मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

जिम्मेदारी से दूर...


एक तरफ सत्ता थी जो अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकत और लापरवाही से जनता को मुसिबत में डाल दिया था तो दूसरी तरफ जनता अपनी जिम्मेदारी समझ इस संकटकाल में लोगों की मदद के लिए आगे आ रही थी। सोनू सूद तो हीरो बन गये है लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में कितने ही लोग हैं जो लोगों की सेवा कर रहे हैं, विधायक सत्यनारायण शर्मा और उनके दोनों बेटे पंकज और विकास तो पीपीई कीट पहनकर दिन रात सेवा में लगे थे तो विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने कोविड सेंटर खोल दिया था, शहर कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे, सराफा व्यापारी अशोक  गोलछा, प्रहलाद सोनी, डॉ. राकेश गुप्ता, मनजीत बल्ला, विकास तिवारी कितने ही नाम है जो सहायता के लिए हर पल तत्पर थे और हैं।

दुख की बात तो यह है कि इस विषम परिस्थिति में राजनीति अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है और ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिर्वसिटी की बेशर्मी तो अब भी हिन्दू-मुस्लिम में लगी हुई है। चारो तरफ मोदी सरकार के प्रति गुस्सा और असंतोष बढ़ रहा है और उसे दबाने ट्रोल आर्मी और आईटी सेल एक बार फिर झूठ का सहारा लेकर नफरत फैलाने में लग गई। वे अब भी मानने को तैयार नहीं है कि केन्द्रीय सत्ता की लापरवाही और कोविड की गंभीरता को नजरअंदाज करने की वजह से ही हालत यहां तक आ पहुंची है।

हैरानी तो तब होती है जब देश के गृहमंत्री अमित शाह या दूसरे केन्द्रीय मंत्रियों का इस पर बयान आता है और राज्य सरकार को दोषी ठहराते हैं। जिन लोगों ने अपनी सत्ता बचाने बार-बार प्रोटोकाल की अवहेलना की हो वे प्रोटोकॉल को मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में धर्म की राजनीति करने वालों को याद करना चाहिए कि सत्ता को प्रोटोकाल की याद तभी आती है जब संकट में अपनी भूमिका को उजागर होते देखते हैं। महाभारत को याद कीजिए कि प्रोटोकाल की याद कब-कब दिलाई गई वे लोग जिन्हें पांच गांव नहीं देने को राजी थे, भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण कर रहे थे, अभिमन्यु को अकेले घेर कर मार रहे थे। वे जब कर्ण पर बाण चला रहे थे तो प्रोटोकाल बता रहे थे, दुर्योधन के जंघा पर वार के समय प्रोटोकाल बता रहे थे।

हैरानी तो तब होती है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे ही प्रधानमंत्री केयर फंड से देश के सभी जिलों में आक्सीजन प्लांट डालने की घोषणा करते हैं उसके कुछ ही घंटों बाद देश के गृहमंत्री इस कदम का स्वागत करते हुए कहते हैं कि अब आक्सीजन की कमी नहीं होगी। यानी आक्सीजन प्लांट न हुआ अलाउद्दीन का चिराग हो गया, बोलते ही प्लांट तैयार होकर आक्सीजन देने लगेगा। आक्सीजन की जरुरत आज है और अभी है ऐसे में इस प्लांट का लाभ तो बाद में ही मिलेगा लेकिन जब देश के एक्सपर्ट और संसद में सांसद आने वाले दिनों में आक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तब सत्ता ने क्या किया? तब क्यों नहीं व्यवस्था की। आक्सीजन के निर्यात को क्यों नहीं रोका गया।

दूसरी लहर की चेतावनी को क्यों नजर अंदाज किया गया? और आज भी केयर फंड से जो आक्सीजन प्लांट बनाने की घोषणा की गई है उसका पूरा नियंत्रण केन्द्र के ही हाथ में है। यानी पिछली घोषणा की तरह क्या यह भी हवा हवाई होकर नहीं रह जायेगी। तब जनता के प्रति जिम्मेदारी की बात सत्ता न ही करे तो अच्छा है।

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

पत्रकार साथी तिवारी और हसन का निधन

 रायपुर – जनसंपर्क विभाग के सहायक संचालक डॉ छेदीलाल तिवारी हमारे बीच नहीं रहे, उनका बीती रात रायपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। डॉ तिवारी कोरोना से हारने वालों में से नहीं थे, उनकी मौत का जिम्मेदार सुयश हॉस्पिटल की अव्यवस्था है। करीबी सूत्रों के मुताबिक उनके सिर में चोट लगी है और खून निकल रहा था, जबकि वे एक हफ्ते से अधिक समय से आईसीयू में थे। उनकी इस तरह मौत यह सवाल खड़े करती है कि कोरोना के इलाज के नाम पर आखिर हो क्या रहा है।

डॉ तिवारी एक सरल मिलनसार व्यवहार कुशल सहित जीवट व्यक्ति थे, अनेक चुनौतियों और संघर्षों के सामना करते हुए आगे बढ़े थे। उन्होंने अविभाजित मध्य प्रदेश के जनसम्पर्क विभाग में ऑटो चालक के रूप में नौकरी की शुरुआत की। उस ऑटो से वे डाक बांटा करते थे। लेकिन उन्होंने यह नौकरी करते हुए अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी। राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री ली। तबतक विभाग ने उन्हें वाहन चालक बना दिया। इसके बाद छेदीलाल तिवारी ने पीएचडी की। उनके पीएचडी का विषय था ‘मध्य प्रदेश शासन में जनसम्पर्क की भूमिका’। पीएचडी करने के बाद साहब का ड्राइवर , डॉक्टर हो गया। इसकी चर्चा खूब हुई, इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने इसे खबर बनाया। यह खबर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को मिली। इसके कुछ समय बाद दिग्विजय सरकार की कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर डॉ छेदीलाल तिवारी को सूचना सहायक बना दिया। और फिर धीरे धीरे डॉ तिवारी अपनी काबिलियत के बल पर आगे बढ़ते रहे।

डॉ तिवारी का पूरा जीवन प्रेरणा देने वाला है। डॉक्टर तिवारी की असामयिक मृत्यु से छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग में शोक की लहर व्याप्त है वही एक और दिल दहला देने वाले समाचार आया की रायपुर के वरिष्ट पत्रकार जियाउल हसन का कल रात रायपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया वे लंबे समय से दैनिक समाचार पत्र वरिष्ठ पत्रकार अग्रदूत सहित अन्य संस्थाओं में अपनी सेवाएं दी हमेशा जिंदादिल एवं मिलनसार व्यक्तित्व के धनी भाई जियाउल हसन के मृत्यु समाचार से प्रेस जगत को गहरा आघात लगा है वरिष्ठ पत्रकार जियाउल हसन को रायपुर प्रेस क्लब एवं छत्तीसगढ़ एडिटर्स एंड पब्लिशर्स एसोसिएशन द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई है



जन की बात-10

 

कोरोना की दूसरी लहर में सब तरफ वही हालात बनने लगे जो पहली लहर में देखी गई। सत्ता के उपर न मजदूरों को भरोसा है और न ही किसान-जवान, व्यापारी, मध्यम वर्ग किसी को भरोसा नहीं है, इसलिए मजदूर फिर वापस अपने घरों की ओर लौटने लगे। किसान पहले से ही आंदोलित हैं, व्यापारी सरकार की जीएसटी प्रणाली से असंतुष्ट है तो मध्यम वर्ग बढ़ती महंगाई, ऊपर से कोरोना का कहर और सत्ता की कथनी करनी में भेद।

सत्ता के प्रति आसक्ति जब जब इस देश ने देखा है वह अन्याय का शिकार हुआ है। याद कीजिए ऐसी ही आसक्ति इंदिरा गांधी ने 1975 में दिखाई थी, तब वे कहां न्याय के मार्ग पर चले थे लेकिन जल्द ही आंखे खुल गई लेकिन इस बार तो सत्ता के प्रति आसक्ति ने सारी सीमाएं लांघ दी है। रामायण में प्रभु राम ने भी कहा था सत्ता के प्रति आसक्ति का ही अन्याय की जननी है। दिन-रात जय श्री राम के नारे चीख-चीख कर बोलने वाले भी प्रभु राम की इस भाषा को नहीं समझ रहे हैं तब यह देश और किससे उम्मीद करें।

क्या सत्ता का वर्तमान इतना संवेदनाशून्य है कि उसे बिखरते परिवार, गिरती लाशें दिखाई नहीं दे रही है, अस्पतालों में उठ रहे सिसकने की , रोने की आवाज सुनाई नहीं दे रहा है। सत्ता वे होती है जो चुनौती को पहले ही पहचान लेता है या चुनौती का सामना करने को सदैव तत्पर रहता है। लेकिन यहां तो सिर्फ दायित्व का दंभ है, जिम्मेदारी का कहीं पता नहीं है। भक्त अब भी अपने कथित अवतारी के प्रेम में पशु हो गये हैं, ऐसे में इतिहास में घटित एक घटना को याद किया जाना चाहिए।

मिशिगन की डोरोथी मार्टिन ने अपने अनुनायियों और भक्तों को कयामत की चेतावनी देते हुए एक बार कहा कि 21 दिसम्बर 1954 की सुबह दुनिया खत्म हो जायेगी। भक्त तो भक्त होते हैं, कईयों ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, कई लोग तो अपना सब कुछ बेच बाच कर डोरोधी के शरण में आ गये, डोरोथी ने कहा कि जो लोग उन्हें सच्चा गुरु मानते हैं वे सभी उडऩ तश्तरी में सवार होकर जायेंगे।

लेकिन, 21 दिसम्बर की दोपहर को ही स्पष्ट हो गया कि डोरोथी की भविष्यवाणी हवा-हवाई है, लेकिन आप हैरान हो जायेंगे की भविष्यवाणी झूठी होने पर उनके भक्त और कट्टर हो गये, इन भक्तों का तर्क था कि डोरोथी के पूण्य प्रताप की वजह से कयामत टल गई। 

शायद ऐसा ही कुछ वर्तमान में चल रहा है, आप अस्पताल की कमी बताओं वे 70 साल में आ जायेंगे, आप ऑक्सीजन की कमी बोलिये वे 70 साल में आ जायेंगे, आप कुछ भी समस्या बताओ वे 70 साल में आ ही जायेंगे। कहेंगे अवतारी तो समस्या से निजाद का पूरा प्रयास कर रहे हैं लेकिन 70 साल ? असल में ये लोग फंस चुके है, सांप-छुंछुदर सी स्थिति है फिर कौन व्यक्ति अपने को गलत कहेगा। फिर कौन चाहेगा कि लोग कहे देखों मुर्ख बनकर चले गए थे। इसलिए कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचाई, तो इसके लिए राज्यों को दोष देना शुरु हो गया।

वे यह कतई नहीं बताएंगे कि लोग उत्तरप्रदेश में ही नही, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़, झारखंड में भी मर रहे है। और हम बायस्ड लोग वहां के मुख्यमंत्री को कुछ नही बोलते। मैं बताता हूँ क्यों नही बोलते.. 

1- आयात निर्यात की नीति, केंद्र बनाता है। राज्य नही। दवा , वैक्सीन का कृत्रिम अभाव, निर्यातलिप्सा की वजह से बना है। (अदार पूनावाला ने लन्दन में प्रोपर्टी खरीद ली। क्यों, इसलिए कि विदेश का पैसा विदेश में ठिकाने लगाना था। निर्यात की अनुमति न मिलती तब??? तब पूनावाला इलेक्टरल बांड नही खरीद पाते।) 

2- इसी वैक्सीन माफिया के फायदे के लिए ये कोविशील्ड की अनुमति लटकाए हुए थे। मगर पिछली बार जब मामले बढ़े, तो मजबूरी में उसे अनुमति दी। कम्पटीशन खड़ा हो गया। अब तीसरा कॉम्पटीशन नही चाहिए था। इसलिए विदेश में धड़ल्ले से बन बिक यूज हो रही स्पुतनिक वगेरह को लोकल ट्रायल की शर्त रख दी। याने छह आठ महीने लटकाने का प्लान था। राहुल के पत्र के बाद इसे भी मजबूरी में अनुमत करना पड़ा। याने पूरे वक्त ये दवाओं का कृत्रिम अभाव पैदा करते रहे।

3-  पीएम केयर के नाम पर हर कम्पनी का सीएसआर का पैसा अपने पास खींच लिया। क्या किया उसका?? ठेके दिये अनाम-गैर अनुभवी कम्पनी को। वक्त पर सप्लाई नही मिली। हस्पताल दवाओं, इक्विपमेंट की कमी से जूझ रहे हैं। 

4- सीएम फोन कर रहे हैं, क्यों कर रहे है, रेमेडीसीवीर चाहिए। पीएम नही बात कर सकते , क्यों रैली कर रहे हैं। रेमेडीसीवीर क्यों नही है, इसलिए कि तमाम दवा कम्पनियों को धकाधक लायसेंस नही दे रहे। 

5- दवा नही, तो मरीज का जल्दी सुधार नही। दो दिन की जगह पांच दिन बेड ऑक्युपाई कर रहा है। जाहिर है जगह की कमी होगी। अब आप दीजिये स्टेट को दोष। क्योकि हेल्थ तो स्टेट का मसला है।

रविवार, 25 अप्रैल 2021

जन की बात-9

 

सुना था सत्ता का नशा, प्रेम और मदिरा के नशे से भी ज्यादा शक्तिशाली होता है, वह विवेक शून्य तो हो ही जाता है, संवेदना शून्य हो जाता है, उसकी जिव्हा ही अनाप-शनाप नहीं बोलता बल्कि मर्यादा भी भूल जाता है। वह सत्ता मद में इस कदर चूर हो जाता है कि वह अपनी ओर उठने वाली हर उंगलियों को काट देना चाहता है। असहमति के स्वर उसे देशद्रोह लगता है और जनता की पीड़ा से खुशी! उसे जनसरोकार से कोई  मतलब नहीं होता, वह तो सत्ता में बने रहने के षडय़ंत्र में व्यस्त रहता है।

कोरोना के बढ़ते प्रकोप से हर कोई चिंतित था, शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसके बांधव या परिचितों को कोरोना ने अपना ग्रास नहीं बनाया हो। लेकिन, सत्ता चिंतित होने का आंडबर ही कर रही थी क्योंकि उसे चिंता होती तो सालभर में चिकित्सा व्यवस्था कहां से कहां पहुंच जाता, आक्सीजन के अभाव में त्राहिमाम नहीं मचता। न ही कुंभ का आयोजन होता न ही चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने का उपक्रम होता। क्या लंबे अरसे के षडय़ंत्र के बाद मिली सत्ता का मोह इस तरह हावी है कि वह मनुष्यों को कीड़े मकोड़े की तरह मारने का उपक्रम कर रही है।

जब सब तरफ आलोचना होने लगी, सभी दल लोगों के निशाने पर आने लगे तब राहुल गांधी ने चुनावी रैली से दूर रहने की घोषणा कर दी। वास्तव में यह महत्वपूर्ण निर्णय था लेकिन जो लोग मध्यप्रदेश के मोह में पहली लहर को भयावह बनाने में कोई कमी नहीं रखी थी वे अब बंगाल में सत्ता के लिए निर्णय शून्य थे।

कांग्रेस के इस निर्णय से बेशर्मी की चादर हटने की उम्मीद थी लेकिन बड़ी मुश्किल से सत्तर साल में मिली सत्ता को बनाये रखने का मोह उनसे छोड़ देने की कल्पना ही बेमानी है जो झूठ-षडय़ंत्र, अफवाह और नफरत पर विश्वास रखते हैं। हालांकि इस परिस्थिति के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है क्योंकि उनसे रूढि़वादी और नफरती लोगों के आक्षेप से स्वयं को कमजोर और डरपोक बना लिया। सबसे पहले राजीव गांधी उस आक्षेप से डर गये कि उन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए शहबानों के फैसले को बदल दिया, यही से वे लोग हावी होने लगे जो इस देश के सामाजिक सौहार्द के दुश्मन थे, जो अंग्रेजों के फूट डालो राज करों की नीति के प्रशंसक थे, जिसके लिए हिटलर की तरह श्रेष्ठता ही जीवन का पैमाना था।

मुस्लिम तुष्टिकरण के आक्षेप से कांग्रेस इस कदर डर गई कि वह जनेऊ धारण करने लगी, पूजा पाठ के प्रदर्शन में उतर आई। लेकिन यजि कांग्रेस ही आक्षेपों से डर गई तो फिर गांधी, नेहरु, पटेल, विवेकानंद, सुभाष, टैगोर की इस देवभूमि को लंका बनने से कौन रोक सकता है। आरोपों से बचने के लिए कांग्रेस के नेताओं में होड़ ही कुंठित धर्मालंबियों के खादपानी का काम करता है। किसी के आक्षेप से यदि जन नेता अपने मूल कर्म से भटक जाए तो इस देश के दलित, अल्पसंख्यक गरीबों का क्या होगा? न्याय, सत्य का क्या होगा।

लेकिन कांग्रेसी गांधी के राह से भटक गये, और गांधी की राह से भटकने का सीधा सीधा अर्थ था सच से दूर होना। स्वयं को विलासी बनाना, संवेदना शून्य होना। कमजोर और डरपोक होना।

कोरोना का कहर अब भी उफान पर था, लेकिन भाजपा के मंत्री तो अब भी बंगाल फतह के लिए मरे जा रहे थे, इसलिए वे ममता बेनर्जी के एक साथ चुनाव और राहुल गांधी के रैली से असहमति पर बेशर्मी से कह रहे थे कि यह तो कप्तान के जहाज को डूबते समझ का निर्णय है। क्या सत्ता इतनी बेशर्म होता है? हां होती है जब सत्ता झूठ की बुनियाद पर टिकी हो, नफरत के बीज तो फलीभूत हुआ हो। याद कीजिए 2014 का वह दिन जब कहा गया कि पहली बार कोई हिन्दू प्रधानमंत्री? याद कीजिए संसद की सीढिय़ों पर माधा टेकना? लेकिन इससे पहले तिरंगा को अशुभ बताने, संविधान को गलत बताने, आरक्षण की आलोचना को याद कर लेना।

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

जन की बात-8

 

समस्या जड़ में हो, और हम ईलाज पत्तों में, तनों में ढूंढने की कोशिश करते रहेंगे तो क्या होगा? क्या इस देश में आपदा पहली बार आई है? इससे पहले भी आपदा आई है लेकिन इतना जन आक्रोश इससे पहले कभी नहीं था, न ही इतने बिलखते लोग न लाशों से पटती श्मशान, कब्रिस्तान?

जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी रही, लोगों की नौकरी जा रही थी, लोग मर रहे थे तब भी इस आपदा को इस देश ने मिल बांटकर अपने भीतर घुसने नहीं दिया था, दरअसल नेतृत्व की सूझबूझ हम सबकों एक किये हुए था और एकता की ताकत के आगे कोई विपदा टिक नहीं सकती। लेकिन पिछले वर्षों में नेतृत्व ने क्या किया, इस देश के भाईचारे की ताकत को सत्ता के लालच में सबसे पहले तोड़ा, वे भूल गये कि हम आजाद भी इसलिए हुए क्योंकि हिन्दू मुस्लिम सभी ने एक साथ आंदोलन किया था, अपना बलिदान दिया था, वरना हमारे राजाओं ने तो पहले ही मुगलों को सत्ता सौंप दी थी।

कोरोना के इस विपदा के लिए नमस्ते ट्रम्प, मध्यप्रदेश की सत्ता का मोह और अब कुंभ और बंगाल-असम चुनाव की सत्ता के मोह को दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। बिलखते लोग, टपकती लाशों पर ठहाका की बात भी बेमानी होने लगा है क्योंकि जिन्हें धर्म देश समाज से प्यारा सत्ता हो गया उनसे कितनी भी तरह की उम्मीद ही बेमानी है। लोकतंत्र को वे समझते है या जीते हैं परिवार चलाने के चिंतन को समझते हैं या परिवार को जीते हैं। क्योकि लोकतंत्र की पहली इकाई परिवार है। प्रभु राम जब दंडकारण्य पहुंचे और कई ग्रामों को राक्षसों की गुलामी से मुक्त करने लगे तो उनके समक्ष भी यह सवाल आया कि आखिर कोई समाज सामूहिकता से कैसे रह सकता है। तब प्रभु राम ने लोगों को परिवार बुद्धि से चलने का मार्ग बताया था। उन्होंने कहा था कि एक परिवार में माता-पिता आजीविका उपार्जित करते हैं, या केवल पिता धनार्जन करता है, किन्तु सबसे अधिक व्यय बच्चों पर किया जाता है। यदि एक व्यक्ति रुगण हो जाये तो उसके हिस्से का कार्य भी कर देते हैं। पिता समर्थ है तो बाहर का काम कर अजीविका अर्जित करता है, घर में जो कठिन कार्य है, जिसे पत्नी व बच्चे नहीं कर सकते, वह भी करता है और यथा आवश्यकता अपने परिवार की रक्षा भी करता है। क्योंकि वह समर्थ है और अपने को परिवार का अंग मानता है। यदि किसी दुर्घटनावश पति बीमार या पंगु हो जाये तो पत्नी बाहर का काम कर धर्नाजन भी करती है, पति की सेवा भी करती है, बच्चों को भी देखती है और घर का काम, खाना-पकाना भी करती है। यही नहीं कमजोर बच्चों को विशेष संरक्षण व ज्यादा दुलार भी मिलता है। 

यही स्थिति देश और समाज की है। जिस तरह से परिवार में एक व्यक्ति का स्वार्थ परिवार को बिखेर देता है उसी तरह से देश व समाज में भी ऐसे स्वार्थी लोगों से मुसिबत आ जाती है। प्रभु राम ने इसका उपाय भी बताया है कि ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए क्योंकि फिर उसकी प्रवृत्ति राक्षसी होने लगी है। जरा देर रुक कर सोचिए? क्या यह सब नहीं हो रहा है? परिवार का दर्द, बच्चों का जो दर्द जानता है वही जनता का दर्द समझ सकता है।

इस देश में भी सभी जाति और धर्म के लोग बसे हुए है। प्रभु राम ने उनमें कोई विभेद नहीं किया, सबको सत्य और न्याय के एक तराजू में तौला लेकिन जो लोग राम के नाम पर सत्ता हासिल कर रहे है वे क्या कर रहे हैं। अपने धर्म को श्रेष्ठ बताते तो है लेकिन धर्म के मार्ग पर क्या कोई चल पा रहा है। धर्म ग्रन्थ में  ऐसे कितने ही उदाहरण है जब विपदा का प्रतिकार में सबका एका रहा। आज भी इस देश में कोरोना से लडऩे की जो कहानी आ रही है, क्या वह उन कुंठित धर्मावंलियों को उनकी कुंठा से बाहर निकलने का मार्ग नहीं दिखाता। मंदिर-मस्जिद सहित कितने ही जगह कोरेन्टाईन सेंटर खुल गये, सिख समाज, जैन समाज लंगर चला रहा, मुस्लिम युवक जान बचाने अपनी जान दांव पर लगाा रहे, एक मुस्लिम युवक ने तो अपनी बाईस लाख की कार तक बेच दी। सब तरफ सब मिलजुलकर कर कार्य कर रहे हैं। लेकिन सत्ता अब भी अपनी गलती मानने तैयार नहीं है, वह तो मीटिंग के प्रसारण से भी इसलिए डर रही है ताकि उनकी पोल न खुल जाये।

कैसे लोकतंत्र और कैसी सत्ता के साये में हम जी रहे है। जब जनहित की मीटिंग है तो इसके प्रसारण से क्या आपत्ति होनी चाहिए। क्या इस तरह की हर मीटिंग का  प्रसारण नहीं होना चाहिए ताकि जनता यह जो जान सके कि उसके जनसेवक उनके लिए ईमानदारी से काम कर रहे हैं? इससे सत्ता का भ्रम दूर होगा लेकिन जब सत्ता बेईमान हो तो वह ऐसे किसी प्रसारण के लिए कैसे तैयार होगी?

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

जन की बात-7


पहले भी कई बार इस देश के लोगों ने इस सत्ता की नासमझी, नालायकी से त्रस्त हुए हैं, इस बार कोरोना को लेकर सत्ता ने जिस तरह से लापरवाही की, उसका परिणाम सबके सामने है, मुफ्त ईलाज और घर पहुंच सेवा करने की बजाय वह अब भी राज्यों में सत्ता हासिल करने और बहुसंख्य हिन्दु को खुश करने कुंभ के आयोजन को प्रश्रय देने में लगी रही।

यह सत्ता का खेल था, उनकी इच्छा थी, उनकी आवश्यकता थी या एक तरह का रोग था, कहना कठिन है लेकिन नोटबंदी, पूर्व सूचना के लॉकडाउन, निजीकरण, किसान बिल, सीएए सहित अनेक उदाहरण है। कल के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद अब तो आम लोग भी बोलने लगे हैं कि इस सत्ता के शिष्ट अथवा संस्कृत व्यवहार की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। वह लोगों को अकारण परेशान कर सकते है सकारण भी।

ऐसे में क्या पीड़ा और अपमान को चुपचाप पी जायें? क्या इस लोकतांत्रिक देश में काएई अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकता? ऐसे लोगों को देशद्रोही कहने का अधिकार सत्ता को किसने दिया है? बलात्कारियों का, हत्यारों का सिर्फ हिन्दू होने पर संरक्षण का कैसा अधिकार चल रहा है। क्या इस देश के लोग टैक्स नहीं देते तब उन्हें इस आपदा में भी मुफ्त ईलाज कोई सरकार न दे तो इसका क्या मतलब है। क्या लोगों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नहीं है, जब सब मनुष्य समान है तो फिर धर्म के आधार पर भेद क्यों? जब राज्य चलाने बराबर टैक्स भरत हैं तब इस आपदा में भी मुफ्त ईलाज क्यों नहीं।

दुख तो इस बात का है कि सत्ता के पास इस कोरोना के त्राहिमाम् का कोई समाधान नहीं है, और वह एक नये तरह का खेल दिखाकर (संदेश) चला जाता है। ये ठीक है कि इन दिनों देश को बदलने की कोशिश की गई? अपने हिसाब से सत्ता ने देश को हांका है लेकिन लोगों को पीड़ा पहुंचाकर, या पीडि़त को उसके हाल पर छोड़कर सत्ता चालने की परम्परा क्या उचित है। ऐसा नहीं है कि पूर्व के सरकारों ने लोगों को सर आंखों पर बिठा रखा था लेकिन इस सत्ता ने तो एक के बाद एक ऐसे निर्णय लिये  है या लापरवाही की है जिससे आप लोग ही ज्यादा प्रताडि़त हुए हैं।

डब्ल्यूएचओ की दिसम्बर से ही चेतावनी देने के बाद भी निर्णय लेने में मार्च बिता देना, फिर दूसरी लहर की चेतावनी के बाद भी लापरवाह रहना क्या सत्ता के लिए उचित था? क्या इस घोर लापरवाही की सजा आम जन नहीं भुगत रहे हैं, भुगत ही नहीं रहे अब तो लाशें गिरनी लगी हैं। ये ठीक है कि यह देश मर्यादा पुरुषोत्तम राम का देश है लेकिन यदि जनता अमर्यादित हो गई तब क्या होगा? किसान आंदोलन से गुस्साएं लोगों ने किस तरह से भाजपा विधायक को पिटा यह संकेत नहीं है कि मर्यादा की भी अपनी सीमा है, पीडि़त जन जब सड़कों पर उतरते हैं तो  फिर क्या होता है?

अब तो पूरी देवभूमि भगवान के भरोसे हो चली है, सत्ता अब भी राजनैतिक स्पर्धा में मस्त है, विपक्ष के सुझाव भी उन्हें देशद्रोह लगता है, हालात का चित्रण भी उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वे  अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि आजादी के सत्तर साल के कठिन परिश्रम ने देश को उन्नति के नए शिखर तक पहुंचाया है, ये ठीक है कि इस दौरान सत्ता कहीं कहीं निर्दयी हुई है लेकिन इस परिश्रम को सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ के लिए सिरे से नकार देना, कौन सी प्रवृत्ति है।

देश के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हो रही मौत के प्रति क्या सत्ता की कोई जवाबदेही नहीं बनती, क्या केन्द्र सरकार इतनी संवेदनाशून्य है कि वह अपनेे नागिरकों को मुफ्त में ईलाज तो छोड़ वैक्सीन तक नहीं लगा सकती। संघ तो अपने को संस्कारी और सेवाभावी कहकर अपनी पीठ ठोकता रहा है तब उसका डिग्रीधारी की निष्ठुरता, संवेदनहीनता, अमर्यादित बोल से संघ के कथित संस्कार पर उंगली नहीं उठना चाहिए। सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था, खुली आंखों से महामारी के प्रकोप का तांडव सबके सामने है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लापरवाही स्पष्ट थी, बगैर मास्क की रैलियां, कुंभ स्नान मौत को आमंत्रित करने जैसा था। लेकिन, संघ के संस्कार, झूठ और नफरत की राजनीति से उन पढ़े लिखे लोगों का विवेक भी चला गया है जो इस देश की प्रगति में आगे रह सकते हैं, सत्ता के अन्याय का खिलाफत कर सकते है। पता नहीं हिन्दू-मुस्लिम के बीज ने उन्हें क्या बना दिया है कि वे सच को जानते हुए भी सत्य का समर्थन नहीं कर पा रहे हैं। क्या वे हिन्दुत्व के उस खतरे से डरे हुए हैं कायर हो गये हैं जो कभी संभव ही नहीं है। जिन्हें लगता है कि वह मर रहा है, मुझे क्या? मैं सुरक्षित हूं, तो वे जान ले जाति-धर्म देखकर आपदा प्रहार नहीं करता। यदि आप यह सोचते हैं कि अस्पताल में सिर्फ वे ही जायेंगे तो यह भी भूल है। और हां एक बात और समझ लो जिन लोग इसे नियति मान कर जी रहे हैं या खामोश है वे जान लें कि नियति मानकर अपने अधिकार के लिए नहीं लडऩा सत्ता की राक्षसी प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देना है, नियति उन लोगों का गढ़ा शब्द है जो अपनी सत्ता की दुर्बलता को छुपाना चाहते हैं।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

जन की बात-6

 

विभिन्न प्रदेशों में रिकार्ड मौतें, देश में कोरोना ने नया रिकार्ड बनाया और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन में देश को लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताना क्या यह संकेत नहीं है कि बंगाल का चुनाव तो निपट जाने दो।

जब भी इस देश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया है अजीब सा सन्नाटा पसरा है, इस बार तो मरघट सी शांति रही। ये ठीक है कि कुछ लोगों को केवल धार्मिक स्थल और श्मशान में ही शांति मिलती है लेकिन उनका क्या जो घर परिवार में, समाज में, सुख-शांति से रहते हैं। हमने इसी जगह पर कितनी बार लिखा है कि चुनाव में मुद्दा नागरिकों के मूल-भूत सुविधा होनी चाहिए, जाति-धर्म से उपर उठकर व्यवस्था पर वोट डालना होगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार पर वोट हो लेकिन न किसी सत्ता ने इसे स्वीकार किया न ही किसी धार्मिक और जाति से बंधे कुंठित लोगों ने ही माना।

तब, जब आज महामारी की इस भीषण त्रासदी से लोग प्रभावित हो रहे है तो भी सत्ता उन्हें धर्म और जाति में ही उलझाने में लगी है। हमने बार-बार कहा है कि सत्ता का एक ही चरित्र हो गया है वह अपनी रईसी और सत्ता बरकरार रखने के लिए फूट डालो राज करो की नीति का ही इस्तेमाल करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस संबोधन से रही-सही उम्मीद भी न टूटी हो तो शायद कोविड के ट्रिपल म्यूटेंट की प्रतीक्षा का इंतजार कर लें। क्योंकि सत्ता कभी भी अपना दोष नहीं देखती, वह निर्दोष होती है? दोष तो बेबस जनता की आखों में है जो खुद तो कुछ करती नहीं सारा दोष सत्ता पर मढ़ देती है?

सोशल मीडिया में मोदी विरोधी अपना भड़ास निकाल कर जनता को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्हें तो मंदिर चाहिए था, वे अस्पताल या स्कूल की मांग कब की थी, सत्ता से लेकर पूरी मीडिया भी इस दूसरी लहर के लिए जनता को ही दोषी ठहरा रही है। जिस देश में आज भी लोग स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में, दो जून की रोटी की आपाधापी और परिवार पालने के संकट से मर रहे हो वहां सत्ता और मीडिया का कहना कि जनता लापरवाह है वह घर में बैठे तो फिर उनकी बुद्धि पर सवाल उठना ही चाहिए?

क्या सत्ता की ताकत है कि वह अपने देश के लोगों को इस महामारी में भी बिठा के खिला सके, और मुफ्त में ईलाज कर सके? जब यह ताकत ही नहीं है, और वे खुद देश के संस्थानों को एक-एक कर बेच खा रहे है तो फिर जनता कैसे घर में बैठकर जी सकती है? यह सवाल क्या मीडिया को नहीं उठाना चाहिए? यह देश का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें सत्ता सौंपी है जो यह भी नहीं कह पा रहा है कि जनता घर में रहे, हम भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था मुफ्त कर रहे है? कोरोना से बचने के लिए घर में ही रहने की वकालत करने वाली सत्ता में है इतनी हिम्मत कि अपने देशवासियों या प्रदेशवासियों को यह दे सके। नहीं है, उसे तो अपनी रईसी बरकरार रखी है, वे सुविधा को लेकर जो भी फैसले लेंगे अपने लिए लेंग।