शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

संवेदना, दायित्व, अधिकार...

 

इस देश ने कई बवंडर देखें है, यह कोरोना का बवंडर भी थम जायेगा? लेकिन सत्ता की जनमानस के प्रति उपेक्षा याद रहेगी! याद तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ताली-थाली, दीप प्रज्जवलन और टीका उत्सव भी याद रहेगा। आपदा को अवसर में बदलने की सीख तो कई व्यापारी अभी से ही याद कर रहे हैं। ऐसे समय में संवेदना शून्य सरकार और उसके दायित्व को लेकर सवाल खड़ा करना कितना उचित है?

हैरानी तो इस बा की है कि जो लोग कल तक सत्ता की रईसी के लिए लगातार बेचे जा रहे सार्वजनिक उपक्रम और सरकारी संस्थानों के निजीकरण को लेकर सत्ता के साथ खड़े थे वे भी निजी अस्पतालों की कमाई को लूट रहे हैं। हालांकि यह मौका निजीकरण के विरोध का नहीं है लेकिन जो लोग निजीकरण के समर्थक हैं उनके लिए निजी अस्पताल और निजी स्कूल की इस दौर में भी कमाई चेतावनी है।

दरअसल आज भी लोगों को अपने अधिकार का पता ही नहीं है, लोकतंत्र में सरकारें क्यों बनाई जाती है यह वे जानते ही नहीं है, क्योंकि पिछले कई दशकों से उनके दिमाग में यही भरा गया कि सरकार मंदिर नहीं बनवा रही है, अल्पसंख्यकों को ज्यादा तवज्जों दे रही है, आरक्षण के नाम पर सवर्ण समाज का हक और प्रतिभा का गला घोंटा जा रहा है।

जबकि लोकतंत्र में सरकार इसलिए बनाई जाती है ताकि वह आम लोगों के मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखें, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा अधिकाधिक लोगों को मिले। आपदा के समय किसी को कोई तकलीफ न हो, चोरी, लूट और अन्य अपराध से लोग सुरक्षित जीवन जी सके। टैक्स का बोझ न हो अऔर हर आदमी सुख पूर्वक जीवन जीये, सबको काम मिले।

लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि न सरकारों ने जनता को उनका अधिकार समझाया और न ही सत्ता ने अपने दायित्व को ही पूरा किया। जो समझदार थे, नामी-गिरामी थे, पैसे वाले थे उनके गले में पट्टा डाल दिया गया ताकि वे किसी एक दल के होकर रह जाए और अपने दल की राक्षसी प्रवृत्ति पर भी खामोश रहे। लोकतंत्र में सत्ता महत्वपूर्ण नहीं होता और न ही धर्म जाति महत्वपूर्ण होता है लेकिन सत्ता में बैठने का  लोभ ने इसे हवा दी। और इस हवा के साथ लोग बहते चले गए? उन्हें लगा कि उनका दायित्व सिर्फ अपनी धर्म और जाति की श्रेष्ठता ही है।

ही वजह है कि गांधी और अम्बेडकर की तारीफ करने पर कुछ लोगों के पेट में दर्द होने लगा? उन्हें बताया गया कि हमारा ध्वज का रंग कुछ और है, संविधान गलत है। धर्म नहीं रहेगा तो देश का क्या मतलब!

लेकिन इतिहास गवाह है जिस देश ने भी धर्म अधिक महत्व दिया वह देश न तो ठीक से तरक्की कर पाया और न ही वहां लोकतंत्र ही बच सका। बात कोरोना के बवंडर से शुरु हुई थी इसलिए इस पर ही बात होनी चाहिए। लेकिन इस देवभूमि में जिस तरह लाशें गिर रही है उसे लेकर अब गुस्सा ही है, लगता है सरकार अब भी अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। वह अब भी आपदा में अवसर तलाश रही है क्योंकि चुनाव में हजारों की भीड़ और कुंभ में लाखों की भीड़ में वह अपना निजी फायदा देख रही है। तब सवाल यही है कि कौन अपने अधिकार बोध को जागृत करे। और संवेदना शून्य सरकार पर प्रहार करे।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कोरोना की दूसरी लहर और मोदी सत्ता...

 

कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह होगी, यह किसने सोचा था? क्या पहली लहर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए चेतावनी थी कि वह पूरा ध्यान स्वास्थ्य सुविधा पर दे? सवाल कई है क्योंकि अस्पताल और दवाई से जूझ रहे लोगों को यह जानना चाहिए कि पिछले साल कोरोना की पहली लहर से निबटने डब्ल्यू.एस.ओ, आईएमएफ और एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भारत को करीब 53 हजार 620 करोड़ रुपए दिये थे ताकि मोदी सत्ता स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करे। इसके अलावा पीएम केयर फंड में भी करोड़ों अरबों रुपए जमा हुए थे! लेकिन मोदी सत्ता ने क्या किया?

सवाल बहुत से है लेकिन सारे सवाल का हिन्दू-मुस्लिम ही जवाब हो तो फिर गुस्सा और करुणा में लाशें गिनने के अलावा जनता कर भी क्या सकती है। देश का कोई राज्य नहीं है जहां स्वास्थ्य सुविधा मजबूत हो, हर जगह सरकारी लापरवाही साफ दिख रहा है, उपर से कुंभ और चुनाव ने मोदी सत्ता की लापरवाही के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं?

कोरोना को लेकर जब पिछले साल सारी दुनिया उपाय ढूंढ रही थी तब हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नमस्ते ट्रम्प के चक्कर में थे लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। न यार मिला न बिसार सनम के तर्ज पर कोरोना तो बढ़ा ही अमेरिका से दुश्मनी अलग मोल ले ली। लापरवाही यही नहीं रुकी जब तक मध्यप्रदेश में सत्ता नहीं बन गई तब तक हाथ बांधे इंतजार किया गया। राहुल गांधी ने जब कोरोना को सुनामी और अर्थव्यवस्था को लेकर चेतावनी दी तो मोदी सत्ता सहित पूरी भाजपा मजाक बनाने लगे। यानी जिस सत्ता को विपक्ष का अच्छा सुझाव भी गंवारा नहीं उस सत्ता के अहंकार का असर जनता ही भुगतेगी। लेकिन सत्ता इन सब बातों से इसलिए बेपवाह है क्योंकि उनके पास लोगों का दिल जीतने धर्म और राष्ट्रवाद का ब्रम्हा है।

खैर सवाल तो यही है कि सालभर के समय मिलने के बाद भी मोदी सत्ता ने अस्पताल दवाई और डॉक्टर के बारे में क्या किया। कुछ नहीं किया और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा कहा जाए तो गलत नहीं है। दुनिया की शायद यह पहली सत्ता है जिसका विरोध करना देशद्रोह है, पैसों का हिसाब मांगना देशद्रोही और हिन्दू विरोधी है। कब्रिस्तान की तरह श्मशान में बढ़ोत्तरी की मंशा सबके सामने है। उपर से सत्ता का जिम्मेदारी से भागना तो बेशर्मी की हद पार करना है। हर बात पर हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद के ढोंग ने देश के सामने भयावह संकट खड़ा कर दिया है। चिकित्सा सुविधा को मजाक बना देने और निजी अस्पतालों को प्रश्रय देने का नतीजा सबके सामने है। तब सवाल है आम आदमी क्या करे, एक तरफ सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अभाव और दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की महंगी होती चिकित्सा सुविधा में आम जन मरे नहीं तो क्या होगा। हम निजी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को लूट इसलिए नहीं कहेंगे क्योंकि ये सिस्टम क अंग है। जब सरकार ही सुविधा देने के नाम पर कमीशनखोरी और लूट मचा रखी है तब किसी एक संस्थान पर लूट का आरोप बेमानी है।

जब सत्ता ही आपदा को अवसर में बदलने का राग अलाप रहा हो तो कालाबाजारी कैसे गलत हो सकता है आखिर वे गलत क्या कर रहे है। जैसी राजा वैसी प्रजा तो 2014 के बाद से चल रही है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-2

 

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि इसका इतिहास क्या है और कब से शुरु हुआ। इससे पहले ये जान ले कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?

ऐतिहासिक तथ्य इसे हिटलर से शुरुआत होना बताते हैं। क्या इससे पहले भी शुरु हुआ? इतिहासकारों का अपना दावा है लेकिन एक बात तो तय है कि इसकी शुरुआत सत्ता और श्रेष्ठता पर आधारित है। सत्तासीन होने और स्वयं को श्रेष्ठ समझने-समझाने के साथ ही ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण हुआ है। क्योंकि बगैर पढ़े-लिखों को तो आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखाों में नफरत का ध्वजारोहण आसान नहीं होता क्योंकि वे पंचतंत्र के शेर आया शेर आया वाला चरवाहे की कहानी भी पढ़े लिखे होते है तो आदमखोर शेर के दलदल में सोने का कंगन दिखाकर शिकार करने की कहानी भी जानते हैं तब सवाल था ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण कैसे किया जाए।

हमने पहले ही कहा है कि आदमी तोता नहीं है जो रटा रटाया वाक्य 'शिकारी आयेगा, जाल फैलायेगा, दाना डालेगा, दाना नहीं चुगना, जाल में फंस जाओगÓे को बोलकर जाल में फंस जायेगा! इसलिए दिल और दिमाग को अलग करना जरूरी था। और यह काम भारत में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने भारतीय को टाई पहनाना शुरु किया। टाई दिल यानी हृदय और दिमाग यानी मस्तिष्क के बीच गले में पहना जाता है। यानी ज्ञान पर नफरत की ध्वजारोहण की शुरुआत भारत में अंग्रेजों ने शुरु की। वह आजादी की लड़ाई का दौर था, अंग्रेजों ने भले ही 1857 की क्रांति को विफल कर दिया था, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़कर ही लंबे समय तक राज किया जा सकता था।

इतिहास चिख-चिख के कह रहा था कि शिवाजी से महाराणा प्रताप के लिए मुस्लिम और मुगलों की तरफ से हिन्दू युद्ध करते थे। कहीं धर्म को लेकर नफरत नहीं था। युद्ध केवल और केवल राजाओं की सत्ता प्राप्ति और सत्ता के विस्तार की वजह से होते थे। आम तौर पर हिन्दू-मुस्लिम सभी एक साथ रह रहे थे। जाति भेद तो था लेकिन वह जीवन जीने के तरीके को लेकर था। नफरत की दीवारें कैसे खड़ी की जाए ताकि जाति और धर्म की दीवार में जहर बोया जा सके यह काम अंग्रेजी सल्तनत का था। और इसी अंग्रेजी सल्तनत ने ही अपने स्वार्थ के लिए नफरत का जहर बोना शुरु किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय सेवक संघ का उदय हुआ। और भी संगठन बनने लगे।

1857 की क्रांति से डरे अंग्रेजों ने हिन्दू और मुस्लिम एकता को कुठाराघात करने जहां बंग भंग जैसे कानून लाये तो दलितों को अलग करने पूना पेक्ट लाया गया। इस अंग्रेजी नीति में वे लोग फंसते चले गए, जिसमें स्वार्थ भरा था, या जिनमें संघर्ष का माद्दा नहीं था। उधर हिटलर की जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता ने पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झोक दिया तो उसी तरह की श्रेष्ठता की लड़ाई यहां भी होने लगी। इतिहास कुरेदे गये जिनका वर्तमान से कोई संबंध नहीं रहा। राजाओं की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम का मसाला लगाया गया जबकि वह केवल सत्ता की लड़ाई थी। राजाओं के फैसलों में हिन्दू मुस्लिम ढूंढा गया। यहां तक कि अफवाह, झूठ का सहारा लिया जाने लगा।  झूठ को अतिशयोक्ति तक ले जाकर नफरत के बीज बोए जाने लगे। 

लेकिन महात्मा गांधी दीवार बनकर खड़े हुए। नफरत के हर तीर पर ढाल बने रहे लेकिन अंग्रेजों की नीति को कामयाब होने से नहीं रोक पाये। देश का विभाजन नहीं रोक पाये। और विभाजन के बाद जब सत्ता नहीं मिली तो गांधी को ही मार डाला गया। (जारी...)

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आपदा में अवसर...

 

जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी वे लोग ताली बजा रहे थे, जो हिन्दू कुंठा से ग्रस्त थे, उन्हें तो मोदी की हर बात अच्गछी लगती है चाहे वह कितना भी अधार्मिक हो या अनैतिक हो। ये वे लोग है जो ईवीएम के विरोध को भाजपा का विरोध मानते हैं और भाजपा के विरोध को देश का।

खैर बात यहां महामारी में आपदा में अवसर की बात पर ही चर्चा होनी चाहिए क्योंकि ये बात प्रधानमंत्री ने कहा थी और उसका परिणाम कालाबाजारी से लेकर निजी अस्पतालो में दिखाई देने लगा है। बहुत पहले शायद स्कूल के दिनों में कहीं सुना था कि आपदा में अवसर नहीं सेवा ही धर्म होना चाहिए और कोई भी लोकतांत्रिक और सेवाभावी जनसेवक महामारी में आपदा में अवसर की बात नहीं कर सकता लेकिन तब मेरे इस बात को लेकर भक्तों ने मुझसे लड़ाई भी कर ली थी और कुछ तो आज भी बात नहीं करते।

तब यह भी कहा गया कि महामारी जैसे आपदा में अवसर की प्रतिज्ञा गिद्ध, सियार और लकड़बग्घे करते हैं, उनके लिए महामारी से प्रभावित लाशें शानदार दावतें होती है और ये उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिस देश में एक व्यक्ति के सुख और दुख में पूरा गांव का गांव, या मोहल्ला का मोहल्ला शामिल होता है वहां महामारी के आपदा में उत्सव की बात कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन अंधेर नगरी, अंधेर राजा की कहानी भी याद न हो तो फिर पढऩे-लिखने का मतलब ही क्या है?

आपदा में अवसर की तलाश ज्यादातर वे लोग करते हैं जिनके खून में व्यापार है। और यह बात जब कोई स्वयं स्वीकार कर ले तो याद कीजिए 1965 और 1971 का वह युद्ध जब कुछ व्यापारी कालाबाजारी कर आपदा में अवसर का लाभ ले रहे थे। लेकिन तब सत्ता ने सेवा को धर्म बताकर कितने ही व्यापारियों के हृदय परिवर्तन किये थे लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही आपदा में अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग करेगा तो उसका परिणाम क्या होगा?

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही कालाबाजारी और अब निजी अस्पतालों की लूट से आम जनमानस में भय व्याप्त है। भयमुक्त शासन का कहीं पता नहीं है। लेकिन हमारा आज भी मानना है कि आपदा में अवसर की तलाश करने की बजाय आपदा में सेवा धर्म किया जाए!

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सातवां बेड़ा...

 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में विदेशी  हस्तक्षेप को लेकर बाइडन ने साफ कह दिया था कि इसकी प्रतिक्रिया मिलेगी ! तब किसने सोचा था कि अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं भारत भी होगा।

भारत के मामले में बिना चुनौती के इस तरह से सातवें बेड़े के भारतीय ईईंजेड में प्रवेश क्या अबकी बार ट्रम्प सरकार की प्रतिक्रिया है। अपने जहाज को भारत की सीमा में प्रवेश कराकर जिस तरह से प्रेस नोट जारी किया गया है वह पूरी दुनिया को जानकारी देना ही नहीं भारत की फजीहत करना भी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ये बता रही है कि ऐसा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है कि यूएन कन्वेशन के तहत कोई भी देश, किसी दूसरे देश की ईईजेड में देश की अनुमति के बिना हथियार और साजो समान से लदे फ्लीट के साथ प्रवेश नहीं कर सकता। यदि जहाज में व्यापारिक वस्तएं है तो अनुमति की जरूरत नहीं।

हालांकि अमेरिका इसे अधिकार और आजादी का इस्तेमाल करने का दावा कर रही है और इसे फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन बता रही है और यह भी कहा है कि भारत के समुन्दर को लेकर किये जा रहे दावे को वह नहीं मानते और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

यह एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलकर चुनौती है लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी हैरान कर देने वाला है। सांतवा बेड़ा नाम सुनकर 1971 जेहन में आने लगता है। तब पाकिस्तान पर हमला करने पर अमेरिका के द्वारा धमकी दी जा रही थी वो सातवां बेड़ा भेजेंगे। और अमेरिका ने हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा उतार भी दिया लेकिन तब इस देश की लौह महिला ने अमेरिका को आंख दिखाकर न केवल सांतवा बेड़ा को लौटने मजबूर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।

अमेरिका द्वारा किये गये इस सार्वजनिक फजिहत से पहले पाठकों को यह जान लेना चाहिए कि इंदिरा गांधी उसी जवाहर लाल नेहरु की बेटी और राहुल गांधी की दादी है जिन पर परिवारवाद का आरोप जड़ा जाता है और 70 साल में कुछ नहीं किया का दावा किया जाता है। हैरानी तो यह है कि 70 साल में कुछ नहीं करने का दावा वे लोग भी समर्थन करते हैं जो सायकल से कार में पहुंच गए?

खैर राजनीति में झूठ नफरत और अफवाह ही जिनकी सोच हो उनके बारे में ज्यादा क्या कहा जाए? जिस तरह से झूठ और नफरत की दीवार खड़ी हुई है उसी तरह से ये गिर भी जायेगी? लेकिन तब देर न हो जाए।

ऐसे में यदि चीन के बाद दूर बैठे अमेरिका भी यदि भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने लगे तो इसका करार जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका हर चुप्पी को कमजोरी समझता है तब अमेरिका यह भी जान ले कि कमजोर देश नहीं सत्ता  हो सकता है!

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...


कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधई सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सचा लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में हैÓ। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुस रहे हैं।

(जारी...)

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

शाबास प्रधानमंत्री जी...

 

क्या बात है... देश में फिर कोरोना हाहाकार मचाने लगा है। रोज हजारों लोग मरने लगे हैं, देश की जनता तो सीधी-साधी है और सबसे भोले हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी। और उनसे भी लाख गुना सीधे है हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी। दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर पहुंच जायेंगे बंगाल और जुटा लेंगे लाखों की भीड़।

मुझे एक बात प्रधानमंत्री से सीधी पूछनी है कि क्या आपकी रैलियों में जो भीड़ जुट रही है उससे कोरोना नहीं फैलता क्या? चंद रुपयों की खातिर रैली में आने वालों के लिए तो भूख पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है लेकिन देश में जिस तरह से कोरोना के कहर से लाशों में लोग तब्दिल हो रहे हैं क्या वह भई दिखाई नहीं दे रहा है या चुनावी जीत के लिए लोगों की जान को दांव में लगा देना उचित है?

शाबास की हेडलाईन इसलिए लगाया ताकि भाजपा के वे लोग भी पढ़े और एक बार चिंतन करें कि चुनावी जीत क्या इतना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी आप देश के मुखिया हैं और मुखिया का व्यवहार और कर्तव्य सब लोगों के हित के लिए होना चाहिए। हम मानते हैं कि चुनाव में जीत महत्वपूर्ण है लेकिन एक दो राज्य गंवा देने से क्या फर्क पड़ जायेगा, पहले भी तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली गंवा ही चुके हो।

एक तरफ देश में कोरोना ने हाहाकार मचा दिया है, नाईट कफ्र्यू, लॉकडाउन ने आम आदमी को प्रताडि़त किया है तो दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी सभा लेने में व्यस्त है, दिनभर चुनावी सभा और शाम को दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की बात क्या बेमानी नहीं है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में कोरोना के लिए हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता की भूख ही जिम्मेदार है, और इस बार फिर कहते हैं कि चुनावी सभा में जुटाये जा रहे भीड़ इस देश को नरक बना देने वाला है। सत्ता और राजनेताओं की बेशर्मी के कितने ही किस्से हैं लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही चुनावी जीत के लिए जनता की जान को ही दांव पर लगा दे तो इसका मतलब साफ है कि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनते तक का इंतजार भी क्या ऐसा ही कुछ नहीं था।

हैरानी तो इस बात की है कि करोड़ों लोगों की जान दांव में लगते देख भी राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने आंखे बंद कर रखी है बाजार में भीड़ पर हल्ला मचाने वाली मीडिया को भी चुनावी रैली में भीड़ जुटाने वालों के तलवे चाटना पसंद है। जब देश की तमाम संवैधानिक संस्था, समाजसेवी कलाकार सब चुप हो तो जनता क्या करें।

वैसे भी इस देश ने गरीबी और भूखमरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, चंद पैसों के लिए जो लोग अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं उनका ही दोष गिनाया जायेगा, कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री की चुनावी सभा से कोरोना की स्थिति आने वाले दिनों में भयावह होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब तो फैसला लिजिए, लोगों को बख्श दीजिए, बंगाल तो आते-जाते रहेगा लेकिन जब लोग ही नहीं रहेंगे तब...!