। जांच के नाम से लूट की शुरुआत एडमिट करने के बाद और उपचार के  बाद भी जारी रहता है। कमीशनखोरी इस तरह हावी है कि वेश्याओं के दलाल भी शरमा जाए। लेबोरेटरी में कमीशन, खुन में कमीशन ,दवाईयों में कमीशन की वजह से ईलाज का 75 फीसदी खर्च तो कमीशन खोरी में ही चला जाता है ऐसे में एक आम आदमी के लिए यह स्लाटर हाउस से कम कैसे हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि राजधानी के सभी डाक्टर या पैथालॉजी लैब वाले लूट-खसोट में लगे है यहां वन्दना ग्रुप के गंगा डायग्नोस्टिक सेंटर जैसी संस्थाएं  भी है जो 75 फीसदी छूट के साथ जांच रिपोर्ट दे रहे है वह भी उच्च स्तरीय मशीन के साथ काम कर रहे है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कमीशनखोरी में लगे डाक्टरों को तो अपने बताये लैब की रिपोर्ट ही चाहिए। दवाईया भी खुद का मेडिकल स्टोर्स से ही होना चाहिए।
कमाई के फेर में मरीज के परिजनों की जान लेने पर आमदा इन नर्सिंग होम या बड़े अस्पतालों के खिलाफ सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी ही चाहिए ताकि सेवा के इस क्षेत्र की पवित्रता बनी रहे।
                                                

बुधवार, 9 मई 2012

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे...


यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अपने करतूत पर परदा डालने की कोशिश में लगे पीएससी यानि लोक सेवा आयोग के पदाधिकारी मीडिया पर दोषारोपण नहीं करते। संघ से सूची जारी करने का प्रयास ये कर रहे है, मुरली मनोहर जोशी से रिश्तेदारी ये निभा रहे है, उत्तरप्रदेश के सवाल ये कर रहे है गलत मॉडल उत्तर ये जारी कर रहे है और मीडिया पर आरोप लगा रहे है कि ये लोग नकारात्मक खबर छाप रहे है जिससे पीएससी की छवि धूमिल हो रही है।
पीएससी अपने किये पर परदा डालने जिस तरह से मीडिया पर दोषारोपण कर रही है वह कहीं उचित नहीं है।
छत्तीसगढ़ में आयोजित पीएससी की परीक्षा एक बार फिर विवाद में है। विवाद की वजह यहां बैठे लोग है जो शायद कसम खा चुके है कि वे अपनी मनमानी करेंगे? पीएससी के अध्यक्ष डॉ. जोशी  तो पहले से ही विवाद में है और मामला यहां तक जा पहुंचा है कि पीएससी की सूची इस बार संघ तय करेगी। कल के प्रश्नपत्र के  बाद तो यह तय ही हो चुका है कि छत्तीसगढ़ की लोगों की उपेक्षा राज बनने के बाद भी जारी है। शासन-प्रशासन में बैठे लोग नहीं चाहते है कि यहां के युवाओं को नौकरी मिले और यहां के युवाओं की षडयंत्रपूर्वक उपेक्षा की जा रही है।
हमें ये नहीं लगता कि इन गलतियों को सुधारा जाना चाहिए जिस तरह की गलतियां हुई है इसके बाद तो परीक्षा रद्द कर दोषियों कर कड़़ी करवाई की जरूरत है।
इस सरकार में तो अधिकारियों की करतूत किसी से भी छिपा नहीं है । चोरी और सीना जोरी के तर्ज पर आंख दिखाने से कभी गुरेज नहीं किया।  ऐसे कई मामले है जब भ्रष्टाचार के आरोपियों को सरकार ने संरक्षण देकर अपनी गोद में बिठाया है।
पीएससी के मामले में हमारा मानना है कि छत्तीसगढ़ के युवाओं के साथ जिस तरह से षडयंत्र हुआ है इसकी न केवल उच्चस्तरीय जांच की जरूरत है बल्कि जिम्मेदारी तय कर कड़ी सजा देने की भी जरूरत है। आखिर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही प्रदेश में साजिशपूर्वक नकारा गया तो वे कहां जायेंगे।
राज हमारा, फिर नौकरी दूसरों के लिए तय हो यह उचित नहीं है। हमने कल इसी जगह पर साफ कहा था कि छत्तीसगढ़ के युवाओं के उपेक्षा ऐसे ही होती रही तो राज-ठाकरे जैसे लोगों को सर उठाने का मौका मिलेगा जो सरकार के     लिए भी ठीक नहीं है। इसलिए अब भी समय है सरकार को पूरी परीक्षा रद्द कर नये सिरे से परीक्षा आयोजित करवाना चाहिए ।