सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

पेलिहा ले पंगनहा हारय


परन दिन खल्लारी के मड़ई म बिसरु ल भेंट डारेवं। पूछेवं कईसे बिसरु का हाल-चाल हे। धान-वान बने हो ए हे?
अतका ल सुनिस तहां ल बिसरु बईहा होगे। का महाराज आजकल आस जास नहीं। जा के गाँव ल देख धान-पान  ल चाटबो। ग़ांव ह बिगड़त हे। आजकल के नवा-नवा टूरा  मन ह कखरों नई सुनत हे। भ_ी वाला ह गांवएच म दुकान ल खोल दे हे अउ पीए बर थोड़ बहुत मंद-महुआ बनात रहेन तउना म छेका करथे। अऊ नान  नान टूरा मन ह घलो मन्दु होगे हे। चोरी-हारी बाढ़ गे हे। कुछु ल छोड़े नई सकस। ए दे मड़ई आय हावव तेमा मोर धियान घर डहार लगे हे। झिम झाम देखिस तहां ले कुछु ल उठा के लेग जथे। सित बाबा के घंटी घलो  नई बाजिस। मंदिर देवाला म चोरी हारी होवत हे। घोर कलजुग आगे हे। मय ह केहेवं - छोड़ न बिसरु चार दिन जीना हे, काबर टेंसन ले थस। कईसे फि़कर नई करहूं महाराज। गाँव ल बनाए बर का उदीम नई करे हन। डांड़-बोड़ी ले बर अपन-तुपन नई देखेन। अउ आज जेन ल देख तउने ह दूसर के जीनिस ल हड़पे म लगे हे। अनियाव ला कलेचुप देख कथें। कईसे देखबे? तय कुछु काह गा अनियाव होवत नई देखव। मरते मर जहूं महाराज , फ़ेर गलत के बिरोध ल नई  छोड़वं। तय त पतरकार हस्। बने भसेड़ के छपबे तभे सु्धरही।
बिसरु के बात सुन के मय ह दंग रहिगेंव। ए उमर म घलो वो ह नियाव बर सब ले लड़े-भिड़े बर तइयार रथे। अऊ एक झन उही गाँव के राम लाल हे। वोला अपन सुवारथ के आगु कुछु नई दिखय। ते म त भ_ी वाला मन के दू चार सौ रुपया के सेती गाँव म भ_ी वाला मन ल दारु बेचे बर जगह देहे हे। पेलिहा अतका के लउड़ी बेडग़ा धर के भिड़ जथे। तभे त बिसरु ह कहाय वोला सरपंच झन चुनव, वो ह गांव ल बेच दिही। फ़ेर बिसरु जईसे मन के बात ल कोन सुनथे। आज कल त परबुधिया मन के कोनो कमी नईए। दूचार रुपया बर लुहुर-टुपुर करत रथे। छत्तीसगढिय़ा मन के इही परबुधिया होय के सेती त कतकोइन झन मजा उड़ावत हे। अऊ छत्तीसगढिय़ा मन ह दू रुपया किलो के चांऊर मा भुलाए हे। चुनई आथे चेपटी पाथे। तहां ले जम्मो पीरा ल भुला जथे। दूचार बिसरु असन लड़ईया मन के कोनो पुछन्ता नईए। अऊ जादा होईस त कही देथे, एखर त कामेच इही हे। अब सरकार ह काय काय ल देखही। अऊ बिकास करे म दू चार बांध तरिया, गऊठान त पटाबेच करही। उद्योग ह हवा म नई लगय। खेत खार ल बेच दे के हल्ला करईया मन के का हे वो मन त कोइला के कालिखेच देखत रथे। ए नई दिखते हे के सरकार ह कइसे गरीब मन ल चांऊर देवत हे। पढ़ईया टूरी मन ल सइकिल देवत हे। बिसरु असन मन ल त खाली मंत्री विधायक के गाड़ी अऊ खेत खार के खरीदीच ह दिखथे।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

सोए तो मुसीबत और जगे तब भी...


छत्तीसगढ़ पुलिस इन दिनों अजीब दौर से गुजर रही है। यदि वह सो जाए तो चोर अपना कमाल दिखाने से नहीं चुकते। तभी तो महासमुंद में गणतंत्र दिवस समारोह स्थल की सुरक्षा में लगे जवान समारोह स्थल पर ही सो गए तो चोर मैग्जिन और इंसाल रायफ़ल ही चुराकर ले गए। अब पुलिस अधिकारियों ने गुस्से में ड्यूटी पर तैनात चारों सिपाहियों दीपक विदानी, नरेन्द्र यादव, सूर्यकांत ठाकुर और संजीत सिंह को निलंबित कर दिया। यह अलग बात है कि इन चारों कुछ दिन बाद फिऱ से ड्यूटी पर ले लिया जाएगा। नक्सली आमद की सूचना वाले इस जिले की पुलिस की इस गंभीर चूक पर  इन सिपाहियों पर और कड़ी कार्यवाही होगी या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन पुलिस की ऐसी ही लापरवाही के चलते चोरों के हौसले बुलंद हैं।
लेकिन पुलिस की दिक्कत यह है कि वह सब कुछ रात में ही कर लेना चाहती है तभी तो मौदहापारा में आधी रात को ऐसे आदमी का वारंट तामिल करने पहुची और पिटे गए। जो दिन में आसानी से उपलब्ध रहत था। आसानी से उपलब्ध तो बैजनाथ पारा में बलवाकांड के आरोपी भी हैं। लेकिन उन पर भी हाथ डालने की हिम्मत पुलिस अधिकारियों में नहीं है। कांग्रेस की नेतागिरी करने वाला यह बलवाई पुलिस अधिकारियों के साथ उठता बैठता है।
तभी तो वायदा कारोबारी मन्नु नत्थानी हो या स्मार्ट कार्द घोटाले का आरोपी डॉक्टर बांठिया ही क्यों न हो। पुलिस उन्हे नहीं पकड़ती।
ये ठीक है कि राजधानी में पुलिस पर राजनैतिक दबाव है और यहाँ तो  मिलावट खोरों को पकडऩे की हिम्मत दिखाने वालों को मंत्रियों द्वारा फ़ोन कर बचाया जाता है। लेकिन जिन वारंटियों के नाम थाने की सूचि से गायब हो गए हैं उनका क्या? क्या उन थानेदारों पर कार्यवाई करने की हिम्मत किसी पुलिस अधिकारी में है। थानेदारों की करतूत किसी से छिपी नहीं है। तभी तो यहां पुलिस पिटी जा रही है। लूट पर चोरी की रिपोर्ट लिखने वाले मोवा थानेदार कोई गुस्सा करे तो पुलिस अधिकारियों को क्या फ़र्क पड़ता है। मगरलोड में तो महिला के आत्महत्या करने के मामले मे सबूत के बाद भी दहेज प्रताडऩा की रपट नहीं लिखने की वजह से हाईकोर्ट को डीजीपी तक को तलब करना पड़ा।
 पुलिस तो यहां दिन में भी सोती है तभी तो दिन में उन्हे वारंटी नजर नहीं आते। हर थाने में दर्जनों वारंटी मजे से घूम रहे हैं। कोई खादी पहर रखा है तो कोई भगवा ओढ़ रखा है और थानेदार का तो पूरा समय ही अपने क्षेत्र में वसूली और थानेदारी बचाने में लग रहा है।
अब गृहमंत्री बोलते रहे कि दस-दस हजार में दारु ठेकेदारों के हाथों थाने बिक रहे हैं। किसी को फ़र्क नहीं पड़ता और जिन थानेदारों को फ़र्क पड़ता है वे लाईन में ड्यूटी कर रहे हैं। थानेदारी के लिए भी यहां कई शर्ते हैं और उन शर्तो में तो नेताओं का ध्यान रखना भी शामिल है।
चलते चलते
अकलतरा बलात्कार कांड में थाना प्रभारी को भाजपाईयों से रिश्तेदारी निभाना भारी पड़ा और अब वे निलंबित कर दिए गए  लेकिन इन दबंग भाजपाईयों ने आश्वासन दिया है कि उन्हे निलंबित करने वाले अफ़सर की खैर नहीं है, उन्हे भी चलता कर दिया जाएगा।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

भाजपा की हैट्रिक में आधा दर्जन मंत्री सहित दो दर्जन विधायक बन रहे हैं रोड़


छत्तीसगढ़ में कोयले की कालिख पूते चेहरे के साथ हैट्रिक की तैयारी में भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत उनके अपने मंत्री और विधायकों की करतूतों से होने लगी है। एक सर्वे ने जहां संघ की नींद उड़ा दी है वहीं इनकी टिकिट काटने की भी अंदरुनी चर्चा चल रही है। पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी जयप्रकाश नड्डा के बस्तर प्रवास के तुरंत बाद मुख्यमंत्री से हुई भेंट को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में कोयले की कालिख पूते चेहरे के साथ हैट्रिक की तैयारी में भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत उनके अपने मंत्री और विधायकों की करतूतों से होने लगी है। एक सर्वे ने जहां संघ की नींद उड़ा दी है वहीं इनकी टिकिट काटने की भी अंदरुनी चर्चा चल रही है। पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी जयप्रकाश नड्डा के बस्तर प्रवास के तुरंत बाद मुख्यमंत्री से हुई भेंट को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगी भाजपा में हैट्रिक को लेकर जबरदस्त उहापोह है। रमन सरकार की हैट्रिक के लिए निजी कम्पनी से भी सर्वेक्षण भी कराया गया है ताकि सत्ता विरोधी कारणों को दूर किया जा सके। बताया जाता है कि संगठन स्तर पर कार्यकर्ताओं से मिलकर कार्यकर्ताओं से मिलकर भी एक रिपोर्ट बनाई गई है और दोनो ही रिपोर्ट में सबसे Óयादा एकरुपता इस बात की है कि यदि आधा दर्जन मंत्रियों सहित दो दर्जन विधायकों कि टिकिट नहीं काटी गई तो हैट्रिक तो दूर की बात शर्मनाक स्थिति भी आ सकती है। कोयला घोटाले के अलावा भ्रष्टाचार के मुद्दे को प्रभारी को बताया गया है। उद्योगपतियों और अधिकारियों की मनमानी पर भी तीखी टिप्पणी की गई है। यही नहीं संकल्प पत्र में शिक्षा कर्मियों के संविलियन,किसानों को 270 रुपए बोनस और बेरोजगारी भत्ता को पूरा नहीं करने से होने वाली दिक्कत को भी रेखांकित किया गया है। जबरिया जमीन अधिग्रहण को लेकर भी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। यही नहीं सतनामी समाज व साहू समाज की नाराजगी को भी रिपोर्ट में जगह दी गई है।
सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट में सर्वाधिक चौंकाने वाली बात मंत्रियों  और विधायकों  को लेकर है। कहा जाता है कि आधा दर्जन मंत्रियों सहित दो दर्जन विधायकों के रिपोर्ट कार्ड बेहद खराब हैं और इन्हे टिकिट दी गई तो पार्टी को शर्मनाक से गुजरना पड़ सकता है।
रिपोर्ट को लेकर सूत्रों का दावा है कि आदिवासी ही नहीं सामान्य वर्ग के कुछ मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड को बेहद खराब बताया जा रहा है। वहीं विधायकों में बस्तर संभाग से 5, बिलासपुर एवं अम्बिकापुर संभाग से एक दर्जन और रायपुर संभाग से आधा दर्जन विधायकों की रिपोर्ट को बेहद खराब बताया गया है। जिसमें महिला विधायक भी शामिल है।
सूत्रों का कहना है कि कार्यकर्ताओं ने कार्यकर्ताओं ने मंत्रियों एवं विधायकों की करतूतों की जमकर शिकायत की है। खासकर बस्तर और रायपुर संभाग में कई कार्यकर्ताओं ने साफ़ तौर पर कहा है कि यदि कुछ विधायकों को दोबारा टिकिट दी गई तो वे काम ही नहीं कर पाएगें।
इधर इस रिपोर्ट के आने के बाद से भाजपा संगठन ही नहीं सरकार में भी हड़कम्प मचा हुआ है और कहा गया है कि बजट सत्र के बाद न केवल प्रशासनिक फ़ेरबदल बल्कि मंत्री स्तर पर भी फ़ेरबदल में कड़ा रुख अख्तियार किया जा सकता है।
हांलाकि सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह स्वयं कोल घोटाले, अमन सिंह की प्रतिनियुक्ति सहित कई मामले से उबर नहीं पा रहे हैं। जबकि संगठन के अस्तित्व को लेकर भी कार्यकर्ताओं में चर्चा कम नहीं है। कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यदि संगठन खेमे ने सरकार पर दबाव नहीं डाला तो हैट्रिक की मंशा पूरी होना मुश्किल है।
बहरहाल रिपोर्ट से सरकार में हड़कम्प है और आने वाले बजट में इससे निपटने की कोशिश साफ़ दिखेगी।

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

कड़वा सच


छत्तीसगढ़ के विकास का दावा करने वाली सरकार इन दिनों रोड़ शो में व्यस्त है। तो विपक्षी कांग्रेस इस रोड़ शो के विरोध में काल झंडा लिए खड़ी है। रोड़ शो का ऐसा विरोध पहले कभी नहीं हुआ और न ही हर रोड़ शो के पहले ऐसी गिरफ़्तारियाँ की गई।
राजनैतिक दांव पेंच में छत्तीसगढ़ के संतुलित विकास की अवधारणा दब गई है। नई राजधानी की चमक जितनी चटक हुई है। गांवों में पसरा सन्नाटा उतना ही गहरा हुआ है। सरकार की इस अजीबो गरीब विकास की अवधारणा से गांव की स्थिति दिल दहला देने वाली है। भारतीय व्यवस्था की रीढ और धान का कटोरा कहलाने वाली छत्तीसगढ़ की कृषि की दुर्दशा खून के आंसू रोने पर मजबूर है। सरकार  की नीति के चलते हजारों एकड़ कृषि भूमि उद्योगों व नई राजधानी तथा विकास की भेंट चढ गयी है
 तो किसानों के लिए यह विकास फ़ांसी का फ़ंदा  बनने लगा है।
रमन सरकार लाख विकास का दावा करे लेकिन सच तो यह है कि कृषि क्षेत्र को नजर अंदाज करने की उसकी नीति ने गांवों की हालत बदतर कर दी है। भले ही आंकड़ों में उत्पादन बढाने की बात हो रही हो लेकिन सच का अंदाजा गांवों की हालत देख कर लगाया जा सकता है। बड़े शहरों में ही तमाम सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। यहां तक की निजि क्षेत्र भी सारी सुविधाएं बड़े शहरों में ही कर रहे हैं और गांवो की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं है। गांवों में रोजगार का संकट खड़ा है।
सरकार को भले ही यह बात कड़वी लगे लेकिन सच तो यह है कि यह सामंतशाही प्रवृत्ति है। एक तरफ़ शहरों में तमाम सुविधाएं हैं तो गांवों में पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और  यहां तक की सड़कें तक ठीक से नहीं है। मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते गांवों को लेकर इस सरकार ने कोई नीति तैयार नहीं की।
सरकर ने जिलों का गठन तो कर दिया लेकिन क्या किसी जिले में मेकाहारा जैसे अस्पताल उसने खोले? या राजधानी रायपुर, बिलासपुर जैसी दूसरी सुविधांए उपलब्ध कराई हैं? नई राजधानी में स्वयं की सुविधाओं के लिए अरबों रुपए फ़ूंकने की योजना बनाने वाली सरकार और बड़े अधिकारियों ने क्या कभी सोचा है कि सभी विकासखंडों में मेकाहारा जैसे सर्व सुविधा युक्त अस्पताल खोला जाए या कालेज खोला जाए जिससे आम लोगों को उसके विकासखंड में उ'च शिक्षा मिल सके। उल्टे सरकार की नीतियों ने सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों को बरबाद करने का काम ही किया है।
रमन सिंह की सरकारी नीति पर गौर करें तो गांवों के लिए उदासी के अलावा कुछ नहीं है। गोदाम एवं कृषि बाजार का पता नहीं है। मोटर पंप के कनेक्शन की जटिलता से किसान परेशान हैं। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर अघोषित रोक लगाई जा चुकी है और लोग पलायन करने को मजबूर हैं।
दरअसल समस्या सरकार की नियत की है। कृषि को लेकर अपनाई जाने वाली अधकचरी नीति के अलावा गांवों में सन्नाटा के लिए सरकार में बैठे मंत्रियों व अफ़सरों की सोच है। क्योंकि ये सभी लोग राजधानी में ही रहना पसंद करते हैं। इसलिए सभी विभागों के कार्यलय राजधानी में ही रखे जाते हैं। जिसकी वजह से सुविधा व रोजगार के लिए लोग शहरों की ओर आ रहे हैं। एक बार विधायक और सांसद बनने वाले जन प्रतिनिधि भी अपने विकासखंडा में सुविधा बढाकर रहने की बजाए वे अपने परिवार को शहरों में ही ले आते हैं जिसकी वजह से गांवों का विकास अवरुद्ध हैं। छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी अधिकांश गांवों के हालातों में कोई बदलाव नहीं आया है।
कुल मिलाकर यह साफ़ है कि नई राजधानी की चमक के बीच से गांवों के सन्नाटे  की ओर जाता रास्ता तमाम दर्द अपने भीतर समेटे हुए है और इसकी परवाह न सरकार को है और नही निजी क्षेत्र के उन लोगों को ही है जो समाज सेवा का लंबा चौड़ा दावा करते नहीं थकते।

बुधवार, 30 जनवरी 2013

बढते अखबार फिऱ भी लाचार


छत्तीसगढ में होने जा रहे इस बार विधानसभा चुनाव की तैयारी  में सिफऱ् राजनैतिक दल ही नहीं मीडिया भी सक्रिय हो गया है। कई अखबार फिऱ से छपने लगे हैं तो हर माह नए नाम से अखबारों का पंजीयन भी होने लगा है। सरकारी विज्ञापन और नेताओं से विज्ञापन के लिए जोड़-तोड़ शुरु हो गई है।
एक आंकड़े के मुताबिक छत्तीसगढ़ में प्रकाशित होने वाले अखबारों की संख्या 2200 से अधिक है। इनमें से कई अखबार तो राष्ट्रीय या धार्मिक त्यौहारों पर ही भरपूर विज्ञापन के साथ प्रकाशित होते हैं।
कभी सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब पेड न्यूज या तोड़-मरोड़ कर खबरें प्रकाशित करने का दौर शुरु हो गया है। यह कहानी सिफऱ् छोटे बैनरों की नहीं है बल्कि बड़े नामचीन बैनरों पर भी कई तरह के आरोप लग रहे हैं। कोई अपने नाम के अनुरुप मित्रता निभा रहा है तो कोइ कोयला खदान के लिए जिद पकड़े हुए है। कहने को तो नए तेवर और नए कलेवर की वकालात हो रही है तो कईयों का काम केवल दलाली करना रह गया है।
सरकार में बैठे लोग भी ऐसे अखबारों को उनकी औकात के अनुरुप रोटी फ़ेंक रहे हैं जबकि कलम की ताकत को नजर अंदाज करते हुए ठकुरसुहाती में लगने वालों की संख्या कम नहीं है।
इलेक्ट्रानिक वालों ने जोर दिखाया
प्रेस क्लब से अलग होकर पृथक संगठन बनाने वालों ने अपनी ताकत दिखानी शुरु कर दी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन के कार्यालय में कैरम लग गया है और इसका उद्घाटन प्रेस क्लब के पूर्व पदाधिकारी और मानद सदस्य आसिफ़ इकबाल ने किया। कभी प्रेस क्लब की गरिमा के लिए लडऩे वाले आसिफ़ इकबाल पृथक बने संगठन में जाना चर्चा का विषय है।
वैसे इलेक्ट्रानिक वालों का दावा है कि अभी और भी कई नामचीन पत्रकार प्रेस क्लब छोडऩे वाले हैं। हालांकि अभी पूरी तरह इलेक्ट्रानिक वाले ही एक नहीं हो पाए हैं। ऐसे में वापसी चर्चा भी कम नहीं है।
और अंत में...
पत्रिका में पहले दिन मौदहापारा पुलिस की पिटाई की खबर छूट जाने की भरपाई दूसरे दिन की गई, लेकिन जनसम्पर्क अधिकारियों ने इस पर खूब चुटकी ली और कहने लगे कि जोश के साथ होश नहीं रखा गया तो खबरें छुटेंगी ही। किसी दिन भद्द भी पिट सकती है।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

नकटा के नाक ...


विधानसभा के चुनई इही साल होही, चुनई ल देख के फ़ेर खादी-भगवा वाले मन ल जनता के फि़कर होगे हे, कोनो रोड़ सो करत हे त कोनो परदरसन करत हे। रो सो हो चाहे परदरसन होय, अवइया जवइया मन के 12 बजत हे। पुलिस ह रद्दा ल घेर देवत हे अउ डंडा ल देखा-देखा के छेंकत हे अउ बपरा जनता ह कले चुप तमासा ल देखे बर मजबूर हे। नेतागिरी जम के होवत हे। हमर सरकार आही त ये करबो वो करबो के गोठ ल सुन डार। जेती देखबे तेती खाली एकेच ठन गोठ हे। कांग्रेसी मन ह 60 साल ले कुछु नइ करीन त भाजपाई मन 9 साल मा सबला बेच के अपन कोठी भरत हे।
जनता ह त रोटी असन होगे हे, कोनो बेलत हे, कोनो सेंकत हे, अउ कोनो खावत हे। जेखर जइसे मन होवत हे तइसे करत हे, फ़ेर जनता ल का मिलय तेखर फि़कर कोनो नई करत हे।
न गाँव म स्कूल हे, न अस्पताल। जिंहा स्कूल हे, तिंहा गुरुजी नई हे। अस्पताल हे त न डाक्टर के पता न दवई के पता हे। पीये के पानी के त नामेच झन ले। अउ नहर नाली के गोठ गोठियाबे त कोनो कारखाना ल लगा के खेतेच ल छीने के उदीम कर दीही। विकास के नाम झन लेबे। & रुपया किलो चांऊर म भुलाय रह। धान के बोनस बर झन कहिबे नही त लाठी बरस जाही। अऊ सरकार ह दस ठन काम गिना दीही के का का करे हन्।
अब ये रमन सरकार ल देख ले। किसान मन ल 270 रुपया बोनस देहे के बात करे रहिस। दिस नइ दिस। अब चार साल म त दिस नइ त आज का दीही। मांग करइया मन ल भितरा दिस। ते धरना परदरसन करत रहा। कुछुच फऱक नइ परय्। बेंझार के फ़ेर चुनई मा वोट ले लीही। गांव गांव म पलायन होतेच हे। काम बुता नइ हे। अऊ काम बुता नई रही त ठलहा मनखे करय काय। तेखर सेती गांव-गांव म दारु बेचइया मन ल ढील दे हे। दारु पी अऊ मस्त राह्। समस्या ल झन गोठिया। नशा म परे रह।
चुनई ल देख के फ़ेर बेंझारे के काम होवत हे। फ़ेर वादा करत हे। सड़क बना देबो, बिजली लगा देबो। अस्पताल-स्कूल खोलवा देबो कहात हे। फ़ेर पहली जेन अस्पताल अऊ स्कूल खुले हे तेन ल सुधरवाय के जांगर नइ चलत हे। राजधानी म नाच गाना देखे बर करोड़ों अरबो ल फ़ूंकत हे अउ गांव म स्कूल खोले बर पइसा नई हे।
छत्तीसगढ़ मा त अतियाचार होगे हे। नेता बनके पद पावत हे, अउ पोठ कमावत हे। गलत सलत काम म फ़ंस जथे तभो लाज नई आवत हे। तभे त गली-गली सब झन गोठियावत हे नकटा के नाक ह दिनो दिन बाढत हे।

रविवार, 27 जनवरी 2013

थानेदारों की करतूतों पर अधिकारी परेशान


यह तो कोइ करे भरे कोई की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना थानेदार की करतूतों पर न लोग न्यायालय जाते और न्यायालय से पुलिस अधिकारियों को नोटिस का सामना करना पड़ता।
छत्तीसगढ़ में थानेदारों की करतूतों के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं और उनकी करतूतों को नजर अंदाज करना भारी पड़ रहा है। थानेदारों की करतूतों से न केवल अपराध बढ़ रहे हैं बल्कि अपराधियों के हौसले भी इतनी बुलंदी पर है कि वे पुलिस वालों पर हमला करने से भी नहीं चूकते। 19 जनवरी की रात मौदहापारा के पुराने हिस्ट्रीशीटर को पकडऩे गए दो-दो थानेदारों की पिटाई हो गई। पुलिस को जैसे-तैसे जान बचाकर भागना पड़ा। यह अलग बात है कि घंटे भर के भीतर ही पूरे मौदहापारा को छावनी बनाकर आरोपियों को पकड़ लिया गया।
वास्तव में इसकी वजह पुलिस की अपनी करतूत है। अपराधियों को मंत्री अपनी गोद में बिठा रहे हों और पुलिस वाले गलबहियां डाल रहे हों तो अपराधी किसी से डरेगा ही क्यों?
अब्दुल अजीम भोंदू जैसे व्यक्ति को भारतीय जनता पार्टी अपनी गोद में बिठाती है तो इससे पार्टी के चरित्र को आसानी से समझा जा सकता है। पूरे प्रदेश में यही हाल है। सत्ताधारियों ने अपराधियों को संरक्षण दे रखा है। उन्हे जनता की प्रतिक्रिया की भी फि़क्र नहीं है। तभी तो एक तरफ़ डॉ रमन सिंह शराब के खिलाफ़ विष वमन करते हैं और दूसरी तरफ़ शराब ठेकेदार के साथ सार्वजनिक रुप से गलबहियां करते नजर आते हैं तब भला थाने के बिकने की चर्चा नहीं होगी तो क्या होगा?
यह सच है कि राजनैतिक दबाव की वजह से अपराधी छुट्टे घूम रहे हैं लेकिन यह भी इतना ही बड़ा सच है कि पैसा देकर थाना हासिल करने वाले थानेदार अपराधियों से ही इसकी भरपाई करते हैं और इन अपराधियों की शिकायत करने वालों पर ही अत्याचार करते हैं। तभी तो थानेदार की मनमानी पर एस पी व गृह सचिव तक चुप रहते हैं। भले ही न्यायालय से उन्हे कितनी भी फ़टकार मिले।
अभनपुर थानेदार की ऐसी ही करतूत की वजह से हाईकोर्ट को गृह सचिव, रायपुर आई जी व एस पी को नोटिस देना पड़ा। थानेदार पर शिकायत कर्ता हेमचंद यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं उनके आरोपों के अनुसार बिरोदा में एक स्टाप डेम की को तोडऩे की शिकायत सीईओ से की गई थी। शिकायत सही पाई गई। सरपंच को इसके लिए दोषी ठहराया गया। सरपंच ने शिकायत कर्ताओं को जान से मारने की धमकी दी तो हेमचंद साहु व अन्य शिकायत कर्ताओं ने थाने में पहुंच कर इसकी जानकारी थानेदार को दी। थानेदार ने हेमचंद की शिकायत पर कार्यवाही करने की बजाए सरपंच को बुलवा लिया और हेमचंद साहु व उनके साथियों के खिलाफ़ ही शांति भंग करने का आरोप लगा कर धारा 107/116 व 151 के तहत गिरफ़्तार कर लिया। यही नहीं जमानत लेने के दौरान अभी पुलिस ने उन्हे अपराधिक प्रवृत्ति का बताते हुए नहीं छोडऩे कहा। इसकी वजह से हेमचंद को तीन दिन जेल में काटने पड़े और जमानत पर रिहा होने के बाद हेमचंद ने अपने साथ हुए अन्याय की जानकारी हाईकोर्ट को दी, जहां हाईकोर्ट ने थानेदार सहित पुलिस अधिकारियों एवं गृह सचिव को नोटिस भेजा है।
यानी पुलिसिया करतूत थमने का नाम नहीं ले रही और अब जब अपराधी पुलिस पर सीधे ही हमला करने की हिम्मत कर रहे हैं। तब बवाल मचा हुआ है।
चलते-चलते
 राÓय मे प्रमोटी आईपीएस और सीधे आईपीएस में मनभेद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। पीएचक्यु से लेकर मैदान में पोस्टिंग तक में प्रमोटी आईपीएस की महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के पहले यह अहसास जरुर दिला दिया जाता है कि तुम्हारी औकात क्या है।