बुधवार, 24 मार्च 2021

सत्ता की तिलमिलाहट...


देश में बदहाल होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, नाराज होते किसान, निजीकरण के नाम पर आरक्षण पर प्रहार, बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त युवा और प्रधानमंत्री की अमर्यादित भाषा ही यदि अच्छे दिन की आहट है तो फिर दिल्ली में एलजी का पावर और बढ़ाने तथा महाराष्ट्र और बंगाल में प्रपंच भी किसी तमाशा से कम नहीं है।

शुरुआत दिल्ली में केजरीवाल के कामकाज से शुरु किया जा सकता है जहां की योजनाओं के परिणाम ने विकास के नए दरवाजे ही नहीं खोले हैं बल्कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की लोकप्रियता को भी बढय़ा है ऐसे में एलजी को अधिकाधिक महत्व देना क्या केन्द्र की सत्ता की सोची समझी रणनीति नहीं है।

तब मुंबई में आईपीएस परमबीर सिंह के एक पत्र को लेकर मचा बवाल को षडय़ंत्र का हिस्सा मानने से कैसे इंकार किया जा सकता है।

भले ही नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है लेकिन भाजपा के पास न देश की राजधानी की सत्ता है और न ही आर्थिक राजनीति मानी जाने वाली मुंबई की ही सत्ता है। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को बचाये रखने की है, मुंबई जब आर्थिक राजनीति है तो वहां से पार्टियों को फलने फुलने का साधन भी पर्याप्त मिलता है ऐसे में मुंबई की सत्ता होने का मतलब साफ है।

इन दो महानगरों की सत्ता जब विरोधियों के पास हो और तीसरे महानगर चेन्नई की सत्ता दूर की कौड़ी हो तो कलकत्ता के लिए तिलमिलाहट तो स्वाभाविक है और इस तिलमिलाहट में प्रधानमंत्री की अमर्यादित भाषा उनके भाषणों में साफ दिखने लगा है। टीएमसी का मतलब समझाने में लगे प्रधानमंत्री की मंशा पर जो लोग आज ताली बजा रही है वही जब कोई भारतीय जनता पार्टी का मतलब भारतीय जनता पार्टी या भुगतों जनता पार्टी कहने पर नाराज होते है।

दरअसल सात साल की सत्ता की नीति ने देश को जिस राह पर चलाया है उससे देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था ने आम आदमी का जीवन स्तर नीचे की ओर ले गया है। आम आदमी को धर्म जाति में इस तरह उलझा दिया है कि उनकी सोच ही बदल गई है। जिन लोगों का गुस्सा बढ़ती-महंगाई, छिनते रोजगार पर निकलना चाहिए वह गुस्सा प्यारे बच्चे पर निकलने लगा है।

कोई भी देश यदि अपने धर्म और जाति की श्रेष्ठता को लेकर उलझा रहेगा तो वहां आप किसी जरूरी मूलभूत मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित कर ही नहीं सकते, यही वजह है कि अब दूसरे राजनैतिक दल भी अपने को हिन्दूवादी साबित करने में लगे है।

राजनैतिक दलों में सत्ता हासिल करने की होड़ होनी चाहिए लेकिन उनके मुद्दे धर्म और जाति की बजाय आम आदमी से जुड़े होने चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह से राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के नाम पर लोगों के दिमाग को मपा गया उसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है।

ऐसे में जब देश के प्रधानमंत्री की भाषा ही मर्यादा की सीमा लांघने लगे, किसी के साथ हुई दुर्घटना को मजाक बना दिया जाए और सत्ता के लिए सिर्फ झूठ का सहारा लिया जाए या नफरत फैलाई जाए तो इसका मतलब साफ है कि देश से बड़ा पार्टी हो गया है।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

गजब मोदी सत्ता...!

 

हम जानते हैं कि आप इस बात का यकीन नहीं करेंगे कि मोदी सरकार ने अपनी सत्ता के दौरान उद्योगपतियों का लगभग साढ़े सात लाख करोड़ रुपया राईट ऑफ कर दिया है, जबकि मनमोहन सरकार ने अपने दस साल के कार्यकाल में दो लाख 20 हजार करोड़ ही राईट ऑफ किया था।

और यह बात वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में सीना ठोक के बताया कि इस वित्त वर्ष में कमर्शियल बैकों ने एक लाख पन्द्रह हजार करोड़ के बैंक लोन राईट ऑफ किया है। और यह बात किसी को शायद ही पता हो कि बैंक की खराब स्थिति को संभालने ही सर्विस टेक्स के नाम पर मनमानी वसूली हो रही है।

भले ही उद्योगपतियों की मित्रता के आरोपों को खारिज कर दिया जाए। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि जिन उद्योगपतियों के लोन बट्टा खाता में डाला गया है उनमें मेहुल चौकसी और विजय माल्या की कंपनी भी शामिल है। ऐसे पचास कंपनी है जिनके करोड़ों रुपये यानी 68,607 करोड़ रुपये को बट्टा खाते में डाल दिया गया है।

इसका दुष्परिणाम आम जनमानस को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि राईट ऑफ की गई रकम की भरपाई के लिए बैक आम आदमी से वसूल करता है, जिसमें सर्विस चार्ज के अलावा सेविंग खाते में ब्याज दर कम कर देता है, मिनिमम बैलेंस चार्ज सहित अन्य चार्ज का बोझ आम जनता पर पड़ता है। ऐसे में किसानों की फसल एमएसपी से लेने पर आर्थिक बोझ बढऩे की बात कहने वाली मोदी सत्ता की हकीकत को समझना होगा।

सवाल यह नहीं है कि सरकार उद्योगपतियों के कर्ज माफ करती है या उसे बट्टा खाते में डाल देती है सवाल तो यह है कि इन कर्जदारों के भाद जाने पर वह रकम की भरपाई आम जनमानस से क्यों?

एक तरफ सरकार स्वयं को जनता का हितैषी बताते नहीं थकती लेकिन दूसरी तरफ वह आम जनता पर नये-नये तरीके से पैसा वसूलने का बोझ डाल रही है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के इस दौर में जब गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, मध्यम वर्ग का जीवन नारकीय होता जा रहा है तब भी सरकार बड़े उद्योगपतियों से ऋण की वसूली करने की बजाय आम लोगों पर कर का बोझ क्यों लाद रही है।

मोदी सत्ता के इस दौर में आम आदमी पर हो रहे इस खेल में निजीकरण का फैसला भी समानता को बढाने वाला है। हमने पहले ही कहा है कि निजीकरण एक तरह से आरक्षित वर्गों पर प्रहार है और उनके जीवन को और कठिन बना देने वाला है ऐसे में जिन लोगों को लगता है कि आरक्षण से देश को नुकसान हो रहा है वे जान ले कि आरक्षण यदि नहीं होगा तो एक बड़ा वर्ग समानता और मुख्यधारा की दौड़ में कभी नहीं आ पायेगा। आरक्षण के बाद भी जाति के आधार पर लोगों की हत्या कर दी जा रही है, ऐसे में बढ़ती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी में निजीकरण से सरकार भले ही कुछ कमा ले एक बड़ा तपका सब कुछ खो देगा।

सोमवार, 22 मार्च 2021

पिछले दरवाजे से आरक्षण पर प्रहार !

 

केन्द्र सरकार जिस तरह से निजीकरण को लेकर कदम बढ़ा रही है, उससे न केवल देश का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार हो रहा है बल्कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर भी हमला है। यह सीधे-सीधे आरक्षित वर्ग पर हमला है और आरक्षण पर प्रहार है।

निजीकरण का मतलब मोटे तौर पर भले ही आर्थिक स्थिति को बताया जा रहा है लेकिन यह संघ की उस विचारधारा का एक रुप है जो आरक्षण की खिलाफत करता है। हैरानी तो इस बात की है कि निजीकरण को लेकर पार्टी के भीतर बैठे आरक्षित वर्ग के लोग भी खामोश है जबकि निजीकरण से सर्वाधिक नुकसान इन्ही आरक्षित वर्ग के लोगों को है।

इस देश में संविधान लागू करते हुए आरक्षण का प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों को समानता का अधिकार मिल सके, इन वर्गों के गरीब लोग, सुदूर गांव और जंगल में रहने वाले वंचित लोग शहरों में रहने वाले लोगों से शिक्षा, नौकरी और राजनीति में बराबरी का दर्जा प्राप्त कर सके।

लेकिन आरक्षण की खामियां गिनाकर इसका विरोध करने वालों की कमी नहीं है। यह सच है कि आरक्षण के नियमों में कुछ खामियां है लेकिन इन खामियों की वजह से सभी को इसके लाभ से वंचित करना न तो उचित है और न ही देश की एकता के लिए सही है।

राष्ट्रीय सेवक संघ की नीति रही है वह आरक्षण की खामियां गिनाते रही है और इसकी समीक्षा करने की बात कहते रही है, आरक्षण विरोधी चेहरे मौन है यह भी किसी से छिपा नहीं है लेकिन जिस तरह से अब आरक्षण पर प्रहार होने लगे है वह संविधान की मूल भावना पर प्रहार है।

हम यह नहीं कहते कि संविधान पर उंगली उठाने वाले या तिरंगा को अशुभ बताने वालों में देशभक्ति की कमी है लेकिन एक बात तो तय है कि यदि निजीकरण हुआ तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान अजा जजा वर्ग के लोगों को ही होगा। कुछ सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की कमजोरी पर प्रहार कर पूरे संस्थानों को बदनाम करने की नीति की वजह से ही निजीकरण को लेकर आम लोग खामोश है लेकिन सच तो यह है कि निजीकरण से असमानता का अंतर और बढ़ जायेगा। निजीकरण को लेकर जिस तरह से बैंक कर्मी आंदोलित है, बीमा कर्मी आंदोलित है यह सिर्फ उन संस्थानों तक ही सिमट कर रह गया है जबकि निजीकरण से जिन्हें सर्वाधिक नुकसान होना है उस अजा जजा वर्ग के नेता इसके गंभीर परिणाम से कैसे अनजान रह सकते हैं।

किसान आंदोलन भी इसी निजीकरण के खिलाफ है। तीनों कृषि कानून से निजीकरण का ही मार्ग प्रशस्त हो रहा है तब भला टुकड़ों में हो रहे आंदोलन का मतलब क्या है।

हैरानी तो इस बात की है कि आरक्षण के खिलाफ पिछले दरवाजे से हो रहे इस प्रहार पर कांग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दल भी खामोश है ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों का क्या मतलब है यह समझा जा सकता है।

रविवार, 21 मार्च 2021

अनिर्णय का बोझ

 

कांग्रेस नेतृत्व इन दिनों अनिर्णय के बोझ से बिखरता जा रहा है। नाराज नेताओं को संभाल नहीं पाने की वजह से कांग्रेस का संकट गहराता जा रहा है, ऐसे में राहुल-प्रियंका की मेहनत का सिर्फ इतना ही मतलब है कि वे खुद को स्थापित करना चाहते है।

वैसे कांग्रेस तो राजीव गांधी की मृत्यु के बाद से ही लगातार कमजोर होते चली गई लेकिन सोनिया के नेतृत्व में बनी मनमोहन सरकार ने आम कांग्रेसियों की उम्मीद कायम रखी लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद जिस तरह से कांग्रेस में बिखराव शुरु हुआ उससे नेतृत्व की क्षमता पर भले ही सवाल न उठे लेकिन नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर तो सवाल उठने ही लगे हैं।

ऐसे में उन लोगों की चिंता बढ़ गई है जो कांग्रेस को लोकतंत्र के प्रहरी के रुप में देखते हैं! लेकिन सवाल वही है कि कांग्रेस से छिटकते लोगों को कैसे संभाला जाए? क्या कांग्रेस में नए तरह का परिवर्तन है या वह प्रसव वेदना से दो चार हो रही है ताकि नए पौध का आगाज हो!

हालांकि कांग्रेस के लिए इस तरह का संकट नया नहीं है। इंदिरा गांधई के नेतृत्व को भी ऐसी ही चुनौती मिली थी लेकिन तब इंदिरा के पास सत्ता की ताकत थी लेकिन आज?

लगातार हारते चुनाव से भले ही कई लोग हताशा में चले गए है लेकिन कांग्रेस में अभी भी ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस में जान फूंकने की ताकत रखते है, हर गांव में कांग्रेस को चाहने वाले हैं, इस सबके बावजूद इस सच्चाई से कतई इंकार नहीं है कि चुनावी राजनीति में जीत ही महत्वपूर्ण है और लगातार पराजय ने कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल मचा दी है। हालांकि कुछ लोग इसके पीछे की वजह कांग्रेस के उन नेताओं पर दोष मढ़ते हुए बताते हैं कि कई नेता सिर्फ सत्ता और रुतबे के जाल में इतना फंस चुके है कि उन्हें स्वयं के हित के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता और ऐसे ही लोग नये लोगों के लिए एक इंच जमीन छोडऩे को तैयार नहीं है ऐसे में गुटबाजी और अंर्तकलहर को संभाल पाना तब और मुश्किल हो जाता है जब आप लगातार चुनावी राजनीति में पराजित हो रहे हो।

राजस्थान में सचिन पायलट मान गये तो सब ठीक हो गया वरना  उसका भी हश्र मध्यप्रदेश की तरह तय था। ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया की स्थिति को लेकर भले ही कांग्रेसी खुश हो ले लेकिन इससे गई सत्ता तो वापस होने वाली नहीं है।

तब सवाल यही उठता है कि कांग्रेस नेतृत्व आखिर किस तरह से संगठन चलाना चाहती है। क्या सिर्फ राहुल और प्रियंका के भाग दौड़ से ही कांग्रेस की वापसी हो सकेगी या नेतृत्व इस बात का इंतजार कर रही है कि मोदी सत्ता की गलतियों से जनता उन्हें सत्तासीन कर देगी?

कांग्रेस की स्थिति इसी से समझा जा सकता है कि पिछले चार साल में 170 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी? ऐसे में नेतृत्व की कमजोरी पर सवाल तो उठेंगे ही?

शनिवार, 20 मार्च 2021

कैसे खुश रहें?

 

विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट में भारत फिर फिसल गया! हमारी स्थिति से बेहतर तो पाकिस्तान है, पाकिस्तान की बात इसलिए कही जा रही है कि हमारी खुशहाली छिनने के आरोपियों ें से एक पाकिस्तान को भी माना जाता है और नफरत और अलगाव का बीज बोने वाले पाकिस्तान को हमसे बदतर बनाते रहते हैं।

ऐसे में उस सपने की हकीकत को समझना होगा, जो अच्छे दिन आयेंगे के जुमले के साथ आम जनमानस को दिखाया गया था, ये उन कट्टरपंथियों और कुंठित हिन्दुओं के लिए भी चेतावनी है जो एक धर्म विशेष पर निशाना साधकर स्वयं को श्रेष्ठता की श्रेणी में स्थापित करना चाहते है। बोया पेड़ बबू का तो आम कहां से होय की कहावत को चरितार्थ करते सत्ता के लिए दो ही मूल मंत्र है, पहला अपनी सत्ता बरकरार रखना और दूसरा सत्ता की रईसी बरकरार रखना इसके लिए देश जल जाये या लोग टेक्स के बोझ से नारकीय जीवन जीने मजबूर हो इससे न राजतंत्र में मतलब था और न ही लोकतंत्र में ही इसका मतलब रह गया है।

एक दो जनप्रतिनिधियों की गरीबी और सादगी जब खबर बेन या उसे मिसाल के तौर पर पेश किया जाए तो इसका साफ मतलब है कि बाकी लोग जनता के सीने पर पैर रखकर अपनी रईसी को स्थापित कर रहे हैं।

जिस देश में प्रधानमंत्री ने 32 रुपया रोज देकर किसानों को सम्मान देने का दावा करते हैं उसी देश में पेट्रोल डीजल में एक लीटर में 33 रुपए वसूले जा रहे हो उस देश में खुशहाली कैसे आयेगी।

खुशहाली नफरत से कभी नहीं आती है। खुशहाली के लिए जितने भी आवश्यक तत्व है उनमें विद्वेष, नफरत, भेदभाव, अलगाव का कोई स्थान नहीं है और जब सत्ता ही नफरत की राजनीति पर टिकी हो तो खुशहाली की कल्पना ही बेमानी है।

याद कीजिए वो पुराने दिन जब अभाव में भी लोग खुश थे लेकिन अच्छे दिन के सपने की चाह ने हमें आज विश्व सूची में कहां खड़ा कर दिया है।

सत्ता पूरी तरह कर्ज में डूब चुका है और देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करने लगातार सरकारी सम्पत्ति को बेचा जा रहा है। ऐसे में यदि कोई नौकरी की कल्पना करे तो इसका मतलब क्या है? कर्ज में हर राज्य डूबा हुआ है, लाखों करोड़ों के कर्ज की स्थिति यह है कि कोई भी राज्य सरकार पटा पाने की स्थिति में नहीं है, वह केन्द्र की ओर ताक रहा है और केन्द्र सरकारी सम्पत्ति बेचकर अपनी रईसी को बरकरार रखना चाहता है।

पिछले सालों में देश की स्थिति के लिए सिर्फ कोविड को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से कोई भई सत्ता नहीं बच सकती।

हमने पहले ही कहा है कि सत्ता के शीर्ष में बैठे लोगों का आचरण, विचार ही महत्वपूर्ण होता है और यह सब झूठ, अफवाह और नफरत की बैशाखी पर टिका हो तो देश खुशहाली के रास्ते पर चल ही नहीं सकता। तब आज किसान आंदोलित है कल युवा, मजदूर से लेकर ऐसे लोग आंदोलित होंगे जिसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती है।

प्रसन्नता आपसी सद्भाव, प्रेम के बीच फलता फूलता है, कुंठा हमेशा ही नुकसानदायक होता है। आप सिर्फ मुस्लिम राजाओं के अत्याचार को उभर कर वर्तमान पीढ़ी पर दोष नहीं दे सकते, या हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम क्यों के सवाल को उभारकर आप उन लोगों की करतूत को नहीं नकार सकते जो आज भी दलितों पर अत्याचार कर रहे है, महिलाओं के पहनावे पर अपनी बीमार सोच को लाद रहे हैं यह भी एक तरह का आतंक है जो समाज के खुशहाली के रास्ते का रोढ़ा हैं। खुश रहें?

विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट में भारत फिर फिसल गया! हमारी स्थिति से बेहतर तो पाकिस्तान है, पाकिस्तान की बात इसलिए कही जा रही है कि हमारी खुशहाली छिनने के आरोपियों ें से एक पाकिस्तान को भी माना जाता है और नफरत और अलगाव का बीज बोने वाले पाकिस्तान को हमसे बदतर बनाते रहते हैं।

ऐसे में उस सपने की हकीकत को समझना होगा, जो अच्छे दिन आयेंगे के जुमले के साथ आम जनमानस को दिखाया गया था, ये उन कट्टरपंथियों और कुंठित हिन्दुओं के लिए भी चेतावनी है जो एक धर्म विशेष पर निशाना साधकर स्वयं को श्रेष्ठता की श्रेणी में स्थापित करना चाहते है। बोया पेड़ बबू का तो आम कहां से होय की कहावत को चरितार्थ करते सत्ता के लिए दो ही मूल मंत्र है, पहला अपनी सत्ता बरकरार रखना और दूसरा सत्ता की रईसी बरकरार रखना इसके लिए देश जल जाये या लोग टेक्स के बोझ से नारकीय जीवन जीने मजबूर हो इससे न राजतंत्र में मतलब था और न ही लोकतंत्र में ही इसका मतलब रह गया है।

एक दो जनप्रतिनिधियों की गरीबी और सादगी जब खबर बेन या उसे मिसाल के तौर पर पेश किया जाए तो इसका साफ मतलब है कि बाकी लोग जनता के सीने पर पैर रखकर अपनी रईसी को स्थापित कर रहे हैं।

जिस देश में प्रधानमंत्री ने 32 रुपया रोज देकर किसानों को सम्मान देने का दावा करते हैं उसी देश में पेट्रोल डीजल में एक लीटर में 33 रुपए वसूले जा रहे हो उस देश में खुशहाली कैसे आयेगी।

खुशहाली नफरत से कभी नहीं आती है। खुशहाली के लिए जितने भी आवश्यक तत्व है उनमें विद्वेष, नफरत, भेदभाव, अलगाव का कोई स्थान नहीं है और जब सत्ता ही नफरत की राजनीति पर टिकी हो तो खुशहाली की कल्पना ही बेमानी है।

याद कीजिए वो पुराने दिन जब अभाव में भी लोग खुश थे लेकिन अच्छे दिन के सपने की चाह ने हमें आज विश्व सूची में कहां खड़ा कर दिया है।

सत्ता पूरी तरह कर्ज में डूब चुका है और देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करने लगातार सरकारी सम्पत्ति को बेचा जा रहा है। ऐसे में यदि कोई नौकरी की कल्पना करे तो इसका मतलब क्या है? कर्ज में हर राज्य डूबा हुआ है, लाखों करोड़ों के कर्ज की स्थिति यह है कि कोई भी राज्य सरकार पटा पाने की स्थिति में नहीं है, वह केन्द्र की ओर ताक रहा है और केन्द्र सरकारी सम्पत्ति बेचकर अपनी रईसी को बरकरार रखना चाहता है।

पिछले सालों में देश की स्थिति के लिए सिर्फ कोविड को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से कोई भई सत्ता नहीं बच सकती।

हमने पहले ही कहा है कि सत्ता के शीर्ष में बैठे लोगों का आचरण, विचार ही महत्वपूर्ण होता है और यह सब झूठ, अफवाह और नफरत की बैशाखी पर टिका हो तो देश खुशहाली के रास्ते पर चल ही नहीं सकता। तब आज किसान आंदोलित है कल युवा, मजदूर से लेकर ऐसे लोग आंदोलित होंगे जिसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती है।

प्रसन्नता आपसी सद्भाव, प्रेम के बीच फलता फूलता है, कुंठा हमेशा ही नुकसानदायक होता है। आप सिर्फ मुस्लिम राजाओं के अत्याचार को उभर कर वर्तमान पीढ़ी पर दोष नहीं दे सकते, या हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम क्यों के सवाल को उभारकर आप उन लोगों की करतूत को नहीं नकार सकते जो आज भी दलितों पर अत्याचार कर रहे है, महिलाओं के पहनावे पर अपनी बीमार सोच को लाद रहे हैं यह भी एक तरह का आतंक है जो समाज के खुशहाली के रास्ते का रोढ़ा हैं।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

पितृ सत्ता का रोग...


21वीं सदी के सफर के बाद भी पितृ सत्ता अपनी सलतनत की मनमानी छोडऩे तैयार नहीं है वह कभी फटी जींस पर झांकने लगती है तो कभी पहनावे से जाति-धर्म की पहचान करती है। घोर धार्मिकता प्रदर्शित करने वाले ये लोग महादेव की जयकारा तो करते हैं लेकिन अर्धनारिश्वर के लिए एक इंच जगह छोडऩे को तैयार नहीं है।

लिबास को संस्कार और राष्ट्रवाद से जोडऩे वालों की बुद्धि पर यह देश सालों से तरस खा रहा है लेकिन इनकी बेशर्मी कम नहीं होती। आज हम जिस दैार में जी रहे है उसकी अनदेखई करना न केवल बौद्धिक दिवालियापन है बल्कि देश के पुरातन संस्कृति को नकारना भी है।

ऐसे में पंडित जवाहर लाल नेहरु को गरियाने वालों के समर्थन करने वाली महिलाओं को यह याद रखना चाहिए की जब पंडित नेहरु ने महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में बराबर का हकदार बनाने और पितृ सत्ता की मनमानी और अत्याचार से मुक्ति के लिए हिन्दू कोड बिल लाने लगे तो किन लोगों ने खिलाफत की और यह हिन्दू कोड बिल क्या था।

बात 1941 की है, हिन्दू प्रॉपर्टी लॉ कमेटी बनाकर सम्पत्ति के हस्तांतरण के लिए, जिसके अध्यक्ष बीएन राव थे। लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन की वजह से यह काम रुक गया। लेकिन 1944 में इसी कमेटी को फिर अपडेट किया गया। इस कमेटी ने आजादी के कुछ महीने पहिले 1947 में अपनी रिपोर्ट दी। लेकिन इससे पहले महिलाएं जान ले कि तब व्यवस्था क्या थी?

इस कमेटी के रिपोर्ट के पहले व्यवस्था थी कि महिलाओं को सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं था पिता की संपत्ति केवल बेटों को मिलता था, पत्नी के गुजारे का पति पर कोई दायित्व नहीं था, पति की सम्पत्ति पर भी अधिकार नहीं था, पति से रिश्ता जन्म जन्मांतर का था।

हिन्दू कोड बिल इन सारे प्रावधानों को खत्म करने वाला था, बेटी को सम्पत्ति पर अधिकार, बहु विवाह पर रोक, गुजारे भत्ते का प्रावधान इस बिल में खास प्रावधान थे। इस बिल के विरोध में उतरने वालों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, हिन्दु महासभा और संघ अगुवाई करने लगे। कांग्रेस के भीतर राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल और तत्कालीन अध्यक्ष पुरुषोत्तम दास टंडन प्रमुख थे।

दूसरी तरफ थे डॉ. भीमराव अम्बेडकर और पंडित नेहरु। नेहरु भी अड़ गये उन्होंने साफ कह दिया कि  वे यदि यह बिल पास नहीं करा पाये तो उनके प्रधानमंत्री रहने का कोई अर्थ ही नहीं है। तो राजेन्द्र बाबू ने भी कह दिया कि राष्ट्रपति किसी भी बिल पर हस्ताक्षर करने बाध्य नहीं है। बढ़ते विरोध के बीच यह भी कहा जाने लगा कि नेहरु चुने हुए नेता नहीं है फिर वे कैसे इतना बड़ा फैसला कर सकते है? यह सवाल नेहरु को साल गया और उन्होंने कहा चुनाव के बाद ये बिल लायेंगे। अम्बेडकर ने बिल पास नहीं कराने के फैसले के विरोध में केबिनेट से इस्तीफा दे दिया।

चुनावी बिगुल फूंका गया। नेहरु हर सभा में इस बिल का जिक्र करते और भारी जीत के बाद संसद में यह बिल पास कराया। बेटी को पिता की सम्पत्ति में अधिकार और बहुविवाह पर रोक क्रांतिकारी फैसले सिर्फ नेहरु की जिद् से पूरी हुई।

हम नहीं कहते कि विरोध के उन चेहरों को याद रखिये लेकिन महिलाओं को अत्याचार और पितृसत्ता की मनमानी तो याद रखना ही होगा क्योंकि यह एक बीमारी है जो कभी भी फटी जींस से आ सकती है।

गुरुवार, 18 मार्च 2021

सीना ठोक के...

 

जब इस देश के दस लाख बैक कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे तब उसी समय केन्द्र सरकार सौ और कंपनियों या संस्थानों को बेचने का निर्णय कर रही थी! सवाल यह नहीं है कि सरकार इसे क्यों बेच रही है क्योंकि जनता ने उन्हें जिस काम के लिए चुना है वह बखूबी कर रही है, पेट्रोल-डीजल पर वह कितना टेक्स ले रही है वह सीना ढोक के कहती है। कंपनी बेचने की बात भी वह सीना ठोक के कह रही है तब सवाल यह है कि क्या कंपनियों को वह औने-पौने दर पर बेच सकती है!

हालांकि यह सवाल अब पूछना देशद्रोह हो जायेगा क्योंकि उसे जनता ने चुना है और वह चाहे तो देश की किसी भी कंपनी का निजीकरण कर सकती है और वह चाहे तो फ्री में भी दे सकती है क्योंकि जनता ने जब उसे चुना है तो फिर सत्ता पर सवाल क्यों?

लेकिन हम यहां सवाल नहीं उठा रहे है बल्कि बता रहे है कि मोदी सत्ता ने पांच ट्रिलियन इकानामी करने के लिए देश की सौ संस्थानों को बेचने का या निजीकरण करने का निर्णय ले लिया है जिसमें रेलवे से लेकर खेल स्टेडियम तक शामिल है।

ऐसे में हम यह भी बता दे कि कोई भी खरीददार जब घाटे का सौदा नहीं करना चाहता तब वह क्या करेगा। वह उस कंपनी के एसेट्स की कीमत कम आंकेगा और फिर एसेट्स से भी कम कीमत पर कंपनी खरीद लेगा, क्योंकि इस देश में बैंक से लोन लेने के लिए किसी भी एसेट्स का मूल्यांकन कैसे किया जाता है यह किसी से छिपा नहीं है तब सरकार का आंकलन या मूल्यांकन पर कोई सवाल कैसे उठा सकता है। और यह सब सीना ठोंक के किया जा रहा है।

पिछले 6-7 सालों में जिन संस्थानों का निजीकरण किया गया था जिसे बेचा गया उसके बारे में कहा जाता है कि उन कंपनियों के जो एसेट्स थे उसका बाजार मूल्य कई गुना ज्यादा था। ऐसे में जब आम जनमानस राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में डूबी हो और विपक्ष में लडऩे की ताकत ही न बची हो तब सत्ता जानती है कि उसे क्या करना है और वह वही कर रही है।

2014 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में करीब पांच लाख लोगों की नौकरी चली गई है, देश में बेरोजगारी दर चरम पर है लेकिन जब लक्ष्य हिन्दूत्व की रक्षा का हो तो ये सारे मुद्दे गौण हो जाते है।

यही वजह है कि पांच राज्यों के चुनाव में जो लोग भाजपा की जीत का दावा कर रहे हैं वे जानते है कि इस देश को कहां ले जाना है और चुनाव कैसे जीता जाता है। इसलिए स्मृति ईरानी ने बढ़ती महंगाई पर कैसे हाय तौबा मचाया था वह मायने नहीं रखता। सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 33 रुपए और डीजल पर 32 रुपए वसूल कर रही है उसका भी कोई मतलब नहीं है क्योंकि खाली बैठे युवाओं के मन में हिन्दू राष्ट्र का सपना जाग गया है और उन्हें इन महंगाई से कोई लेना देना नहीं है और न ही निजीकरण के बाद आरक्षित वार्गो की नौकरी का क्या होगा? यह भी सवाल बेमानी है क्योंकि आरक्षण ने उनका अधिकार छीना है वह यही समझे है।

तब मंदिर में पानी पीने वाला आसिफ के लिए हिन्दुत्व का औजार चुनाव में भी कारगर होगा, तब देश की संस्थाएं कैसे किसने से बची रह सकती है।