गुरुवार, 24 जनवरी 2013

हद हो गई...


छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सुनील कुमार को न केवल हाईकोर्ट में अपनी आमद देनी पड़ी बल्कि लिखित में यह कहना पड़ा कि आईंदा ऐसा नहीं होगा। हाईकोर्ट ने प्रदेश के गृह सचिव तक को नोटिस दिया है। एस पी कलेक्टर आए दिन हाईकोर्ट तलब किए जा रहे हैं और सरकार अफ़सरों की करतूतों पर परदा डाल रही है।
कोयले की कालिख के साथ कंठ तक भ्रष्टाचार में डुबी सरकार से बहुत Óयादा उम्मीद तो बेमानी है लेकिन सरकार की  करतूतों की सजा कोई कोई दूसरा क्यों भुगते। सरकार की इसी करतूत का फ़ायदा अधिकारी उठा रहे हैं। बेलगाम नौकरशाहों की मनमानी से आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। लेकिन सरकार को इसकी जरा भी परवाह हो ऐसा आचरण में नहीं दिखता।
वैसे तो रमन सरकार में अफ़सरशाही और प्रशासनिक आतंक की कहानी नई नहीं है एवं प्रशासनिक आतंक जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले विपक्षी कांग्रेसी नहीं उनकी ही पार्टी के नेता दिलीप सिंह जूदेव हैं। प्रशासनिक आतंक की हालत यह है कि गिनती के 4 अफ़सर पूरे प्रदेश को संभाल रहे हैं और उनके आगे न मंत्रियों की चलती है और न ही किसी और की चलती है।

प्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं होगा जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फ़ल-फ़ूल रहे हैं। सरकारी खजानों पर तो डकैती डाली जा रही है। ईमानदार अफ़सरों को इतना प्रताडि़त किया जा रहा है कि वे आत्महत्या करने तक मजबूर हो रहे हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को मलाईदार पदों पर ही नहीं बिठाया जा रहा बल्कि उन्हे रिटायरमेंट के बाद भी संविदा में रखा जा रहा है। पदोन्नति से लेकर तबादले में ईमानदार अफ़सरों की उपेक्षा की जा रही है और सरकार के मंत्रियों के पास पहुंचने वाली ऐसी शिकायतें रद्दी की टोकरी में फ़ेंकी जा रही हैं। यही वजह है कि अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ हाईकोर्ट में दस्तक दी जा रही है। अगर सरकार ही न्याय करे तो लोग कोर्ट क्यों जाएगें।
विधानसभा हो या मंत्रालय, कलेक्टरेट हो या पुलिस मुख्यालय सब जगह अफ़सरों की मनमानी से आम जनता त्रस्त है। अब तो अफ़सरों की अय्याशी का मामला इतना बढ गया है कि उनके द्वारा निवेशकों को लुभाने के नाम पर अश्लील नाच का आयोजन भी किया जाने लगा है। करीना कपूर हो या मैनपाट कार्निवल की रशियन बालाएं सब अफ़सरों की करतूतों की कहानी है जिस पर सरकार की पूरी स्वीकृति है।
प्रदेश में बैठी भाजपा सरकार को अपनी जिम्मेदारी का कितना अहसास है यह तो वही जाने लेकिन संविधानिक व्यवस्था में अफ़सरों से काम लेना सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में  सरकार इसलिए बिठाई जाती है ताकि सरकारी खजाने का सही और जनहित में उपयोग हो। बेहतर सरकार वही मानी जाती है जहां अफ़सर बेलगाम न हो और लोगों की समस्यायो का निपटारा न्यायालय जाने से पहले हो जाए।
लेकिन जब सरकार पर ही कालिख पूती हो, सरकार के ही मंत्रियों की करतूतों पर सवाल उठ रहे हों और खुद मंत्री की भूख सिफऱ् पैसा कमाने की हो तो अफ़सरों की स्वे'छाचारिता को कैसे रोका जा सकता है। गंभीर अपराधों के बाद भी यदि कई अफ़सर महत्वपूर्ण मलाईदार पदों पर बैठे हैं तो इसकी प्रमुख वजह रमन सरकार और उसके मंत्री हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत विधायिका होती है और उसकी जिम्मेदारी सिफऱ् सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना या अपने हितों में फ़ैसला लेना बस नहीं है। बल्कि जनता के हित और चोरों को सजा मिले यह भी जिम्मेदारी है। लेकिन जिस तरह से उजार हुए भ्रष्टाचार के मामले में लीपापोती हो रही है वह उचित नहीं है। केवल बदनामी के डर से नरहरपुर कें आश्रम की आदिवासी मासूमों के बलात्कार की घटना पर लीपापोती करना शर्मनाक नहीं तो और क्या है। एक बात राजनेता जान लें कि लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला सर्वोपरि होता है और हर बात हद में रहे तभी बेहतर है। अति सर्वत्र वर्जयेत।

बुधवार, 23 जनवरी 2013

सरकार ला झन कोसव...


आजकल जेती देखबे तेती एकेच ठन गोठ चलते हे। जगा जगा जनाकारी होवत हे। नान नान लईका मन ल घलो पापी मन नई छोड़त हे अऊ सरकार ह एमन ल फ़ांसी म चढातीस त बचाए म लगे हे। अऊ घटना के विरोध करईया मन ल मंत्री मन ह कुकुर कहत हे त घटना के साथ देवइया मन ल गोद मा बइठावत हे।
तभे त श्यामलाल ह कहत रीहिस घोर कलजुग आ गे हे बाबू, देख ताक के रहीबे। ते हा अब्बर गुस्सेलहा हस्। ईमान धरम ल गठिया के राख ले। ए मन त राम ल धोखा देवईया हे त तोला कब धोखा दीही तेन ला पार नई पाबे। अब्बर हिन्दू हिन्दू कहात रेहेस। लुटेरा निकल गेस। बांधा तरीया खेत खार दैइहान-गोठान कुछु नई बांचे हे।
सरकार के काम जनता के सेवा करना हे फ़ेर इंहा त धंधा करे लग गे हे। धरम-करम के त ठीकाना नई हे। धर परिवार ह त संभले नई संभलत हे त राज का संभाले सकही। तैं बुजा हिन्दु-हिन्दु करत मरत रहिथस। आदिवासी मन ह हिन्दु नो हे के सतनामी मन ह हिन्दु नो हे। सबके बारा ल बजा दे हे।
आजकल सियनहा मन के इहीच गोठ हे। ऊंखर मन तीरन कुछ कामेच नइ हे। कुछु लफड़़ा होईस सरकार के हाथ धो के पीछू पड़ जथे। कहे रहेवं न। देख वइसनेच होईस्। बताए रहेव न एमन ह खाली पइसा कमाए मा लगे हे।
अब सिअनहा मन ल कोन समझा के आश्रम म आदिवासी लइका मन संग जेन काम होए हे ओमा सरकार के कोनो गलती नइए। अब जनकारी सामने आए हे त कानून ह अपन काम करबेच करही। अउ आजकल मीडिया घलो ह तील के ताड़ बनाथे तेखर सेती त लईका मन ल लुकाए जात हे। अरे भई तुरते तुरत थोड़े फ़ांसी मा चढा दीही, लेकिन कोनो समझबे नई करय।
सियनहा मन ल त बस सरकार ल कोसे के बहाना चाही अतेक बर राज हे हर जगह किसिम किसिम के अपराध होवत हे। जम्मो डहार देखे ल पड़थे। फ़ेर घर परिवार कोती घलो त देखे ल पड़थे। फ़ेर घर परिवार कोती घलो त देखे ल पड़थे। कुछ कांही होत फ़ेर इहीच मन ह कही, ए दे घर ल नई संभाल सकत हे, अउ राज ल संभाले ल चले हे।   

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

हद हो गई...


छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सुनील कुमार को न केवल हाईकोर्ट में अपनी आमद देनी पड़ी बल्कि लिखित में यह कहना पड़ा कि आईंदा ऐसा नहीं होगा। हाईकोर्ट ने प्रदेश के गृह सचिव तक को नोटिस दिया है। एस पी कलेक्टर आए दिन हाईकोर्ट तलब किए जा रहे हैं और सरकार अफ़सरों की करतूतों पर परदा डाल रही है।
कोयले की कालिख के साथ कंठ तक भ्रष्टाचार में डुबी सरकार से बहुत Óयादा उम्मीद तो बेमानी है लेकिन सरकार की  करतूतों की सजा कोई कोई दूसरा क्यों भुगते। सरकार की इसी करतूत का फ़ायदा अधिकारी उठा रहे हैं। बेलगाम नौकरशाहों की मनमानी से आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। लेकिन सरकार को इसकी जरा भी परवाह हो ऐसा आचरण में नहीं दिखता।
वैसे तो रमन सरकार में अफ़सरशाही और प्रशासनिक आतंक की कहानी नई नहीं है एवं प्रशासनिक आतंक जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले विपक्षी कांग्रेसी नहीं उनकी ही पार्टी के नेता दिलीप सिंह जूदेव हैं। प्रशासनिक आतंक की हालत यह है कि गिनती के 4 अफ़सर पूरे प्रदेश को संभाल रहे हैं और उनके आगे न मंत्रियों की चलती है और न ही किसी और की चलती है।
प्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं होगा जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फ़ल-फ़ूल रहे हैं। सरकारी खजानों पर तो डकैती डाली जा रही है। ईमानदार अफ़सरों को इतना प्रताडि़त किया जा रहा है कि वे आत्महत्या करने तक मजबूर हो रहे हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को मलाईदार पदों पर ही नहीं बिठाया जा रहा बल्कि उन्हे रिटायरमेंट के बाद भी संविदा में रखा जा रहा है। पदोन्नति से लेकर तबादले में ईमानदार अफ़सरों की उपेक्षा की जा रही है और सरकार के मंत्रियों के पास पहुंचने वाली ऐसी शिकायतें रद्दी की टोकरी में फ़ेंकी जा रही हैं। यही वजह है कि अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ हाईकोर्ट में दस्तक दी जा रही है। अगर सरकार ही न्याय करे तो लोग कोर्ट क्यों जाएगें।
विधानसभा हो या मंत्रालय, कलेक्टरेट हो या पुलिस मुख्यालय सब जगह अफ़सरों की मनमानी से आम जनता त्रस्त है। अब तो अफ़सरों की अय्याशी का मामला इतना बढ गया है कि उनके द्वारा निवेशकों को लुभाने के नाम पर अश्लील नाच का आयोजन भी किया जाने लगा है। करीना कपूर हो या मैनपाट कार्निवल की रशियन बालाएं सब अफ़सरों की करतूतों की कहानी है जिस पर सरकार की पूरी स्वीकृति है।
प्रदेश में बैठी भाजपा सरकार को अपनी जिम्मेदारी का कितना अहसास है यह तो वही जाने लेकिन संविधानिक व्यवस्था में अफ़सरों से काम लेना सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में  सरकार इसलिए बिठाई जाती है ताकि सरकारी खजाने का सही और जनहित में उपयोग हो। बेहतर सरकार वही मानी जाती है जहां अफ़सर बेलगाम न हो और लोगों की समस्यायो का निपटारा न्यायालय जाने से पहले हो जाए।
लेकिन जब सरकार पर ही कालिख पूती हो, सरकार के ही मंत्रियों की करतूतों पर सवाल उठ रहे हों और खुद मंत्री की भूख सिफऱ् पैसा कमाने की हो तो अफ़सरों की स्वे'छाचारिता को कैसे रोका जा सकता है। गंभीर अपराधों के बाद भी यदि कई अफ़सर महत्वपूर्ण मलाईदार पदों पर बैठे हैं तो इसकी प्रमुख वजह रमन सरकार और उसके मंत्री हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत विधायिका होती है और उसकी जिम्मेदारी सिफऱ् सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना या अपने हितों में फ़ैसला लेना बस नहीं है। बल्कि जनता के हित और चोरों को सजा मिले यह भी जिम्मेदारी है। लेकिन जिस तरह से उजार हुए भ्रष्टाचार के मामले में लीपापोती हो रही है वह उचित नहीं है। केवल बदनामी के डर से नरहरपुर कें आश्रम की आदिवासी मासूमों के बलात्कार की घटना पर लीपापोती करना शर्मनाक नहीं तो और क्या है। एक बात राजनेता जान लें कि लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला सर्वोपरि होता है और हर बात हद में रहे तभी बेहतर है। अति सर्वत्र वर्जयेत।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

बस्तर फतह के लिए भाजपाई तिकड़म शुरू !


मसीही समाज पर दर्जन भर हमले ! राÓयपाल को ज्ञापन !
वैसे तो हिन्दुत्व का मुद्दा गरम कर चुनाव जीतने का भाजपा का पुराना शगल है । चुनाव जीतने के बलए वह कभी राम का सहारा लेती है तो कभी साम्प्रदायिकता की रोटी सेकती है । चूंकि पिछले दो बार से बस्तर फतह की वजह से ही सरकार बनी है इसलिए इस बार बस्तर फतह के लिए कई रणनीतियों में से एक धर्मान्तरण को भी मुद्दा बनाया जा रहा है ।
 इस रणनीति की वजह से ही बस्तर में हिन्दू व इसाई संगठन आमने सामने है । शासन के दबाव में प्रशासनिक करतूत से नाराज इसाई समुदाय ने हिन्दु संगठनों के अत्याचार के खिलाफ राÓयपाल को ज्ञापन सौंप सुरक्षा की मांग की है । छत्तीसगढ़ में बैठी रमन सरकार हैट्रिक के लिए साम दंड भेद सभी का सहारा लेने लगी है । चूंकि पिछले दो चुनाव में बस्तर से मिली ।।
सीटों की बदौलत ही वह सरकार में है इसलिए वह इस बार फिर बस्तर फतह की योजना बना रही है ।
सूत्रों की माने तो राजधानी में आदिवासियों पर हुए पुलिसिया लाटी चार्ज और कथित फर्जी मुठभेड़ के अलावा दबंग नेता बलिराम कश्यप के निधन के बाद भाजपा को बस्तर खोने का डर लगने लगा है । यही वजह है कि बस्तर फतह के लिए धर्मान्तरण व हिन्दुत्व के मुद्दे को जमकर उछाला जा रहा है । और प्रशासन भी तमाशाबीन बनी हुई है । मसीही समाज ने इस संबंध में राÓयपाल को ज्ञापन सौपंकर जान माल की सुरक्षा की मांग करते हुए रमन सरकार पर गंभीर आरोप लगाये हैं । राÓयपाल को सौपे ज्ञापन में हिन्दु संगठनों के द्वारा पिछले एक डेढ़ माह में मसीही समाज पर किये अत्याचार का विवरण हेते हुए प्रशासन पर राजनैतिक दबाव में कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई है ।
राÓयपाल को सौपें ज्ञापन में मसीही महासंघ के अध्यक्ष शैलेन्द्र साह मनीष एण्ड्रूस व नवनीत चांद के कहा कि बस्तर मसीही समाज आपसे मसीही समाज पर हो रहे अत्याचारों के लिए सहयोगात्मक नजरयिे से मदद की उम्मीद व आशा करता है और आपको यह बताना चाहता है कि बस्तर में मसीही समाज के साथ सरकार के नुमाइंदे विश्व हिन्दु परिषद, आर.एस.एस. व बजरंग दल द्वारा प्रताडऩाए व अत्याचार लगातार किया जा रहा है जिससे मसीही समाज बहुत ही आक्रोशित है । आपको हमारी आवाज बनने के लिए इन घटनाओं का विवरण प्रेषित है :-
1.     माह जून 2012 में ग्राम-जाटम, ब्लॉक-जगदलपुर मसीही समुदाय द्वारा निजी जमीन कब्रिस्तान हेतु क्रय की गई है, जिसमें शासन द्वारा बाउण्ड्रीवाल हेतु राशि 20 लाख 40 हजार स्वीकृत किया गया वे ठेकेदार द्वारा कार्य प्रारंभ किये जाने पर विश्व हिन्दु परिषद द्वारा हंगामा मचाया गया । बाउण्ड्रीवाल को तोड़ा गया व गॉव में इसे ना बनने की नसीहत दी गई, जिसके रिपोर्ट मसीही द्वारा परपा थाने में दर्ज है, जिस पर कार्यवाही अब तक लंबित है ।
2.     दिनांक 29/09/2012 स्थान किंजोली गॉव, ब्लॉक बकावण्ड में घटना मसीही समुदाय द्वारा धार्मिक पत्रिका का वितरण उपरांत बजरंग दल व विश्व परिषद द्वारा प्रार्थियों के साथ जमकर मारपीट कर थाना कोतवाली में धारा 151 के तहत 07 मसीही लोगो को गिरफ्तार करवाना ।
&.     दिनांक &0/11/2012 स्थान जगदलपुर प्रेस क्लब - विश्व हिन्दु परिषद द्वारा पत्रकार वार्ता कर सार्वजनिक तौर पर मसीही समाज पर राÓयद्रोह का आरोप लगाकर शासन द्वारा मसीही समाज पर कार्यवाही की मांग करना ।
4.     दिनांक 01/12/2012 मसीही समाज के प्रतिनिधियों द्वारा इन विषयों को लेकर जिला अधीक्षक व जिला पुलिस अधीक्षक से वार्ता कर ज्ञापन सौंपा गया । जिस पर कार्यवाही अब भी लंबित है । कारण राजनैतिक दबाव ।
5.     दिनांक 05/12/2012 स्थान एच.पी.गैस एजेन्सी धरमपुरा जगदलपुर - पास्टर ईसहाक दास द्वारा धार्मिक पत्रिका का वितरण करने पर विश्व हिन्दु परिषद द्वारा सार्वजानिक तौर पर मारपीट कर बोधघाट थाने में केस दर्ज करवाना ।
6.     दिनांक 06/12/2012 स्थान जगदलपुर - विश्व हिन्दु परिषद द्वारा संवेदनशील दिनांक में शौर्य दिवस के नाम पर शहर में सार्वजनिक तौर पर जंगी रैली निकालकर मसीही समाज के ऊपर अशोभनीय नारेबाजी कर (चर्च चलाने वालो को जूता मारो सालो को, ईसाईयों को भगाओ देश को बचाओ) जैसे नारेबाजी कर मसीही समजा के राष्ट्रीय प्रेम एवं राष्ट्रीयता पर सवाल उठाना ।
7.     दिनांक 07/12/2012 मसीही समाज के प्रतिनिधियों द्वारा आपत्ति दर्ज कर जिला अधीक्षक व जिला पुलिस अघीक्षक को ज्ञापन देकर ऐसे माहौल से मुकातिफ कराया गया, व कार्यवाही की मांग की गई जो अब तक लंबित है । कारण राजनैतिक दवाब ।
8.     दिनांक 2&/12/2012 ग्राम आसना, ब्लॉक जगदलपुर - घटना विश्व हिन्दु परिषद द्वारा ग्राम पंचायत आसना में सार्वजनिक तौर पर माइक्रोफोन का उपयोग कर सभी मसीही समाज के अनुयायियों को ग्राम पंचायत व पंचायती सुविधाओं से बहिष्कृत करने का ऐलान कर फतवा जारी किया गया । जिसकी जानकारी तत्काल जिला अधीक्षक व जिला पुलिस अधीक्षक को मसीही समाज के प्रतिनिधियों द्वारा दी गई, जिस पर कार्यवाही अब तब लंबित है । कारण राजनैतिक दवाब ।
9.     दिनांक 02/01/201& स्थान साडग़ुड़, थाना-परपा (जगदलपुर) - घटना साडग़ुड़ में चर्च चलाने को लेकर पास्टर कमल कश्यप, दलसाय एवं उनके सार्थियों के साथ विश्व हिन्दु परिषद द्वारा मारपीट कर गौ हत्या का झूठा आरोप लगाकर प्रताडऩा देना ।
10.     दिनांक 05/01/201& स्थान जगदलपुर - विश्व हिन्दु परिषद द्वारा पत्रकार वार्ता कर हाटकचोरा (जगदलुर) के मसीही कब्रिस्तान को क्षतिग्रस्त करने का सार्वजनिक तौर पर ऐलान करना व कानून व्यवस्था को प्रशासन क ेना मानने पर अपने हाथ में ेने की धमकी देना ।
नोट:-     सभी समाचार पत्रों में         प्रकाशित ।
11.     दिनांक 08/01/201& स्थान हाटकचोरा (जगदलपुर) मसीही कब्रिस्तान घटना - विश्व हिन्दु परिषद व जगदलपुर नगर निगम महापौर, नगर निगम अध्यक्ष, नगर निगम आयुक्त द्वारा बिना कोई सूचना दिये व जिला अधीक्षक के बिना सहहमति लिए समाज को अंधेरे में रख हाटकचोरा मसीही कब्रिस्तान के दीवारो को जेसीबी उपयोग कर तोडऩा व कब्रों को क्षतिग्रस्त कर विश्व हिन्दु परिषद द्वारा मसीही समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ कर समाज के पवित्र कब्र पर नाचकर अश£ील नारेबाजी करना व वहॉ पर उपस्थित मसीही समाज के सम्माननीय पास्टरों के साथ अभद्र व्यवहार कर मारने की धमकी देना ।
12.     दिनांक 08/01/201& स्थान जगदलपुर बोधघाट थाना - हाटकचोरा के कब्रिस्तान को क्षतिग्रस्त करने के बाद मसीही समाज के द्वारा आरोपियों के खिलाफ एफ.आई.आर. करने के लिए 08 घण्टे तक मशक्कत करना व राजनैतिक दवाब के कारण पुलिस प्रशासन का मसीही समाज के साथ अभद्र व्यवहार कर आरोपियों के खिलाफ सामान्य धारा लगाना, पुलिलस प्रशासन द्वारा पक्षपातपूर्ण रवैया दर्शाता है ।
1&.     भारतीय जनता पार्टी नगर मण्डल जगदलपुर हके पदाधिकारियों कद्वारा मसीही समाज पर हो रहे अत्याचार के विरूद्ध समाज द्वारा आवाज उठाये जाने पर मसीही समाज द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों के मान्यताओं को रद्द करने व माम्प्रदायिकता फैलाने का झूठा आरोप गढ़ शासन से कार्यवाही की मांग की गई है ।
14.     मसीही समाज को आशंका है कि उनके कानूनी अधिकारों का उल्लंघन फिरन से किया जा सकता है । मसीही समाज के पदाधिकारियों पर गलत तरीके से कानूनी प्रकरणों का इस्तेमाल कर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है और उन पर जानलेवा हमला होने की भी आशंका है । इन पदाधिकारियों के नाम निम्नलिखित है :-
    1.     रेव्ह.अनीष एण्ड्रस (जिला अधीक्षक, मेथोडिस्ट         चर्च बस्तर जिला)
    2.     श्री शैलेन्द्र शाह (अध्यक्ष, बस्तर मसीही                 महासंघ)
    &.     श्री नवनीत चॉद  (सचिव, बस्तर मसीही                 महासंघ)
    4.     रेव्ह.राकेश दास (सलाहकार, बस्तर मसीही             महासंघ)
    5.     रेव्ह.जॉन डेनियल (अध्यक्ष, इंटर डिनामिनेशन             चर्च फेलोशीप)
    6.     रेव्ह.राजेश हाबिल (पास्टर ए.जी. चर्च)
     7.     रेव्ह.जीजी पॉल (पास्टर आई. पी.सी.चर्च)            8.     रेव्ह.अर्नेस्ट अब्राहम (पास्टर कर्मेल चर्च)
    9.     श्री मुन्ना पॉल  (अध्यक्ष, यूनाईटेड क्रिश्चयन             कब्रिस्तान कमेटी)
अत: महोदय आपसे मसीही समाज का विनम्र निवेदन है कि आप इन अत्याचारी घटनाओं को बड़ी गंभीरता से लेते हुए आप व आपकी पार्टी के जनप्रतिनिधियों के माध्यम से राÓय सभा व विधान सभा में मसीही समाज की तरफ से आवाज बन अपराधियों के विरूद्ध सक्त से सक्त कार्यवाही करवा कर समाज को न्याय दिलाये व हमारे सम्मान की पहचान बन हमारी राष्ट्रीयता की पहचान सरकार को समझाए ।

शराब से लेकर सट्टा का जोर...


नगर निगम मुख्यालय में न तो शराबखोरी नई बात है और न ही जुआं सट्टा । हर अधिकारी को मालूम है कि बेसमेंट से लेकर छत तक शराबियों के अपने-अपने अड्डे हैं । ऐसे में कमिश्रर को इसकी जानकारी नहीं है या महापौर को इसकी खबर नहीं होगी कहना कठिन है । यह तो सीए बंगाली के लोगो ने महिला कर्मचारी से बदसलूकी नहीं की होती तो कोई इसे संज्ञान में ही नहीं लेता । आखिर आडिर के काम में शराब और बिरयानी परोसे जाने का कतलब ही साफ है कि यहां के कई अधिकारी अपने काले-पीले कारनामें को सफेद करने में लगे है । हर विभाग में यही हो रहा है । पिछले महापौर के कार्यकल के दौरान भी हंगामा हुआ था लेकिन मामला दबा दिया गया ।
नगर निगम भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है जहां कई पार्षदों से लेकर अधिकारियों की शामें शराबखोरी में रंगीन होती है । और यह सब इतने खुलेआम चलता है कि इसकी गूंज सड़कों तक सुनाई देती है ।
निगम मुख्यालय हो या जोन यहां तक कि निगम के स्कूलों का भी यही हाल है । छूट्टी होने के पहले ही इंतजाम अली पहुंच जाते है और फिर इससे महफूज जगह भी क्या होगी । दावा तो इस बात का भी हो रहा हे कि यहां के कई कर्मचारी खुले आम सट्टा खेलते हैं और यदि परीक्षा दे रहे ब"ाों की तरह यहां के कर्मचारियों की जेबों की जांच हुई तो बोरी भर सट्टा पट्टी जब्त हो सकता है । नगर निगम के कर्मचारियों की ताकत का अंदाजा यहां के अधिकारियों को भी हे इसलिए यहां अकास्मिक निरीक्षण जैसी बात ही नहीं होती । जनप्रतिनिधि भी इन कर्मचारियों के साथ खड़े होते हैं ऐसे में यदि दिन में भी यहां शराब पीकर काम करते कोई कर्मचारी दिख जाये तब भी कार्रवाई नहीं होती ।
महापौर किरणमयी नायक ने तो शराब-बिरयानी कांड के बाद सारा ठीकरा कमिश्रर के सिर फोड़ दिया । उन्होंने कह दिया कि यदि कमिश्रर लगातार मानिटरिंग करते रहते तो यह घटना नहीं होती केवल आदेश निकालने से कुछ नहीं होता । लेकिन सवाल यह भी है कि नौकरशाह पर नकेल कसने की जिम्मेदारी शहर की जनता के महापौर को दिया है वे क्यों सश्प्राईज चैकिंग क्यों नहीं करती ।
आम आदमी निगम से कितना त्रस्त है यह किसी से छिपा नहीं है । सफाई कर्मी तक शराब के नशे में सुबह-सुबह दिख जाते हैं । मुख्यालय या जोन पहुंचने वालों को खासकर महिलाओं को कितनी दिक्कत होती है यह भी किसी से नहीं छिपा नहीं है ।
स्वे'छा चारिता की हदें पार हो चुकी है और पार्षदों का काम ही दूसरा हो चुका है । कई पार्षद तो अपने वार्डो को सुधारने की बजाय कमाई में Óयादा ध्यान है । ठेकेदारों से काम कराने की बजाय कमिशन का खेल चल रहा है । और जब जनप्रतिनिधि ही कमिशन खोरी में लग जाये तो कर्मचारियों की स्वे'छाचारिता तो बढ़ेगी ही ।
मूंदी
मुंदी आंख से
शहर के चचिते अवैध निर्माण से चंदा वसूलने गये एक पार्षद को जैसे ही पता चला कि उनके नाम का पैसा कोई ले गया है तो वह पहले तो आग बगुला हो गया लेकिन पैसा ले जाये वाले का नाम सुनते ही गिड़गिड़ाने लगा कि आप कुछ न कहना मैं ही बात कर लुंगा ।

रविवार, 20 जनवरी 2013

थाने से लेकर सड़क तक दुव्र्यवहार ...


छत्तीसगढ़ पुलिस के द्वारा आम लोगों से दुव्र्यहार की कोशिश सिर्फ थाने तक ही सीमित नहीं है वह सड़कों परभी बड़े ही अभद्र ढंग े पेश आती है । जनता से व्यवहार सुधारने के लिए अफसरों ने भाषण दिया अैर पुलिस को गुस्सा आ जाता है । आखिर वे गाली गलौज न करे तो फिर पुलिस से कौन डरेगा । और पुलिस से लोग डरेंगे नहीं तो फिर वर्दी पहनने का मतलब ही क्या रह गया है ।
सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने निकले पुलिस वालों को तो अपने प्रदर्शन का बहाना चाहिए जब कानून का रखवाला ही कानून तोड़े तो तमाश देखने के अलावा क्या बचता है ।
हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह के नाम पर पुलिस का प्रदर्शन से सरकार को भी मतलब नहीं रह गया है । सुरक्षा सप्ताह क ेनाम पर सड़कों को घेर कर पंडाल लगाना और फिर यातायात के नियमों का बोर्ड लगाकर वसूली करना तो अब शगल बन चुका है । इस बार तो सुरक्षा सप्ताह के नाम पर लगाये गये पंडालों में फिल्मी गीत भी खूब बजाये गए । बस स्टैण्ड के पास लगे पंडाल में बज रहे फिल्मी धुन पर जब एक शराबी थिरकने लगा तो पुलिस वाले भी मजा लेने लगे ।
आखिर मजा लेने के लिए ही तो फिल्मी गीत बजाये जा रहे थे । अब लोग पुलिस पर हंसे या न हंसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वैसे भी पुलिस वाले जानते है कि उनकी छवि आम लोगों में इ तरह बैठ गई है कि लोग तो उन पर हंसेगे ही तब क्यों न हंसने वाला काम ही कर लिया जाए ।
और यातायात सुधार सप्ताह तो हर साल आता ही है । फिर लोगों को भी मालूम है कि सप्ताह भर में कोई सुधर नहीं सकता ह। जब खुद नहीं सुधर पा रहे हैं तो लोगों को उम्मीद करना ही बेमानी है ।
पुलिस जानती है कि यह चुनावी साल है और चुनावी में सरकार उनसे क्या चाहती है इसलिए सरकार के हिसाब से चलना है यानी सांप भी मर जाए और लाटी भी न टूटे । यही वजह है कि अपराधियों को पकड़ कर कौन मंत्रियों से पंगा ले । तभी तो डॉ. बाढिया हो या मन्नू नत्थानी सभ्ी मजे से शहर में घूम रहे हैं । जनता को बरडालाने संपत्ति $फुर्क करने की हवा फैलाते रहो । करना कुछ नहीं है ।
Óयादा हल्ला मचे तो पुलिस बल की कमी का रोना रो दो । वैसे भ पुलिस को बचाने का काम सरकार का हो गया है । तभी तो बढ़ते अपराध पर नेता ही कह देते हैं कि राजधानी में अपराध तो बढेंग़े ही । आखिर थानों में पोस्टिंग वैसे ही नहीं होती है । बगैर पैसों का कुछ नहीं होता ।
तभी तो थाने में बढ़ते दुव्र्यवहार पर कोईवाई नहीं होती । हर थानेदार अपनी मर्जी का मालिक हो गया है । चाहा तो रिपोर्ट लिखेंगे और रिपोर्ट लिखेंगे तो अपनी मनमर्जी का धारा लगाते रहेंगे ।
अब पीडि़त बोलता रहे उनके साथ लूट हुई है मोवा थाने में चोरी ही लिखी जायेगी आप अफसरों के चक्कर लगाते थक कर चुप बैठ ही जाओंगे ।
चलते-चलते
पुलिस ने जमीन विवाद को निपटाने अलग सेल बना रखा है । सेल में बैठे लोग आने वाली शिकायतों के लिए मेहनत भी कर रहे है लेकिन अस्सी फीसदी मामले में कार्रवाई करने से उनके हाथ पांव फूलने लगते हैं । अब तो वे सत्ता बदलने की राह ताक रहे हैं ताकि कार्रवाई में अडग़ा डालने वाले मंत्री के परिवार को मजा चखा सकें ।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

आखिर इलेक्ट्रानिक वाले अलग हो ही गये ...


यह तो होना ही था । आखिर ग्लैमर से भरे इलेक्ट्रानिक मीडिया कब तक प्रिंट मीडिया के दबदबे पर चुप रहती । इलेक्ट्रानिक मीडिया इस बात पर लंबे समय से नाराज थे कि आजकल हर नेता - अधिकारी इलेक्ट्रानिक मीडिया के ग्लैमर के आगे नतमस्तक है तब भला प्रेस क्लब में पिं्रट मीडिया का दबदबा क्यों नहीं है ।
दरअसल प्रेस क्लब को प्रिंट मीडिा के वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने खूब पसीना से सींचा है और सीनियरों की मेहहनत की वजह से ही रायपुर प्रेस क्लब का नाम सम्मान से लिया जाता है । ऐसे में प्रेस क्लब की गरिमा बनाये रखने की जिम्मेदारी भी कम नहीं है ।
ऐसा नहीं है कि प्रेस क्लब को तोडऩे की यह पहली कोशिश है पहले भी ऐसी कोशिश होते रही है लेकिन वरिष्ठों की प्रभावी भूमिका से तोडऩे का मसूंबा कभी पूरा नहीं हुआ ।
पुसदकर नेतागिरी की ओर
प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने पत्रकारिता छोड़ दिया है या नहीं यह तो तय नहीं है लेकिन इन दिनों बे फिरसे राजनीति करने लगे है और केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी के रायपुर का मीडिय़ा संभाल रहे हैं । यानी लड़ाई चालू आहे ।
सिमटती दूनिया-छिटकती खबरें...
कांकेर जिले के नइहरपुर ब्लॉक के आदिवासी कन्या आश्रम में हुई बलात्कार ने समूचे छत्तीसगढ़ को झकझोर कर रख दिया । घटना के विरोध में चप्पा-चप्पा बंद रहा । पर इतनी बड़ी खबर का नेशनल मीडिया में स्थान हैरान कर देने वाला है ।
नेशनल मीडिया की इस तरह की भूमिका को लेकर कमोबेश सभी राÓयों में जनमानस में नाराजगी है । काहे का नेशनल ! दिल्ली में बैठने भर से कोई नेशनल मीडिया बन जाता है ? ऐसे कितने ही आक्रोश के स्वर सुनाई पड़ते हैं ।
दरअसल संचार क्रांति के इस दौर में जैसे-जैसे दुनिया मोबाईल और इंटरनेट में सिमटती जा रही है । वैसे-वैसे खबरों की जानकारी बढ़ते जा रही है । ऐसे में समाचार पत्र या खबरिया चैनल की भूमिका भी बदली है । और व्यापार बाद हावी हुआ है । और जब व्यापार की सोच के साथ खबरें परोसी जाती है तब उन खबरों को ही प्राथमिकता दी जाती है जहां से विज्ञापन अधिक मिलते है या जहां प्रसार अधिक होता है ।
नेशनल ही नहीं राÓयों की राजधानी में बैठे मीडिया का भी यही रवैया है । खबरों की अधिकता और जगह की कमी की वजह के अलावा व्यापारिक फायदे ने कई बार खबरों के साथ अन्याय तो किया ही है पाठकों की सोच को भी बदला है । जब पूरे मामले का दारोमदार वे राÓय सरकार के ऊपर छोड़ते है तो खुद क्षमा क्यों मांगते हैं और अगर वे यह साफ करने की कोशिश करते हे कि उन्हौंने माननीय आधार पर क्षमा मांगा है तो क्या मानवीय आधार का क्षेत्रफल उनके क्षमा मांगने तक विस्तारित है, या सिमित है ? बात यह भी है कि अगर वे मान लेते है कि इस आरपी एफ कार्यवाही दौरान निर्दोष मारे गए है तो क्या देश गृहमंत्री के पद पर सुशोशित चिदंबरम द्वारा एक भी निर्दोष के मौत बाद केवल क्षमा मांग लेना भी उचित प्रतीत होता है ? देखा जाए तो अपने तरह का यह पहला मामला है जब किसी निर्दोष सोचना है कि काश इस मुद्धे पर चिदंबरम खामोश ही रहते तो कितना अ'छा होता, पर चिदंबरम भी क्या करें ना बोले तो क्यूं और अब बोल दिए तो क्यों ?
दरअसल उक्त विषय में जाग्रत पार्टी के लामबंदी बाद चिदंबरम ने कहा है कि अगर इसमें निर्दोष लोग मारे गए है तो वह इसके लिए मानवीय आधार पर क्षमा मांगते है ! उन्हौंने यह भी कहा है कि कानून व्यवस्था राÓय का विषय है यह भी कहते है कि इस पर अन्तिम फैसला लेने का हक सरकार का है सवाल यह है कि राÓयों की बड़ी खबरों को लेकर आम पाठकों का नेशनल मीडिया के प्रति जो सोच है । कमाबेश वही सोच राÓयों की राजधानी की मीडिया के प्रति ब्लाक या जिला के पाठकों का है ।
यही वजह है कि नेशलन मीडिया पर राÓयों की राजधानी की मीडिया के प्रति लोगों का आक्रोश बढ़ा है । हालांकि यह भी सच है कि कई बार बड़ी खबरों की जानबुझकर उपेक्षा की जाती है ।
और अंत में ...
सूचना के अधिकार के तहत जूटाये गए साक्ष्य पर जब एक पत्रकार ने खबर बनाने की सोची तो अखबार के संपादक ने अपने स्लोगन सुनाते हुए पत्रकार को ही फटकार लगा दी । यानी स्लोगन में मित्र यूं ही नहीं है ।