शुक्रवार, 19 मार्च 2021

पितृ सत्ता का रोग...


21वीं सदी के सफर के बाद भी पितृ सत्ता अपनी सलतनत की मनमानी छोडऩे तैयार नहीं है वह कभी फटी जींस पर झांकने लगती है तो कभी पहनावे से जाति-धर्म की पहचान करती है। घोर धार्मिकता प्रदर्शित करने वाले ये लोग महादेव की जयकारा तो करते हैं लेकिन अर्धनारिश्वर के लिए एक इंच जगह छोडऩे को तैयार नहीं है।

लिबास को संस्कार और राष्ट्रवाद से जोडऩे वालों की बुद्धि पर यह देश सालों से तरस खा रहा है लेकिन इनकी बेशर्मी कम नहीं होती। आज हम जिस दैार में जी रहे है उसकी अनदेखई करना न केवल बौद्धिक दिवालियापन है बल्कि देश के पुरातन संस्कृति को नकारना भी है।

ऐसे में पंडित जवाहर लाल नेहरु को गरियाने वालों के समर्थन करने वाली महिलाओं को यह याद रखना चाहिए की जब पंडित नेहरु ने महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में बराबर का हकदार बनाने और पितृ सत्ता की मनमानी और अत्याचार से मुक्ति के लिए हिन्दू कोड बिल लाने लगे तो किन लोगों ने खिलाफत की और यह हिन्दू कोड बिल क्या था।

बात 1941 की है, हिन्दू प्रॉपर्टी लॉ कमेटी बनाकर सम्पत्ति के हस्तांतरण के लिए, जिसके अध्यक्ष बीएन राव थे। लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन की वजह से यह काम रुक गया। लेकिन 1944 में इसी कमेटी को फिर अपडेट किया गया। इस कमेटी ने आजादी के कुछ महीने पहिले 1947 में अपनी रिपोर्ट दी। लेकिन इससे पहले महिलाएं जान ले कि तब व्यवस्था क्या थी?

इस कमेटी के रिपोर्ट के पहले व्यवस्था थी कि महिलाओं को सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं था पिता की संपत्ति केवल बेटों को मिलता था, पत्नी के गुजारे का पति पर कोई दायित्व नहीं था, पति की सम्पत्ति पर भी अधिकार नहीं था, पति से रिश्ता जन्म जन्मांतर का था।

हिन्दू कोड बिल इन सारे प्रावधानों को खत्म करने वाला था, बेटी को सम्पत्ति पर अधिकार, बहु विवाह पर रोक, गुजारे भत्ते का प्रावधान इस बिल में खास प्रावधान थे। इस बिल के विरोध में उतरने वालों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, हिन्दु महासभा और संघ अगुवाई करने लगे। कांग्रेस के भीतर राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल और तत्कालीन अध्यक्ष पुरुषोत्तम दास टंडन प्रमुख थे।

दूसरी तरफ थे डॉ. भीमराव अम्बेडकर और पंडित नेहरु। नेहरु भी अड़ गये उन्होंने साफ कह दिया कि  वे यदि यह बिल पास नहीं करा पाये तो उनके प्रधानमंत्री रहने का कोई अर्थ ही नहीं है। तो राजेन्द्र बाबू ने भी कह दिया कि राष्ट्रपति किसी भी बिल पर हस्ताक्षर करने बाध्य नहीं है। बढ़ते विरोध के बीच यह भी कहा जाने लगा कि नेहरु चुने हुए नेता नहीं है फिर वे कैसे इतना बड़ा फैसला कर सकते है? यह सवाल नेहरु को साल गया और उन्होंने कहा चुनाव के बाद ये बिल लायेंगे। अम्बेडकर ने बिल पास नहीं कराने के फैसले के विरोध में केबिनेट से इस्तीफा दे दिया।

चुनावी बिगुल फूंका गया। नेहरु हर सभा में इस बिल का जिक्र करते और भारी जीत के बाद संसद में यह बिल पास कराया। बेटी को पिता की सम्पत्ति में अधिकार और बहुविवाह पर रोक क्रांतिकारी फैसले सिर्फ नेहरु की जिद् से पूरी हुई।

हम नहीं कहते कि विरोध के उन चेहरों को याद रखिये लेकिन महिलाओं को अत्याचार और पितृसत्ता की मनमानी तो याद रखना ही होगा क्योंकि यह एक बीमारी है जो कभी भी फटी जींस से आ सकती है।

गुरुवार, 18 मार्च 2021

सीना ठोक के...

 

जब इस देश के दस लाख बैक कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे तब उसी समय केन्द्र सरकार सौ और कंपनियों या संस्थानों को बेचने का निर्णय कर रही थी! सवाल यह नहीं है कि सरकार इसे क्यों बेच रही है क्योंकि जनता ने उन्हें जिस काम के लिए चुना है वह बखूबी कर रही है, पेट्रोल-डीजल पर वह कितना टेक्स ले रही है वह सीना ढोक के कहती है। कंपनी बेचने की बात भी वह सीना ठोक के कह रही है तब सवाल यह है कि क्या कंपनियों को वह औने-पौने दर पर बेच सकती है!

हालांकि यह सवाल अब पूछना देशद्रोह हो जायेगा क्योंकि उसे जनता ने चुना है और वह चाहे तो देश की किसी भी कंपनी का निजीकरण कर सकती है और वह चाहे तो फ्री में भी दे सकती है क्योंकि जनता ने जब उसे चुना है तो फिर सत्ता पर सवाल क्यों?

लेकिन हम यहां सवाल नहीं उठा रहे है बल्कि बता रहे है कि मोदी सत्ता ने पांच ट्रिलियन इकानामी करने के लिए देश की सौ संस्थानों को बेचने का या निजीकरण करने का निर्णय ले लिया है जिसमें रेलवे से लेकर खेल स्टेडियम तक शामिल है।

ऐसे में हम यह भी बता दे कि कोई भी खरीददार जब घाटे का सौदा नहीं करना चाहता तब वह क्या करेगा। वह उस कंपनी के एसेट्स की कीमत कम आंकेगा और फिर एसेट्स से भी कम कीमत पर कंपनी खरीद लेगा, क्योंकि इस देश में बैंक से लोन लेने के लिए किसी भी एसेट्स का मूल्यांकन कैसे किया जाता है यह किसी से छिपा नहीं है तब सरकार का आंकलन या मूल्यांकन पर कोई सवाल कैसे उठा सकता है। और यह सब सीना ठोंक के किया जा रहा है।

पिछले 6-7 सालों में जिन संस्थानों का निजीकरण किया गया था जिसे बेचा गया उसके बारे में कहा जाता है कि उन कंपनियों के जो एसेट्स थे उसका बाजार मूल्य कई गुना ज्यादा था। ऐसे में जब आम जनमानस राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में डूबी हो और विपक्ष में लडऩे की ताकत ही न बची हो तब सत्ता जानती है कि उसे क्या करना है और वह वही कर रही है।

2014 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में करीब पांच लाख लोगों की नौकरी चली गई है, देश में बेरोजगारी दर चरम पर है लेकिन जब लक्ष्य हिन्दूत्व की रक्षा का हो तो ये सारे मुद्दे गौण हो जाते है।

यही वजह है कि पांच राज्यों के चुनाव में जो लोग भाजपा की जीत का दावा कर रहे हैं वे जानते है कि इस देश को कहां ले जाना है और चुनाव कैसे जीता जाता है। इसलिए स्मृति ईरानी ने बढ़ती महंगाई पर कैसे हाय तौबा मचाया था वह मायने नहीं रखता। सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 33 रुपए और डीजल पर 32 रुपए वसूल कर रही है उसका भी कोई मतलब नहीं है क्योंकि खाली बैठे युवाओं के मन में हिन्दू राष्ट्र का सपना जाग गया है और उन्हें इन महंगाई से कोई लेना देना नहीं है और न ही निजीकरण के बाद आरक्षित वार्गो की नौकरी का क्या होगा? यह भी सवाल बेमानी है क्योंकि आरक्षण ने उनका अधिकार छीना है वह यही समझे है।

तब मंदिर में पानी पीने वाला आसिफ के लिए हिन्दुत्व का औजार चुनाव में भी कारगर होगा, तब देश की संस्थाएं कैसे किसने से बची रह सकती है।

बुधवार, 17 मार्च 2021

आदमी की प्रवृत्ति...

 

गब्बर सिंह का भी तो कोई परिवार नहीं था? फिर वह लूटपाट क्यों करता था? सोशल मीडिया में इस तरह के सैकड़ों सवाल तैर रहे हैं? लेकिन इनका एक ही जवाब है कि हर व्यक्ति की अपनी फितरत और प्रवृत्ति होती है? धंधेबाज व्यक्ति हर काम को इसी ढंग से करता है, आखिर कफन भी तो बेचे जाते हैं? और भौतिकता के दौर में नैतिकता, सुचिता तमाशा नहीं होता तो लालकृष्ण अडवानी इस तरह से न किनारे किये जाते और न ही वे चुप बैठ सकते थे।

ऐसे में जब किसान आंदोलन के दौरान लालकिले में झंडा फहराने वाले दीप सिंद्धू का भापा कनेक्शन और प्रधानमंत्री मोदी के साथ तस्वीर सामने आया तो भी किसी को हैरानी नहीं हुई तब अब जब परिवहन मंत्री नीतिन गडकरी को घूस के रुप में बस देने वाले मामले में स्वीडिश बस कंपनी स्कैनिया के भारतीय पार्टनर एस.वी.एल.एल. के मालिक रुपचंद बैद के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर सामने आई है तब भी किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि आदमी कुछ भी बोल ले उसकी प्रवृत्ति नहीं बदलती उसका फितरत वैसा ही रहेगा।

इसलिए 2014 में जब संसद में अपराधिक प्रवृत्ति के सांसदों के फैसले शीघ्र करने के लिए अलग से व्यवस्था करने की बात कही गई तब भी हमने इसे बकवास कहा था हालांकि तब ट्रोल आर्मी ने हमें देशद्रोही तक कह दिया था, लोकपाल बिल और कालाधन वापसी को लेकर भी जो लोग प्रधानमंत्री  पर भरोसा करते हैं उन्हें यह जान लेना चाहिए कि संसद में करीब आधे सांसदों के खिलाफ अपराधिक मामले दर्ज है जिनमें भाजपा के सांसदों की संख्या भी बहुत ज्यादा है।

ऐसे में जब शारद चिट फंड घोटाले से जुड़े लोगों का भाजपा में स्वागत करते हुए सदस्यता से नवाजा गया तब भी यही सवाल था कि आखिर गब्बर सिंह का भी तो कोई परिवार नहीं है?

सवाल परिवार दोस्त या रिश्तेदारों का नहीं है सवाल उस राजनीति का है जिसका ध्येय सत्ता हासिल कर पावर हासिल करना है, जनसरोकार की बात ही बेमानी है और जब सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रवाद, हिन्दू मुस्लिम ही पर्याप्त है तब नैतिकता की बात वे करते हैं जो विपक्ष में बैठे होते है। 

इसलिए नीतिन गडकरी ने जब सीना ठोक कर बस रिश्वत वाले मामले में मानहानि का दावा करने की बात कही तब पता चला कि रुपचंद वैद का क्या रोल है। क्या यह भाजपा की अंदरूनी लड़ाई के चलते यह सब हो रहा है। रिश्वत तो दी गई है? लेकिन क्या वह नीतिन के बजाय किसी और को मिली है?

भले ही ट्रोल आर्मी, आईटी सेल और वॉट्सअप युनिवर्सिटी को इसमें कोई रूचि न हो लेकिन दीप सिद्धू के बाद रूपचंद वैद के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर तो अपनी कहानी कह ही चुका है।

मंगलवार, 16 मार्च 2021

सबकी बारी आयेगी !

 

न किसान दिल्ली के भीतर जा पाये न उनकी आवाज ही दिल्ली की मोदी सत्ता ने सुनी। 2014 से पहले दिल्ली के वोट क्लब से लेकर रामलीला मैदान तक पहुंचना आसान था, दिल्ली को आवाज सुननी पड़ती थई लेकिन अब हालात बदल गए हैं, एक सौ दस दिनों से अधिक हो गये किसान आंदोलन को! लेकिन वे लुटियन दिल्ली में नहीं जा पाये ऐसे में विशाखापट्टनम में एक महिना से निजीकरण के खिलाफ चल रहे आंदोलन को दिल्ली कैसे सुन सकती है। तब बैंक कर्मी भी आंदोलन कर रहे है, इसके बाद हर वो कंपनी और संस्थान के लोग एक-एक करके आंदोलन करेंगे लेकिन एकजुटता के अभाव में अपनी बारी का सिर्फ इंतजार करेंगे!

बैंक कर्मियों ने निजीकरण के खिलाफ जब आंदोलन किया तो बैंकों को डूबाने की मोदी सत्ता की नीति पर सवाल उठाने की बजाय मीडिया पांच राज्यों के चुनाव में व्यस्त हो गई। ऐसे में विशाखापट्टनम में 35 दिनों से राष्ट्रीय इस्पात विकास निगम के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन को कौन दिल्ली तक पहुंचाए।

दिल्ली में जब पहले ही तय कर लिया है कि वह सबकुछ निजीकरण कर देगा तब संस्थाएं केवल अपनी बारी का इंतजार ही कर सकते है। इस्पात विकास निगम के करीब पचास हजार कर्मचारियों ने भी किसान आंदोलन को कहां सुना था, फिर बैक कर्मियों की तो अपनी दुनिया है।

क्या बैंकों की हालत के लिए वहां के कर्मचारी जिम्मेदार है या सरकार की वह नीति है जिससे उद्योगपतियों के अरबों रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया। कर्जदारों से वसूलने की बजाय जनता पर सर्विस टेक्स का बोझ डालना कौन सी नीति है।

सवाल यही है कि यदि सरकारी बैक से आम जनता त्रस्त है तो निजी बैंकों की हालत कितनी अच्छी है, क्या वह जनता का पैसा नहीं डुबायेगी, हाल के वर्षों में लक्ष्मी विलास बैंक सहित कई निजी बैंक बंद हुए तो फिर सरकारी बैंकों के निजीकरण का मतलब सिर्फ उसके एसेट्स से कमाई करना नहीं है।

फूट डालो राज करो की नीति के दिन अब भी जारी है, सरकार की रणनीति रही है कि वह अपनी करतूत के खिलाफ उठ रहे आवाजों को एक न होने दे। और फिर इस सरकार ने तो राष्ट्रवाद, हिन्दूत्व, देशद्रोह, आतंकवादी जैसे ऐसे शब्द उछाले हैं जिससे असहमति के स्वर सहम से गये हैं।

बिखराव का फायदा उठाने की कोशिश ने देश की अर्थव्यवस्था को बदहाल कर दिया है। पेट्रोल-डीजल पर मनमाने टेक्स ने सरकार की तिजौरी तो भरी है लेकिन अव्यवस्था के चलते या सही उपयोग नहीं होने से सब गड़बड़ हो गया है ऐसे में राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद का तड़का से आप खुश रहिए और अपनी बारी का इंतजार करते रहिए!

सोमवार, 15 मार्च 2021

ये कौन सी राह !


क्या कांग्रेस भीतर से इतनी डर गई है कि वह मुसलमानों के हित में खड़ा होने से पीछे भाग रही है? कांग्रेस ही क्यों दूसरी राजनैतिक दल भी क्या डर नहीं गई है? तब फिर इसे हम संघ की सफलता कह सकते हैं। क्या संघ जीत गया है और लोकतंत्र हार गया है? धर्म निरपेक्षता कोई मायने नहीं रखता? मानवता, संवेदना सब कुछ समाप्त हो चला है।

यकीन मानिए जिन पांच राज्यों में हो रहे चुनाव पर दृष्टि डाला जाए तो यह बात सच ही दिखेगा? क्योंकि इन चुनावों में तमाम राजनैतिक दलों ने मुसलमानों के हितों को लेकर दूरी बना ली है। भाजपा तो बंगाल विजय जय श्रीराम के नारे के साथ करना चाहती है। जिस बंगाल में गाडिय़ों के पीछे जय काली, जय माता दी लिखा जाता था उस बंगाल में भी जय श्रीराम के नारों ने जगह बनाकर जय काली को पीछे छोडऩे लगा है?

आजादी के आंदोलन के दौरान मुसलमानों ने भी कुर्बानी दी है और कांग्रेस हमेशा ही अल्पसंख्यकों के साथ  खुद को खड़ा किया है, उसके लिए लड़ते रही है, यहां तक की विभाजन के दौरान हुए दंगों में भी कांग्रेस अल्पसंख्यकों के साथ डटकर खड़ी रही, संतुष्टिकरण के आरोपों से भी कांग्रेस कभी विचलित नहीं हुई। फिर बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनाव में वह मुसलमानों के साथ खड़ा होने से क्यों हिचक रही है, उसके घोषणापत्र में मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं होना यह दिखाता है कि हिन्दू वोट खिसकने के डर से वह भीतर तक कमजोर हो गई है। ऐसे में इन राज्यों के मुसलमानों के लिए चुनाव का क्या मतलब है। बंगाल की शेरनी कहलाने वाली ममता बैनर्जी भी मंदिरों में घूमने लगे और स्वयं को किसान-मजदूर का हितैषी बताने वाले, धर्मनिरपेक्षता की रहनुमा के तमगे पहनने वाले कम्यूनिस्ट पार्टी भी यदि मुसलमानों के साथ खड़ा होने से हिचकने लगे तो यह मान लेना चाहिए कि संघ ने जैसा चाहा वैसा इस देश को ढाल दिया है।

या तो मुसलमानों के साथ खड़ा होकर हार जाओं या जीतना है तो हिन्दुत्सव के झंडे के नीचे खड़े हो जाओ?ऐसे में जब मुद्दा सिर्फ जय श्रीराम नहीं बनेगा तो क्या बनेगा? हमने पहले ही कहा था कि खेला तो देश की जनता के साथ होबे है। बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बिकते सार्वजनिक उपक्रम, विश्वसनियता खोते संवैधानिक संस्थान के बाद भी यदि इस देश के चुनाव में हिन्दुत्व ही सबसे बड़ा मुद्दा है तो फिर कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता का ढोंग छोड़कर इसी राह पर चल पडऩा चाहिए। और मुसलमानों के लिए औवेसी की पार्टी तो है ही।

आजादी की लड़ाई से लेकर इस देश की तरक्की में मुसलमानों या अल्पसंख्यकों के योगदान को यदि झटके में खारिज करने की प्रवृत्ति के खिलाफ भी कांग्रेस खड़ा नहीं हो पा रही है तो फिर देश में कमजोर होते लोकतंत्र पर फ्रीडम हाउस, स्वीडन की वी डेमोक्रेसी ही नहीं सारी दुनिया ही उंगली उठायेगी तो गलत क्या है?

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से सिखों को खालिस्तानी या आतंकवादी होने का तोहमत लगाया गया तब क्या उनके योगदान को खारिज करने की मंशा नहीं थी। हमने पहले ही कहा है कि आज मुसलमान निशाने पर है कल दूसरे अल्पसंख्यकों की बारी भी आ सकती है?

क्योंकि जिसका बीज ही नफरत, झूठ, अफवाह के साये में बना हो उससे और कोई उम्मीद बेमानी है लेकिन डरी हुई कांग्रेस का क्या कहें?

इन चुनावों का परिणाम जो भी हो, भले ही भाजपा के पक्ष में न हो लेकिन तमाम राजनैतिक दलों की मुस्लिमों से बेरुखी ने संघ को चुनाव से पहले ही नहीं जीता दिया है? धर्म निरपेक्षता क्या हार नहीं गई है?

रविवार, 14 मार्च 2021

खेला होबे...

 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने जब कहा कि खेला होबे (खेल हो गया) तो देश के दूसरे राज्यों में बैठे लोगों ने क्या समझा होगा? देश की जनता के साथ तो पहले ही खेला होवे हो चुका है।

राजनीति में जुमले और नारों का अपना महत्व है, अच्छे दिन आयेंगे और मोदी है तो मुमकीन है के नारों से जिस तरह से आम जनमानस को जोड़ा गया उसका सच क्या खेला होबे के साथ सामने नहीं है?

ये सच है कि अन्ना हजारे के आंदोलन ने कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में माहौल खड़ा कर दिया था तब देश में मंहगाई बढऩे लगी थी, लोकपाल बिल भी लोगों की प्राथमिकता में शामि था, राम मंदिर, धारा-370 जैसे मुद्दों ने कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश खड़ा कर दिया था। हालांकि रोजी-रोटी को लेकर उतना झंझट नहीं था, लेकिन आखिर वे इस देश में मजे से बिरयानी कैसे खा सकते हैं का सवाल बेवजह खड़ा किया गया। काला धन, भ्रष्टाचार और राजनैतिक अपराध को इस देश से उभारा गया कि इससे बुरा दिन तो कोई हो ही नहीं सकता था! पटेल-सुभाष बाबू की उपेक्षा और सिर्फ गांधी परिवार को प्राथमिकता के झूठ के उस अच्छे दिन की कल्पना लोक में विचरण का मार्ग प्रशस्त किया जो मोहक लगने लगा।

लेकिन परिणाम क्या हुआ! क्या सुभाष बाबू के मौत का वह रहस्य पिछले 6 सालों में उजागर हो पाया! सिर्फ धारा 370 के एजेंडे को छोड़ दे तो देश को क्या मिला?

इस पर चिंतन करने की जरुरत ही नहीं बेबाक बोलने की भी जरुरत है, असहमति के स्वर को दबाने देशद्रोह कानून का सहारा लिया गया! संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनियता तार-तार हो चुकी है! गैर सिलेण्डर की कीमतों ने फिर चूल्हे की ओर लौट जाने मजबूर कर दिया है, बढ़ती बेरोजगारी से कितने ही लोग रोज आत्महत्या कर रहे हैं या अपराध में चले गए। भ्रष्टाचारी-दूराचारी और माफिया एक ही छत के नीचे इकट्ठे होने लगे है, न अपराधियों-भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है और न ही कालाधन आने की उम्मीद ही बची है?

सार्वजनिक उपक्रमों के बंद होने और बेचे जाने से किसकी नौकरी जा रही है, बढ़ती महंगाई से कौन ज्यादा पीडि़त है! उद्योगपतियों के बढ़ते कर्ज को बट्टा खाने में डालने से बैंक किससे पैसा वसूल रही है! ये सवाल पूछना भी देशद्रोह हो चला है तब दूसरी तरफ नजर भी दौडऩा चाहिए कि क्या उन लोगों के मजे लेकर बिरयानी खाने में दिक्कतें आई है, बिल्कुल नहीं आई है वे  अब भी मजे से बिरयानी खा रहे हैं हां हमारे खाने में परेशानी जरूर बढ़ गई है।

तब यदि ममता बैनर्जी कहती है खेला होबे यानी खेल हो गया तो बरबस ही देश के दूसरे राज्यों से आवाज सुनाई देती है खेला तो हमारे साथ पहले ही होबे है।

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

कैसा जनसरोकार !



एक तरफ केन्द्र सरकार के मनमाने फैसले से देश की आर्थिक स्थिति बदहाली की कगार पर है, बेरोजगारी और महंगाई से आम जनमानस त्रस्त है तब छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा विधायकों और पूर्व विधायकों की सुविधा की राशि को दो गुणा कर देने का मतलब क्या है? ये सच है कि भूपेश सरकार जब से सत्ता में आई है तब से आम जनों के हित में कई निर्णय लिये है लेकिन नोट बंदी, जीएसटी और कोविड की वजह से आर्थिक झंझावत भी कम नहीं है।

ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय न केवल हैरान कर देने वाला है बल्कि सत्ता के चरित्र को भी प्रदर्शित करता है। सवाल जनप्रतिनिधियों की सुविधा में ईजाफे का नहीं है और न ही हमें इस बात से इंकार है कि जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं में कमी हो लेकिन क्या यह वर्तमान समय में उचित है।

छत्तीसगढ़ भी उन राज्यों में शामिल है जिनकों लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है, प्रदेश की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है और केन्द्र की मनमानी के चलते आने वाले दिनों में कोई आर्थिक मदद की उम्मीद तो दूर योजनाओं के लिए या धान खरीदी के कोटे के लिए ही पैसा मिलने की उम्मीद नहीं है।

जानकारो का कहना है कि छत्तीसगढ़ राज्य में विकास के कार्यों में रफ्तार की कमी है। धीमी गति से चल रहे विकास कार्यों के अलावा नई नौकरी के रास्ते भी नहीं खुल पा रहे हैं। अस्पताल या स्कूल भवन तो बन गए है लेकिन डाक्टरों और शिक्षकों की कमी है। सहायक शिक्षक अपने वेतन की विसंगति को दूर करने आंदोलनरत है, मनरेगा का काम भी धीमी गति से हो रहा है। इसके अलावा भी वित्तीय स्थिति को लेकर कई तरह के सवाल है। साल दर साल राज्य का कर्ज बढ़ता ही जा रहा है, पैसों की कमी की वजह से कई योजनाएं तय समय में पूरी नहीं होने की वजह से योजना लागत में डेढ़ से दो गुणा वृद्धि हो गई है।

ऐसी स्थिति में पूर्व और वर्तमान विधायकों की सुविधा में सीधे दो गुणा वृद्धि को लेकर सवाल तो उठेंगे ही। क्या विधायकों की सुविधा जन सरोकार से बड़ा हो गया है।

राजधानी में ही शारदा चौक से तात्यापारा चौक तक चौड़ीकरण के लिए बजट का रोना रोया जाता है, तालाबों की सफाई का मामला हो या नए ओवर ब्रिज निर्माण का मामला हो सब कुछ वित्तीय संकट के कारण रुका पड़ा है।

सरकार अपने प्रचार प्रसार और सुविधा के नाम पर करोड़ों अरबों रुपये खर्च कर रही है लेकिन अस्पतालों की हालत बदहाल है, कहीं दवाई नहीं तो कहीं डाक्टर नहीं है। ऐसे में यह सवाल तो उठेंगे ही कि क्या जनप्रतिनिधि केवल अपनी सुविधा ही देखते है। जब छत्तीसगढ़ के विधायकों का वेतन वैसे भी बहुत ज्यादा है।