बुधवार, 8 अप्रैल 2015

छत्तीसगढ़ी फिल्म पर भी निर्णय करें..


महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने मल्टीप्लेक्स के लिए एक नया फरमान जारी करते हुए सभी मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों को अपने प्राईम टाईम 6 से 9 के शो टाईम पर मराठी फिल्म दिखाना अनिवार्य कर दिया है। यह सब मराठी फिल्मों को प्रमोट करने किया गया है।
छत्तीसगढ़ में भी छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग सरकारी उपेक्षा की शिकार है। राज्य बने 14 साल हो गये लेकिन न तो फिल्म विकास निगम ही बनाये गये और न ही सरकारी स्तर पर प्रमोट करने के कुछ उपाय ही किये गये। अपने दम पर घिसटते चल रही छत्तीसगढ़ फिल्म उद्योग में महाराष्ट्र सरकार के फैसले से आशा की किरणें यदि देखी जा रही है तो गलत भी नहीं है।
क्योंकि महाराष्ट्र की तरह छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की सरकार है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी फिल्मों सहित अन्य क्षेत्रीय फिल्मों को प्रमोट के लिए भाजपा शासित राज्यों में मांग उठने लगेगी। जहां तक छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग का सवाल है तो वह पूरी तरह से सरकारी उपेक्षा का शिकार है।राज्य बनने के बाद शुुरूआत में छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लेकर जो आशा बनी थी वह सरकारी नीति के चलते निराशा में बदलने लगी लेकिन छत्तीसगढ़ी निमार्ताओं और कलाकारों ने सरकारी रवैय्ये से कभी भी घुटने नहीं टेके और फिल्म निर्माण में अब भी लगे हैं। हर साल दर्जनों फिल्में बन रही है और कलाकारों के हौसले भी बुलंद है। छत्तीसगढ़ी फिल्म को प्रमोट करने में लगे प्रेम चंद्राकर से लेकर अनुज शर्मा और योगेश अग्रवाल तो मेहनत कर ही रहे हैं। एबेलोन संस्था प्रमुख अजय दुबे ने भी कलाकारों के लिए एवार्ड और सम्मान कार्यक्रम आयोजित कर छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग के लिए आक्सीजन का काम कर रहे हैं।
अपने दम पर चल रहे छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग को राज्य सरकार से अभी भी उम्मीद है और उन्हें लगता है कि देर सबेर इस दिशा में सरकार कुछ न कुछ करेगी। महाराष्ट्र सरकार के मराठी फिल्मों को प्रमोट करने के लिए जारी फरमान को लेकर यहां भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रमोट के लिए रमन सरकार से ऐसे ही कदम उठाने की मांग शुरू हो गई है। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अब छत्तीसगढ़ की सरकार को भी सोचना होगा। हालांकि फिल्म उद्योग से जुड़े एक अन्य पक्ष का कहना है कि छत्तीसगढ़ी फिल्म विकास निगम शीघ्र बनाया जाए।
महाराष्ट्र सरकार के फरमान के बाद छत्तीसगढ़ की रमन सरकार से यदि इस तरह की उम्मीद की जा रही है तो इसमें गलत भी नहीं है। क्षेत्रीय भाषा को लेकर आंदोलन कर रहे बीएल शुक्ला ने तो साफ कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास के लिए सरकार को हर क्षेत्र में कदम उठाने चाहिए तभी छत्तीसगढ़ का विकास होगा।
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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

सरकारी लूट...


छत्तीसगढ़ में सरकारी लूट चरम पर है। हर विभाग में घपले बाजी के नये-नये सरकारी तरीके हैरत अंगेज है ऐसे में यह यक्ष प्रश्र उठना स्वाभाविक है सरकार के जिरो टारलेंस की बात कितनी सार्थक है।
ताजा मामला आबकारी विभाग का है जहां सरकारी लूट का ऐसा तरीका ईजाद किया गया जो न केवल घोर आपत्तिजनक है बल्कि हैरान कर देने वाला है। बिलासपुर में आधा दर्जन शराब दुकाने बगैर ठेके का महिनों चलता रहा। इसकी वजह से सरकार को राजस्व का नुकसान तो उठाना ही पड़ा। अधिकारियों और मंत्रियों की जेबों में भी तगड़ी रकम पहुंच गई। शिकायत कर्ता अनिल दुबे के मुताबिक इस खेल में न केवल शराब माफिया बल्कि आबकारी विभाग के अधिकारी और सरकार के कई मंत्री भी शामिल है। खुले आम सरकार डाका की संज्ञा देने वाले दुबे ने इस मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
वास्तव में सरकार के इस करतूत का पर्दाफाश तो होना ही चाहिए दोषियों को कउ़ी सजा के साथ-साथ जेल में भी होना चाहिए लेकिन कहा जाता है कि जब पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो और सत्ता में बैठे लोगों का ध्येय पैसा कमाना हो तो सारी जांच और उसकी रिपोर्ट बेमानी हो जाती है।
छत्तीसगढ़ में तीसरी बार सत्ता हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी पर भ्रष्टाचार और मनमानी के इतने आरोप लगे हैं कि यदि इनकी निश्पक्ष जांच कराई जाए तो कई बड़े चेहरे न केवल सलाखों के पीछे होंगे बल्कि भाजपा के कई राष्ट्रीय नेता भी मुंंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।
भटगांव कोल ब्लॉक से लेकर इंदिरा बैंक घोटाले का मामला हो या लोकायुक्त में पीडब्ल्यु डी और अन्य विभाग का मामला हो। सचिवों से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार की चपेट पर है। हालत यह है कि बाबूलाल अग्रवाल हो या एम के राउत सहित कई नामी गिरामी सचिव कटघरे में है लेकिन जांच के नाम पर जिस तरह की नूरा कुश्ती की जा रही है वह हैरान कर देने वाली है।
लोकतंत्र का सबसे दुखद पहलू यह है कि 40-42 फीसदी वोट पाकर स्वयं को सर्वशक्तिमान समझ लिया जाता है और पूरे खेल में विपक्षी दलों की भूमिका भी सिर्फ कांव-कांव की रह जाती है।
बिलासपुर के शराब दुकान के मामले में जिस तरह का खेल हुआ है। उसकी जांच होगी भी या नहीं यह भी सवालों में है ओर लूट अब भी जारी है... 

बुधवार, 26 मार्च 2014

कर्णधारों की कवायद


न नीति न नैतिकता, भाड़ में जाए जनता
देश की सत्ता संभालने की बिसात बिछ चुकी है और मोहरे भी बिठाये जाने लगे हैं। सत्ता के लिए दोनों राष्ट्रीय दल कांग्रेस और भाजपा अपने अपने सहयोगियों के साथ आमने सामने है। पिछले दो दशक से जनता ने किसी एक दल को बहुमत के आकड़े से दूर रखा है तो इसकी वजह इन दिनों प्रमुख राजनैतिक दलों की सत्ता की भूख है जिसे जनता अच्छी तरह जान चुकी है। और इस बार भी जिस तरह से सत्ता के लिए अनैतिक गठबंधन किये जा रहे हैं उसके बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिल जाए इसकी सभावना कम ही है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भारत की सत्ता के लिए 9 चरणों में हो रहे चुनाव में सत्ता हासिल करने की कवायद में लगे दलों ने जिस तरह से राजनैतिक सुचिता और अपने दलों के सिद्धांतो को तिलाजंति दी है वह आश्चर्यजनक है।
अपने दम पर सरकार बनाने से दूर होते कांग्रेस में तो अफरा तफरी का माहौल है। उसके कई बड़े नेता चुनाव लडऩे से मना कर रहे हैं या फिर जिधर बम उधर हम की तर्ज पर दूसरे दलों का सहारा लेने लगे हैं। इसके बावजदू राहुल गांधी को पिछले चुनाव से अधिक सीटें जीतने की उम्मीद हैं तो इसकी वजह कांग्रेस विरोधियों की वह करतूत है जो हर हाल में सत्ता हासिल करने अनैतिक गठबंधन या कांग्रेस से आने वालों को टिकिट देना या यादिरप्पा जैसों को गले लगाना है।
चुनाव के घोषणा के पहले जिस तरह से कांग्रेस के खिलाफ माहौल था वह माहौल चुनाव आते-आते खतम होने लगा तो इसकी प्रमुख वजह भी भारतीय जनता पार्टी का मुद्दे की बजाय नरेन्द्र मोदी को प्रमोट करना है।
दरअसल भाजपा के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वह आज भी अपने दम कर कांग्रेस को परास्त करने की सोच ही नहीं पैदा कर पाई हैं इससे पहले भी वह कांग्रेस को सत्ता से दूर करने की लड़ाई में गठबंधन का सहारा लेते रही है और इस खेल में न केवल उसने अपनी पार्टी के सिद्धांतो को तिलांजलि दी बल्कि राजनैतिक सुचिता को भी दरकिनार किया।
पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की हवा तो उस दिन ही हवा हो गई जबब उसने विहार में राम विलास पासवान से समझौते किये और यदिरप्पा को पार्टी से टिकिट दी। यही नहीं बीजेपी के बड़े नेताओं ने जिस तरह से सुरक्षित सीट की तलाश शुरू की तभी से भाजपा की जीत को लेकर संशय के बादल न केवल मंडराने लगे बल्कि मोदी की हवा पर भी सवाल उठने लगे।
राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो इस बार भी किसी एक दल के जादुई आकड़े छुने की संभावना दूर दूर तक नहीं दिख रहा है। और यही वजह है कि भाजपा की बौखलाहा खुलकर सामने आने लगी है। और वह भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाने की बजाय नरेन्द्र मोदी के नाम का सहारा ले रही है। हर हर मोदी का नारा और दिल्ली भाजपाध्यक्ष हर्षवर्धन का भगवान भी नहीं रोक सकने वाले बयान को इसी बौखलाहट का परिणाम भी माना जा रहा है।
दूसरी तरह जनता भी यह समझ नहीं पा रही है कि आखिर कांग्रेस और भाजपा किस मामले में अलग है। भ्रष्टाचार की फेहरिश्त दोनों ही दलों में कम नहीं है तो अपराधियों को टिकिट देने के मामले में भी दोनों दलो की एक ही तरह की राम है। दोनों ही दलो के सहयोगियों के कारनामें भी एक ही तरह के है तो फिर सत्ता की दौड़ में अफरातफरी दोनों ही दलों में एक समान है। इधर गांधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा में भी वंशवाद का जो खेल इस चुनाव में हुआ है वह भी दोनो को एक कर रही है। यही वजह है कि अनैतिक गठबंधन से सत्ता हासिल करन के खेल ने दोनों ही पार्टियों से जनात का मोह भंग किया है और नई नवेली आम आदमी पार्टी में उम्मीद दिखने लगी है।
छ: महीने की पार्टी आम आदमी पार्टी को जिस तरह से बड़े शहरों में समर्थन मिल रहा है और जिस तरह से कस्बों तक लोग उनसे जुडऩे लगे है वह दोनों ही दलों के लिए हैरान कर देने वाली है और इसे नजर अंदाज करना भी भारी पड़ सकता है। क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में वोट काहु पार्टी की सोच हवा हो चुकी है।
क्या कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता आपस में मिले हुए है या कार्पोरेट घरानों के कारनामों पर दोनों ही दल चुप हैं। यह सवाल उबकर आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से कांगे्रस और भाजपा के दिग्गजों को चुनौती देने का फार्मूला बनाया है क्या यह नई राजनीति जनता के दुखते रग को छु पायेगी।
ऐसे कितने ही सवाल है जो जनता के मन में है और कहा जाता है कि यही सवाल पिछले हो दशकों से किसी एक दल को सत्ता के जादुई आंकड़े से दूर रखा है।

सोमवार, 24 मार्च 2014

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने से परहेज?


लोकसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों की सत्ता की भूख थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। जिसे देखो वहीं सत्ता के लिए अनैतिक गठबंधन कर रहा है या फिर अनैतिक कार्य कर रहा है। सारे सिद्धांतो को तिलाजंलि देकर जिस तरह से चुनाव जीतने की कोशिश हो रही है वह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि दुखद भी हैं।
पिछले दस सालों से सत्ता में बैठी कांग्रेस को निशाना बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी भी भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाने की बजाय जिस तरह से नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर चुनावी वैतरणी वार करना चाहती हैं वह भाजपा के राजनैतिक सुचिता पर तो सवाल खड़ा करते ही है कथनी और करनी के अंतर को भी स्पष्ट कर देने वाला है।
सत्ता के लिए कुछ भी करेगा मेरी मर्जी के आगे आम जनमानस हैरान है। अपराध से लेकर भ्रष्टाचार करने वालों को टिकिट देने वाले दलों से सत्ता प्राप्ति के बाद यह उम्मीद बेमानी है कि वे ऐसे लोगों के दबाव में आये बगैर जनहित में कार्य कर पायेंगे।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंंत्र के राजनेताओं की सत्ता भूख के आगे जनता की बेबसी स्पष्ट है कि वह आखिर किस दल पर भरोसा करे। जो लोग कांग्रेस से उम्मीद छोड़ चुके है उनके सामने भाजपा को लेकर भी वहीं सवाल है। आखिर दोनों दल किस मामले में अलग है। कुर्सी की दौड़ में जिस बम उधर हम की अफरा तरफी स्पष्ट है और भ्रष्टाचार जैसा भयावह मुद््दा जाति धर्म के आगे दम तोड़ता दिख रहा है।
यूपीए के खिलाफ चुनाव पूर्व माहौल को भुनाने की बजाय भाजपा ने जिस तरह से दूसरे दलों से आने वालों को टिकिट दी है और मोदी के भरोसे चुनावी वैतरणी पार करने की कवायद की है उससे लोगों का भरोसा भाजपा से भी डिगा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
सिर्फ मोदी के भरोसे दलबदल करने वाले या आपराधिक छवि वालों को टिकिट देकर जीत का सपना कहीं एक बार फिर भाजपा को सत्ता से दूर ही रखे तो भाजपाईयों को हैरानी नहीं होनी चाहिए।
इस मामले में अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी या ममता बेनर्जी और बिजू जनता दल ही कुछ अलग राजनैतिक संदेश तो दे रहे हैं लेकिन यह कहना कठिन है कि इनकी स्वीकार्यता कितनी है।
यही वजह हैं कि पिछले दो दशक यानी 1984 के बाद से किसी भी दल ने 272 का जादुई आकंड़ा नहीं छु सका है। दलबदल करने वालों की हार और अपराधिक छवि वालों को टिकिट देने का दुस्परिणाम को नजर अंदाज करने की भूल ने ही जनता को मजबूर किया है कि वह किसी एक दल पर भरोसा न करे।
भले ही ऐसे नेता चुनाव जीत रहे हो पर सच तो यह है कि इस तरह के लोगों को टिकिट देने का दुष्परिणाम आखिल भारतीय स्तर पर पड़ता है जिसे नजरअंदाज किया जाता रहा है।
बकौल अरविन्द केजरीवाल भाजपा और कांग्रेस ने मिल बैठकर सत्ता हासिल कर रहे  हैं। ये राजनैतिक दलाली है जिसके खिलाफ हर व्यक्ति को आगे आना चाहिए तभी लोकतंत्र स्थापित होगा। क्या यह स्पष्ट नहीं दिखता इससे परे कांग्रेस और भाजपा की राजनीति है? यह सवाल केजरीवाल ने भले उठाये हो पर मोदी बनाम राहुल की लड़ाई से असल मुद्दो गौण करने की कोशिश इस सवाल पर उत्तर है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

ब्लेकमेलर युवती के कई नामचीन लोगों से अतंरंग संबंध...


वन विभाग के रेंजर को ब्लेकमेल से हुआ खुलासा
कई नामचीन लोगों ने करोड़ो का बीमा करवाया
दर्जनों अश्लील क्लीप व वीडियों पाये गये
कई हो चुके ब्लेकमेल का शिकार
बदनामी के डर से नहीं आ रहे सामने
पीएचक्यू से मंत्रालय तक के अफसर शामिल
वन विभाग के रेंजर उदय सिंह ठाकुर को ब्लेकमेल करने वाली युवती भले ही गिरफ्तार होकर जेल का हवा खा रही है लेकिन उसके द्वारा प्रदेश के कई लोगों को भी ब्लेकमेल करने की जानकारी पुलिस को मिलने लगी है लेकिन ये अधिकारी अपनी प्रतिष्ठा बचाने ब्लेकमेलर युवती के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने से बच रहे हैं। दूसरी तरफ ुयुवती द्वारा अपने रूपजाल में फांस कर करोड़ों रूपये का बीमा करवाये जाने का सनसनीखेज मामला भी खुलकर सामने आया है। पुलिस इसे भी आधार मानकर जांच कर रही है। छत्तीसगढ़ की राजधानी में चल रहे हाईप्रोफाईल खेल का यह एक ऐसा किस्सा है जो साबित करता है कि किस तरह से यहां हाईप्रोफाईल सेक्स रैकेट चल रहे हैं। सूत्रों की माने तो ट्रांसफर पोस्टिंग से लेकर ठेका लेने तक के खेल में यहां युवतियां इस्तेमाल हो रही है और यह सब इतने गुपचुप तरीके से चल रहा है कि कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। सूत्रों का कहना है कि वन विभाग के रेंजर को ब्लेकमेल करने का मामला भी अति सर्वत्र वर्जत की तर्ज पर ही उजागर हुआ वरना युवती द्वारा ब्लेकमेल करने का खेल तो लंबे समय से चल रहा था। पुलिस सूत्रों के मुताबिक युवती के घर और बैंक लाकर से बड़ी मात्रा में न केवल अश्लील क्लीपिंग बरामद हुई है बल्कि इन क्लीपिंग में अलग अलग चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं। पुलिस ने इस आधार पर दावा किया है कि कई नामचीन लोग भी ब्लेकमेल का शिकार हो सकते हैं।
दूसरी ओर पुलिस का यह भी दावा है कि युवती ने कई नामचीन लोगों को करोड़ों रूपये का बीमा पालिसी बेची है और इनमें से कई पॉलिसी ब्लेकमेल करके बेची गई हो सकती है। पुलिस इस संभावना के आधार पर बीमा कंपनी से डिटेल मांग रही है। इधर सूत्रों का दावा है कि युवती द्वारा ब्लेकमेल के शिकार लोगों की संख्या दर्जनभर से अधिक है लेकिन वे लोग सामने आने से कतरा रहे हैं। ऐसे लोगों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता है। जबकि चर्चा इस बात की भी है कि युवती के पीएचक्यू से लेकर मंत्रालय में पदस्थ कई अफसरों से संबंध रहे हैं और कई बड़े ठेके और तबादले में इस युवती का अहम रोल रहा है।
सूत्रों का तो यहं तक दावा है कि शहर के कई नामचीन व्यापारिक संस्थान के लोगों को भी युवती ने बीमा पॉलिसी बेची है और इनमें से कुछ पॉलिसी जबरिया दिलाई गई है।
बहरहाल छत्तीसगढ़ की राजधानी में चल रहे इस खेल को लेकर कई तरह की चर्च है और कहा जा रहा है कि ठेके हासिल करने या बड़ा काम कराने के एवज में राजधानी में यह खेल लंबे समय से चल रहा है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कर्णधारों के मायने और महापर्व की आगाज...


लोकतंत्र कर सबसे बड़े महापर्व का आगाज हो गया। 16 मई तक राजनैतिक दलों की सांसे सांसत में रहेगी। 81.4 करोड़ मतदाता अपने 543 कर्णधारों को चुनेंगे।  जो जीतने के पहले अपने पक्ष में मतदान कराने घर घर घुमेंगे।
चुनाव आयोग के घोषणा के साथ ही शुरु हो रही इस खंदक की लड़ाई पर जीत का सेहरा बांधने की होड़ मची है। और हर बार की तरह इस बार भी जनता ने मोटे तौर पर तय कर लिया है कि सरकार किसकी बननी है। कांग्रेस जहां राहुल गांधी के नेतृत्व में हम जोड़ते हैं वे तोड़ते हैं के नाटों के साथ मैदान में है तो भाजपा पीएमएन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में देश की आखंडता और महंगाई का मुद्दा बनाने में लगे हैं। पर सच तो यह है कि वर्तमान परिस्थिति में दोनों ही दलों के लिए स्वयं के बूते न तो सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा 272 को छुने की क्षमता है और न ही इन्हें छू पाने का विश्वास है।
कल तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी से गठबंधन करने वाली भाजपा आज भी गठबंधन के रास्ते ही सत्ता तक पहुंचने इस कदर आतुर है कि उसके लिए रामविलास पासवान हो या कोई अन्य दल अछुत नहीं है। उसे पार्टी गुर्राने वाले येदियप्पा से लेकर कल्याण सिंह और शिवसेना से लेकर आरपीआई सभी का समर्थन चाहिए।
पिछले दो दशक से जारी गठबंधन की राजनीति से देश को होने वाले नुकसान की चिंता न तो कांग्रेस को हैं और न ही भाजपा को ही रह गई है। वाजपेयी सरकार के समय में बात हो या यूपीए की हर बार अपनी अक्षमता पर गठबंधन की राजनीति की मजबूरी बताने वाले दल इस बार भी इसी राह पर है तब भला जनता क्या करें।
तीसरे मोर्च ने भी एक गठबंधन तैयार किया है लेकिन इनमें भी वहीं दल है जो देर सबरे कांग्रेस या भाजपा का हिस्सा रह चुके हैं और चुनाव परिणाम के बाद जिधर बम उधर हम के फार्मूले पर भरोसा करते हैं।
इस बार चुनाव रोमांचक और कटु होने की इसलिए भी अधिक संभावना है क्योंकि गठबंधन की राजनीति से परे आन्दोलन की राह चलते दिल्ली की सत्ता हासिल करने वाले आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से राजनीति शुरु की है उससे परम्परागत ढंग से जनता को बेवकुफ बनाने वाले राजनैतिक दलों की नींद उड़ गई है। हालांकि आम आदमी पार्टी का असर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है लेकिन जिस तरह से आप के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के बीच दलाली का मुद्दा उठाकर भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त जनता के बीच एक नई राजनीति की शुरूआत की है उससे भाजपा की राह कठिन होने लगी है।
कार्पोरेट घरानों के साथ कांग्रेसी और भाजपाई ताल्लुकात को मुद्दा बनाते हुए रातों रात देश में लोकप्रिय होने वाले अरविन्द केजरीवाल की पार्टी भी अपने बूते सरकार नहीं बना सकती लेकिन उसकी जीत तो तभी तय मानी जा रही थी जब उनकी पार्टी की वजह से कई राजनैतिक पार्टियों के मंत्रियों के काफिले की गाडिय़ा कस हो गई। सुरक्षा बल कम हो गये और निराश हो चुके लोगों की आंखो में उम्मीद दिखने लगी।
अब तक सिर्फ सत्ता के लिए जोड़-तोड़ और जीतने वाले प्रत्याशी को ही टिकिट का मापदंड बताने वाले दलों के लिए आप की चुनौती कितनी होगी यह तो पता नहीं लेकिन यह महापर्व अब राहुल बनाम मोदी था यूपीए बनाम एनडीए या कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया है अब इसमें आम आमदी की भागीदारी भी जुड़ गई है जो कर्णधारों के मायने क्या हो यह लकीर खीचीं जा चुकी है।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

कौन जिम्मेदार?


सत्ता = अनैतिक गठबंधन+ धन बल + बाहुबल + झूठे वादे+ जाति-धर्म का दुरूपयोग + बेहिसाब चुनावी खर्च + गलत आरोप-प्रत्यारोप + शराब खोरी + मुफ्त खोरी+ वोट खरीद
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव का बिगुल बज गया है। सत्ता हासिल करने की लड़ाई का आगाज जिस तरह से पिछले दो-तीन दशकों से चल रहा है वह न केवल शर्मनाक स्थिति में पहुंच गया है बल्कि कौन किसके साथ है कहना मुश्किल है। हर हाल में सत्ता के लिए सिद्यांतो से समझौते के खेल से न गांधीवादी बचे है न हितुत्व वादी ऐसे में चुनाव आयोग के साथ-साथ आम जनता की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। कार्पोरेट जगत की बढ़ती ताकत के बीच कमर तोड़ती महंगाई और बढ़ते भ्रष्टाचार से आज देश त्रस्त है तब इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए।
लोकतंत्र का चुनाव 9 चरणों हो रहा है। देश की जनता इन 9 चरणों में अपना प्रतिनिधि चुनेगी। सिद्दांतत: ये प्रतिनिधि ही हमारे हीतों को देखेंगे पर क्याा यह सचमुच हो रहा है। राजनैतिक दलों का सिद्यांत हर हाल में सत्ता तकर पहुंचना रह गया है। प्रत्याशी स्वयं चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाते कहीं जाति-धर्म का सहारा ले रहे हैं तो झूठा शपथ पत्र दे रहे हैं धन की बारिश, शराब की नदिया और मुर्गाभात की दावतें उड़ाई जा रही है। राजनैतिक दल जीतने वाले प्रत्याशी के नाम पर बाहुबली और भ्रष्ट लोगों को टिकिट दे रही है जिसका परिणाम सबके सामने हैं। संसद का नजारा शर्मनाक हो चुका है हमारे प्रतिनिधि दुर्योधन और दुशासन की तरह लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे हैं और अच्छे लोग भीष्म की भूमिका में तमाशा देख रहे हैं। सत्ता की चाह में डुबे ये कथित लोग पार्टी फोरम में भी इसका विरोध नहीं कर रहे हैं और आम आदमी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है।
क्या यह सही वक्त नहीं है कि सारे अच्छे लोग जाति धर्म से परे उठ कर अच्छे लोगों को ही चुनाव जीताये चाहे वह किसी भी दल का हो? तभी हम लोकतंत्र को बचा पायेंगे। चुनाव सुधार की प्रक्रिया में तेजी के अलावा आम नागरिक अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभाये?
आज जब सभी दलों का ध्येय सिर्फ सत्ता पाना हो। सत्ता के लिए सिद्यांतो को भूल क्षेत्रिय दलो से हाथ मिला रहे हो न कांग्रेस ही  कांग्रेस रह गई है और न भाजपा ही भाजपा है तब भला इनके सिद्धांतो पर वोट डालने का औचित्य क्या रह गया है।
आज कांग्रेस के साथ कल भाजपा के साथ रह कर जिधर बम उधर हम के सिद्धांत पर चलने वालों की कमी नहीं है और न ही सत्ता के लिए राष्ट्रीय दलों को भी किसी से भी हाथ मिलाने से गुरेज ही रह गया है। ऐसे में आम जनता के सामने स्वत: ही विकल्प खुल गया है कि वह सिंद्धातों की राजनीति की दुहाई देने वाले दलों की बजाय अच्छे प्रतिनिधि का चयन करें।
जनता की जिम्मेदारी तब और भी बढ़ जाती है जब उनके राजनैतिक दल ऐसे लोगों को टिकिट देने से गुरेज नहीं करते जो लोकतंत्र के दुश्मन है और जिनका अपराध से नाता है।
संसद के हर सत्र में तमाशा बन रहे जनप्रतिनिधियों की अपने स्वार्थ के लिए एका भी आश्चर्यजनक है पार्टी नेतृत्व की अक्षमता की वजह से गलत लोग प्रभावशील होने लगे है। नेतृत्वकर्ता कितना भी काबिल हो यदि उसमें कड़ी कार्रवाई करने की क्षमता न हो तो अनैतिक काम करने वालों का ही हौसला बढ़ता है। पिछले दो तीन दशकों में यह बात खुलकर सामने आ चुका है कि ईमानदारी का मतलब चुप्पी नहीं है। लोग तो आज भी कहते हैं कि मनमोहन सिंह अच्छे व्यक्ति है पर मंत्रीमंडल की करतूत पर खामोशी का इस अच्छाई से क्या मतलब है।
लोकतंत्र में सभी की जिम्मेदारी तय है लेकिन हमने देख लिया है कि किसी भी तबके ने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से नहीं निभाई है अब जनता की बारी है कि वह सिद्धांत विहिन राजनैतिक दलों के वोट कमाऊ राजनीति का हिस्सा बनने की बजाय झूठे घोषणापत्र जारी कर सिद्धांत बघारने वाले दलों की बजाय अच्छे जनप्रतिनिधि को चुने भले ही उसकी सरकार न बने पर लोकतंत्र को बचाने का हथियार जरूर बनेगा।