शुक्रवार, 6 मार्च 2020

आयकर छापे के पीछे का सच!


मुख्यमंत्री के करीबियों पर ही क्यों?
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी माने जाने वाले आईएएस अफसरों व महापौर एजाज ढेबर के ठिकानों पर आयकर के छापे की वजह क्या राजनैतिक है या कुछ और? इसे लेकर राजधानी में चर्चा का बाजार गर्म है।
पिछले दिनों आयकर विभाग ने जिस अंदाज में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबियों को अपने निशाने पर लिया है उसे लेकर कांग्रेसी खेमे में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है और इसे राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। जबकि दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी भी आक्रामक मूड में दिख रही है।
आयकर की इस कार्रवाई को राजनैतिक चश्में से देखने की बड़ी वजह कार्रवाई का वह तरीका है जिसमें स्थानीय अधिकारियों को छापे से दूर रखना है। आईएएस विवेक ढांड और अनिल टुटेजा को मुख्यमंत्री का करीबी माना जाता रहा है जबकि एजाज ढेबर की मुख्यमंत्री से राजनैतिक पकड़ किसी से छिपी नहीं है।
सूत्रों की माने तो छापे की बड़ी वजह कांग्रेस को राज्य से जने वाली फंडिग में बाधा डालना है। कहा जाता है कि कांग्रेस को मजबूत करने में जिस तरह से भूपेश सरकार की फडिंग की चर्चा रही है उसे लेकर ही छापे की कार्रवाई की गई है। हालांकि आईपीएस मुकेश गुप्ता और पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के करीबी अफसर अमन सिंह की भूमिका की भी चर्चा है लेकिन छापे की वजह कहीं न कहीं फडिंग है।
इधर यह भी चर्चा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के करीबियों ने रेत और शराब के कारोबार में अनाप शनाप पैसा बनाया है और इसकी चर्चा ने जिस तेजी से जनमानस को घेरे में ले रखा था उसकी शिकायत आयकर विभाग को लगातार मिल रही थी। चर्चा में यह भी कहा जा रहा था कि कांग्रेस पार्टी को इस कमाई का बड़ा हिस्सा दिल्ली भेजा जा रहा है और पार्टी की हालत में सुधार होने से मोदी सरकार के सामने दिक्कतें होने लगी थी। लगातार राज्यों के चुनाव खासकर दिल्ली विधानसभा के चुनाव में पराजय के बाद भाजपा में चिंता बढ़ गई है और आने वाले दिनों में बिहार और बंगाल में होने वाले चुनाव से पहले भाजपा अपने विरोधियों को आर्थिक रुप से कमजोर कर देना चाहती है। हालांकि दिल्ली हो या छत्तीसगढ़ कहीं भी पैसों की ताकत काम नहीं आई लेकिन फिर भी भाजपा को भरोसा है कि पैसों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
इधर छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के करीबियों के ठिकानों पर आयकर छापे को राजनैतिक ढंग से भी देखने की कोशिश शुरु हो गई है। छापे की कार्रवाई की चपेट में शराब कारोबारी पप्पू भाटिया और होटल व्यवसायी गुरुचरण होरा के भी चपेट में आने को लेकर बाजार में चर्चा गर्म है। कहा जा रहा है कि भाजपा शासनकाल में भी इन दोनों व्यवसायियों का संबंध भाजपा के दिग्गज नेताओं से रहा है और सत्ता बदलते ही जिस तरह से इन दोनो ने जिधर बम उधर हम की नीति अख्तियार की थी उससे इनके खिलाफ भी आक्रोश था। बहरहाल यह ऐसा सच है जो साबित किया ही नहीं जा सकता है।
अब बेचने का कुछ नहीं रहा तो छापे से फंडिग...
राजधानी में मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वालों के ठिकानों में आयकर की दबिश को लेकर सोशल मीडिया में चल रहे चर्चा भी रोचक और मजेदार है। एक ने लिखा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बेचने के बाद भी जब फंडिग की कमी बनी हुई तो मोदी सरकार ने फंडिग जुटाने आयकर विभाग का सहारा लिया है।

ईतवारी घलो ल देशद्रोही बना दिन...



नवा नवा सरपंच बने ईतवारी ह जोरदार मड़ई के आयोजन करे रीहिस। गांव ल तोरण झंडा ले सजाय रीहिस, घर घर म उत्साह रीहिस, सगा पहुना के अवई जवई म गांव ह महरत रीहिस, मझनियाच ले किसिम किसिम के दुकान सजे लगीस, मंदहा मन अपन म मगन रीहिन त जुआ चित्ती वाला मन घलो अपन डेरा जमाय के जतन कर ले रीहिन, रातभर नाचा देखे के खुशी माई लोगन मन के चेहेरा म झलकत रीहिस।
जइसे जइसे बेरा ह खिसकत रिहिस तइसे तइसे बजार ह झमाझम होय लागीस आसपास के दसो गांव के मनखे मन घलो जुटीयाय लगीस। सांझ होवत होवत बजार म मनाखेच मनखे दिखे लागीस। ईतवारी के रुतबा ह अलगेच दिखत रहाय। पहली बार गांव म कोनो पढ़े लिखे सरपंच बने हे तेखर सेती ए दारी के मड़ई ह कुछ अलगेच रीहिस। बजार ह त बढिय़ा बइठे रीहिस। मंच ह घलो अलगेच सजे रीहिस। लइका मन के अपन अलगेच दुनिया होथे, कोनो कुछु ल निहारय त कोनो कुछु ल छु-छु के देखत रहाय। छु-छुअऊल खेलत लईका मन ह मंच म घलो चढ़ जाए त गिरत हपटत कुधरा म सनावत रहाय। गांव भर के ये तिहार के मजा कुछ अलेगेच होथे।
रात के नाचा रीहिस अऊ नाचा देखे बर जगह पोगराय बर लइका मन ह बोरा धर धर के आय लगीन। मंच म बाजा-गाजा बाजे लगीस। बीच-बीच म कोनो कोनो लइका मन मटके घलो लगय। नाचा पार्टी ह मंच के पाहु सजे संवरे लग गे। नाचा के पहिली सरपंच ईतवारी ह भाषण बाजी बर क्षेत्र के विधायक ल घलो बुलवा ले रीहिस। विधायक के आते ही गहमा गहमी शुरु होगे। मंच में सजे कुर्सी म जम्मो अतिथिमन ल बइठारे के बाद स्वागत भाषण दे बर इतवारी ह खड़े होईस त गांव वाला मन उत्साह म ताली बजाईन।
ईतवारी ह जय छत्तीसगढ़ ले शुरु करके विधायक ले गांव के विकास बर कई ठन मांग करीस एखर बाद विधायक ह भाषण दे बर खड़ा होईस त बाजू गांव ले आये जीवराखन ह विधायक ल बके झके लग गे। दू चार झन वोला चुप कराय बर गिस त ओ ह मुख्यमंत्री मुर्दाबाद विधायक मुर्दाबाद के नारा लगाय लगीन। जीवराखन के डहार ले घलो चार छ: झन खड़ा होके किसान मन उपर लाठी चार्ज अउ वादा खिलाफी करे के नारा लगात लगात मोदी जिन्दाबाद, भारत माता की जय के नारा लगाय लगीन त ईतवारी ह ओखर मन तीर जाके हाथ जोड़े लगीस। विधायक ह त हंगामा ल देख चुपचाप कब खिसकिस पता नई चलीस लेकिन आधा एक घंटा के बाद हंगामा ह शांत होईस त ईतवारी ह माईक म सब झन ल कले चुप बइठे ल कीहिस अऊ हंगामा के निंदा करे लगीस। ईतवारी के मन ह हंगामा के सेती उचट गे रीहिस वो ह मढ़ई तिहार ल राजनीति के अड्डा बनाय के निंदा करत हुए बोलिस भारत माता के जय अऊ मोदी जिन्दाबाद से कोन ल इंकार हो सकत हे। मोदी देश के प्रधानमंत्री हे। हमर मन के प्रधानमंत्री हे लेकिन राजनीति के चक्कर म हमन अपन सुख-दुख चैन ल काबर गंवावन। अतेक सुंदर आयोजन ल काबर खराब करन। लेकिन आजकल जेन हिसाब से राजनीति चलत हे ये ह ठीक नई हे। मोदी के चक्कर म हमन काबर लड़त झगड़त हन। ये गांव म जम्मो जात अऊ धरम के मनखे रथे। एक दूसर के सुख दुख म शामिल होथे। कखरो तिहार होवय मिल जुल के मनाथन। लेकिन जब ले ये मोदी सरकार आय हे कुछ न कुछु बात म झंझट होय लगे हे। जेन गांव म आज तक पुलिस नई आय हे अइसने लड़बो त ये गांव के का होही। ये देश ह गांधी के देश हे अऊ हमन गांधी के राह म चलबो। गांव के विकास करबो। पाकिस्तान अऊ हिन्दुस्तान के बंटवारा ह भाई बंटवारा हे। लड़ई भाई-भाई में होवत रथे लेकिन एखर ए मतलब नई हे के हमन अपना काम धाम ल छोड़ एक दूसर के जिन्दाबाद मुर्दाबाद करत रहन। पाकिस्तान बर हमर सेना काफी हे। हमर सेना निपट लिही लेकिन पाकिस्तान के चक्कर म जम्मो मुसलमान ल बैरी समझ लेना गलत हे। अब समय आगे हे जैइसे जर्मनी एक होगे वइसे भारत-पाकिस्तान ेक हो जाए। भारत जिन्दाबाद रहे पाकिस्तान जिन्दाबाद रहे तभे त हमन  एक होबो अऊ तरक्की करबो।
ईतवारी के पाकिस्तान जिन्दाबाद रहे के बात म फेर हंगामा शुरु होगे अऊ जीवराखन ह फेर हंगामा करे लगीस। अऊ ईतवारी ल देशद्रोही बताय लगीस। कोनो ह पुलिस ल फोन कर दिस पहली बार गांव म पुलिस आईस अऊ ईतवारी ऊपर देशद्रोही के जुर्म दर्ज कर गिरफ्तार कर लीन।

सोमवार, 17 जून 2019

मोदी सरकार के मंत्रियों पर लगभग सभी तरह के अपराधिक मामले

0 सर्वाधिक भाजपा के 116 सांसदों पर आपराधिक मामले, कई गंभीर
0 223 सांसदों पर आपराधिक मामले, हर चुनाव बाद बढ़ रहे है ऐसे सांसद
विशेष प्रतिनिधि
देश के लोकतंत्र का मंदिर माने जाने वाले संसद में हर चुनाव के बाद अपराधिक मामले वाले सांसदों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इस बार तो मोदी सरकार के 22 मंत्रियों पर भी आपराधिक मामले चल रहे हैं जिसमें 16 मंत्रियों पर तो अत्यंत गंभीर मामले है। कुछ मंत्री तो हिस्ट्रीशीटर भी हैं।
राजनीति के अपराधीकरण को हटाने लेकर राजनैतिक दलों का रवैया ठीक इसके उलट नजर आ रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि जैसे जैसे देश साक्षर की ओर बढऩे की बात कर रहा है वैसे वैसे हर चुनाव के बाद लोकसभा में पहुंचने वाले आपराधिक मामलों के सांसदों की संख्या बढ़ते ही जा रही है। हैरानी की बात तो यह है कि सरकार में ऐसे गंभीर अपराधिक मामले वालों को मंत्री तक बना दिया जाता है। ऐसे में कानून व्यवस्था का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
मोदी सरकार में इस बार 22 ऐसे लोगों को मंत्री बनाया गया है जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं इनमें से 16 पर तो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर आरोप बताये जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक उड़ीसा से सांसद बने प्रताप सारंगी पर 7 तरह के गंभीर प्रकरण दर्ज है और ऐसे लोगों को भाजपा में उड़ीसा का मोदी कहकर महिमा मंडन किया जाता है। 
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेसी रिफार्म के रिपोर्ट के मुताबिक हैरानी की बात तो यह है कि ऐसे आपराधिक मामले वाले सांसदों के प्रकरणों को निपटाने की मांग की जाती रही है। लेकिन कुछ नहीं होता। 2014 में संसद में अपने पहले भाषण में ही प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले में लम्बा चौड़ा वक्तव्य देकर प्रकरणों के शीघ्र निराकरण के लिए विशेष पहल की बात कही थी लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। बहरहाल मोदी सरकार में जिस तरह से गंभीर आपराधिक मामले वालों को मंत्री बनाया गया है वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि सरकार की मंशा पर भी सवाल उठा रहे हैं।

रविवार, 16 जून 2019

पैसा है तो पढ़ाई

मोदी सरकार में पैसा है तो शिक्षा है
नहीं तो स्कूलों में नाश्ता खाना तो है ही!
0 निजी शिक्षण संस्थाओं को फीस बढ़ाने की खुली छूट
0 स्वायत्तता, निजी संस्थानों व कार्पोरेट को प्राथमिकता
0 इन्फ्रास्ट्रक्चर और रिक्त पदों के लिए पैसा नहीं
0 हर जिले में हायर एजुकेशन की बात लेकिन जमीन नहीं
0 त्रिभाषा फार्मूला, फ्रेंच, जर्मन सहित कई विदेशी भाषा में शिक्षा
0 स्कूली शिक्षा में बड़ा बदलाव- 5+3+3+4
0 मिशन तक्ष शिक्षा- मिशन नालंदा
0 प्राथमिक शाला के बच्चों को मध्यान्ह भोजन के पहले नाश्ता भी
30 जून तक सुझाव मांगे गये हैं फिर लागू होगा
विशेष प्रतिनिधि
मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति के एक बात स्पष्ट कर दी कि सरकारें किसी की भी हो शिक्षा को लेकर उनका रवैया दोयम दर्जे का ही रहेगा। नई शिक्षा नीति में शिक्षा को लेकर सरकार का रवैया भी स्पष्ट हो गया है कि वे शिक्षा का स्तर तो बढ़ाना चाहते हैं लेकिन उनके पास पैसा नहीं है ऐसे में वह धीरे-धीरे निजी संस्थाओं, स्वयत्तता और कार्पोरेट पूंजी को प्राथमिकता देंगे। यदि आपके पास पैसा है तो उच्च शिक्षा ग्रहण करे वरना सरकार प्राथमिक शालाओं में नाश्ते में दूध केला और भोजन में दाल चावल देकर पेट भर रही है और मानसिक विकास तो हो ही जायेगा।
मोदी सरकार ने सत्ता में बैठते ही इस देश की नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी। 640 पृष्ठ के नई शिक्षा नीति के इस मसौदे में देश को सुपर नॉलेज पॉवर बनाने का सपना तो देखा गया है लेकिन बगैर पैसों का यह सब कैसे होगा यह चिंता का विषय है। क्योंकि यदि नीति का क्रियान्वयन ईमानदारी से किया जायेगा तो जो पैसे चाहिए उसका बीस फीसदी ही शिक्षा बजट है। ऐसे में नई शिक्षा नीति भी पिछले दोनों शिक्षा नीतियों की तरह मृगमरिचिका बनकर रह जाने वाला है। जबकि उच्च शिक्षा में जिस तरह से कार्पोरेट सेक्टर को आमंत्रित किया जा रहा है वह नए तरह के खतरे का संकेत है। शिक्षा नीति में भोजन के साथ नाश्ते का जिक्र तो किया गया है लेकिन शिक्षा के बाद रोजगार का क्या होगा इसका कहीं जिक्र नहीं है। नई शिक्षा नीति में इस बात का भी जिक्र नहीं है कि हर साल देश की लाखों प्रतिभा दूसरे देशों में पलायन कर रही है उसे कैसे रोका जाए और सबसे दुखद तो यह है कि निजी स्कूलों तक को फीस की खुली छूट दे दी गई है।
देश की पहली शिक्षा नीति 1968 में आई थी और इसके बाद 1986 में बनी। 1992 में संशोधन हुई तो अब तीसरी शिक्षा नीति 2019 में आई है। शिक्षा के गिरते स्तर पर सवाल उठाकर संसद तक ठप्प करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अब जब नई शिक्षा नीति की घोषणा की है तो यह नीति भी पिछले नीतियों से ज्यादा कुछ अलग नहीं है। हैरानी की बात तो यह है कि नई शिक्षा नीति में सुपर नॉलेज पावर बनाने का जो सपना देखा गया है उसे पूरा करने का कोई ठोस उपाय भी नहीं दिया गया है। हालांकि इसे मिशन तक्षशिला और मिशन नालंदा का नाम देकर इतिहास के वैभव को याद तो किया गया है लेकिन यह बगैर पैसों का कैसे पूरा होगा यह सबसे बड़ा सवाल है।
640 पृष्ठ के इस मसौदे में सरकार ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर 12वीं तक की शिक्षा के लिए इन्फ्रास्क्ट्रक्चर ही नहीं है। यही नहीं पांचवी के बाद 5 फीसदी, आठवीं के बाद करीब 30 फीसदी और 10वीं के बाद लगभग 49 फीसदी तथा बारहवीं के बाद करीब 90 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। हालांकि पढ़ाई छोडऩे का कोई स्पष्ट कारण सरकार ने नहीं बताया है। लेकिन सच तो यह है कि पढ़ाई छोडऩे की बड़ी वजह गरीबी के अलावा स्कूल कालेज की दूरी भी है। जब बच्चों को शिक्षा के लिए 20 किलोमीटर तक रोज जाना पड़े तो गांव का बच्चा यह सब कैसे कर सकता है। नई शिक्षा नीति में इसके कोई उपाय नहीं दिये हैं। यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर आज से खड़ा भी किया जायेगा तो सरकार के पास जब पैसा ही नहीं है तो वह इसे कैसे करेगी।
यही नहीं जिस त्रिभाषा को लेकर 1968 में विवाद हुआ था और सरकार को कदम वापस लेने पड़े थे उसी त्रिभाषा का बेवजह जिक्र कर दक्षिण के राज्यों में विवाद और तनाव was की कोशिश की गई। इसी तरह 1995 से स्कूलों में लागू मध्यान्ह भोजन को अपर्याप्त मानते हुए नाश्ते भी देने का जिक्र किया गया है शिक्षा पर बात करते समय नाश्ते का जिक्र हैरानी भरा फैसला है जबकि अब तक मध्यान्ह भोजन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के कंधे पर है और उनसे मध्यान्ह भोजन के अलावा दूसरे भी काम कराये जाते हैं इससे रुष्ठ देशभर के  आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आंदोलित है। इनका कहना है कि उनका वेतन बढ़ा जाए क्योंकि सरकार उनसे कई तरह का काम लेती है जिसकी वजह से उन्हें अपने घर परिवार के लिए समय ही नहीं मिल पाता। उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पंजाब, राजस्थान सहित कई राज्यों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आंदोलित है।
नीति का सबसे दोषपूर्ण पहलू यह है कि उच्च शिक्षा में कार्पोरेट जगत को लाने की कोशिश है ऐसे में पहले ही महंगी शिक्षा से त्रस्त लोगों के लिए यह कठिन हो जायेगा। जबकि शिक्षा के बाद रोजगार को लेकर नई शिक्षा नीति में कोई खास प्रावधान ही नहीं किया गया  है। एक आंकड़े के मुताबिक एमबीए करने वाले 90 फीसदी व इंजीनियरिंग करने वाले 70 फीसदी बच्चे पढ़ाई के बाद या तो बेरोजगार हो जाते है या अपनी पढ़ाई वाले कार्य को छोड़ दूसरा कार्य करते हैं। इसी तरह सीए से लेकर दूसरी तकनीकी शिक्षा का हाल है।
उच्च शिक्षा में पढ़ाई का हाल किसी से छिपा नहीं है। विश्वविद्यालयों में 70 से 80 फीसदी पद रिक्त हैं और इन्हें भर्ती के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। इसी तरह नई शिक्षा नीति में स्वायत्तता जैसी बात कही गई है यानी कुल मिलाकर नई शिक्षा नीति से पढ़ाई और महंगी होगी। यही नहीं निजी स्कूलों को फीस की खुली छूट दे दी गई है लेकिन कहा गया है कि फीस बढ़ाने में मनमानी न करे अब यह मनमानी कहां तक सीमित है कोई कैसे बता सकता है। नई शिक्षा नीति में जिस तरह से फीस बढ़ाने का अधिकार निजी संस्थानों को दिया है उसके बाद तो यह तय माना जा रहा है कि अब आने वाले दिनों में वही शिक्षा लेगा जिसके पास पैसा होगा। 
बहरहाल मोदी की सरकार की इस शिक्षा नीति को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं देखना है कि 30 मई को जारी इस ड्राफ्ट में 30 जून तक मांगे गये सुझाव को कैसे माना जायेगा। हालांकि यह ड्राफ्ट 2016 में ही तैयार हो गई थी।

मंगलवार, 7 मई 2019

झूठ बोलो, झूठ बोलो और सिर्फ झूठ बोलो!

झूठ बोलो, झूठ बोलो और सिर्फ झूठ बोलो...
केन्द्र की सत्ता के लिए संघर्ष चरम पर है, अमर्यादित भाषा ने अपनी सारी सीमाएं लांघ दी है, और इसमें कोई दल अछूता नहीं रह गया है। अमर्यादित भीड़ के बीच सोशल मीडिया और वाट्सअप युनिर्वसिटी के जरिये जिस तरह से झूठ परोसा गया वह भी इस चुनाव की पहचान बनी है।
वाट्सअप ने तो बकाया देशभर के सभी समाचार पत्रों और चैनलों में विज्ञापन देकर लोगों से अपील की है कि अफवाहें नहीं खुशियां बांटिये। वाट्सअप के इस विज्ञापन देने की वजह से आप जान सकते हैं कि मामला कितना गंभीर है और अफवाहें किस स्तर पर जाकर फैलाई जा रही है। 
चुनावी फायदों के लिए जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ है वह भी चुनाव आयोग के लिए चुनौती तो है ही राजनैतिक दलों के लिए भी गंभीर चुनौती है। एक तरफ जब चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने नए-नए नियम कानून बना रही है तब दूसरी तरफ सोशल मीडिया का इस्तेमाल चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के लिए किया जाना लोकतंत्र के मूल्यों पर प्रहार है।
अमर्यादित भाषा को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कड़ा रुख अख्तियार तो किया है लेकिन इससे उन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा है जो अमर्यादित भाषा के लिए जाने जाते है और न ही राजनैतिक दलों को ही कोई फर्क पड़ा है। राजनीति के गिरते स्तर को अभी और गिरते हुए देखना लोगों की मजबूरी है।
लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि इसमें वे लोग भी शामिल होते चले जा रहे हैं जिन्हें राजनीति से कोई खास लेना देना नहीं रहा है। सोशल मीडिया ने तो अफवाह उड़ाने की मशीन बन कर रह गई है। विभिन्न पार्टियों के आईटी सेल के द्वारा वाट्सअप युनिर्वसिटी के जरिये जिस तरह से झूठ परोसा जा रहा है आने वाले वक्त में इसका भयंकर दुष्परिणाम होंगे।
चुनाव तो इस देश में होते रहेंगे लेकिन सत्ता संघर्ष से जिस तरह से आम लोगों में वैमनस्यता का जहर बोया जा रहा है वह इस देश को कहां ले कर जायेगा? कहना कठिन है।
इस चुनाव में नफरत की फैक्ट्री का संचालन किया गया। ये कौन लोग है किसी से छिपा नहीं है। भक्तों की लंबी फेहरिश्त है और उनके सोशल साइट्स  पर आप जाकर देख सकते है कि वे किस हद तक गिरते चले जा रहे है। इससे पहले भी इस देश में चुनाव हुए हैं लेकिन ऐसी कटुता कभी नहीं रही।
संतोष सिंह ने तो फेसबुक में यहां तक लिख दिया कि 23 मई के बाद भक्तों से नाता खत्म। सुख-दुख में भी आना-जाना बंद। योगिता बाजपेयी ने तो आज से ही समाप्त करने की घोषणा की तो कमल शुक्ला ने यहां तक लिखा कि जिन भक्तों को वे पसंद नहीं उनके फ्रेंड लिस्ट से हट जाए। ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जो मौजूदा वक्त में कटुता की पराकाष्ठा को इंगित करता है। सिर्फ असहमति होने पर गाली गलौज और धमकी से कोई अछूता नहीं रहा है और नफरत की फैक्ट्री चलाने वालों का तो एक ही काम था कि झूठ बोलो, झूठ बोलो और सिर्फ झूठ बोलो!

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

राज्य सत्ता के साथ रहे हैं नतीजे


लोकसभा में भाजपा की राह आसान नहीं
लोकसभा चुनाव को लेकर छत्तीसगढ़ में इस बार भी मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है और अब तक के नतीजों में उसी पार्टी को फायदा मिला है जिसकी राज्य में सत्ता रही है। ऐसे में जब सरकार कांग्रेस की है तो क्या इस बार भी लोकसभा में कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलेगी।
छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव इसलिए भी रोमांचक हो गया है क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस ने भारी बहुमत से सकार बनाई है और इस उत्साह के चलते कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेलजहां 11 में से 11 सीटें जीतने का दावा कर रही है तो भाजपा अब भी कुछ नहीं बोल पा रही है।
छत्तीसगढ़ में तीन चरणों में मतदान के लिए दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। भारतीय जनता पार्टी ने जहां सभी सीटों पर नये चेहरा उतारते हुए पुराने सभी दस सांसदों की टिकिट काट दी है तो कांग्रेस ने भी सभी सीटों पर रणनीतिक दांव खेला है। पिछले चुनाव में छत्तीसगढ़ में 10 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी तो कांग्रेस केवल दुर्ग सीट जीत पाई थी। यहां से चुनाव जीतने वाले ताम्रध्वज साहू राज्य की सत्ता में आ गए। इसलिए दुर्ग में भी कांग्रेस ने नये चेहरे दिये हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति पर नजर डाले तो राज्य बनने के बाद यहां हुए पहली लोकसभा चुनाव बेहद दिलचस्प रहा और इस चुनाव में भाजपा ने दस सीटें जीती। भाजपा को केवल महासमुंद सीट से पराजय मिली। जहां से अजीत जोगी चुनाव जीते थे। भाजपा की राज्य सत्ता के बीच हुए इस चुनाव के बाद हुए दूसरे चुनाव में भी भाजपा ने दस सीटे जीत कर प्रदर्शन को दोहराया लेकिन इस बार कांग्रेस के चरणदास महंत ने कोरबा से जीत दर्ज की जबकि तीसरे चुनाव में कांग्रेस दुर्ग सीट ही जीत पाई।
तीनों चुनाव के दौरान भाजपा की राज्य में सरकारें थी और इसका फायदा भाजपा को मिला लेकिन इस बार राज्य की सत्ता कांग्रेस के पास है और ऐसे में पिछले तीन चुनाव से दस सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए प्रदर्शन दोहरा पाना आसान नहीं है। अब तक के नतीजों से यह बात तो स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव का परिणाम राज्य सत्ता के अनुरुप रहा है यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सभी सीटें जीतने का दावा कर रहे है जबकि भाजपा ने शायद यही वजह से अपने सभी सांसदों की टिकिट काटकर नये सिरे से रणनीति बनाई है।
इधर राजनीति के जानकारों का दावा है कि विधानसभा चुनाव में जिस तरह से कांग्रेस ने 68 सीट जीतकर भाजपा को पटखनी दी है उसके सदमें से भाजपा अभी भी उबर नहीं पाई है और यही वजह है कि नामांकन रैलियों में भी भाजपा के कार्यकर्ता उत्साहित नहीं दिखते। नामांकन रैलियां में जिस तरह से कांग्रेस में भीड़ दिख रही है वह एक संकेत माना जा रहा है। 

रविवार, 17 मार्च 2019

विरासत संस्कृति और काशी...



अब तक सरकारों पर जल-जंगल जमीन और आदिवासी संस्कृति को समाप्त करने का आरोप लगता रहा है लेकिन बनारस के सौंदर्यीकरण के नाम पर जो कुछ काशी में हुआ उससे हमारी सभ्यता, संस्कृति और विरासत पर खतरे के बादल मंडराने लगे है और यह सब वह सरकार कर रही है जो भारतीय संस्कृति की झलक के रुप में अपनी पहचान बताने की कोशिश करती है।
काशी में जिस तरह से सौंदर्यीकरण का खेल खेला गया वह हैरान और परेशान करने वाला इसलिए भी है कि आज पूरी दुनिया में प्राचीन धरोहरों, संस्कृति और शहरों को बचाने के उपाय किये जा रहे है। अपनी पुरानी पहचान को बनाने के इस जद्दोजहद में पुरातत्व विभाग से लेकर दुनियाभर के लोग लगे हैं तब सिर्फ एक सोमनाथ मंदिर की भव्यता को रेखांकित करने पुराने शङर को ही मिटा देने का काम शर्मनाक है जिस पर संस्कृति की दुहाई देने वालों का मौन इतिहास कभी नहीं भूलेगा और समय आने पर यह सवाल भी पूछा जायेगा कि हमारी प्राचीन पहचान को मिटा देने का अधिकार किसने दिया?
काशी आज से 7 साल पहले जब हम गये थे तब वहां पहुंचे विदेशी सैलानियों से जब हमने पूछा था कि वह काशी क्या बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने आये हैं तब उनका उत्तर सुन हम हैरान थे और तब काशी को नये तरह से जानने की जिज्ञासा हुई थी। उस विदेशी ने कहा था 'काशी हम गंगा और यहां की गलियों में बसे शहर और 33 करोड़ देवी देवताओं को देखने समझने आये हैं।Ó  तब अनायास हमारा ध्यान गया था कि काशी की सिर्फ बाबा विश्वनाथ की नगरी नहीं है यह तो हमारी विरासत है हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। छोटी-छोटी गलियों में विराजमान 33 करोड़ देवी देवताओं के प्रति हर गुजरने वालों की श्रद्धा ने ही इस प्राचीन नगरी को विश्व में अलग पहचान दी है। दुनिया के प्राचीन शहरों में गिना जाने वाला इस शहर को जब बदला जाने लगा तब किसी ने शोर क्यों नहीं किया। वहां रहने वालों ने इस बदलाव पर अपनी जुबान पर क्यों ताला लगाकर खून का आंसू टपकाते रह गये यह भी सवाल इतिहास में पूछा जायेगा।
इस बदलाव की वजह से बाबा विश्वनाथ अब अकेले हो गये हैं और पुराना काशी तस्वीरों और स्मृतियों में शेष रह जाएगा। पुराना चला गया और वर्तमान जो है क्या वह अंतिम विकल्प है। पौराणिक मान्यता और काशी के भीतर होने वाली अंतरग्रही यात्रा का क्या होगा। दीवारों और हर घर में मंदिर के इस शहर में हर कोई सेवाभाव से आते थे। काशी में स्वर्गद्वार यानी मोक्ष द्वार भी बने थे। घाट किनारे से बाबा विश्वनाथ तक गलियों की दीवारों में भी मंदिर थे और गलियों के कारण ही जिस काशी की विश्वव्यापी पहचान थी और विदेशी इन गलियों को देखने ही आते थे जो देश में और कहीं नहीं देखने को मिल सकता है। वहां के लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि शरीर से प्राण निकाल दिया गया है। जहां 33 करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियां ही हटा दी गई यानी 33 करोड़ देवी-देवता ही नहीें रहेंगे तो काशी का क्या मतलब?
सवाल अनेक है लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर इस तरह की प्राचीन शहरों की रक्षा कैसे हो। विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर कब तक सभ्यता का विनाश होता रहेगा। आने वाली पीढ़ी क्या देखेंगी? क्या वह समझ भी पायेगी कि भारतीय प्राचीन शहर कैसे होते थे? और सबसे बड़ा सवाल तो यह भी उठेगा की आखिर संस्कृति की दुहाई देने वाले ही सांस्कृतिक शहर को कैसे नष्ट करने का काम किया।