गुरुवार, 31 जनवरी 2013

कड़वा सच


छत्तीसगढ़ के विकास का दावा करने वाली सरकार इन दिनों रोड़ शो में व्यस्त है। तो विपक्षी कांग्रेस इस रोड़ शो के विरोध में काल झंडा लिए खड़ी है। रोड़ शो का ऐसा विरोध पहले कभी नहीं हुआ और न ही हर रोड़ शो के पहले ऐसी गिरफ़्तारियाँ की गई।
राजनैतिक दांव पेंच में छत्तीसगढ़ के संतुलित विकास की अवधारणा दब गई है। नई राजधानी की चमक जितनी चटक हुई है। गांवों में पसरा सन्नाटा उतना ही गहरा हुआ है। सरकार की इस अजीबो गरीब विकास की अवधारणा से गांव की स्थिति दिल दहला देने वाली है। भारतीय व्यवस्था की रीढ और धान का कटोरा कहलाने वाली छत्तीसगढ़ की कृषि की दुर्दशा खून के आंसू रोने पर मजबूर है। सरकार  की नीति के चलते हजारों एकड़ कृषि भूमि उद्योगों व नई राजधानी तथा विकास की भेंट चढ गयी है
 तो किसानों के लिए यह विकास फ़ांसी का फ़ंदा  बनने लगा है।
रमन सरकार लाख विकास का दावा करे लेकिन सच तो यह है कि कृषि क्षेत्र को नजर अंदाज करने की उसकी नीति ने गांवों की हालत बदतर कर दी है। भले ही आंकड़ों में उत्पादन बढाने की बात हो रही हो लेकिन सच का अंदाजा गांवों की हालत देख कर लगाया जा सकता है। बड़े शहरों में ही तमाम सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। यहां तक की निजि क्षेत्र भी सारी सुविधाएं बड़े शहरों में ही कर रहे हैं और गांवो की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं है। गांवों में रोजगार का संकट खड़ा है।
सरकार को भले ही यह बात कड़वी लगे लेकिन सच तो यह है कि यह सामंतशाही प्रवृत्ति है। एक तरफ़ शहरों में तमाम सुविधाएं हैं तो गांवों में पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और  यहां तक की सड़कें तक ठीक से नहीं है। मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते गांवों को लेकर इस सरकार ने कोई नीति तैयार नहीं की।
सरकर ने जिलों का गठन तो कर दिया लेकिन क्या किसी जिले में मेकाहारा जैसे अस्पताल उसने खोले? या राजधानी रायपुर, बिलासपुर जैसी दूसरी सुविधांए उपलब्ध कराई हैं? नई राजधानी में स्वयं की सुविधाओं के लिए अरबों रुपए फ़ूंकने की योजना बनाने वाली सरकार और बड़े अधिकारियों ने क्या कभी सोचा है कि सभी विकासखंडों में मेकाहारा जैसे सर्व सुविधा युक्त अस्पताल खोला जाए या कालेज खोला जाए जिससे आम लोगों को उसके विकासखंड में उ'च शिक्षा मिल सके। उल्टे सरकार की नीतियों ने सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों को बरबाद करने का काम ही किया है।
रमन सिंह की सरकारी नीति पर गौर करें तो गांवों के लिए उदासी के अलावा कुछ नहीं है। गोदाम एवं कृषि बाजार का पता नहीं है। मोटर पंप के कनेक्शन की जटिलता से किसान परेशान हैं। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर अघोषित रोक लगाई जा चुकी है और लोग पलायन करने को मजबूर हैं।
दरअसल समस्या सरकार की नियत की है। कृषि को लेकर अपनाई जाने वाली अधकचरी नीति के अलावा गांवों में सन्नाटा के लिए सरकार में बैठे मंत्रियों व अफ़सरों की सोच है। क्योंकि ये सभी लोग राजधानी में ही रहना पसंद करते हैं। इसलिए सभी विभागों के कार्यलय राजधानी में ही रखे जाते हैं। जिसकी वजह से सुविधा व रोजगार के लिए लोग शहरों की ओर आ रहे हैं। एक बार विधायक और सांसद बनने वाले जन प्रतिनिधि भी अपने विकासखंडा में सुविधा बढाकर रहने की बजाए वे अपने परिवार को शहरों में ही ले आते हैं जिसकी वजह से गांवों का विकास अवरुद्ध हैं। छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी अधिकांश गांवों के हालातों में कोई बदलाव नहीं आया है।
कुल मिलाकर यह साफ़ है कि नई राजधानी की चमक के बीच से गांवों के सन्नाटे  की ओर जाता रास्ता तमाम दर्द अपने भीतर समेटे हुए है और इसकी परवाह न सरकार को है और नही निजी क्षेत्र के उन लोगों को ही है जो समाज सेवा का लंबा चौड़ा दावा करते नहीं थकते।

बुधवार, 30 जनवरी 2013

बढते अखबार फिऱ भी लाचार


छत्तीसगढ में होने जा रहे इस बार विधानसभा चुनाव की तैयारी  में सिफऱ् राजनैतिक दल ही नहीं मीडिया भी सक्रिय हो गया है। कई अखबार फिऱ से छपने लगे हैं तो हर माह नए नाम से अखबारों का पंजीयन भी होने लगा है। सरकारी विज्ञापन और नेताओं से विज्ञापन के लिए जोड़-तोड़ शुरु हो गई है।
एक आंकड़े के मुताबिक छत्तीसगढ़ में प्रकाशित होने वाले अखबारों की संख्या 2200 से अधिक है। इनमें से कई अखबार तो राष्ट्रीय या धार्मिक त्यौहारों पर ही भरपूर विज्ञापन के साथ प्रकाशित होते हैं।
कभी सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब पेड न्यूज या तोड़-मरोड़ कर खबरें प्रकाशित करने का दौर शुरु हो गया है। यह कहानी सिफऱ् छोटे बैनरों की नहीं है बल्कि बड़े नामचीन बैनरों पर भी कई तरह के आरोप लग रहे हैं। कोई अपने नाम के अनुरुप मित्रता निभा रहा है तो कोइ कोयला खदान के लिए जिद पकड़े हुए है। कहने को तो नए तेवर और नए कलेवर की वकालात हो रही है तो कईयों का काम केवल दलाली करना रह गया है।
सरकार में बैठे लोग भी ऐसे अखबारों को उनकी औकात के अनुरुप रोटी फ़ेंक रहे हैं जबकि कलम की ताकत को नजर अंदाज करते हुए ठकुरसुहाती में लगने वालों की संख्या कम नहीं है।
इलेक्ट्रानिक वालों ने जोर दिखाया
प्रेस क्लब से अलग होकर पृथक संगठन बनाने वालों ने अपनी ताकत दिखानी शुरु कर दी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन के कार्यालय में कैरम लग गया है और इसका उद्घाटन प्रेस क्लब के पूर्व पदाधिकारी और मानद सदस्य आसिफ़ इकबाल ने किया। कभी प्रेस क्लब की गरिमा के लिए लडऩे वाले आसिफ़ इकबाल पृथक बने संगठन में जाना चर्चा का विषय है।
वैसे इलेक्ट्रानिक वालों का दावा है कि अभी और भी कई नामचीन पत्रकार प्रेस क्लब छोडऩे वाले हैं। हालांकि अभी पूरी तरह इलेक्ट्रानिक वाले ही एक नहीं हो पाए हैं। ऐसे में वापसी चर्चा भी कम नहीं है।
और अंत में...
पत्रिका में पहले दिन मौदहापारा पुलिस की पिटाई की खबर छूट जाने की भरपाई दूसरे दिन की गई, लेकिन जनसम्पर्क अधिकारियों ने इस पर खूब चुटकी ली और कहने लगे कि जोश के साथ होश नहीं रखा गया तो खबरें छुटेंगी ही। किसी दिन भद्द भी पिट सकती है।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

नकटा के नाक ...


विधानसभा के चुनई इही साल होही, चुनई ल देख के फ़ेर खादी-भगवा वाले मन ल जनता के फि़कर होगे हे, कोनो रोड़ सो करत हे त कोनो परदरसन करत हे। रो सो हो चाहे परदरसन होय, अवइया जवइया मन के 12 बजत हे। पुलिस ह रद्दा ल घेर देवत हे अउ डंडा ल देखा-देखा के छेंकत हे अउ बपरा जनता ह कले चुप तमासा ल देखे बर मजबूर हे। नेतागिरी जम के होवत हे। हमर सरकार आही त ये करबो वो करबो के गोठ ल सुन डार। जेती देखबे तेती खाली एकेच ठन गोठ हे। कांग्रेसी मन ह 60 साल ले कुछु नइ करीन त भाजपाई मन 9 साल मा सबला बेच के अपन कोठी भरत हे।
जनता ह त रोटी असन होगे हे, कोनो बेलत हे, कोनो सेंकत हे, अउ कोनो खावत हे। जेखर जइसे मन होवत हे तइसे करत हे, फ़ेर जनता ल का मिलय तेखर फि़कर कोनो नई करत हे।
न गाँव म स्कूल हे, न अस्पताल। जिंहा स्कूल हे, तिंहा गुरुजी नई हे। अस्पताल हे त न डाक्टर के पता न दवई के पता हे। पीये के पानी के त नामेच झन ले। अउ नहर नाली के गोठ गोठियाबे त कोनो कारखाना ल लगा के खेतेच ल छीने के उदीम कर दीही। विकास के नाम झन लेबे। & रुपया किलो चांऊर म भुलाय रह। धान के बोनस बर झन कहिबे नही त लाठी बरस जाही। अऊ सरकार ह दस ठन काम गिना दीही के का का करे हन्।
अब ये रमन सरकार ल देख ले। किसान मन ल 270 रुपया बोनस देहे के बात करे रहिस। दिस नइ दिस। अब चार साल म त दिस नइ त आज का दीही। मांग करइया मन ल भितरा दिस। ते धरना परदरसन करत रहा। कुछुच फऱक नइ परय्। बेंझार के फ़ेर चुनई मा वोट ले लीही। गांव गांव म पलायन होतेच हे। काम बुता नइ हे। अऊ काम बुता नई रही त ठलहा मनखे करय काय। तेखर सेती गांव-गांव म दारु बेचइया मन ल ढील दे हे। दारु पी अऊ मस्त राह्। समस्या ल झन गोठिया। नशा म परे रह।
चुनई ल देख के फ़ेर बेंझारे के काम होवत हे। फ़ेर वादा करत हे। सड़क बना देबो, बिजली लगा देबो। अस्पताल-स्कूल खोलवा देबो कहात हे। फ़ेर पहली जेन अस्पताल अऊ स्कूल खुले हे तेन ल सुधरवाय के जांगर नइ चलत हे। राजधानी म नाच गाना देखे बर करोड़ों अरबो ल फ़ूंकत हे अउ गांव म स्कूल खोले बर पइसा नई हे।
छत्तीसगढ़ मा त अतियाचार होगे हे। नेता बनके पद पावत हे, अउ पोठ कमावत हे। गलत सलत काम म फ़ंस जथे तभो लाज नई आवत हे। तभे त गली-गली सब झन गोठियावत हे नकटा के नाक ह दिनो दिन बाढत हे।

रविवार, 27 जनवरी 2013

थानेदारों की करतूतों पर अधिकारी परेशान


यह तो कोइ करे भरे कोई की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना थानेदार की करतूतों पर न लोग न्यायालय जाते और न्यायालय से पुलिस अधिकारियों को नोटिस का सामना करना पड़ता।
छत्तीसगढ़ में थानेदारों की करतूतों के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं और उनकी करतूतों को नजर अंदाज करना भारी पड़ रहा है। थानेदारों की करतूतों से न केवल अपराध बढ़ रहे हैं बल्कि अपराधियों के हौसले भी इतनी बुलंदी पर है कि वे पुलिस वालों पर हमला करने से भी नहीं चूकते। 19 जनवरी की रात मौदहापारा के पुराने हिस्ट्रीशीटर को पकडऩे गए दो-दो थानेदारों की पिटाई हो गई। पुलिस को जैसे-तैसे जान बचाकर भागना पड़ा। यह अलग बात है कि घंटे भर के भीतर ही पूरे मौदहापारा को छावनी बनाकर आरोपियों को पकड़ लिया गया।
वास्तव में इसकी वजह पुलिस की अपनी करतूत है। अपराधियों को मंत्री अपनी गोद में बिठा रहे हों और पुलिस वाले गलबहियां डाल रहे हों तो अपराधी किसी से डरेगा ही क्यों?
अब्दुल अजीम भोंदू जैसे व्यक्ति को भारतीय जनता पार्टी अपनी गोद में बिठाती है तो इससे पार्टी के चरित्र को आसानी से समझा जा सकता है। पूरे प्रदेश में यही हाल है। सत्ताधारियों ने अपराधियों को संरक्षण दे रखा है। उन्हे जनता की प्रतिक्रिया की भी फि़क्र नहीं है। तभी तो एक तरफ़ डॉ रमन सिंह शराब के खिलाफ़ विष वमन करते हैं और दूसरी तरफ़ शराब ठेकेदार के साथ सार्वजनिक रुप से गलबहियां करते नजर आते हैं तब भला थाने के बिकने की चर्चा नहीं होगी तो क्या होगा?
यह सच है कि राजनैतिक दबाव की वजह से अपराधी छुट्टे घूम रहे हैं लेकिन यह भी इतना ही बड़ा सच है कि पैसा देकर थाना हासिल करने वाले थानेदार अपराधियों से ही इसकी भरपाई करते हैं और इन अपराधियों की शिकायत करने वालों पर ही अत्याचार करते हैं। तभी तो थानेदार की मनमानी पर एस पी व गृह सचिव तक चुप रहते हैं। भले ही न्यायालय से उन्हे कितनी भी फ़टकार मिले।
अभनपुर थानेदार की ऐसी ही करतूत की वजह से हाईकोर्ट को गृह सचिव, रायपुर आई जी व एस पी को नोटिस देना पड़ा। थानेदार पर शिकायत कर्ता हेमचंद यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं उनके आरोपों के अनुसार बिरोदा में एक स्टाप डेम की को तोडऩे की शिकायत सीईओ से की गई थी। शिकायत सही पाई गई। सरपंच को इसके लिए दोषी ठहराया गया। सरपंच ने शिकायत कर्ताओं को जान से मारने की धमकी दी तो हेमचंद साहु व अन्य शिकायत कर्ताओं ने थाने में पहुंच कर इसकी जानकारी थानेदार को दी। थानेदार ने हेमचंद की शिकायत पर कार्यवाही करने की बजाए सरपंच को बुलवा लिया और हेमचंद साहु व उनके साथियों के खिलाफ़ ही शांति भंग करने का आरोप लगा कर धारा 107/116 व 151 के तहत गिरफ़्तार कर लिया। यही नहीं जमानत लेने के दौरान अभी पुलिस ने उन्हे अपराधिक प्रवृत्ति का बताते हुए नहीं छोडऩे कहा। इसकी वजह से हेमचंद को तीन दिन जेल में काटने पड़े और जमानत पर रिहा होने के बाद हेमचंद ने अपने साथ हुए अन्याय की जानकारी हाईकोर्ट को दी, जहां हाईकोर्ट ने थानेदार सहित पुलिस अधिकारियों एवं गृह सचिव को नोटिस भेजा है।
यानी पुलिसिया करतूत थमने का नाम नहीं ले रही और अब जब अपराधी पुलिस पर सीधे ही हमला करने की हिम्मत कर रहे हैं। तब बवाल मचा हुआ है।
चलते-चलते
 राÓय मे प्रमोटी आईपीएस और सीधे आईपीएस में मनभेद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। पीएचक्यु से लेकर मैदान में पोस्टिंग तक में प्रमोटी आईपीएस की महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के पहले यह अहसास जरुर दिला दिया जाता है कि तुम्हारी औकात क्या है।

शनिवार, 26 जनवरी 2013

अपराधियों से भी नाता भ्रष्ट बेईमान इन्हे भाता


छत्तीसगढ के रमन राज में न केवल अपराध बढ रहे हैं बल्कि अपराधियों को सत्ता का भरपुर संरक्षण भी मिला है। भ्रष्ट बेईमान नौकरशाह हो या अपराध की दुनिया के बाहुबली सभी इस राÓय में फ़ल फ़ूल रहे हैं। अपराधियों और भ्रष्ट नौकरशाह के चलते आम लोगों का जीना तो दूभर हुआ ही है। राजनैतिक सूचिता की नई परिभाषा भी गढी गई। अपराधिक तत्वों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिस तक उन पर हाथ डालने से कतराती है और जिस पुलिस वाले ने ऐसी हिमाकत की या तो उसे प्रताडि़त किया गया या पिटाई तक हो गयी। शहर की सबसे नामी मस्जिद जामा मस्जिद के मुतव्ल्ली अब्दुल अजीम भोंदू को लेकर जो बवाल मचा है वह रमन राज की कार्यशैली पर तो सवाल उठाता ही है साथ ही सवाल यह भी उठ रहे हैं कि कल तक मुख्यमंत्री से सीधे संबंध रखने वाले शख्स पर हाथ डालने की वजह क्या है।
रमन राज की दूसरी पारी में अपराध एवं भ्रष्टाचार में दुगने से अधिक इजाफ़ा हुआ है तो इसकी वजह सत्ता में बैठी भाजपाईयों की कार्यशैली है। अकेले राजधानी में तीन हजार से उपर फऱार वारंटी घूम रहे हैं तो सैकड़ों की संख्या में भ्रष्ट और बेईमान नौकरशाह सत्ता की नाक के बाल बने हुए हैं। मिलावटखोरी में आरोपी रहे बद्री जैसे लोगों को भाजपा टिकिट देती है तो अब्दुल अजीम भोंदू जैसे बाहुबलियों को गोद में बिठाती है। संसद जैसे पवित्र स्थान में सवाल पूछने के लिए पैसे लेने वाले प्रदीप गाँधी जैसे लोग भाजपा और मुख्यमंत्री के रणनीतिकार बने हुए हैं तो बाबूलाल अग्रवाल जैसे लोग महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं।
सिफऱ् हवाला कांड में नाम आ जाने से संसद से इस्तीफ़ा देकर राजनैतिक सुचिता की परिभाषा गढऩे वाले लालकृष्ण आडवाणी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके जीते जी भाजपा की राजनीति में वे लोग सत्ता में बने या बैठे रह सकते हैं जिन पर कोयले की कालिख से लेकर बांध, नदी एवं तालाब तक बरबाद करने के आरोप लगे हैं।
यह बात कोई नकार नहीं सकता कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता में बैठने की कई वजहों में एक वजह कांग्रेस की कार्यशैली रही है। जहां अपराध से लेकर भ्रष्टाचार को फ़लने फ़ूलने का मौका लगा। लेकिन सत्ता में आते ही जिस तरह से भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को संरक्षण दिया गया वह भाजपा को शर्मशार करने वाला साबित हो रहा है। आरोपों  को बहुमत के दम पर खारिज करने की कांग्रेसी शैली को भाजपा ने भी अपना लिया है और चुनावी चंदे के लिए या चुनावी फ़ायदे के लिए बेईमान और अपराधिक लोगों को खुले आम न केवल संरक्षण दिया गया बल्कि सत्ता से लेकर संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी दी गई।
आंकड़े बताते हैं कि सत्ता में आने से पहले जिन भ्रष्ट अफ़सरों पर उंगली उठाई गई वे आज महत्वपूर्ण पदों पर हैं। जिन अपराधियों पर कार्यवाई नही करने का आरोप लगा वे आज या तो पार्टी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं या इन्हे संरक्षण दिया जा रहा है।
पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार और अपराध के आंकड़ों में जो तेजी आई है वह चौंकाने वाली है और यही हाल रह तो छत्तीसगढ को अपराधगढ़ के रुप में कुख्यात होने में समय नहीं लगेगा।
पुलिस सुत्रों की माने तो पूरे प्रदेश में फऱार आरोपियों की संख्या 15 हजार से उपर है। जिनमें से आधे Óयादा फऱार आरोपियों को राजनैतिक संरक्षण के चलते नहीं पकड़ा जा रहा है। ऐसे लोग न केवल सार्वजनिक सरकारी कार्यक्रमों में उपस्थित रहते हैं बल्कि पुलिस को आँख दिखाने से भी परहेज नहीं करते।
कमोबेश यही हाल भ्रष्ट नौकरशाहों का है। भ्रष्टाचार से लेकर दूसरी अनियमितता करने वाले अधिकारी कर्मचारी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं ऐसे नौकरशाहों की संख्या भी सैकड़ों में है। जिनमें आईएस, आईपीएस से लेकर राÓय प्रशासनिक सेवा के अफ़सर भी शामिल हैं। इंजीनियरों के मामले में तो साफ़ होने लगा है कि जो जितना भ्रष्ट उसे उतने ही महत्वपूर्ण पद से नवाजा जाएगा।
प्रशासनिक सुत्रों का कहना है कि रमन राज में ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया गया है और रिटायरमेंट के बाद उन अधिकारियों को संविदा पर Óयादा रखा गया है जो अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्ट या विवादित माने जाते हैं।
बहरहाल रमन सरकार के भ्रष्टाचार पर सवाल उठने लगे हैं और आने वाले चुनाव में इसके असर से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
रमन राज की दूसरी पारी में अपराध एवं भ्रष्टाचार में दुगने से अधिक इजाफ़ा हुआ है तो इसकी वजह सत्ता में बैठी भाजपाईयों की कार्यशैली है। अकेले राजधानी में तीन हजार से उपर फऱार वारंटी घूम रहे हैं तो सैकड़ों की संख्या में भ्रष्ट और बेईमान नौकरशाह सत्ता की नाक के बाल बने हुए हैं। मिलावटखोरी में आरोपी रहे बद्री जैसे लोगों को भाजपा टिकिट देती है तो अब्दुल अजीम भोंदू जैसे बाहुबलियों को गोद में बिठाती है। संसद जैसे पवित्र स्थान में सवाल पूछने के लिए पैसे लेने वाले प्रदीप गाँधी जैसे लोग भाजपा और मुख्यमंत्री के रणनीतिकार बने हुए हैं तो बाबूलाल अग्रवाल जैसे लोग महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं।
सिफऱ् हवाला कांड में नाम आ जाने से संसद से इस्तीफ़ा देकर राजनैतिक सुचिता की परिभाषा गढऩे वाले लालकृष्ण आडवाणी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके जीते जी भाजपा की राजनीति में वे लोग सत्ता में बने या बैठे रह सकते हैं जिन पर कोयले की कालिख से लेकर बांध, नदी एवं तालाब तक बरबाद करने के आरोप लगे हैं।
यह बात कोई नकार नहीं सकता कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता में बैठने की कई वजहों में एक वजह कांग्रेस की कार्यशैली रही है। जहां अपराध से लेकर भ्रष्टाचार को फ़लने फ़ूलने का मौका लगा। लेकिन सत्ता में आते ही जिस तरह से भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को संरक्षण दिया गया वह भाजपा को शर्मशार करने वाला साबित हो रहा है। आरोपों  को बहुमत के दम पर खारिज करने की कांग्रेसी शैली को भाजपा ने भी अपना लिया है और चुनावी चंदे के लिए या चुनावी फ़ायदे के लिए बेईमान और अपराधिक लोगों को खुले आम न केवल संरक्षण दिया गया बल्कि सत्ता से लेकर संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी दी गई।
आंकड़े बताते हैं कि सत्ता में आने से पहले जिन भ्रष्ट अफ़सरों पर उंगली उठाई गई वे आज महत्वपूर्ण पदों पर हैं। जिन अपराधियों पर कार्यवाई नही करने का आरोप लगा वे आज या तो पार्टी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं या इन्हे संरक्षण दिया जा रहा है।
पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार और अपराध के आंकड़ों में जो तेजी आई है वह चौंकाने वाली है और यही हाल रह तो छत्तीसगढ को अपराधगढ़ के रुप में कुख्यात होने में समय नहीं लगेगा।
पुलिस सुत्रों की माने तो पूरे प्रदेश में फऱार आरोपियों की संख्या 15 हजार से उपर है। जिनमें से आधे Óयादा फऱार आरोपियों को राजनैतिक संरक्षण के चलते नहीं पकड़ा जा रहा है। ऐसे लोग न केवल सार्वजनिक सरकारी कार्यक्रमों में उपस्थित रहते हैं बल्कि पुलिस को आँख दिखाने से भी परहेज नहीं करते।
कमोबेश यही हाल भ्रष्ट नौकरशाहों का है। भ्रष्टाचार से लेकर दूसरी अनियमितता करने वाले अधिकारी कर्मचारी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं ऐसे नौकरशाहों की संख्या भी सैकड़ों में है। जिनमें आईएस, आईपीएस से लेकर राÓय प्रशासनिक सेवा के अफ़सर भी शामिल हैं। इंजीनियरों के मामले में तो साफ़ होने लगा है कि जो जितना भ्रष्ट उसे उतने ही महत्वपूर्ण पद से नवाजा जाएगा।
प्रशासनिक सुत्रों का कहना है कि रमन राज में ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया गया है और रिटायरमेंट के बाद उन अधिकारियों को संविदा पर Óयादा रखा गया है जो अपने कार्यकाल के दौरान भ्रष्ट या विवादित माने जाते हैं। बहरहाल रमन सरकार के भ्रष्टाचार पर सवाल उठने लगे हैं और आने वाले चुनाव में इसके असर से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्निग्धा जैसी सबकी किस्मत नहीं होती...


रमन सरकार ने शायद यह तयही कर लिय अहै कि निजी स्कूल चाहे कितनी भी मनमानी करे उस पर कोई कार्यवाही नहीं होगी और सरकारी स्कूलों का स्तर इतना गिरा दिया जाए कि लोग अपने ब'चों को निजी स्कूलों में पढाने पर मजबूर हो जाएं।
तभी तो सरकारी स्कूलों में समय के अनुरुप न तो अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ही शुरु की जा रही है और न ही शिक्षक रखे जा रहे हैं। न स्कूलों में ढंग से शौचालय बनाए जाते हैं और न ही पीने की पानी की व्यवस्था पर ध्यान दिया जा रहा है ऐसे में लोगों की मजबूरी का फ़ायदा निजी स्कूलों के द्वारा उठाया नहीं जाएगा तो क्या होगा।
छत्तीसगढ में निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर है। मनमाने फ़ीस के अलावा जूता-मोजा, बेल्ट-टाई, कापी-किताब से लेकर लोगों की जेब पर डकैती डालने नए नए तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। लेकिन न तो यह सब अधिकारियों को ही दिख रहा है और न ही जनप्रतिनिधि कहलाने वाले मंत्रियों को ही दिख रहा है। उपर से इन निजी स्कूलों की करतूतों पर लीपा पोती की जा रही है।
सरकार के लिए तो सरकारी स्कूल घाटे का धंधा कहलाने लगा है। उन्हे लगता है कि सरकारी स्कूल को सुधारने में फिज़ूल खर्च है। जबकि उनकी सुविधा बढाने में फिज़ूल खर्ची उन्हे नहीं दिखता। सरकारी खजाने से जनता के लिए खर्च करने में उन्हे तकलीफ़ होती है। पता नहीं यह पैसा उन्की जेब से जाता तो क्या करते।
कहने को तो सरकार का काम जनता का हित देखना है लेकिन सरकार हर काम को धंधे की नजर से देखने लगी है। जबकि हर साल के परीक्षा परिणाम से स्पष्ट है कि निजी स्कूल के ब'चों से Óयादा होशियार अभाव ग्रस्त सरकारी स्कूल में पढ़ रहे ब'चे हैं।
निजी स्कूलों में सुविधाओं के नाम पर खुले आम डकैती की जा रही है। चौतरफ़ा लूट खसोट के अलावा नियम-कानून की धÓिजयाँ उड़ाई जा रही हैं। यदि सरकारी स्कूलों में सरकार नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम शुरु कर दे तो अस्सी फ़ीसदी से अधिक लूटेरे अपने संस्थान बंद कर देगें। ये वे लोग हैं जो शिक्षा के माध्यम से समाज सेवा का दावा तो करते हैं लेकिन सरे आम लोगों की जेबों पर डकैती डाल रहे हैं।
यही वजह है कि निजी स्कूलों में चल रही बसों की हालत बदतर है। लेकिन अधिकारी से लेकर मंत्रियों तक पहुंच रही उपरी कमाई की वजह से ब'चों की ज आन से खिलवाड़ किया जा रहा है।
राजकुमार कालेज की चलती बस से स्निग्धा वर्मा नाम की मासूम ब'ची सड़क पर गिर जाती है और कालेज प्रबंधन से लेकर पूरी सरकार इस मामले पर कार्यवाई करने की बजाए लीपा-पोती में लग जाती है। बस चालक और परिचालक जैसे छोटे कर्मचारियों को गिरफ़्तार कर लिया जाता है लेकिन काले प्रबंधन के खिलाफ़ जुर्म तक दर्ज नहीं किया जाता।
इस मामले में तो सीधे राÓयपाल को हस्तक्षेप करना चाहिए क्योंकि निजी शिक्षण संस्थाओं की मनमानी पर सरकार कुछ नहीं करने वाली। उपर से लेकर नीचे तक के लोगों का मुंह पैसों से भर दिया गया है। वे बोलेगें भी नही और कभी भी कोई और बड़ी घटना हुई तो मासूमों की जान तक जा सकती है। हर कोइ स्निग्धा वर्मा जैसी किस्मत वाली नहीं होती।


हद हो गई...


छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सुनील कुमार को न केवल हाईकोर्ट में अपनी आमद देनी पड़ी बल्कि लिखित में यह कहना पड़ा कि आईंदा ऐसा नहीं होगा। हाईकोर्ट ने प्रदेश के गृह सचिव तक को नोटिस दिया है। एस पी कलेक्टर आए दिन हाईकोर्ट तलब किए जा रहे हैं और सरकार अफ़सरों की करतूतों पर परदा डाल रही है।
कोयले की कालिख के साथ कंठ तक भ्रष्टाचार में डुबी सरकार से बहुत Óयादा उम्मीद तो बेमानी है लेकिन सरकार की  करतूतों की सजा कोई कोई दूसरा क्यों भुगते। सरकार की इसी करतूत का फ़ायदा अधिकारी उठा रहे हैं। बेलगाम नौकरशाहों की मनमानी से आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। लेकिन सरकार को इसकी जरा भी परवाह हो ऐसा आचरण में नहीं दिखता।
वैसे तो रमन सरकार में अफ़सरशाही और प्रशासनिक आतंक की कहानी नई नहीं है एवं प्रशासनिक आतंक जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले विपक्षी कांग्रेसी नहीं उनकी ही पार्टी के नेता दिलीप सिंह जूदेव हैं। प्रशासनिक आतंक की हालत यह है कि गिनती के 4 अफ़सर पूरे प्रदेश को संभाल रहे हैं और उनके आगे न मंत्रियों की चलती है और न ही किसी और की चलती है।

प्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं होगा जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फ़ल-फ़ूल रहे हैं। सरकारी खजानों पर तो डकैती डाली जा रही है। ईमानदार अफ़सरों को इतना प्रताडि़त किया जा रहा है कि वे आत्महत्या करने तक मजबूर हो रहे हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को मलाईदार पदों पर ही नहीं बिठाया जा रहा बल्कि उन्हे रिटायरमेंट के बाद भी संविदा में रखा जा रहा है। पदोन्नति से लेकर तबादले में ईमानदार अफ़सरों की उपेक्षा की जा रही है और सरकार के मंत्रियों के पास पहुंचने वाली ऐसी शिकायतें रद्दी की टोकरी में फ़ेंकी जा रही हैं। यही वजह है कि अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ हाईकोर्ट में दस्तक दी जा रही है। अगर सरकार ही न्याय करे तो लोग कोर्ट क्यों जाएगें।
विधानसभा हो या मंत्रालय, कलेक्टरेट हो या पुलिस मुख्यालय सब जगह अफ़सरों की मनमानी से आम जनता त्रस्त है। अब तो अफ़सरों की अय्याशी का मामला इतना बढ गया है कि उनके द्वारा निवेशकों को लुभाने के नाम पर अश्लील नाच का आयोजन भी किया जाने लगा है। करीना कपूर हो या मैनपाट कार्निवल की रशियन बालाएं सब अफ़सरों की करतूतों की कहानी है जिस पर सरकार की पूरी स्वीकृति है।
प्रदेश में बैठी भाजपा सरकार को अपनी जिम्मेदारी का कितना अहसास है यह तो वही जाने लेकिन संविधानिक व्यवस्था में अफ़सरों से काम लेना सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में  सरकार इसलिए बिठाई जाती है ताकि सरकारी खजाने का सही और जनहित में उपयोग हो। बेहतर सरकार वही मानी जाती है जहां अफ़सर बेलगाम न हो और लोगों की समस्यायो का निपटारा न्यायालय जाने से पहले हो जाए।
लेकिन जब सरकार पर ही कालिख पूती हो, सरकार के ही मंत्रियों की करतूतों पर सवाल उठ रहे हों और खुद मंत्री की भूख सिफऱ् पैसा कमाने की हो तो अफ़सरों की स्वे'छाचारिता को कैसे रोका जा सकता है। गंभीर अपराधों के बाद भी यदि कई अफ़सर महत्वपूर्ण मलाईदार पदों पर बैठे हैं तो इसकी प्रमुख वजह रमन सरकार और उसके मंत्री हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत विधायिका होती है और उसकी जिम्मेदारी सिफऱ् सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना या अपने हितों में फ़ैसला लेना बस नहीं है। बल्कि जनता के हित और चोरों को सजा मिले यह भी जिम्मेदारी है। लेकिन जिस तरह से उजार हुए भ्रष्टाचार के मामले में लीपापोती हो रही है वह उचित नहीं है। केवल बदनामी के डर से नरहरपुर कें आश्रम की आदिवासी मासूमों के बलात्कार की घटना पर लीपापोती करना शर्मनाक नहीं तो और क्या है। एक बात राजनेता जान लें कि लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला सर्वोपरि होता है और हर बात हद में रहे तभी बेहतर है। अति सर्वत्र वर्जयेत।