शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

कहानी कुछ अलग है...

 

ये रोटी के लिए झगड़ते बंदरों को मुर्ख बनाते सियार की कहानी कतई नहीं है और न ही डाकू गब्बर सिंह की ही कहानी है यह तो साफ-साफ उस सोने के कंगन के लालच में दलदल में बैठे आदमखोर के पास लाकर अपनी मौत मरने की कहानी है।

गुलनार साहेब ने कहा था कि बेहतर की तलाश में ऐसा न हो कि हम बेहतरीन दिन खो दें। लेकिन दिवारों में लिखी ईबादत को कौन पूछता है? सबकी अपनी सोच है और अपनी सुविधानुसार परिभाषा गढऩे की आजादी। ऐसे में हम किसी को आदर्श भले ही कह दें लेकिन उस रास्ते पर कौन चलता है।

अच्छे दिन आयेंगे का मतलब का हम बेहतर चाहते हैं, हर व्यक्ति चाहता है कि उसका आने वाला दिन बेहतर हो लेकिन ठंड से बचने के लिए कोई घर को ही आग नहीं लगाता। सत्ता का अपना चरित्र है और सत्ताधारी नेताओं के चरित्र की बात ही बेमानी है, विपक्ष में रहते जिन मुद्दों पर वह हाय तौबा मचाती है, सत्ता आते ही वही मुद्दे उन्हें देशद्रोही लगने लगता है! देशद्रोही की नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगी है, आलोचना को बर्दाश्त करने की ताकत सत्ता के पास कब रही है। 

सत्ता पाने नफरत की दीवारें खड़ी करने का खेल तो स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही शुरु हो गया था। साथ ही शुरु हुआ था हिन्दुत्व का खेल। इस खेल को मजेदार और विजयी बनाने नफरत, अफवाह और झूठ की चाशनी में लपेटा जाने लगा। अच्छे दिन के सपने दिखाये जाने लगे। हिन्दूत्व के अस्तित्व को खतरा बताने के लिए लालच देने का दौर का लंबा इतिहास है। पंचतंत्र के उस आदमखोर शेर की तरह सोने का कंगन तलाशा गया और जो भी इस कंगन को पाने जाता वह मारा जाता लेकिन वह कहानी है, इसलिए इसमें फेरबदल किया गया। कंगन की जगह अच्छे दिन के सपने सजाये गए। उस कहानी में तो सिर्फ लालची आदमी मारा जाता था लेकिन इस कहानी में सद्भावना, प्रेम, एकता, भाईचारा समाप्त होने लगी लेकिन बेहतर की तलाश में समाप्त होते रिश्ते की मौन परवाह करता है। कीचड़ मौजूद रहे बस। सत्ता की यही कोशिश रही ताकि लोग फंसते रहेे।

लोकतंत्र का मतलब ही बदल गया। लोकतंत्र का मतलब जन सरोकार की बजाय चुनावी जीत हो गया। और उस आस्था को इतना बड़ा कर दिया गया जो अंधविश्वास के रास्ते पर चल पड़े। आस्था से उत्पन्न अंधविश्वास की पराकाष्ठा सबके सामने है, जिस देश में सत्य और अहिंसा के दम पर आजादी मिली वहां झूठ स्वीकार्य हो गया, यह अलग बात है कि जो लोग अपनी पत्नी और बच्चे के झूठ पर क्रोधित हो जाते हैं उन्हें साहेब का झूठ अपनी बरबादी और देश की बरबादी के स्तर पर पसंद है।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

म्यांमार से दिल्ली...

 

म्यांमार में अब रोहिंग्या नहीं है, लेकिन म्यांमार एक बार फिर जल रहा है, सेना की गोली से अब तक म्यांमार में पांच सौ लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इस नरसंहार के पहले बौद्ध भिक्षु अशीन विराथु ने जो नफरत फैलाई थई उसके चलते रोहिंग्या दर-बदर हंै। विराथु तब जीत गये थे और आज भी सेना के साथ खड़े विजयी मुस्कान लिए हुए हैं। म्यांमार में लोकतंत्र समाप्त हो गया है, सत्ता सेना के पास है।

क्या यह इस देश के लिए सबक नहीं होना चाहिए। कट्टरपंथई ताकतें जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बना रहे हैं उसके बाद क्या कट्टरपंथियों को पालना उचित होगा? इन कट्टरपंथियों को जिस तरह से सत्ता का संरक्षण प्राप्त है वह किसी से छुपा नहीं है, सत्ता के संरक्षण में ही मॉब लिचिंग हो या बलात्कार के आरोपी हो सभी को सम्मानित किया जाना, और इस सम्मान का सार्वजनिक प्रदर्शन का मतलब क्या है।

हम संवैधानिक संस्थानों की वर्तमान में स्थिति को लेकर कोई टिप्पणी करने की बजाय कोरोना काल में तब्लिकी और किसान आंदोलन के समय सिख समुदाय के खालिस्तानी का उदाहरण ही पर्याप्त समझते हैं। और इसे ही चेतावनी मानते हैं। बहुसंख्यकवाद से ग्रस्त होकर मानवीय मूल्यों की अनदेखी करना या उसे नुकसान पहुंचाना किसी भी देश के लिए सैनिक शासन या तानाशाही शासन का मार्ग प्रशस्त करता है।

जो लोग टाईम मेग्जिन में अशीन विराथू को बौद्ध आतंकवाद का चेहरा घोषित करने पर अजान बने रहे या नजरअंदाज करते रहे वे जान ले कि अशीन विराथू अब अपने ही लोगों के लाशों पर चढ़कर सत्ता प्राप्त करने में लगे हैं? हम यह नहीं कहते कि अमेरिका के कुछ संस्थानों ने यहां के कुछ संस्थानों पर अशीन विराथू की तरह आतंकवाद का चेहरा चिपकाया है वह उचित अनुचित के तराजू में कहां है लेकिन यह एक तरह की चेतावनी है।

किसी भी देश में बहुसंख्यक समाज तभी तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में फल-फूल सकता है जब तक उनके देश के अल्पसंख्यक वर्ग बगैर डर-भय के जीवन यापन करते हैं। हर देश ने अपने देश के अल्पसंख्यकों को विशेष सुविधा दी है, कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने का उपक्रम किया है और इस उपक्रम में बहुसंख्यक कट्टरपंथी बाधा डालते रहे हैं, हक मारे जाने का झूठा बवाल खड़ा करते रहे हैं और इस बवाल को जिसने भी सच मान ाउस देश में सत्ता तानाशाही हुई है और देश बर्बाद!

बुधवार, 31 मार्च 2021

सवाल झूठ का नहीं...

 

जब आप जानते हो कि वह बात-बात पर झूठ बोलता है? फिर भी उसका झूठ बहस का मुद्दा बने इसका मतलब क्या है? इसका मतलब समझने से पहले एक राजा की कहानी को याद रखना जरूरी है जो सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का प्रपंच करता था कि जनता उसकी मनमानी की बजाय उसके दान-धर्म और कलाकारी पर ही ध्यान केन्द्रित करे। वह जानबूझकर ऐसे सवाल बड़ा करता था कि लोग उस सवाल को हल करने में लग जाए ताकि खूब ईनाम मिले।

यह एक तरह का सत्ता में बने रहने और मनमानी को जारी रखने का तरीका था। जनता को ऐसे सपनों में सलाह दो कि वह जागती आंखों में वही देखे जो सत्ता चाहती है, जो लोग जानते हैं कि यह सपना है उन्हें बागी करार देकर जेल में डाल दो और उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगा दो।

सत्ता की अपनी विचित्र शैली है, और लोकतंत्र में यह शैली तब तक कारगर होते रही है, जब तक स्वयं इस शैली के शिकार न हो जाये। तब तक बहुत देर हो चुका होता है। दरअसल प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परेशानी है, और स्वयं की गलतियों पर दूसरे पर दोष मढऩा मानवीय प्रवृत्ति है, और सत्ता इसी बात का फायदा उठाती है। ये सच है कि इस देश में आरक्षण की वजह से कुछ सामान्य वर्ग के लोगों को दिक्कत हुई है लेकिन इस दिक्कत को बड़ा बनाना और स्वयं को आरक्षण के खिलाफ बताकर जो सपना दिखाया जाता है उसे जानने की जरूरत है। सभी जानते है उसे जानने की जरूरत है। सभी जानते हैं कि आरक्षण समाप्त करना मुश्किल भरा काम है लेकिन आरक्षण का विरोध कर वोट बटोरे जा रहे हैं।

एसेे कितने ही उदाहरण है जो केवल राजनैतिक सब्ज बाग है, हिन्दू राष्ट्र की कल्पना हो या फिर मुस्लिमों या दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत की लकीरे खींचने की बात हो यह सिर्फ वोट हासिल करने का तरीका है। आजकल तो आय दुगनी करने और लाखों लोगों को रोजगार देने का नया जुमला शुुरु हो गया है और हैरानी की बात तो यह है कि इस प्रपंच में पढ़े-लिखे युवा भी फंसते चले जा रहे हैं।

बात असल मुद्दे से भटकाने से हुई है, बात शुरु हुई थी बात-बात में झूठ बोलने से। इसलिए यह बताना जरूरी है कि आम लोगों की सुरक्षाशिक्षा, रोजगार परिवहन के साधन और अस्पताल ही जरूरी मुद्दे हैं लेकिन इस पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। बहस की जाती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंग्लादेश की आजादी को लेकर झूठ क्यों बोल रहे हैं।

जबकि बहस होनी है कि पिछले सात सालों में अच्छे दिन क्यों नहीं आये, रुपयों के मुकाबले डालर का क्या हाल है, दो करोड़ रोजगार के वादों का क्या, पेट्रोल डीजल घरेलू गैस की बढ़ती कीमत और निजीकरण के लिए लगातार बिकते सार्वजनिक उपक्रम पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए। किसानों के आंदोलन को लेकर सरकार की बेरुखी पर सत्याग्रह क्यों नहीं किया जाना चाहिए और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन सात सालों में ऐसी क्या परिस्थितियां निर्मित हुई कि पांच लाख से अधिक लोगों ने भारत की नागरिकता त्याग दी। जिस दिन भी यह सवाल खड़ा करते लोग अपने-अपने हिस्से को लेकर खड़ा हो जायेगा देश मजबूत हो जायेगा।

रविवार, 28 मार्च 2021

झूठ बोलने की बीमारी...

 

झूठ बोलने की बीमारी को माई थोमेनिया भी कह सकते हैं, यह उन व्यक्तियों में अधिक होती है जो स्वयं के धर्म-जाति को श्रेष्ठ बताते नहीं थकते, हालांकि माईथोमेनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें झूठ बोलने या अतिश्योक्ति की असमान्य प्रवृत्ति होती है। यह एक तरह का मानसिक विकार है और जिसमें यह विकार आ जाता है वह यह कभी नहीं सोच पाता कि उसकी इस हरकत से वह स्वयं हंसी का पात्र हो सकता है या उसकी झूठ की वजह से देश समाज को शर्मिन्दा उठानी पड़ सकती है।

हालांकि झूठ बोलने वालों को पसंद करने वालों की तादात बढ़ी है और वे इस पर तर्क भी देते नहीं थकते कि झूठ बोलने से किसी का नुकसान न हो रहा हो या किसी की जान बच रही है तो झूठ बोलने में क्या हर्ज है। अपने झूठ से किसी दूसरे को चकित या भ्रमित करना उनके लिए किसी विश्व विजेता से कम नहीं है। लेकिन मनोचिकित्सकों का क्या, वे तो इसे मानसिक बीमारी ही कहते हैं।

मनोचिकित्सकों के अनुसार यह सब माहौल की वजह से होता है, आप जिस माहौल में अपना जीवन खफा देते हैं जहां झूठ, अफवाह और नफरत के अलावा स्वयं ही सर्वश्रेष्ठ है। इसका पता लगाने की जरूरत नहीं पड़ती वह स्वयं अपनी बीमार या विकार का प्रदर्शन कर देता है। और वह व्यर्थ की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है।

मनोचिकित्सक तो यहां तक कहते हैं कि इस तरह से झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी वफादार नहीं होता। और स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और इस चक्कर में यदि इस बीमारी का शिकार व्यक्ति यदि उच्च पदों पर बैठा हो तो अपने पद का दुरुपयोग कर समाज-देश का नुकसान कर सकता है।

हालांकि ऐसा व्यक्ति अपनी वाकपटुता के चलते इसी तरह की बीमारी से ग्रस्त लोगों को न केवल अपना प्रशंसक बना लेता है बल्कि एक दो ऐसे काम कर लेता है जो अविश्वसनिय नजर आता है लेकिन कुल मिलाकर इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति से बड़े नुकसान की आशंका बनी रहती है।

हालांकि मनोचिकित्सकों ने झूठ बोलने की बीमारी को पकड़ लेने का दावा करते हैं और अब तो नार्को टेस्ट भी होता है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग इसलिए पकड़ में नहीं आते क्योंकि झूठ बोलने के लिए कोई खास संस्था से वे ट्रेनिंग लिये होते हैं।

झूठ बोलने की ट्रेनिंग देने वाली जाति या धर्म को ही महान बताकर युवाओं और बच्चों को आकर्षित तो करते ही है साथ ही सच की दीवार में झूठ का ऐसा सुराख करते हैं कि दीवार कम दिखे और सुराख ही बड़ा दिखे। आधा सच बताकर झूठ को ही सच बताने, अफवाह उड़ाने और अपने हालात के लिए दूसरे को जिम्मेदार बताकर नफरत का बीड़ा बोने वाली इन संस्थाओं को लेकर कुछ लोगों ने रिसर्च भी किया है।

खैर जब संस्था का उद्देश्य ही नफरत अफवाह और झूठ फैलाना हो तो आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी का क्या मतलब। अपने देश की आजादी हो या दूसरे देश की। बीमारी तो असर करेगा ही।

शनिवार, 27 मार्च 2021

किसान आंदोलन से डरने लगी सत्ता

 

किसानों के आंदोलन को तीन माह हो रहे हैं लेकिन पांच राज्यों के चुनाव में फंसी सत्ता को इससे कोई मतलब नहीं है, न ही आम जनमानस ही इस आंदोलन से उद्देलित है, ऐसे में किसान आंदोलन और भी लंबा चले तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा लेकिन एक बात जान ले आंदोलन किसी सत्ता का विरोधी नहीं होता, आंदोलन का मतलब सत्ता की मनमानी से मुक्ति का रास्ता है, आखिर नमक आंदोलन छेड़ कर गांधी जी ने क्या किया था, मुठ्ठी भर नमक बिट्रिश सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी और न ही विदेशी वों की होली जलाने से ही बिट्रिश सत्ता के राजा को ही कोई फर्क पडऩे वाला था लेकिन हिन्दुस्तानियों का दिल जुड़ गया था।

और जब दिल जुड़ता है तो लोग जुड़े है तब मनमानी करने वाली सरकार का सिंहासन डोलने लगता है, वह जनता को एक साथ जुडऩे नहीं देता क्योंकि निरापद सामूहिक कर्म किसी भी आततायी सत्ता को कंधा देता है, उसे तो हिंसा चाहिए ताकि अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सके इसलिए जब आंदोलन अहिंसक हो तो वह उसे हिंसक बनाने षडयंत्र रचता है ताकि भला मनुष्य खामोश बैठ जाए और सत्ता अपनी मनमानी करता रहे। अविश्वास भय और अलग-अलग झुंड चाहिए ताकि हर झुंड को वह अपनी ताकत से दबोच ले।

यही वजह है कि वह किसान आंदोलन ही नहीं इससे पहले हुए शाहिन बाग को लेकर भी भय, अफवाह फैलाते रहा, निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त लोग एक साथ जमा न हो जाए इसलिए वह राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में में डूबे रसगुल्ले परोसता है। क्योंकि सत्ता यह बात जानती है कि खुदीराम, आजाद, भगतसिंह से निपटना आसान है लेकिन गांधी से निपटना अब भी कठिन है क्योंकि गांधी का मतलब अहिंसा, सामूहिकता, समर्पण और भय से मुक्ति है।

किसानों के पास क्या है, दुनिया में किसी भी देश के किसानों से कम आय भारतीय किसानों की है जबकि दुनिया के देशों में कृषि उत्पादन के मामले में वह सबसे आगे की दौड़ में है तब किसान आंदोलन से सरकार क्यों डरे, क्योंकि किसानी से होने वाले नुकसान की वजह से हर साल लाखों युवा किसानी छोड़ दूसरे काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि किसान आंदोलन को लेकर न सरकार गंभीर है और न ही आम लोग ही इससे जुड़ पा रहे हैं तब मोदी सत्ता की मनमानी के चलते झुंड में बंटे आंदोलनकारी निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी इकट्ठा क्यों नहीं हो पा रहे हैं।

किसानों ने पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट डालने की अपील करते हुए आंदोलन का विस्तार तो कर दिया है तब क्या निजीकरण का खिलाफत करने वालों को भी इन राज्यों के चुनाव में अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं करनी चाहिए।

किसानों के भारत बंद को जो लोग असफल बता रहे हैं उन्हें जानना चाहिए कि यदि किसानों का आंदोलन असफल है तो  अहमदाबाद में पत्रकार वार्ता के बीच किसान नेता की गिरफ्तारी पुलिस नहीं करती। सत्ता डरने लगी है यह ईशारा है।

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

बोल के लब आजाद है तेरे...

 

यकीन मानिये महाराष्ट्र में जो लेटर बम फटा है, उसका कोई मतलब नहीं है, ये सिर्फ जनता को उसके असली मुद्दों से भटकाने का एक राजनैतिक तरीका है क्योंकि यही भाजपा खुद सत्ता में हो तो ऐसे लेटर का वही हश्र करती है जो आज महाराष्ट्र की सरकार कर रही है। यदि यकीन न हो तो गुजरात के संजीव भट्ट या असम के अखिल गोगई की याद दिला दूं।

संजीव भट्ट गुजरात केडर के अधिकारी ने अपने पत्र में कहा था कि गुजरात दंगे को भड़काने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार है लेकिन इसके बाद क्या हुआ, हंगामा मचा और संजीव भट्ट जेल में ढंंूस दिये गये। इस पत्र को लेकर अब शिवसेना हमलावर हो गई है।

असम के अखिल गोगई का पत्र तो और भी विस्फोटक है, जेल में बंद अखिल गोगई को एनआईए दफ्तर में भाजपा ज्वाईन करने, बीस करोड़ रुपये देकर अपना एनजीओ शुरु करने जैसे आरोप है। जेल से लिखे इस पत्र के बाद क्या भाजपा ने कोई कार्रवाई की। यही नहीं उत्तर प्रदेश के आईपीएस अमिताभ ठाकुर को जबरिया सेवानिवृत्त करने जैसे कितने ही आरोप भाजपा की झोली में है। सारदा स्कैम के आरोपी मुकुल राय का भाजपा प्रवेश क्या किसी लेटर बम से कम है।

ऐसे में कल बिहार विधानसभा में हुए शर्मसार कर देने वाली घटना से कौन शर्माये। महाराष्ट्र में ही अपराधियों का राजनैतिक दलों से संबंध किसी से नहीं छिपा है। उद्व ठाकरे मंत्रिमंडल के दो दर्जन सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज है तो भाजपा के 105 विधायकों में से 60-65 विधायकों पर गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज है।

हमाम में सभी नंगे है कि तर्ज पर जिस तरह से राजनीति ने आपराधियों को न केवल संरक्षण दिया है बल्कि उसे सत्ता की राह भी दिखाई है। मोदी सरकार के मंत्रिमंडल और सांसदों पर गंभीर अपराध की फेहरिस्त है ऐसे में महाराष्ट्र में लेटर बम को लेकर हंगामा क्या सिर्फ राजनैतिक नौटंकी नहीं है।

राजनैतिक दलों की अपनी सुविधानुसार परिभाषा देने की ललक से जो लोग भ्रमित है उनका क्या कहा जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में संसद में जब कहा था कि वे जनप्रतिनिधियों के अपरधिक मामलों को शीघ्र निपटाने कमेटी बनायेंगे। किसी ने वह कमेटी देखी, या अपराधियों की टिकिट कटते ही देखी क्या? बल्कि दूसरे दलों के अपराधिक आरोप वाले नेताओं को भाजपा में प्रवेश भी मिल गया।

पिछले सात सालों में देश की हालत क्या हो गई है यह किसी से छिपा नहीं है, किसान कितने दिनों से आंदोलित है यह अब खबर ही नहीं बनता, खबर तो निजीकरण से आरक्षित वर्गों को हो रहे नुकसान भी नहीं है। खबत तो वही बनेगा जो सत्ता चाहेगी, इसलिए इन दिनों महाराष्ट्र ही खबर है।

गुरुवार, 25 मार्च 2021

केजरीवाल का खौफ...

 

क्या देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब केजरीवाल सरकार से खौफ खाने लगी है नहीं तो वह दिल्ली राज्य की सत्ता हथियाने पिछले दरवाजे का इस्तेमाल क्यों कर रही है, ऐसा कानून वह क्यों बनाना चाहती है जिससे केजरीवाल सरकार के हाथ पैर बंध जाये और एलजी वही करें जो मोदी सत्ता चाहे!

यह सवाल भाजपाईयों को पसंद नहीं आने वाला है और वे इस बात को सिरे से नकार सकते है कि नरेन्द्र मोदी किसी से नहीं डरते और न ही भाजपा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को कुचलना ही चाहती है बल्कि वे इसके लिए देश की राजधानी की व्यवस्था को लेकर कई तरह का तर्क-कुतर्क दे सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि केजरीवाल सरकार ने जिस तरह से सत्ता चलाते हुए गर्वमेंस दी है और राजनीति की है उससे भाजपा के राष्ट्रवाद और हिन्दूतत्व के मोनोपल्ली की चूलें हिल गई है।

ऐसे में जब नगर निगम के उपचुनाव में भी भाजपा एक भी सीट नहीं जीत सकी तब सत्ता हथियाने के लिए यह बिल लाया गया है कहा जाये तो इसका मतलब आसानी से समझा जा सकता है।

दरअसल केजरीवाल ने जिस तरह से आम जनता के हित में मोहल्ला क्लीनिक से लेकर स्कूल की व्यवस्था की। तय सीमा और तय लागत से कम में ओवर ब्रिज व विकास के कार्य किये वह देश के दूसरे राज्यों के लिए मॉडल बनने लगा है। जबकि इसके उलट मोदी सत्ता आर्थिक नीति, विदेश नीति से लेकर अन्य नीति में फेलवर दिखने लगा है। 

सवाल सत्ता अच्छी तरह से चलाना भर होता तो शायद मोदी सत्ता केजरीवाल की तरफ से लापरवाह हो सकती थी लेकिन केजरीवाल ने राजनीति के चतुर खिलाड़ी के रुप में स्वयं को पेश करते हुए कश्मीर में धारा 370 हटाने पर जिस तरह से खामोशी बरती और एनआरसी और सीएए के मुद्दे पर दूरी बनाई जो भाजपा के लिए बेचैन करने वाला था। इतना ही नहीं अभी पिछले महिने केजरीवाल ने जिस तरह से दिल्ली की बजट को राष्ट्रवादी बजट और रामलला के दर्शन के लिए बजट में प्रावधान किया वह सीधे सीधे भाजपा के राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व के मोनोपल्ली पर हमला था।

और शायद यही वजह है कि मोदी सत्ता नहीं चाहती कि केजरीवाल ताकतवर बने इसलिए दिल्ली की सत्ता स्वयं चलाना चाहती है?

इस बिल के पास होने का अर्थ साफ है कि दिल्ली में चुनी हुई सरकार का कोई अर्थ ही नहीं बचेगा और न ही आम जनता को सरकार चुनने का ही कोई मतलब ही रहेगा। केजरीवाल सरकार जो भी कानून बनायेगी उसे एलजी आराम से रोक देगा और विवाद की स्थिति में राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा। इसका मतलब साफ है कि सत्ता किसके हाथ में होगी?