बुधवार, 18 मार्च 2020

ये क्या हो रहा है कप्तान साहेब!


पीडि़तों को प्रताडऩा, अपराधियों से सेटिंग
छत्तीसगढ़ की राजधानी में पुलिस का हाल बुरा है। वर्दी की आड़ में कमाई का जरिया बना चुके विभिन्न थानों में पीडि़तों की जहां सुनवाई नहीं हो रही है वहीं अपराधियों से सांठ-गांठ कर मामले को रफा-दफा करने का खेल खुले आम चल रहा है। हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीडि़तों को मुख्यमंत्री और राज्यपाल से गुहार लगाना पड़ रहा है तो मुख्यमंत्री को चेतावनी देनी पड़ रही है।
नेहा की सुनवाई कब?
होटल गिरिराज की डायरेक्टर नेहा पुरोहित का जीना दूभर हो गया है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद है कि उनकी शिकायतों को पुलिस नजरअंदाज कर देती है। उनकी बिटिया से छेड़छाड़ होती है। सीसीटीवी के सबूत भी पुलिस के सामने कोई मायने नहीं रखता और अपराधिक तत्व थाने में घुसकर पुलिस के सामने नेहा से बदतमीजी करते है। पुलिस नेहा की शिकायत पर रिपोर्ट लिखना तो दूर उल्टे उसी के खिलाफ रिपोर्ट लिखना तो दूर उल्टे उसी के खिलाफ रिपोर्ट लिख देती है। हालत यह है कि वे राज्यपाल तक से न्याय की गुहार लगा चुकी है लेकिन कुछ नहीं हुआ। हालांकि वह परिवारवाद दायर करने की मन बना चुकी है लेकिन थानों की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस किस तरह दबंगों का साथ देती है। इस मामले का एक पहलू यह भी है कि उसकी लड़ाई सम्पत्ति को लेकर अपने भाई से ही है और पुलिस खुलकर अपराधियों का साथ दे रही है।
शराब लॉबी से सेटिंग
पिछले दिनों पुलिस ने हरियाणा से ट्रक में आई 22 लाख की शराब जब्त करने के लिए अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त रही और जनता भी पुलिस की इस कार्रवाई की सराहना कर रही है लेकिन इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह है कि शराब मंगाने वाले मुख्य आरोपी अभी भी पुलिस के गिरफ्त से बाहर है। रसूखदार माने जाने वाले इस अपराधी को गिरफ्तारी से बचाने में पुलिस के आला अधिकारी ही नहीं कांग्रेस के कुछ नेता भी लगे हैं। सूत्रों की माने तो सौदेबाजी का बड़ा खेल चल रहा है। बताया जाता है कि एक विशेष व्यवसायिक वर्ग से जुड़े इस शराब माफिया से दस लाख रुपये लिए जाने का हल्ला है हालांकि हमारे सूत्रों का कहना है कि अभी सेटिंग का खेल चल रहा है।
शराब की अवैध बिक्री को लेकर प्रदेश में जिस तरह का खेल आम चर्चा का विषय बना हुआ है और मुख्यमंत्री से लेकर डीजी तक बिफरे हुए हैं उसके बाद भी थाना या सीएसपी स्तर पर सेटिंग की खबरों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस के हौसले किनते बुलंद हैं।
आरोपी को भगा दिया
तीसरा मामला नकली हवा कारोबार से जुड़ा है। मुखबिर की सूचना पर पिछले दिनों देवपुरी के एक गोदाम में छापा मारकर दो दर्जन कार्टून नकली दवाओं का जब्त तो किया गया लेकिन सूत्रों का दावा है कि जब्ती के दौरान वहां मौजूद मुख्य आरोपी श्रवण कुमार मंधानी उर्फ शिशुपाल को पुलिस के एक सिपाही ने महज पांच हजार लेकर भगा दिया। यही नहीं जिन निजी दवा दुकानों को यह दवाईयां बेची गई है उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है।
बहरहाल ये तीन घटनाएं बताती है कि पुलिस की कार्यप्रणाली राजधानी में कैसे चल रही है और सिका दुष्परिणाम क्या होगा? क्या इससे सरकार की बदनामी नहीं होगी?

मंगलवार, 17 मार्च 2020

निगम मंडल के लिए धड़कने तेज़


बजट सत्र समाप्ति की ओर है वैसे-वैसे निगम मंडल में नियुक्ति चाहने वाले कांग्रेसियों की धड़कने तेज होने लगी है। गणेश परिक्रमा के इस दौर में किसे लालबत्ती नसीब होती यह तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ही पता है लेकिन इस नियुक्ति को लेकर अधिकारियों की भी रूचि देखने को मिल रही है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कांग्रेसियों में लालबत्ती पाने होड़ मची हुई है और सवा साल होते-होते कई कांग्रेसियों की नियुक्ति टलने की पीड़ा भी बाहर आने लगी है। लोकसभा चुनाव और नगरीय निकाय में चुनाव की वजह से नियुक्ति का मामला टलते रहा है और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की बजट सत्र के बाद नियुक्ति की घोषणा से कांग्रेसी खेमे में हलचल बढ़ गई है।
सूत्रों की माने तो संगठन से जुड़े नेताओं की रूचि इसमें अधिक है। संगठन से जुड़े एक नेता का कहना है कि संघर्ष करने के दिन अब खत्म हो गये है और संघर्ष के बाद मिली सत्ता का लाभ अब उन्हें मिलना चाहिए। बताया जाता है कि एक अनार सौ बीमार की तर्ज पर कई नेता लालबत्ती के लिए लग गये हैं। हालांकि वे जानते हैं कि नियुक्ति भूपेश बघेल को ही करना है इसके बावजूद वे दूसरे प्रभावशाली नेताओं की गणेश परिक्रमा से भी नहीं चुक रहे हैं। कांग्रेस के अदरूनी सूत्रों की माने तो संगठन के कई प्रभावशाली नेताओं की रूचि भी बड़े निगमों पर है। जिन निगमों को मलाईदार माना जाता है उसमें सबसे प्रमुख खनिज निगम, गृह निर्माण मंडल, बेवरेज कार्पोरेशन, पर्यटन मंडल के अलावा रायपुर विकास प्राधिकरण भी शामिल है और इन निगमों पर कांग्रेस के महामंत्री गिरिश देवांगन, कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, प्रवक्ता शैलेष नीतिन त्रिवेदी, आरपी सिंह, अजय साहू के अलावा पुराने दिग्गज राजेन्द्र तिवारी, सुभाष धुप्पड़, गजराज पगारिया के अलावा दो दर्जन से अधिक दावेदार है। दौड़ में वैसे तो वे लोग भी शामिल है जो चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हुए है लेकिन इन्हें लेकर कांग्रेस के भीतर खाने में भी विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो निगम मंडलों में नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्री ने सूची को अंतिम रुप दे दिया है और सिर्फ घोषणा करना ही शेष है। हालांकि निगमों में नियुक्ति को लेकर चर्चा इस बात की भी है कि हाईकमान का हवाला देकर सूची को कुछ दिन और लटकाया जा सकता है। 
बहरहाल कांग्रेसियों की धड़कने तेज हो चुकी है और देखना है कि नियुक्ति के बाद इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।

बेरोजगारों को भी नहीं छोड़ रही मोदी सरकार, अरबों की वसूली

 

0 अकेले रेलवे ने वसूले हजार करोड़ से अधिक
0 न परीक्षा ली न नौकरी दी
कौशल तिवारी
नोटबंदी और जीएसटी के चलते देश की खराब होती आर्थिक हालत के बीच केन्द्र सरकार ने बेरोजगारों को भी ठगना शुरु कर दिया है। नौकरी देने के नाम पर बेरोजगारों से भी कमाई की जा रही है। अकेले रेलवे ने रिक्त पदों में भर्ती के नाम पर एक हजार करोड़ से अधिक की राशि बेरोजगारों से वसूल किये हैं और साल बीत जाने के बाद भी न परीक्षा हुई न भर्ती।
देश की जर्जर होती आर्थिक हालात को लेकर सरकार की रीति नीति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपनी हर योजना को गरीबों से जोड़ती तो है लेकिन इसकी आड़ में कुछ चहेते कार्पोरेट घरानों को ही फायदा पहुंचाती है। नोट बंदी करते समय भी इसे गरीबों के हित और बड़े लोगों के खिलाफ बताकर खूब प्रचार प्रसार किया था लेकिन इसका सर्वाधिक नुकसान किसे हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। नोटबंदी के चलते देश के अर्थ तंत्र को जो झटका लगा जिससे रोजगार के क्षेत्र में नया संकट खड़ा हो गया।
इधर केन्द्र सरकार ने भर्ती परीक्षा के नाम पर जिस तरह से बेरोजगारों को भी लुटने का निर्णय लिया है वह हैरान कर देने वाला है। रोजगार का संकट चरम पर है और सरकार रोजगार देने की स्थिति में नहीं दिख रही है। ताजा मामला रेल्वे भर्ती बोर्ड का है। रेल मंत्री पियूष गोयल ने पिछले साल यानी 2019 में रेल्वे में रिक्त पदों में चार लाख भर्ती करने की घोषणा की थी। इसके बाद रेल्वे ने बेरोजगारों से कमाने का नया तरीका ईजाद किया।
रेल्वे भर्ती बोर्ड ने रिक्त पदों की भर्ती के लिए आवेदन मंगाये और कहा कि नान टेक्नीशियन वाले 35 हजार और ग्रुप डी के एक लाख पदों पर भर्ती की जानी है। इसके तहत पांच सौ रुपए का ड्राफ्ट भी आवेदकों यानी बेरोजगारों से मांगा गया। आवेदन आन लाईन भी किया जाना था। आप विश्वास करेंगे कि इन विभिन्न पदों के लिए लगभग 2 करोड़ 49 लाख आवेदन देशभर से आये और पांच सौ रुपये के हिसाब से रेल्वे को एक हजार करोड़ से भी अधिक राशि मिली।
मॉडल कन्डेक्ट नियम के तहत 9 माह में परीक्षा की सारी प्रक्रिया पूरी हो जानी था लेकिन सालभर बाद पिछले जनवरी से ये जनवरी आ गया लेकिन परीक्षा तक नहीं हुई। पैसा सरकार के पास पहुंच गया और इस एक हजार करोड़ रुपए का ब्याज क्या होता है जरा कल्पना करीए। खुले आम बेरोजगारों से कमाने का खेल यही खत्म नहीं हुआ है इस्टर्न रेल्वे ने भी कारपेंटर से लेकर मिी तक की भर्ती के लिए आवेदन मंगाना शुरु कर दिया है।
कुल मिलाकर बेरोजगारी के इस दौर में सरकार ने बेरोजगारों से कमाने का जो फार्मूला तैयार किया है वह हैरान कर देने वाला है। क्या इस पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान नहीं लेना चाहिए? क्या युवाओं को इस पर संज्ञान नहीें लेना चाहिए। क्या यह सवाल संसद में नहीं उठने चाहिए? लेकिन सरकार के इस खेल पर सभी खामोश है क्योंकि उसने इससे ध्यान हटाने सीएए एनसीआर ले आई है ताकि देश में लोग हर समस्या को भूल कर हिन्दू मुस्लिम करते रहे। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस मामले को लेकर मीडिया घरानों ने भी सरकार की मंशा की समीक्षा नहीं की वह भी हिन्दू मुस्लिम में उलझकर रह गई है। जब सरकार नोटबंदी से लेकर हर योजना को लागू करते समय गरीबों के लिए बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है तब इन योजनाओं से गरीबों को कितना फायदा हो रहा है इस पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए?
बहरहाल बेरोजगारों को रोजगार देने के नाम पर सरकार किस तरह से युवाओं से कमाने का धंधा कर रही है वह भले ही चर्चा का विषय न बने लेकिन गरीबों के नाम पर अमीरों को दान की नई कहानियां रोज सुनने में आ रही है। 

सोमवार, 16 मार्च 2020

देश का बैकिंग सेक्टर आईसी यू में !



पीएमसी और यश बैंक के हालात के लिए भले ही मोदी सरकार जिम्मेदारी से बच रही है लेकिन हकीकत यह है कि मोदी सरकार की नीतियों के चलते देशभर में बैकिंग सेक्टर आईसीयू में जाते दिख रही है। यहां तक की एसबीआई की हालत भी खराब होने लगी है उसके शेयर में 20 फीसदी तक गिरावट हुई है और इसकी वजह बड़े व खास औद्योगिक घरानों का आठ लाख हजार करोड़ रुपया सरकार द्वारा राईट अप यानी माफ करना है जबकि बैंकों में एनपीए दस हजार करोड़ के पास पहुंच गया है।
देश की डांवाडोल होती अर्थ व्यवस्था को लेकर भले ही सरकार चिंतित नहीं हो लेकिन हालत दिनों दिन खराब होने लगी है और यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम आयेंगे। सूत्रों की माने तो पीएमसी और यश बैंक की बदतर हालत के लिए मोदी सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। सार्वजनिक क्षेत्रों की संस्थानों को एक के बाद एक बेचना और आरबीआई के रिजर्व फंड से लाखों करोड़ों रुपये निकालने का अर्थ है कि सरकार के पास फंड की कमी होते जा रही है और सरकार की नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है।
2014 में मनमोहन सिंह की सरकार की जब विदाई हुई तब बैंकों में एनपीए की स्थिति लगभग ढाई लाख करोड़ रुपए थी जो बढ़कर अब लगभग दस लाख करोड़ रुपए हो गई है। सत्ता परिवर्तन के दौरान मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बैकों में एनपीए को लेकर आम सभाओं में चिंता जताने वालों ने  सत्ता हासिल करते ही किस तरह से काम किया यह आसानी से समझा जा सकता है। सरकार ने बैंकों के एनपीए घटाने में कोई रूचि नहीं दिखाई।
एनपीए का मतलब साफ है कि बैकों और सरकारों ने अपने कर्जदारों से वसूली की बजाय उसे बट्टा खाते में डाल दिया यानी बैंकों के इतने रुपये डूब गए जिसकी वसूली नहीं की जानी है और ये रकम स्वाभाविक तौर पर जनता के पैसे है। जब एनपीए की यह स्थिति है तो फिर बैंकों की हालत खराब होना तय है।
यस बैंक के डूबने को लेकर आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने जो आंकड़े दिये है वह कम चौकाने वाले नहीं है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बैकों से कर्ज उन्हीं उद्योगपतियों को दिया जाता है जो राजनैतिक दलों को चंदा देते है। चूंकि बैक जो पैसा लोन देती है वह जनता का पैसा होता है ऐसे में कर्ज लेने वाली कंपनी डूब भी जाये तो इसका नुकसान न उद्योगपतियों को होना है और न ही सरकार में बैठे राजनैतिक दलों के नेताओं को ही इससे कोई मतलब है।
हैरानी की बात तो यह है कि यस बैंक 2017 से आरबीआई की निगरानी में होने के बावजूद उसने सरकार के कुछ खास माने जाने वाले उद्योगों को एक लाख करोड़ कर्जा दे दिया। जिसमें अंबानी ग्रुप, एस्सले ग्रुप, रेडियस डेवलेपर्स समेत कई कंपनी है और हैरानी की बात तो यह है कि इन कंपनियों ने भारतीय जनता पार्टी को करोड़ों रुपया चंदा दिया। एस्सले ग्रुप ने तो चालीस करोड़ दिया जबकि रेडियस ने पचास करोड़ चंदा दिया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चंदा के एवज में सरकार ने इन कंपनियों को न केवल लोन दिलवाया बल्कि राइट अप में भी मदद की।

क्यों हैं निशाने पर शाहीन बाग...


रायपुर के जयस्तम्भ चौक पर स्थापित किये गये शाहीन बाग को प्रशासन ने बलपूर्वक हटा दिया। आखिर शाहीन बाग को क्यों हटाया गया यह किसके निशाने पर था और प्रशासन ने इसे हटाने के लिए जिस तरह पहले दिन दिल्ली हिंसा और फिर होली त्यौहार में शांति बनाये रखने का हवाला दिया उसके बाद क्या यह जरुरी नहीं हो गया कि शाहीन बाग को हटाने की असली वजह क्या हैं?
दरअसल दिल्ली में चल रहे शाहीन बाग की तर्ज पर जिस तरह से देशभर में लगभग सौ शहरों में शाहीन बाग चलने लगा है। सीएए के खिलाफ चल रहे इस शांतिपूर्ण आंदोलन ने न केवल केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी है बल्कि जिन राज्यों में शाहीन बाग चल रहा है वहां की सरकारों के लिए यह असहज होता जा रहा है। पहले तो इसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ जोड़ा गया और भाजपा के कई नेताओं का दावा था कि दिल्ली चुनाव के बाद शाहीन बाग बंद हो जायेगा लेकिन चुनाव के परिणाम के बाद भी जब यह बंद नहीं हुआ और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिलने लगा तो सरकार की बौखलाहट साफ दिखने लगी। दिल्ली में जिस तरह से गुजरात मॉडल को दोहराने की कोशिश हुई वह किसी से छिपा नहीं है। बड़बोले भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयान पर जब सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई करने का आदेश जारी किया तो जज के ही तबादले कर दिये गये।
शाहीन बाग के आंदोलन ने उन गांधी विरोधियों के मुंह में करारा तमाचा जड़ा है जो चरखे से आजादी की आलोचना करते थे। क्योंकि शाहीन बाग ने जिस शांति और मौन के साथ आंदोलन को देशभर में विस्तार दिया है उससे हिंसा पर विश्वास करने वालों की मंशा को चकनाचूर कर दिया है। यही वजह है कि सरकार की तरफ से सीएए के समर्थन में न केवल प्रदर्शन किया जा रहा है बल्कि आंदोलनकारियों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं।
दिल्ली हिंसा के बाद राज्य सरकारों की बेचैनी भी बढ़ गई थी और रायपुर  में जिस तरह से हिन्दू संगठनों ने शाहीन बाग के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था उससे पुलिस प्रशासन भी दबाव में था। रायपुर में जहां जयस्तम्भ पर शाहीन बाग चल रहा था तो इसके विरोध में शारदा चौक में हनुमान चालीसा का आयोजन होने लगा था। जो प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनने लगा था। हनुमान चालीसा के आयोजकों ने स्पष्ट कह दिया था कि जयस्तम्भ से शाहीन बाग हटाये बगैर वे नहीं हटने वाले है।
ऐसी परिस्थिति में शाहीन बाग के आयोजक भी अड़ हुए थे तब पुलिस को बलपूर्वक कार्रवाई करनी पड़ी। पहले दिन प्रशासन ने दिल्ली दंगा का हवाला देते हुए शांति व्यवस्था पर खतरे के नाम पर इसे बंद कराया तो दूसरे दिन आनन फानन में होली त्यौहार के मद्देनजर जयस्तम्भ सहित चार प्रमुख स्थानों और मार्गों पर धारा 144 लगा दी गई। लेकिन चर्चा इस बात की रही कि जब दिल्ली का शाहीन बाग चल ही रहा है तो इसे बंद करने का क्या औचित्य है?
बहरहाल शाहीन बाग के शांतिप्रिय आंदोलन ने कई सवाल खड़े किये है जिसमें से सबसे बड़ा सवाल है शांति और मौन की ताकत? जिसकी वजह से अंग्रेजों को भी भागना पड़ा था।

रविवार, 15 मार्च 2020

सूचना का अधिकार भी तमाशा


कानून की आड़ लेकर जानकारी देने
से बच रहे हैं सूचना अधिकारी
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। सूचना का अधिकार कानून इसलिए लागू किया गया था कि इससे भ्रष्टाचार और मनमानी पर रोक लगाई जा सके लेकिन कानून की आड़ लेकर कई विभागों ने इस कानून को ही तमाशा बना दिया है। ऐसा ही एक मामला राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरों का है जिन्होंने जानकारी देने से मना कर दिया है।
सूचना का अधिकार कानून की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही है वह हैरान कर देने वाला है। बताया जाता है कि इस कानून के तहत आने वाले आवेदनों की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही है उसकी कहीं सुनवाई नहीं है। राज्य आयोग में भी आवेदनों की फाईल मोटी होते जा रही है।
बताया जाता है कि अफसरों की मनमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बने इस कानून की खुले आम धज्जियां उड़ाई जा रही है। हालत यह है कि पहले तो आवेदन करने वालों से ही मिलीभगत करने की कोशिश की जाती है और जब यह कोशिश नाकाम हो जाती है तो कानून का सहारा लेकर जानकारी देने से मना कर दिया जाता है जिससे आदमी इतना परेशान हो जाता या जोश ठंडा हो जाता है। 
ताजा मामला राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो से मांगी गई जानकारी का है। प्रो. बीएल पंथी ने राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो से जानकारी चाही थी कि सन्....... से....... तक ब्यूरो ने कितने लोगों के खिलाफ छापे की कार्रवाई की और इसमें से कितने लोग अनूसूचित जाति और जनजाति के है तथा इनमें से कितने लोगों के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया गया है। लेकिन इसकी जानकारी देने से इंकार करते हुए ब्यूरो के जनसूचना अधिकारी ने कानून का हवाला दे दिया जबकि मांगी गई जानकारी से किसी तरह की दिक्कत नहीं होनी है और न ही सुरक्षा या शांति को ही कोई खतरा उत्पन्न होने वाला है।
इस संबंध में प्रो. पंथी ने कहा कि वे इस मामले की आगे अपील करेंगे क्योंकि वे जिस शोषण मुक्ति मंच के माध्यम से अजजाजजा वर्ग का उत्थान करना चाहते है उसके तहत इस तरह की जानकारी इकट्ठा करना जरूरी है। सूचना के अधिकार के तहत काम कर रहे विभिन्न सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि जानकारी लेना मुश्किल हो गया है अधिकारी पहले तो जानकारी लेने की वजह को लेकर सवाल जवाब करते है और जानबूझकर लेट लतीफ या अधूरी जानकारी देते हैं। 
बहरहाल सूचना के अधिकार कानून की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही है वह हैरान कर देने वाला है।

शनिवार, 14 मार्च 2020

साख का सवाल...


दिल्ली में जो कुछ हुआ, वह ठीक नहीं हुआ यह बात सभी कहते हैं लेकिन अगर परन्तु के साथ दिल्ली हिंसा को परिभाषित करने की जो कोशिश हो रही है वैसी कोशिश इससे पहले कब हुई। यह सोचने की बात है। सोशल मीडिया के इस दौर में कहीं कुछ नहीं छुपता यह जितना बड़ा सच है उससे भी बड़ा सच यह भी है कि अफवाहों और झूठ को परोसने का जो होड़ मचा है उसमें सच कहीं खो सा गया है।
देश में धर्म के नाम पर जो लकीरें खींची गई है वह लकीर इतनी मोटी होने लगी है कि देश का भविष्य क्या होगा कहना कठिन जान पड़ता है। बढ़ते अंधकार के बीच आखिर तरक्की के रासेत क्या होंगे इसकी चिंता तो न सरकार को है और न ही विपक्षी दलों को ही इसकी चिंता है। तमाम राजनैतिक दलों की एक ही चिंता है कि उन्हें सत्ता का लाभ और निजी लाभ किस तरह से मिले। देश की सार्वजनिक कंपनियों और संवैधानिक संस्थाओं की साख जाती है तो जाती रहे वे विधायक या सांसद बनकर अपनी आय किसी तरह बढ़ा लें। बस यही चिंता है।
यही वजह है कि एक-एक कर राज्यों से सत्ता जाने के बाद भी न तो प्रधानमंत्री का रवैया बदला है और न ही भाजपा-संघ की रीति नीति में ही कोई बदलाव आया है। और आम जनमानस के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचा है क्योंकि जो भी राजनैतिक दल के लोग चुनकर आते है वे अपने नीजि फायदे में लग जाते हैं।
भाजपा एक-एक कर खोते राज्य के बाद भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी साख पर बट्टा लगा है तब सत्ता बदलने से भी क्या होगा? शाहीन बाग की तपिश के बाद दिल्ली में भाजपा नहीं आई, लोगों ने भाजपा को नकार भी दिया लेकिन इससे क्या होगा? न संवैधानिक संस्थाओं की साख बच रही है और न ही सार्वजनिक संस्थाओं का साख ही बन रहा। ऐसे में सत्ता की धर्म के खिलाफ खिंची जा रही मोटी लकीरों के पीछे का अंधकार और घना नहीं होगा। दिल्ली में क्या हुआ, पुलिस तमाशाबीन रही, कड़ी कार्रवाई की चेतावनी  देने वाले जज मुरलीधरन का तबादला कर दिया गया और तमाम राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे और सोशल मीडिया ने लाशों का धर्म बताने में लग गये। जब संवैधानिक संस्थाओं के ही साख पर बट्टा लग चुका हो तब आप किसा दरवाजा खटखटाएंगे? और दरवाजा खटखटाने से फायदा भी क्या रह गया है।
सीएए के खिलाफ उठे विरोध के स्वर को दबाने की कोशिश में हम दंगा करा देते हैं और सोचते हैं कि सत्ता के खिलाफ उठने वाले सभी आवाज को देशद्रोही घोषित कर देंगे। यह एक नया दौर है आप बेरोजगारी का मुद्दा उठा लें या शिक्षा की बदहाल स्थिति पर आवाज बुलंद करें, आपको एक ही जवाब मिलेगा, क्या इससे पहले दूसरी सरकारों में यह नहीं था। आप कोई भी सवाल उठा लें जवाब इसी तरह से आयेगा और फिर आपको देशद्रोही भी घोषित कर दिया जायेगा?
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इस सवाल को हल किए बगैर आप वर्तमान में घना होते अंधेरों से निकलने का रास्ता नहीं खोज सकते। दरअसल इस दौर में राजनैतिक दलों और नेताओं की पद लोलुपता ने उनकी साख पर बट्टा लगाया है। सत्ता की मनमानी के खिलाफ जब खड़ा होने वालों की कोई साख ही न बची हो तब भला आप इस घने अंधेरे में उजाले के रास्ते कैसे ढूंढ सकते हैं। तमाम विरोधी दलों में चाहे वह राहुल गांधी हो, लालू प्रसाद यादव हो, अखिलेश यादव से लेकर आप कोई भी नाम गिन ले इनकी साख कहां रह गई है, तब आम जनता किसके विश्वास पर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे। 
क्षत्रपों यानी क्षेत्रिय दलों की अपनी स्वार्थ है और कांग्रेस तो आजादी के आंदोलन की गाथा तले ऐसे दब गई है कि वह उससे उबर नहीं पा रही है। सत्ता की मनमानी के खिलाफ उसे नये तरीके से जनता में विश्वास जमाना होगा। अन्यथा इस घनघोर अंधेरे को भुगतने के लिए तैयार हो जाईये क्योंकि जो लोग विधायक या सांसद चुने जा रहे हैं उनके लिए अपनी कमाई ही महत्वपूर्ण है।