रविवार, 6 जनवरी 2013

किरण की करतब फिर फेल...


नगर निगम के पार्षद उपचुनाव में कांगे्रस हार गई। बैजनाथ पारा में कांगे्रस पहली बार नहीं हारी है लेकिन यहां से भाजपा पहली बार जीती है और वह भी तब जब निगम में कांगे्रस का कब्जा है। पार्षद जैसे चुनाव में हार जीत भले ही राजनैतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण न हो लेकिन कांग्रेसी महापौर किरण मयी नायक के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि टिकिट से लेकर सारी रणनीति में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी रही है। और इस हार की वजह उनकी रणनीति को मानी जाय तो गलत नहीं होगा।
वैसे भी किरणमयी नायक जिस दिन से महापौर बनी है निगम में कई तरह के इतिहास रचे गए है। उनके कार्यकाल में बÓाट प्रस्ताव तक गिर गया वह भी कांगेे्रस के ही पार्षद की बगावत की वजह से गिरा था। इसके बाद स्टेज में उनके रौद्र रूप को लेकर भी नागरिक हैरान थे। और अब उपचुनाव में मिली हार ने उनकी कार्यशैली पर फिर से सवाल खड़ा कर दिया है।
यह अलग बात है कि भाजपा के दिग्गज मंत्रियों ने यहां पानी की तरह पैसा खर्च किया लेकिन हार की सिर्फ यही एक वजह बताना सच से दूर भागना होगा।
निगम के बजट प्रस्ताव गिर जाने के बाद भी संगठन ने जिस तरह से उपचुनाव में उन पर भरोसा किया था। अब नये सिरे से इस पर सोचने की Óारूरत पड़ सकती है।
वैसे भी शहर का विकास कांगे्रस और भाजपा की राजनीति में उलझ कर रह गई है। बड़ी योजनाएं तो शुरू नही हो पा रही है। रोजमर्रा के कार्य तक ठीक से नही हो रहे है। बजबजाती नालियां, धूल भरी सड़क और भयावह म'छर से लोग परेशान हैै।
और पार्षदों का काम तो जैसे तैसे पैसा कमाने का रह गया है। खासकार पार्षद पतियों की दखलंदाजी चरम पर है। Óयादातर काम पार्षदपति ही कर रहे है। यहां तक कि जोन कार्यालय से लेकर मुख्यालय तक पार्षद पतियों का ही दखल है। अब तो निगम के कर्मचारी भी इन पार्षद पतियों से तंग आ चुके है और वे पार्षद पतियों के हरकतों पर चुहल बाजी करते नहीं थकते।
एक निगम कर्मचारी ने बताया कि सफाई ठेकेदार को एक पार्षद पति ने किस तरह हर माह पैसा देने का फरमान सुना दिया तो एक पार्षद पति ने अपने  रिश्तेदार को ठेका दिलाने अधिकारियों से कैसे भीड़ गया था। यह अलग बात है कि उसे बाद में अपने पार्टी के आकाओं को सफाई तक देनी पड़ी थी।
निगम में सिर्फ साफ सफाई का ही मामला नहीं है अब राजस्व वसूली में भी खेल होने लगा है। कई पार्षद तो राजस्व वसूली में हस्तक्षेप करने लगे है और टैक्स कम  करवाने में लगे हैं। जबकि टैक्स को लेकर निगम कर्मचारी भी अपनी चला रहे है।
सीनेट्री इंस्पेक्टरों का काम तो सिर्फ  दस्तखत करना ही रह गया है। कुछ की तो सुबह होटलों में ही बीत जाती है। पार्षद उपचुनाव के साथ ही निगम कर्मचारी महासंघ का भी चुनाव हुआ और अरूण दुबे और सुरेन्द्र दुबे फिर काबिज हो गये। अरूण दुबे के साथ सुभाष सोहाने के नाम की चर्चा भी एक बार गर्म है। आखिर कमिश्नर साराभाई वाली घटना को लोग कैसे भूल सकते  है।
वैसे भी अरूण दुबे की Óाुझारू शैली किसी से छिपी नहीं है। उनके तेवर से भी सभी  परीचित है। ऐसे में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से उनकी कितनी जमेगी देखना है।

मुंदी आंख से...

उपचुनाव में भाजपा की जीत से उत्साहित पार्षद दल ने महापौर से इस्तीफे की मांग कर डाली लेकिन यह मांग कुछ को भारी पड़ गई और चर्चा है कि उपर से इसके लिए फटकार भी लगाई गई। फटकार की वजह अब भी ढूंढा जा रहा है।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

अब भी नहीं सुधर रही पुलिस ...


यह तो कुत्ते की दुम को बारह साल पोंगली में रखने के बाद भी सीधी नहीं होने वाली कहावत को ही चरितार्थ करती है वरना छत्तीसगढ़ पुलिस का रवैया पीढि़तों को लेकर इतना नकारात्मक नहीं होता । जुआं सट्टा अवैध शराब बेचने वालों के अलावा अपराधियों से गठजोड़ में छत्तीसगढ़ पुलिस इतनी मशगुल हो गई है कि उनका मन बलात्कार जैसे मामले की पीढि़तों को देखकर भी नहीं पिघलता तभी तो गौरेला के टीआई सी एन सिंह ने बलात्कार की शिकार महिला को थाने से भगा दिया । पीडि़त महिला की शिकायत पुलिस कप्तान रतन लाल डांगी से की गई तब कहीं जाकर न केवल रिपोर्ट लिखी गई बल्कि टी आई सी एन  सिंह को निलंबित किया गया ।
पिछले हफ्ते जहां पूरा देश दामिनी के लिए न्याय मांग रहा था वहीं छत्तीसगढ़ की पुलिस बलात्कारियों के प्रति नरम रवैया रखे हुए थे । गौरेला की इस घटना के अलावा पिछले हफ्ते छत्तीसगढ् में आधा दर्जन से अधिक बलात्कार की वारदात हुई और प्राय: इन सभी मामलों में थाने का रवैया दुर्भाग्य पूर्ण रहा  । भानुप्रतापुर में तो महिला से सामूहिक बलात्कार के मामले में पुलिस ने तब कार्रवाई की जब मीडिया ने हल्ला मचाया । ईलाज के लिए उस मलिा को राजधानी से दूर इसलिए भी रखा कि कोई नई मुसिबत खड़ी न हो जाए । रातो रात जुर्म दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया । लेकिन मजाल है कि इस मामले में कप्तान साहब कुछ कहते । इसलिए कुछ नहीं कर पाये क्योंकि थाना प्रभारी उपर तक पहुंच रखता है ।
पुलिस जानती है कि उनकी वर्दी के रौब के आगे सब डरते है और यदि मामले पर Óयादा हल्ला मचा तो भी तो कुछ दिन बाद सब शांत हो जायेगा ।
पुलिस जानती है कि उनके प्रति लोगों में बेह्द गुस्सा है लेकिन उन्हें उनकी परवाह भी नहीं है क्योंकि गुण्डागर्दी का लाइसेंस तो उन्ही के पास है और जब तक नेताओं व मंत्रियों के पैसों की भूख रहेगी उन्हें अ'छी जगह पोस्टिंग से कोई नहीं रोक सकता ।
तभी तो राजधानी में ऐसे ऐसे वर्दी वाले थाने में बैठे हैं जिनकी गलतियां उन्हें नौकरी में रखने के लायक नहीं है । पंडरी मोवा थना प्रभारी की शिकायत क्या कम है या लोहा कारोबारी पंकज की रिपोर्ट नहीं लिखने वाले का क्या हुआ ।
तभी तो लोगों का गुस्सा फट पड़ता है और यदि कोई पुलिसिया अत्याचार पर आवाज उठाये तो पुलिस उसकी पिटाई से भी  परहेज नहीं करती तभी तो पिछले दिनों राजधानी के शास्त्री चौक जैसे व्यस्ततम चौक में वर्दी वालों ने भाजपा नेता के रिश्तेदार की सरे आम पिटाई की लेकिन उपर से दबाव आया तो विभागीय जांच के निर्देश दे दिये गये । भाजपा के सांसद रमेश बैस के भतीजे ओंकार बैस की भी पुलिस वालों ने पिटाई की लेकिन मामला सांसद के भतीजे का था इसलिए मारने वाला पुलिस कर्मी को निलंबित कर दिया यानी आम आदमी की पिटाई पर यहां कुछ नहीं होना है ।
ुपुलिस अपनी मर्जी की मालिक है वह जो चाहे कम है तभी तो पंडरी कपड़ा मार्केट में तवेरा की लूट होती है और पुलिस चोरी का जुर्म दर्ज करती है मजाक है राजधानी के दो-दो मंत्री पुलिस से पूछने की हिम्मत कर सके कि ऐसा कैसे हो गया वे तो तभी बोलते है जब उनके परिजानों पर पुलिस का गुस्सा निकलता है ।
लोग गुस्से में है । लेकिन उनका गुस्सा कभी नहीं निकलता । वर्दी वाले का खौफ केवल शरीफों पर ही चलता है तभी तो अंबिकापुर में पुलिस कर्मी पर जानलेवा हमला होता है और हमलावर को पकडऩे जब पुलिस आरोपी के घर पहुंचती है तो वहां एक सब इस्पेंक्टर को कालर पकड़कर बंधक बना लिया जाता है और सीएसपी को दल बल के साथ जाना पड़ता है । और अपराधी पुलिस से डरे भी क्यों ? पैसा लेकर गलबहियां करने में पुलिस को भी मजा आता है ।
चलते चलते ...
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाने व ठेकेदार के दबाव से निपटने पुलिस ने नया फार्मूला निकाला है । आलंपिक संघ के अध्यक्ष और महासचिव यानी रमन सिंह और बल्देव भाटिया के संबंधो को खूब प्रचारित करों लोग सीधे मुख्यमंत्री पर ही उंगली उठायेंगे ।

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

न वादा न काम सिर्फ हुए बदनाम


खदानों की बंदर बांट, खेती की जमीनों की बरबादी, सरकारी खजानों को अरबों-खरबों का नुकसान, भयावह अपराध और शर्मनाक भ्रष्टाचार की वजह से छत्तीसगढ़ की बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई । राजनीति और सत्ता के लिए वादे तो किये गये लेकिन न तो शिक्षा कर्मियों से किये वादे पूरे हुए न ही किसानों से किये वादे ही पूरे हुए । आदिवासी वर्ग पुलिसिया बर्बरता से उद्वेलित है तो सतनामी समाज आरक्षण कम होने से आन्दोलित है । मंत्री परिवारों की ढाट-बाट जहां आम छत्तीसगढिय़ों के दिलों को छलती करने लगा है तो शराब ठेकेदार की मुख्यमंत्री से सीधे नजदीकी ने गांवों की शांति छिन ली है । सत्ता के दुस्पयोग को लेकर छत्तीसगढ़ के लिए 2012 हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है कहा जाय तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी ।
छत्तीसगढ़ में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भले ही भाजपा व कांग्रेस ने राजनीति शुरू कर दी हो लेकिन इस राजनीति के घनचक्कर में सभी वर्ग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं । घोटाले-भ्रष्टाचार और कालिख से पूते चेहरे सत्ता के दुरूपयोग की जो कहानी कह रहे है वह किसी के लिए भी शर्मसार कर देने वाला है । 
छवि पर ही धब्बा ...
          पिछला चुनाव भाजपा ने डॉ. रमन सिंह की साफ छवि की वजह से जीता था और  इस बार इसी साफ छवि पर एक नहीं कई बार धब्बे लगे हैं । रतनजोत घोटाले या ओपन एक्सेस घोटाले को लोग भूल भी जाये लेकिन कोयले खदान की कालिख से छत्तीसगढ़ की बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई है न तो इस संचेती बंधु की वजह से हुई बदनामी भूलने लायक है और न ही राजसी तामझाम वाली पार्टी ही लोग भूल सकते है । लोग न तो सलमान के झटके भूलने वाले है और न ही करीना के ठुमके पर किये गए करोड़ों रूपये ही भूलने वाले हैं ।
प्रदेश के मुख्य के पास उर्जा और खनिज जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं और दोनों ही विभागों में जिस तरह से भ्रष्टाचार के किस्से सामने आये है वह सरकार के लिए आगामी दिनों में मुसिबत बढ़ाने वाली हो सकती है ।
सरपल्स स्टेट का दावा बिजली की बड़ती कीमतों के आगे दम तोडऩे लगी है । लगातार बढ़ रही बिजली की कीमत ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है । उपर से आम आदमी को छूट देने की बजाय उद्योगों को जिस तरह से छूट दी गई वह व्यथित करने वाला  
 है ।
रतन जोत के नाम पर जिस तरह से करोड़ों फूंके गए वह भी अपने आप में एक इतिहास है । प्रचार-प्रसार में ही आरबों फूंके गए ।
ओपन एक्सेस घोटाला को लेकर तो सरकार के जिंदल प्रेस जगजाहिर हो गया जबकि हर गांव में बिजली पहुंचने का वादा पूरा होता कहीं नहीं दिख रहा है ।
ऊर्जा विभाग में ऊर्जासचिव अमन सिंह की नियुक्ति ही विवादास्पद है और यहां के अफसर शाही के किस्से तो दिल्ली तक सुनाई देते है ।
खनिज में तो बंदरबांट का जो खेल हुआ उसकी बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई । संचेती बंधुओं को कोल ब्लाक आबंटन में जिस तरह से नियम कानून की अनदेखी की गई वह सत्ता के दुरूपयोग का ऐसा मामला है जिसकी कालिख पूछते नही पूछ रही है । सरकार का संचेती प्रेम इस कदर है कि उससे संचेती बंधु को 49 फीसदी शेयर के बाद भी एम डी बना दिया है ।
खदानों की बंरबांट की कहानी यही खतम नहीं होती । पुस्य स्टील से लेकर न जाने कितने लोगों को खदानें दे दी गई जो नियम कानून के खिलाफ है । सरकार ने आवेदन कर्ताओं के आवेदन का परिक्षण तक नहीं किया ।
खेती की बरबादी और उद्योग प्रेम
विकास के नाम पर जिस तरह से खेती की जमीनों को बरबाद किया गया इसके दुस्परिणाम आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा ।
सरकार का उद्योग प्रेम इस कदर रहा कि उसने उद्योगों को जमीन दिलाने नियम-कायदे को ताक पर रखा । झूठे जन शिविर लगाये गए और जमीन नहीं देने वाली किसानों की पुलिसिया पिटाई तक हुई । औद्योगिक दादागिरी का यह आलम रहा कि खुद पार्टी के सांसदों को औद्योगिक आतंकवाद जैसे नारे बुलंद करने पड़े ।
नई राजधानी के नाम पर भ्रष्टाचार की नदिया बहाई गई और जबरिया जमीन अधिग्रहण के अलावा राÓयोत्सव के नाम पर खड़ी फसल तक में बुलडोजर चलाये गए ।
बालको चिमनी मामला हो या अन्य औद्योगिक दादागिरी सरकार साफ तौर पर इनके आगे नतमस्तक होते नजर आई ।

दमदार मंत्री की दमदारी...
ेप्रदेश के दमदार मंत्री माने जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी के किस्से अब दिल्ली तक गुुजने लगे है । उखड़ती सड़कें दरकतीं पूल अपने आप में भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रही है ।
परिवार वालों के सत्ता में गुसपैठ की चर्चा तो दिल्ली तक गुंजने लगी है । संस्कृति विभाग हो या पयर्टन विभाग हर जगह भ्रष्टाचार की नदिया बहाई गई । बगैर नाम पते के रोप वे बनाने लाखों रूपये देने का मामला हो या विदेश से काम के एवज में पैसा मांगने के आरोप ने सरकार के लिए मुसिबत बड़ा दी । सरकार के लिए शर्मिन्दगी की बात तो 26/11 के जश्र का आयोजन भी रहा ।
जिसकी चर्चा अब भ्ीा चौक चौराहों पर सुनी जा सकती है ।
अफसरशाही, दलाल-निकम्मपा प्रशासनिक आतंकवाद
रमन सरकार के कार्यकाल में अफसरों की मेहरबानी और उनकी दादागिरी के किस्से यहां तक जा पहुंचे हैं कि दीलिप सिंह जुदेव को प्रशासनिक आतंक वाद की बात कहनी पडी तो गृहमंत्री ननकी राम कंवर को एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहना पड़ा ।
अफसरों ने सरकार की उसी योजना में रूचि ली जिसमें उनका हित सधता दिखा ।
गुटबाजी के चलते कई बार सचिवों के झगड़े सामने आये तो डीजीपी स्तर के कई अधिकारी रिटायर्ड मेंट के पहले हटाये गये । मंत्रियों से टकराव चरम पर रहा और पार्टी से टकराव चरम पर रहा और पार्टी के विधायक से लकर कार्यकर्ता भी अफसरशाही से त्रस्त नजर आये ।
संकल्प तोड़ा गया ...
रमन सरकार के लिए भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए हिन्दुत्व की खूब दुहाई देते हुए कहा था कि वे जनता से वादा नहीं संकल्प कर रहे हैं लेकिन आज भी ऐसे दर्जनों संकल्प है जिससे सरकार दूर भाग रही है इनमें से कई संकल्प तो तब लिये गये थे जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिह स्वयं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष थे ।
शिक्षाकर्मियों का संविलियन इसके से प्रमुख संकल्प रहा है । आम शिक्षा कर्मी आन्दोलित है और उनके आन्दोलन की सÓाा ब"ाों से लेकर आम आदमी तक को भुगतना पड़ रहा है । जब शिक्षा कर्मियों का संविलियन ही नहीं करना था तब ऐसे वादे किये ही क्यों गये ।
इसी तरह का मामला प्रदेश भर के लिपिकों का है । सरकार ने तिवारी कमेटी की अनुशंसा को लागु नहीं कर रही है और जब अनुशंसा लागु नहीं करना थ तो कमेटी क्यों बनाई गई ।
प्रदेश भर के किसानों को 270 रूपये बोनस का संकल्प भी सरकार ने पूरा नहीं किया उल्टा इस मामले में केन्द्र की सरकार से राजनीति की जाने लगी ।
युवाओं को बेरोजगारी भत्ता के नाम पर छला गया । तो नौकरी के दरवाजे भी ठीक ढंग से नहीं खोले गये ।

बुधवार, 2 जनवरी 2013

परिवर्तन के स्वर को धरातल पर लाने का संकल्प---


अन्ना का आन्दोलन, रामदेव का तामझामए प्रमुख राजनैतिक दल कांगेे्रस-भाजपा की करतूतों, उद्योगों की चालबाजी और छत्तीसगढ़ की रमन सरकार के कालिख पूते चेहरे, रोगदा बांध का बिकना, और महिला अत्याचार की दर्दभरी दास्तान के साथ 2012 भी बीत गया।
बीती ताही बिसार दे आगे की सुध ले। आखिर कब तक हम सच से अपने को दूर रखे। सच तो यह है कि अतीत को भूल जाने की सलाह वही देते हैं जो अतीत के काले सच से सराबोर होते है। जबकि अतीत का काला सच ही भविष्य के प्रकाश का रास्ता होता है। हर साल नये वर्ष में अतीत के स्याह पक्ष को भूलने की सलाह ने ही वर्तमान में भी अंधेरा फैलाने का काम किया है। और राजनैतिक दलों में समाजसेवा की बजाय पैसे की भूख बढ़ी है। इसलिए अब हम इस स्याह पक्ष को भूल जाने की बजाय इसकी खिलाफत की बात कर रहे है।
 बहुत हो चुका, रक्षक के भेष में भक्षकों की ताज पोशी। इसलिए हमें अब नये साल में बदलते तारीख के साथ समाज के  दुश्मनों को पहचान कर उसके खिलाफ खड़े होने का संकल्प लेना है। और इसकी शुरूआत अपने आसपास से ही की जानी चाहिए।
छत्तीसगढ़ राÓय निर्माण के समय क्या नहीं सोचा गया था। टैम्स फ्री राÓय की बात तक की जाती रही। बिजली के मामले में खूब प्रसार हुआ। और रतनजोत से नई क्रांति की बात कही जाने लगी। क्या हुआ? इन बातों का? क्यों सरकार अपने वादे से मुकर गई।
नई राजधानी पर करोड़ों-अरबों फंूकने वाली सरकार के पास शिक्षा-स्वास्थ्य प्राथमिकता क्यों नहीं है। जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद औकात से बढ़कर रहन सहन कैसे हो गया। जब किसानों को 270 रूपये बोनस देना ही नहीं था तब वादे क्यों हुए। जब शिक्षा कर्मियों का संविलियन होना ही नहीं था तब संकल्प का नाम क्यों दिया गया और जब तिवारी कमेटी की अनुशंसा माननी ही नही थी तब कमेटी क्यों बनाई गई। आन्दोलन करने वाले अपनी मांग पूरी होने पर अपने साथ हुए अन्याय को शायद भूल भी जाये लेकिन क्या उन लोगों को यह सब भूलना चाहिए जो सरकार के रवैये की वजह से हुए आन्दोलन के कारण आते जाते बेवजह परेशान हुए।  क्या लोगों को कोयले की कालिख भूल जानी चाहिए या बांध बेचना भूलना चाहिए? उद्योगों के लिए जबरिया खेती की जमीनों की बरबादी को कैसे भूला जा सकता है या करीना को नचाने खड़ी फसल पर बुलडोजर चलाने की तुगलकी फरमान भूला जा सकता है।
बढ़ते अपराध, लुटती बेटियां को कैसे भूला जा सकता है।
बारह साल में छत्तीसगढ़ में शिक्षा को दूकान बनाने में सरकार जिस तरह से सरकारी स्कूल कालेजों को बरबाद किया है वह कैसे भूला जा सकता है और न ही चिकि त्सा के अभाव में मरते लोगों को भूलना मानवता के लिए कितना ठीक होगा।
सत्ता की ऊंची दौड़ ने गाँवों के विकास को अवरूद्ध कर दिया है। सत्ता मे बैठे लोगों के अपराधिक गठजोड़ ने इस शांत प्रदेश को अपराध के आंकड़े में सबसे उपर ला दिया है। हर विभाग भ्रष्टाचार में गले तक डुब गया है और कुर्सी में बैठने वालों ने सात पीढ़ी की व्यवस्था कर ली है या करने में लगे है।
यदि कांग्रेस के छत्तीसगढ़ में हार की वजह से भी भाजपा ने सबक नहीं लिया है तो इसके परिणाम की चिंता जनता को करनी पड़ेगी ।
अब पिछली बातों को भूलने की बजाय इससे सबक लेने का समय ही नहीं है बल्कि इस पर प्रहार करने की जरूरत आ पड़ी है। हर अपराध के खिलाफ  खुल कर खड़े होने का समय है। अपराधी चाहे अपना ही क्यों न हो।
आओं वर्ष 201& का स्वागत इसी संकल्प के साथ करें।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वांटेड मन्नू को पकडऩे में पुलिस के हाथ पांव फूल रहे!



रायपुर। करोड़ों के वायदा कारोबार में धमकी-चमकी और अपहरण के मामले पुलिस ने दर्ज तो कर लिये हैं लेकिन इस कांड के सरगना मन्नू उर्फ अभिनंदन नत्थानी को पुलिस अब तक गिरफ्तार नहीं कर पाई है जबकि वह लगातार नेताओं और अधिकारियों के संपर्क में है। करोड़ों के वायदा कारोबार को लेकर शहर के धनाड्य वर्गों में जबरदस्त रूचि है। चूंकि मामला लाखों-करोड़ों का है इसलिए इसकी वसूली भी इसी तरीके से की जाती है। चूंकि पूरा मामला नम्बर दो का है इसलिए वायदा कारोबारी पैसा वसूली में दो नंबरी लोगों का ही उपयोग करती है कही वजह है कि इस कारोबार में किसी गंभीर वारदात की आशंका है। चूंकि इस मामले में दोनों की पक्ष धनाड्य व अपने को ई"ातहार मानते हैं इसलिए भी मामला पुलिस तक पहुंचने के पहले ही जैसे-तैसे सुलझा लिया जाता है।
चूंकि एक मामला पुलिस तक पहुंच गया इसलिए इस धंधे के पीछे का सच लोग जान पाये। इधर अभय नाहर अपहरण कांत में पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा जरूर है लेकिन वह मन्नू नत्थानी को गिरफ्तार नहीं कर पा रही है इससे पुलिस पर उसे बचाने का भी आरोप लगाया जा रहा है। हालांकि पुलिस ने उसे वांटेड घोषित जरूर कर दिया है लेकिन उसे अभी मन्नू तक पहुंचने में सफलता नहीं मिली है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि मन्नू नत्थानी लगातार शहर में मौजूद अपने शुभ चिंतकों के संपर्क में है और उसके पास पुलिस की गतिविधियों की भी सूचना पहुंच रही है। मन्नू इन दिनों मोबाईल नंबर बहल-बदल कर या लैंड लाईन से अपने शुभचिंतकों के संपर्क में है।
ज्ञात हो कि सोने चांदी की ऑनलाईन बुुकिंग के जरिये करोड़ों का खेल दो नंबर में बिना लिाख पढ़ी के हुआ है सूत्रों का कहना है। मन्नू उर्फ अभिनंदन नत्थानी, नीतिन चोपड़ा और सन्नी नायडू इस बाजार के बड़े खिलाड़ी के रूप में अपने को प्रचारित किया था। एजेटों के माध्यम से बेहिसाब कटिंग के चलते वसूली में दिक्कत हुई फिर वसूली के लिए भाई गिरी का रास्ता अख्तियार किया गया।
बताया जाता है कि शहर में अभी भी तीन दर्जन से अधिक एजेंट हैं जो बेहिसाब कटिंग कर रहे हैं जबकि इस खेल में किसी प---पृथ्वानी के दादागिरी करने की चर्चा भी दब  जोर पकडऩे लगी है। एकांश जैन सहित कोठारी बंधु भी अपने दो वायदा बाजार का बड़ा खिलाड़ी बताकर वसूली के लिए धमकी चमकी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं।
वायदा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि कई लोग अपना सब कुछ दांव पर लगा चुके हैं और पैसा देने में आना-कानी कर रहे हैं चूंकि पूरा खेल दो नंबर में हुआ है इसलिए वसूली के लिए भाईगिरी वाला रास्ता ही अख्तियार किया जा रहा है।
इधर खबर है कि अनीस भंडारी, प्रवीण मालू, निलेश बेगानी विकास अग्रवाल जैसे वायदा कारोबारियों पर पुलिस की नजर लगी हुई है। चूंकि में लोग राजनैतिक पहुंच रखते हैं इसलिए पुलिस इन पर हाथ नहीं डाल पा रही है।
बहरहाल वाटेंड मन्नू को पुलिस द्वारा गिरफ्तार नहीं करने से आम लोगों में कई तरह की प्रतिक्रिया है जो ठीक नहीं कही जा सकती।

रविवार, 30 दिसंबर 2012

अवैध निर्माण बना कमाई का जरिया ...


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को सुंदर बनाने की जिम्मेदारी जिन पर है वे ही निगम को चूना लगाने आमदा है । बजबजाती नालियां, भयंकर धूल और खौफनाक म'छर राजधानी की पहचान बन चुका है । कभी धूल मुक्त शहर का दावा करने वालों को जनता ने धूल चटा ही । इसके बाद भी हालात कुछ नहीं बदला है ।
बेतरतीब निर्माण ने तो शहर को बेढंगा कर ही दिया है इसकी वजह से यातायात की समस्या भी शहर वालों को झेलना पड़ रहा हैं । निगम के अधिकारियों से तो इन अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद ही बेमानी है और जिन पाषदों पर उम्मीद की जा रही है वे भी ऐसे अवैध निर्माण को कमाई का जरिया बना चुके है ।
यहां तक कि इन अवैध निर्माण करने वालों से मंत्रियों तक पैसा पहुंचाने की चर्चा गरम है ।
शहर के ह्दय स्थल माने जाने वाले जयस्तम्भ चौक में स्थित किरण बिल्डिंग को लेकर क्या कुछ नहीं हुआ । नक्शे के विपरित निर्माण से लेकर नियम-कानून की ध"िायां उड़ाते यह अब भी वैसा ही खड़ा है । पहले तो जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई करने का बहाना बनाया गया और जब जांच रिपोर्ट आ गई तब भी कुछ नहीं हो रहा है । कमिश्रर से लेकर महापौर सहित तमाम जिम्मेदार लोगों पर पैसों को लेकर उंगलिया उठ रही है । हल्ला मचाने वाले भाजपाई भी खामोश है और वार्ड पार्षद को तो मानों इससे कोई मतलब ही नहीं है ।
जब शहर के जयस्तम्भ जैसी जगह का यह हाल है तो आसानी से समझा जा सकता हे कि दूसरे काम्प्लेक्सों का क्या हाल होगा । कार्रवाई नहीं करने का मतलब  साफ है कि तिजोरियां भरी जा रही है । Óयादा दिन नहीं हुए है शंकर नगर में राजकुमार चोपड़ा के काम्प्लेक्स की दूकानों पर सील लगाई गई थी । मंत्री राजेश मूणत तक नाराज थे । क्रिस्टल टावर का भी यही हाल था । सील लगाई गई । फिर खोल दी गई । सील खोलने के एवज में क्या सौदा हुआ । कोई नहीं जानता । पार्किंग की समस्या यथावत है काम्प्लेक्स नियम कानून को चिढ़ाते खड़े है । पार्षद बनते ही जिन्दगी बदलने लगी । गाडिय़ां खरीदी जा रही है । क्या-कांग्रेस और क्या भाजपा, निर्दलीय तो पहले ही सौदेबाजी कर मजे में है ।
शहर का बुरा हाल हे । निगम राजनीति का अड्डा बनते जा रहा है । विकास में बाधा के लिए एक दूसरे के सिर ठिकरा फोड़ा जा रहा है लेकिन धूल और म'छर से परेशान जनता की पीड़ा कोई नहीं देख रहा है । नगर निगम पहले दिन घोषणा करता है कि सड़कें नहीं खोदने दी जायेगी दूसरे दिन पुलिस वाले मोतीबाग के पास धड़ा-धड़ सड़क खोदते है । कुछ नहीं होता है।
धर्मार्थ के नाम पर बिल्डिंग बन गई है लेकिन यहां खुले आम दूकानदारी चल रही है लेकिन निगम को यह सब देखने की फुरसत  ही नहीं है । सच तो यह है कि टैक्स बचाने के एवज में भी पैसे वसूले जा रहे है ं ।
राÓय बनने के बाद से निगम की राजनीति में जबरदस्त गिरावट आई है । लाखों रूपए चुनाव में खर्च किये जा रहे हैं । लोग हैरान है कि पार्षद जैसे पद के लिए लाखों खर्च करके चुनाव जीतने की कोशिश क्यों हो रही है ।
बैजनाथ पारा के उपचुनाव में तो एक मंत्री द्वारा 60-70 लाख रूपये खर्च करने की चर्चा है । खर्च तो कांग्रेसीयों ने भी कम नहीं किया है । इतने खर्च के बाद क्या जन सेवा होगी । आसानी से समझा जा सकता है ।
मूंदी आंख से ..
बैजनाथ पारा में पार्षद उपचुनाव में भले ही मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच कही जा रही हो लेकिन वास्तव में कांग्रेस यहां अपने ही लोगों से मुकाबले पर नजर आ रही थी । ढेबर गुटको पटकनी देने कौन सा गुट सक्रिय था और वह कितना कारगर होगा यह तो वक्त की बात है लेकिन भाजपाई भी अपने मंत्री की रूचि से हैरान थे ।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

अवैध कालोनी की सूची बने साल बीत गये पर कार्रवाई नहीं...



रायपुर। यह तो राम नाम की लूट है लूट सको तो लूट की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना नगर एवं ग्राम निवेश द्वारा अवैध कालोनियों की सूची बगैर कार्रवाई के सवा साल तक यू ही पड़ी नहीं होती। कहा जाता है कि राजनैतिक पहुंच से लेकर पैसे वालों की इस जमात ने अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक के मुंह में नोट भर दिये हैं। इसलिए कार्रवाई होने की बात तो दूर इन्हें नोटिस तक नहीं दिया गया और गुपचुप ढंग से पैसा खाकर इन्हें बचाया जा रहा है।
राजधानी में पदस्थ अधिकारियों की खाओं पियों नीति के चलते भू-माफियाओं ने जबरदस्त ठंग से अवैध कालोनी बना रखा है और वे शासन प्रशासन को अपनी जेबों में रखने का दावा करते हुए आम लोगों को मनमाने कीमत पर जमीन व मकान बेच रहे हैं।
इस संबंध में आरटीओ कार्यकर्ता इंदरजीत छाबड़ा, राकेश चौबे से बात की गई तो उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के बाद सरकार में बैठे मंत्री और अधिकारियों की नीति के चलते ही आम आदमी ठग जा रहा है। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश ने ऐसे 204 लोगों की सूची बनाई है जिन लोगों के द्वारा ग्राम बोरियाखुर्द, डोमा, माना, डूण्डा, कांदुल, धरमपुर, बनरसी टेमरी, दतरेंगा, भठगांव, संकरी, पिद्दा जोरा मडिया देवपुुरी, काठाडीह, कचना, धनेली, छपोरा व सेजबहार में अवैध रूप से प्लाटिंग, अवैध व्यपर्तन व अवैध कालोनी का निर्माण कर रहे हैं।
यह सूची 10-08-2010 को बन गई है लेकिन इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है। आखिर सरकार क्या यह चाहती है कि इनके झांसे में आकर लोग अपने घर का सपना परा करे फिर सरकार इसे तोड़ दे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना चाहिए? सरकार की इस नीति के चलते आम आदमी ठगा जा रहा है। ग्राम व नगर निवेश द्वारा तैयार सूची के अनुसार माना में दलजीत सिंह पिता कुलदीप सिंह चावला, जनक बाई पिता मनराखन, मनोज पिता नंदकुमार सिंहा, ग्राम बोरियाखुद में श्रीमती मथुरा बाई पिता प्रेमलाल, सुरेश सिंह पिता चंद्रपाल सिंह, ग्राम डूण्डा में मो. मोहसिन पिता अब्दुल जलील, विनोद अंदानी पिता स्व. नरसिंह दासअंदानी, कमलजीत कौर पिता हरजीत सिंग छाबड़ा, ग्राम सेरीखेड़ी में अनिल कुमार थौरानी पिता मंशाराम थौरानी, ग्राम धरमपुरा में मनोहरलाल पिता आसन दास, घनाराम पिता बिसाहू, कार्तिक पिता बिसाहू, अमरू पिता कार्तिक, सरजू पिता भोकलू, ग्राम टेमरी में विजय कुमार पिता शुभकरण, ग्राम बनरसी में तापस चन्द्र दास और ग्राम काठाडीह में विमल कुमार पिता मोतीलाल जैन शामिल है।
सूत्रों के मुताबिक इस 17 लागों की सूची में शामिल लोगों ने नियम कानून को ताक पर रखकर काम किया है और इन्हें बचाने में मंत्री स्तर के लोग भी लगे हुए हैं। बताया जाता है कि सरकार का काम ऐसे लोगों पर कार्रवाई कर आम लोगों को ठगी से बचाना है लेकिन कार्रवाई की बजाय इनसे पैसा लेकर मामले को रफा-दफा किया जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि इस मामले में भाजपाईयों को ही बचाया जा रहा है बल्कि कांग्रेस के लोग भी शामिल है जिसके चलते यह कहावत को भी बल मिला है कि लूट की राजनीति में दोनों ही दल माहिर है।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले में अधिकारियों की जेबें Óयादा गरम हुई है और मंत्रियों या नेताओं को सिर्फ रोटी डाला गया है तब भी कार्रवाई नहीं की गई।