मंगलवार, 29 मई 2012

अब तो भगवान ही मालिक...

अब तो भगवान ही मालिक...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक महिला सिपाही ही गैंग रेप का शिकार हो गई। 15 दिन पहले कटोरा तालाब में हुए गोलीकांड के बाद हमने इसी जगह पर लिखा था कि छत्तीसगढ़ जैसे शांत प्रदेश में कानून व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। भ्रष्टाचार में लिप्त मुख्यमंत्री से लेकर पूरा सरकारी अमला सिर्फ और सिर्फ अपनी तिजौरी भरने में लगा है और आम आदमी के लिए मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
भय भूख और भ्रष्टाचार के नारे से सत्ता में आई रमन सरकार ने अपनी कथनी के ठीक विपरीत करनी करने में लगे हैं। आम आदमी कानून व्यवस्था से भयभीत है। किसानों की जमीने छीन ली जा रही है और बढ़ती मंहगाई से उनके सामने भूखों मरने की नौबत ला दी है जबकि भ्रष्टाचार की कालिख से प्रदेश के मुखिया तक रंगे हो तो फिर इस प्रदेश का भगवान ही मालिक नहीं होगा तो क्या कहा जाए। हम शुरू से ही यह बात कह रहे हैं कि जिस प्रदेश के गृहमंत्री को एसपी निकम्मा कलेक्टर दलाल और दस-दस हजार में थाना बिकने की बात कहनी पड़ रही हो वहां हालत कितने बदतर है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन यहां तो बिल्ली के भाग से छींका टूटा है तो धूल तक निगला जा रहा है। कल तक पुलिस पर हमला केवल नक्सली ही करते रहे हैं तब जंगल में लक्ष्य को लेकर बहस होती रहती है लेकिन अब तो छत्तीसगढ़ में हत्या लूट बलात्कार की घटना यूपी बिहार की याद दिलाने लगी है और जब पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं है तब वे किस तरह से दूसरे की रक्षा करेंगे।
रमन सिंह के कार्यकाल में पुलिस वालों का मनोबल गिरा है जब प्रदेश के मुखिया अपराधियों के साथ मंच पर खड़े हो रहे हैं तब भला अपराधियों के हौसले क्यों नहीं बुलंद होंगे।
कल रात जिस तरह से सूचना पाने के बाद भी महिला सिपाही हादसे की शिकार हुई है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार भी दोषी है उसने व्यवस्था ही ऐसी बना रखी हैं कि पुलिस का मनोबल टूटने लगा है। अपराधियों को छुड़ाने थाने तक फोन जाता है और कहना नहीं मानने वाले शशिमोहन सिंह जैसों को प्रताडि़त किया जाता हो उस सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है।

सोमवार, 28 मई 2012

निगम में राजनीति...


वैसे तो पूरे प्रदेश में नगरीय निकायों में राजनीति के चलते बुरा हाल है। नगर निगम राजनीति का अड्डा बन चुका है। सत्ता में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारियों की राजनीति के चलते आम आदमी अपनी मूलभूत जरूरत से दूर होता जा रहा है और इसकी परवाह किसी को नहीं है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का तो सर्वाधिक बुरा हाल है। यहां महापौर कांग्रेस की है और प्रदेश भाजपा की सरकार होने के वजह से एक दूसरे पर हावी होने की राजनीति के चलते निगम के अधिकारी व कर्मचारी बेलगाम हो गए हैै। महापौर की नहीं चलली तो मंत्री के पास चले जाते हैं और मंत्री नाराज हुए तो महापौर से संरक्षण मिल जाता है। हालत यह है कि निगमायुक्त तक की नहीं सुनी जा रही है। सालों से एक ही पदों पर बैठे निगम के तनखईया के आगे सब बेबस है और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। कमाई वाली जगह पर बैठने की ललक और झंझट वाली जगह से छुटकारे की राजनीति का शिकार आम आदमी हो रहा है। इस भीषण गर्मी में पानी के लिए राजधानी में त्राहि मचा हुआ है। सुबह से रात तक टेंकरो से पानी की आपूर्ति में करोड़ो रूपए की घपलेबाजी हो रही है। सफाई के नाम पर पार्षद तक लूट मचा रहे हैं और बजबजाती नालियों के चलते कई क्षेत्रों में बिमारियों ने दस्तक शुरू कर दिया है।
अवैध निर्माण को संरक्षण देने में भी पार्षद से लेकर निगम अधिकारियों की भूमिका सामने आ रही है और कब्जा करने वाले बेधड़क आम लोगों का रास्ता रोक रहे है। गोलबाजार, सदर, मालवीय रोड, एमजी रोड जैसे व्यस्ततम इलाकों का तो सबसे ज्यादा बुरा हाल है।
इस सरकार में यही हाल पूरे प्रदेश भर में है, नगरीय निकाय राजनीति का अड्डा बन चुका है इसकी प्रमुख वजह राज्य व केन्द्र्र से मिल रहे बेहताशा पैसा है जिससे अपनी जेब गरम करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा जा रहा है और एक दूसरे पर हावी होने की राजनीति से निगम में कार्यरत अधिकारी इसका फायदा उठाने से गुरेज नहीं करते। राजनांदगांव, अंबिकापुर, रायगढ़ से लेकर जगदलपुर में मूलभूत सुविधाओं को पूरा करने की बजाय दलगत राजनीति का अखाड़ा बन चुका है।
दूसरी तरफ पानी के टैक्स में बढ़ोत्तरी से आम आदमी परेशान है। व्यवसाय के नाम पर लगातार बढ़ रहे टैक्स वसूली से आम आदमी त्रस्त है और भ्रष्टाचार के चलते सुविधाओं से वंचित होती जनता केवल तमाशा देख रही है ऐसे में राजनीति का अड्डा बन चुके निगम को ठीक नहीं किया गया तो आनेवाले दिनों में इसका गंभीर परिणाम होगा।
 

रविवार, 27 मई 2012

उद्योगों की दादागिरी...


छत्तीसगढ़ में जिस पैमाने पर रमन सरकार ने उद्योग के लिए रास्ते खोले हैं। उद्योगपति अब अपनी जेब में सरकार को रखने लगे है। खुलेआम कब्जे और पेड़ो की कटाई के साथ भयंकर प्रदूषण फैला रहे उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई करने की सरकार में हिम्मत भी खत्म हो गई है। श्रम कानून का खुलेआम उल्लंघन से लेकर ऐसे कितने मामले हैं जो सरकार का मुंह चिढ़ा रहे हैं लेकिन सरकार तो मानों उनके गोद में बैठी है। रायगढ़ में कल जिंदल समूह के एक उद्योग में जिस तरह से भारी दबाव में कलेक्टर को जांच के लिए भेजना पड़ा और वहां जो कुछ जांच टीम ने किया वह सरकार की असलियत की कलई खोलने के लिए काफी है। जिंदल समूह के रायगढ़ स्थित इस उद्योग को लेकर जब शिकायते बढ़ गई तो भारी दबाव में जिला प्रशासन ने वहां छापे की कार्रवाई तो की लेकिन छापे का नेतृत्व करने वाले जिला प्रशासन के अधिकारी सहायक कलेक्टर गोयल और एसडीएम चौरसिया वहां जाकर जिंदल के एक बड़े अधिकारी के एसी चेम्बर पर बैठ गए। यहीं नहीं न तो शिकायत कर्ताओं को ही साथ रखा और न ही पत्रकारों को ही वहां घुमने दिया गया। जिंदल समूह पर जमीन कब्जे से लेकर प्रदूषण फैलाने तक के अलावा भी ढेरो शिकायते हैं। जिंदल समूह के इस पतरापाली स्थित फैक्ट्री में भारी अनियमितता की भी शिकायत है लेकिन उद्योग समूह ने सब मैनेज कर लिया। अब रिपोर्ट क्या होगा आसानी से समझा जा सकता है।
रायपुर में भी उद्योगपतियों की दादागिरी किसी से छिपी नहीं है। रमन सिंह जगह-जगह उद्योगों की तालाब साफ करने व सौंदर्यीकरण के लिए कहते घूम रहे हैं लेकिन उद्योगपति उनकी बात ही नहीं सुन रहे है। राजधानी के दर्जनभर तालाबों की सफाई करने की बात उद्योगपतियों ने की थी लेकिन कलेक्टर के दबाव के बाद भी कुछ नहीं किया गया और इसके चलते तालाबों की हालत खराब हो गई है।
उद्योगपतियों की दादागिरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करोड़ों रूपए के बिजली का बिल बाकी रहने के बाद भी इनसे वसूली नहीं हो पा रही हैं। अवैध निर्माण से लेकर अवैध कब्जों की शिकायतों पर कार्रवाई की बजाय चंदा लेने में भरोसा ज्यादा है।
           

शनिवार, 26 मई 2012

भाजपाई सद्बुद्धि !


छत्तीसगढ़ में सत्ता में काबिज भाजपाईयों ने पेट्रोल के दाम में बढ़ोतरी को लेकर जिस तरह से कांग्रेस भवन में प्रदर्शन करने का निर्णय लिया यह आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ को किस दिशा में ले जायेगा यह कहना कठिन है लकिन वह किसी भी हाल में उचित नहीं कहा जा सकता।
ये सच है कि पेट्रोल की बेतहाशा किमत बढऩे से आम आदमी का जीना दूभर हो जायेगा। पहले ही बढ़ी हुई महंगाई ने आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है। लोगों में इसे लेकर बेहद आक्रोश है और वे सड़कों तक उतर कर अपना रोष जाहिर भी कर रहे है लेकिन इस सबके बाद भी किसी पार्टी कार्यलय में प्रदर्शन कितना उचित है। आज भाजपाईयों ने पेट्रोल की कीमतों को लेकर कांग्रेस भवन में प्रदर्शन करने की कोशिश की है। राज्य मे भाजपा की सरकार है और उसके किसी निर्णय पर कहीं कांग्रेसी भी कोशिश करने लगे तो फिर क्या होगा?
पश्चिम बंगाल में एक पार्टी के लोग दूसरे पार्टी पर जानलेवा हमला करने से भी गुरेज नहीं करते? और छत्तीसगढ़ में आज भी पार्टी की विचारधारा से परे कांग्रेसी और भाजपाई आपस में मेल-जोल रखते है और ऐसी स्थिति मे पेट्रोल की आग को लेकर राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को एक दूसरे से सीधे मुकाबले तक ले जाना कतई उचित नहीं है।
छत्तीसगढ़ मे भाजपा की सरकार है और ऐसी स्थिति मे भाजपाईयों को और भी संयमित होने की जरूरत है। फिर भाजपाई ये क्यूं भूल जाते है कि प्रदेश में उनकी सरकार ने कोयले की कालिख से लेकर न जाने कितने मुद्दे  कांग्रेसियों के  हाथों सौंपा है। इसी पेट्रोल में राज्य सरकार 25 फीसदी वेट ले रही है जबकि दूसरे राज्यों ने अपने लोगों को राहत पहुंचाने वेट में कमी की है और इसी मुद्दे को लेकर कल कहीं कांग्रेसी सीएमहाऊस की बजाय भाजपा कार्यलय को निशाना बनाये तब यहां के सौहाद्र का क्या होगा।
यह परम्परा ठीक नहीं है। और इसे विराम देते हुए भाजपा नेतृत्व को अपने कार्यकर्ताओं के  ऐसे उत्साह पर कार्रवाई करनी चाहिए। अन्यथा छत्तीसगढ़ के इस शांत राजनैतिक फिजा में दूसरे प्रांतों के  कीड़े न पनप सके।
               

शुक्रवार, 25 मई 2012

मोदी और रमन...


मुम्बई में चल रहे भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह की नितिन गडकरी ने तारीफ की,छत्तीसगढ़ भाजपा के लिहाज से यह महत्वपूर्ण है। कोयले की कालिख सहित कई तरह के भ्रष्टाचार में फंसी सरकार की जब आम लोगों में साख गिर रही है तब राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तारीफ एक तरह से रमन विरोधियों को पटकनी देने से कम नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार के काम काज को लेकर भाजपा के रमेश बैस,श्रीमती करूणा शुक्ला, नंदकुमार साय सहित कई लोग नाराज है। कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन रिहाई मामले में सरकार की भूमिका की यहां थू-थू हो रही है वहांं पीठ थपथपाई जा रही है। राजनीति के इस गुढ़ रहस्य को तो आम लोग भी नहीं समझ पा रहे है कि आखिर जिस मामले में सरकार की किरकिरी हो रही है। जिस मुख्यमंत्री के राज में अफसरशाही हावी बताये जा रहे है प्रशासनिक ढीलापन की बात कही जा रहा है। उसी मुख्यमंत्री को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  कुशल प्रशासक बता रहे है।
दरअसल कोयले की कालिख में नीतिन गड़करी का नाम भी जुड़ा है और जब भाजपा में आंतरिक गुटबाजी चरम पर है। मोदी येदिरप्पा,अरूण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे लोग आंख दिखा रहे हो तब डॉ.रमन सिंह ही बच जाते है जो नितिन गड़करी के साथ है शायद यह वजह भी मायने रखती है। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने अपनी जिद पूरी करवा  कर ही बैैठक में पहुुंचे। संजय जोशी से उनकी टकराहट और नितिन गड़करी का संजय जोशी को समर्थन का यह पेचिदा मामला मोदी के जिद के आगे  नेस्तनाबूत हो गया और नितिन गडकरी की जबरदस्त हार के रूप में इसे देखा जा रहा है। राजनैतिक विश्लेषक नरेन्द्र मोदी की इस जीत पर हैरान है। और अब तो भाजपा में यह राष्ट्रीय अध्यक्ष के हैसियत भी नापी जा रही है।
कहा जाता है कि यदि राष्ट्रीय अध्यक्ष ही कमजोर हो तो कोई भी आंख दिखा सकता है फिर नरेन्द्र मोदी तो वैसे भी भाजपा मेें बड़े नेता बनकर उभर चुके है। उनकी लोकप्रियता के आगे नितिन गडकरी कहीं नहीं टिकते है। और येदिरप्पा से पहले ही परेशान नितिन के लिए मोदी से लडऩा आसान भी नहीं था। यही वजह है कि सिडी कांड के लिए चर्चित संजय जोशी को इस्तीफा देना पड़ा। यही वजह है कि मोदी की पीठ नहीं थपथपाने के बाद भी वह हीरो बनकर उभर गये!
               

गुरुवार, 24 मई 2012

आग में घी...


यह आग में घी डालने का काम नहीं है तो क्या है। पहले ही मंहगाई से आहत जनता को जिस तरह से यूपीए सरकार ने अपने तीसरे वर्षगांठ पर पेट्रोल के दरों में बढ़ोत्तरी की है वह आम लोगों में गुस्सा बढ़ाने के सिवाय और कुछ नहीं है।
इस मुल्य वृद्धि का चौतरफा विरोध पर जिस तरह से वित्त मंत्री प्रणय मुखर्जी का पेट्रोल की कीमतों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है वाला ब्यान आया वह बेहद गैर जिम्मेदाराना है। यह बात सच है कि तेल कंपनियां ही पेट्रोल की कीमते तय करती है लेकिन सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है कहना सरासर बेईमानी है। यदि ऐसा नहीं तो अब जनता के गुस्से को वह कैसे रोकेगी। केन्द्र सरकार पहले ही घोटाले की वजह से संकट में है। सत्ता में बैठे रहने की मजबूरी को गठबंधन की मजबूरी बताकर अपने पाप को कम करनेे में लगी यूपीए सरकार आखिर कब तक जनता को बेवकूफ बनाते रहेगी।
हर जरूरी चीजों की कीमत लगातार बढ़ रही है आम आदमी का जीना कठिन होता जा रहा है। नीचे से उपर तक फैले भ्रष्टाचार से नौकरशाह और जनप्रतिनिधि गुलछर्रे उड़ा रहे है और आम आदमी बदतर जीवन की ओर चला जा रहा है। आखिर सरकारे होती किसलिए है। नियंत्रण में नहीं है तो नियंत्रण के लिए कानून क्यों नहीं बनना चाहिए। आखिर जनता को उसके मौलिक अधिकार से वंचित रखने की कोशिशें क्यों होनी चाहिए।
राजनैतिक तिकड़म के चलते जब सरकार बगैर बहुमत के  होते हुए चल सकती है तब पेट्रोल की कीमतों पर वृद्धि रोकने राजनैतिक तिकड़म का सहारा क्यों नहीं लिया जा रहा है। यह ठीक है कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के चलते कई चीजों में सब्सिडी की वजह से सरकार को घाटा उठाना पड़ रहा है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि खुद भ्रष्टाचार करके सात पीढ़ीयों की व्यवस्था कर लो और आम  आदमी को मंहगाई से मार डालो। पेट्रोल की कीमतों में हुई यह वृृद्धि आम लोगों का गुस्सा बढ़ाने वाला है। भले ही ममता नहीं मुलायम जयललीता नहीं मायावती से समर्थन पाकर यूपीए अपना सरकार बचा ले लेकिन वह लोगों के गुस्से से कैसी बचेगी।
                                  

बुधवार, 23 मई 2012

निजी शिक्षण संस्थानों पर उठते सवाल...


इस बार फिर बारहवी के रिजल्ट में सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूल फिसड्डी साबित हुए है। पिछले साल भी कमोबेश यही स्थिति रही  है लेकिन यह बात सरकार को दिखाई नहीं देती  और निजी स्कूल माफियाओं से होने वाली अवैध कमाई के चलते सरकारी स्कूलों को बर्बाद करने का षडयंत्र चल रहा है।
दरअसल शिक्षा माफियाओं ने तामझाम कर एक ऐसी लकीर खींच दी है कि मध्यवर्ग तक इससे प्रभावित है और आज जब एक रिक्शावाला या मजदूर तपके के लोग भी अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा देना चाहते है। तब भला सरकार अपनी संस्थानों में अंग्रेजी शिक्षा क्यों शुरू नहीं करना चाहती यह घोर आश्चर्यजनक है।
शिक्षा माफिया का दबाव सरकार पर है और अब यह साफ दिख रहा है। जब हर साल सरकारी स्कूलों का परिणाम निजी स्कूलों से बेहतर हो तब सरकार का यह रवैया साफ बताता है कि सरकार में बैठे जनप्रतिनिधियों को केवल अपनी जेब गरम करने से मतलब है।
छत्तीसगढ़ में शिक्षा माफियाओं ने चारों तरफ अपना पैर पसार लिया है और सरकार उनके इशारे पर भले ही नहीं नाच रहे हो लेकिन सरकारी अधिकारियों का एक बड़ा समूह निजी स्कूलों को बढ़ावा देने सरकारी स्कूलों में गड़बडिय़ां कर रहे है। लेकिन इससे सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती और सरकारी स्कूलोंं के लिए कहीं न कहीं सरकार की नीति व जनप्रतिनिधि भी दोषी है। केवल अंग्रेजी शिक्षा की वजह से ही निजी स्कूलों का भाव बढ़ा है और सरकार यदि अपनी संस्थानों में अंग्रेजी शिक्षा प्रारंभ कर दे तो आधे से ज्यादा निजी शिक्षण संस्थान बंद हो जायेंगे? जहां आम आदमी टाई,ड्रेस,बेल्ट,जूता,मोजा,कॉपी-किताब के नाम पर लूटा जा रहा है। लकिन सरकार को जानबुझकर इस तरफ से आंख बंद किये हुए है। निजी शिक्षण संस्थानों की लूट बढ़ते ही जा रही है जबकि इस पैमाने पर  वहां पढ़ाई नहीं होती यह बात हर आदमी जानता है कि निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई उतनी अच्छी नहीं होती। शिक्षकों को शोषण होता है और यहा के 90 फीसदी बच्चे कोचिंग व ट्यूशन पर निर्भर होते है। जबकि सरकारी स्कूलों के 10 फीसदी बच्चे ट्यूशन व कोचिंग का सहारा लेते है और इसके बाद भी रिजल्ट निजी स्कूलों से बेहतर आता है। ऐसे में सरकार को नये सिरे से शिक्षा नीति बनानी होगी।