शनिवार, 27 जुलाई 2024

राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश...

 राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश... 




अपनी जिस जूती को पहनकर आदमी घर के भीतर इसलिए नहीं जाता कि घर अपवित्र हो जायेंगा, तब दूसरे की जूती को अपने जंघे पर रख लेना भले ही लोगों को राजनीति लगे, लेकिन सच तो यही है कि यही मानवता है जिसका  रास्ते का सफ़र गांधीवाद से शुरू होता है।

मंच से दलित-वंचित के लिए लंबे चौड़े भाषण देना उनके साथ,  उनके काम के साथ उनकी ज़िंदगी जीना आसान नहीं है । क्या कोई नेता सप्ताह नहीं, कुछ घंटे ही वैसी ज़िंदगी बिता सकता है?

धर्म और जाति की राजनीति के इस दौर में जब जन‌कल्याण और मानवता से लोगों ने दूरी बना ली है। सत्ता में बैठे लोगों को वेलफेयर की अवधारणा बकवास लगने लगी हो तब यह बात भाजपा और संघ को भी समझना होगा कि असली धर्म और जाति मानवता ही है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ कर रखती है।

क्या मोची की दुकान पर आकर उसने बातचीत करते हुए उसके काम को समझ लेना ही गांधी है ? नहीं क़तई नहीं..।

लेकिन यह गांधीवाद का एक रास्ता है।

 जरा सोचिये कि एक सामान्य घर का लड़का यदि चाय बेचने की बात बताकर खुद को महान होने का दंभ भरता है तो वह कितना महान होगा जिसकी तीन पीढ़ियां इस देश में सत्ता संभाली हो वह कभी बढ़ई के पास काम सीखने लगता है तो कभी गैराज में जाकर मोटर साइकिल बनाता है तो कभी किसान के साथ खेत में, और इसमें भी उसका मन नहीं भरता तो मोची की दुकान में पहुंचकर जूते बनाने की बारिकियां सीखने लगता है।

इसे कोई फोटो आपुर्चनिटी भी कह सकता है लेकिन यह दलितों और वंचितों को राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखने का एक मात्र जरिया है।

गांधी इसलिए महात्मा हुए क्योंकि वे शौचालय की सफाई और सङ्‌क में झाडू लगाने से परहेज नहीं करते थे महात्मा ने सच का प्रयोग किया, सादगी के साथ जन सेवा को आत्म सात किया।

नेहरू इसलिए लोकदेव नहीं कहलाये कि विनेबा भावे ने उन्हें यह तमगा  दिया बल्कि नेहरू इसलिए लोकदेव कहे जाने लगे कि वे आजादी के बाद के भारत को संभालने में स्वयं को न्यौछावर करने से कभी हिचके नहीं। लाठी डंडा लिये हिंसक भीड़ में सीना ताने घूसते चले जाते थे।

तब राहुल गांधी ने जिस तरह से अपने सरनेम को सार्थक करने में सड़क से लेकर संसद तक समर्पित दिखाई दे रहे हैं यह भारत की पुर्नजागरण का ऐसा दौर है जो  धर्म और जाति के स्थान नाम पर मानवता को स्थापित करता है।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

लोकसभा चुनाव में पाँच करोड़ वोट का असामान्य बढ़ जाना…

लोकसभा चुनाव में पाँच करोड़ वोट का असामान्य बढ़ जाना…


वोट फॉर डेमोक्रेसी ने लोकसभा चुनाव 2024 के संचालन पर रिपोर्ट जारी की है, इस रिपोर्ट में चुनाव के प्रथम और अंतिम सातवें चरण के बीच असामान्य रूप से लगभग पांच करोड़ वोट बढ़ जाने, और इसका सीटवार तथा राज्यवार चुनाव नतीजों पर प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।रिपोर्ट न केवल चौंकाने वाला है बल्कि कई सवाल खड़ा करता है…।

रिपोर्ट में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुई कथित गड़बड़ियों पर भी रोशनी डालने की कोशिश की है। वोटों में बढ़ोतरी और दर्ज मतों में संख्यात्मक विसंगतियों के बारे में भी जानकारी दी गई है। 

वोट फॉर डेमोक्रेसी (महाराष्ट्र) ने 22 जुलाई को मुंबई के वाईबी चव्हाण सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान लोकसभा चुनाव 2024 के संचालन पर अपनी व्यापक चुनाव रिपोर्ट जारी की। “रिपोर्ट: लोकसभा चुनाव 2024 का संचालन – ‘वोट हेरफेर’ और ‘मतदान और मतगणना के दौरान कदाचार’ का विश्लेषण” शीर्षक वाले प्रकाशन में चुनाव चक्र के दौरान सामने आईं कथित गड़बड़ियों, भारत के चुनाव आयोग और रिटर्निंग अधिकारियों की भूमिका, ईवीएम में डाले गए वोटों और गिनती के बीच रिपोर्ट की गई विसंगतियों और चरणवार, राज्यवार और राष्ट्रीय स्तर पर वोटों में बढ़ोतरी (“डंप किए गए” वोट) का वर्णन किया गया है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि शुरुआती मतदान और अंतिम मतदान के बीच कुल 5 करोड़ वोट बढ़े (“डंप किए गए”), जो यह दर्शाता है कि इस बढ़ोतरी ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को असंगत रूप से मदद की।


वीएफडी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि "कुल डाले गए वोटों और गिने गए वोटों के बीच विसंगतियों के बारे में गंभीर सवाल उठाए गए हैं, साथ ही, भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा मतदान प्रतिशत में पर्याप्त अस्पष्ट वृद्धि के बारे में भी सवाल उठाए गए हैं। हालाँकि हमें ईसीआई की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं है, लेकिन इस लोकसभा चुनाव के दौरान इसके आचरण ने हमें, नागरिकों और मतदाताओं के रूप में, चुनावी प्रक्रिया के निष्पक्ष परिणाम के बारे में गंभीर रूप से चिंतित कर दिया है।"




रिपोर्ट में कुल 4 अध्याय हैं, जिसमें तालिकाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से चुनाव परिणामों में संभावित हेरफेर का विश्लेषण किया गया है, जिससे पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल को अपनी सीटों की संख्या में कुल कमी के बावजूद अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में मदद मिली है। उम्मीदवारों को किसी निर्वाचन क्षेत्र में संभावित कदाचार की पहचान करने में मदद करने के लिए, रिपोर्ट में संभावित हेरफेर का पता लगाने के लिए एक चेकलिस्ट संलग्न की गई है। इसके अलावा, एक कानूनी संसाधन के रूप में, चुनाव प्रक्रिया की अखंडता पर जोर देने के लिए, रिपोर्ट प्रासंगिक न्यायिक मिसालें और चुनाव कानून भी प्रदान करती है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव के संचालन के लिए मौलिक हैं। विशेष रूप से, मुंबई उत्तर पश्चिम और फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्रों में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाली कदाचारों का प्रकाशन में विस्तार से वर्णन किया गया है।

चुनाव आयोग पर सवाल

चुनावी गड़बड़ियों, शुरुआती मतदान के आंकड़ों की घोषणा में देरी और अंतिम मतदान के आंकड़ों में भारी वृद्धि को उजागर करते हुए, वीएफडी ने इन मुद्दों पर भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) की चुप्पी की आलोचना की। शुरुआती मतदान के आंकड़ों को जारी करने में देरी और अंतिम मतदान के आंकड़ों में अस्पष्ट वृद्धि को चिह्नित करते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि चरण 1 के लिए "ईसीआई ने यह नहीं बताया कि अंतिम आंकड़ों में पर्याप्त वृद्धि क्यों हुई, न ही चुनाव निकाय ने अंतिम आंकड़े जारी करने में लंबी देरी (11 दिन!) और वह भी केवल प्रतिशत में" के बारे में बताया। इसने आगे कहा कि ईसीआई ने अंतिम वोटर टर्नाउट में उछाल और ईवीएम वोटों और आज तक की गिनती के बीच विसंगतियों के बारे में किसी भी विशिष्ट प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कुछ उम्मीदवारों को फॉर्म 17C जारी नहीं किया गया था या नहीं दिया गया था, जो मतदान के दिन के अंत में डाले गए वोटों का लेखा-जोखा रखता है।

वोटों में बढ़ोतरी से सत्तारूढ़ गठबंधन को फायदा 

वीएफडी ने पाया कि शुरुआती मतदान के आंकड़ों की तुलना में अंतिम मतदान में पर्याप्त वृद्धि से पता चलता है कि सत्तारूढ़ दल को इन बढ़ोतरी से सबसे अधिक लाभ हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि "यह ध्यान देने योग्य है कि इस चरण 2 में मतदाता मतदान (वोटर टर्नाउट) वृद्धि की इस पद्धति से, एनडीए/बीजेपी के लिए बहुत लाभकारी परिणाम आए हैं: अधिकांश राज्यों में जैसे पश्चिम बंगाल 3/3, उत्तर प्रदेश 8/8, मध्य प्रदेश 6/6, छत्तीसगढ़ 3/3, त्रिपुरा 1/1, जम्मू और कश्मीर 1/1, कर्नाटक 12/14, राजस्थान 10/13 और असम 4/5। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, राजस्थान जैसे राज्यों सहित मतदान के अन्य 6 चरणों में ऐसा रुझान नहीं देखा गया है। इस चरण 2 में केरल का उदाहरण अनूठा है, क्योंकि इस चरण में भाजपा को एक सीट मिली, दूसरी सीट पर दूसरे स्थान पर रही और राज्य की कुल 20 सीटों में से 14 पर तीसरे स्थान पर रही! यहां स्पष्ट रूप से हेरफेर हुआ है।" इसके अलावा, इसमें कहा गया है कि करीब 5 करोड़ वोटों की बढ़ोतरी से भाजपा/एनडीए को कम से कम 76 सीटें हासिल करने में मदद मिली है, जो ऐसी बढ़ोतरी के अभाव में उसे खोनी पड़ सकती थी।

रिपोर्ट में विशेष रूप से तीन तालिकाएँ दी गई हैं, जिसमें उन सभी संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों (पीसी) की सूची प्रदर्शित की गई है, जहाँ जीत/हार का अंतर 1 लाख वोट से कम रहा है; जहाँ ईवीएम में डाले गए वोटों और 50000 वोट या उससे कम के हार के अंतर वाले ईवीएम वोटों के बीच विसंगतियाँ पाई गई हैं; और उन निर्वाचन क्षेत्रों को शामिल करते हुए शॉर्टलिस्ट की गई तालिकाएँ दी गई हैं, जहाँ कथित तौर पर गड़बड़ी की सूचना दी गई है। इनके अलावा, मतदाता मतदान में वृद्धि, वोटों की कुल संख्या में वृद्धि और संभावित गड़बड़ी के कई पहलुओं का विश्लेषण करने वाली एक दर्जन से अधिक तालिकाएँ दी गई हैं।

डॉ. हरीश कार्निक ने कहा कि ईवीएम और वीवीपीएटी के वोटों का पूर्ण क्रॉस-सत्यापन करने से चुनाव आयोग का इनकार अनुचित है, खासकर शुरुआती मतदान के आंकड़ों को जारी करने में हुई अस्पष्ट देरी और उसके बाद अंतिम मतदान के आंकड़ों में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए। डॉ. कार्निक ने कहा कि वीवीपीएटी के पूरे मामले से लेकर मतदाता के यह जानने के अधिकार के हनन तक कि उन्होंने किसे वोट दिया है, इन हेराफेरी के रिकॉर्ड मौजूद हैं लेकिन कोई जवाब नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईवीएम ने चुनावी प्रक्रिया में मौजूदा कुछ कमियों को और बढ़ा दिया है और लगता है कि चुनाव आयोग ने उन कमियों का फायदा उठाया है।

उक्त रिपोर्ट में उठाई गई शिकायतों और मुद्दों के बाद, विभिन्न नागरिक समाज समूहों के सदस्यों द्वारा 18 जुलाई को ईसीआई को एक संयुक्त कानूनी नोटिस भेजा गया था। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को संबोधित नोटिस में ईसीआई से निम्नलिखित हस्तक्षेप की मांग की गई थी:

1. मतदाताओं की जानकारी के लिए, जो किसी भी चुनाव में वास्तविक हितधारक होते हैं, नोटिस में उठाए गए मुद्दों और बताई गई अनियमितताओं/अवैधताओं की गहन जांच की जाएगी।

2. उठाए गए सभी मुद्दों पर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी।

3. संविधान या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम या इस अधिनियम के तहत बनाए गए किसी नियम या आदेश के प्रावधानों का अनुपालन न करने के आधार पर अवैध रूप से निर्वाचित उम्मीदवारों के निर्वाचन को रद्द करना।

4. आरपीए 1951 की धारा 129, आईटी अधिनियम 200 की धारा 65, 66, 66एफ और आईपीसी धारा 171एफ/409/417/466/120बी/201/34 के तहत तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और ईसीआई अधिकारियों, बीईएल और ईसीआईएल इंजीनियरों और लाभार्थी पक्षों सहित इसमें शामिल सभी लोगों की भूमिका की जांच की जाए।

5. अनुलग्नक में दी गई सूची के अनुसार, उन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव रद्द करना जहां बड़े पैमाने पर फर्जी वोट डाले गए हैं तथा पुनः चुनाव कराने का आदेश देना।

6. तथ्यों के आधार पर तथा भविष्य में भी चुनावों की सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ऐसे अन्य आदेश तथा आगे के आदेश पारित करना, जो आवश्यक समझे जाएं।

 

पूरी रिपोर्ट अंग्रेजी में है तथा https://votefordemocracy.org.in पर उपलब्ध है।

कौशिक की कुलबुलाहट…

 कौशिक की कुलबुलाहट…


कभी विधानसभा में अध्यक्ष रहे धरमलाल कौशिए इन दिनों सत्ता होने के बाद भी विपक्ष की भूमिका में खूब नाम कमा रहे हैं, जल जीवन मिशन के बपले घोटाले को लेकर तो उन्होंने अपने ही उपमुख्यमंत्री अरुण साव की बोलती बंद कर दी। वह तो विधानसमा स्पीकर डॉ रमन सिंह ने स्थिति को भांपते हुए हस्तक्षेप कर दिया नहीं तो धरमलाल कौशिक अधिकारियों और ठेकेदारों से वसूली करवा  कर ही दम लेते। स्वास्थमंत्री को तो ऐसा तगड़ा कि वे कभी नहीं भूल पायेंगे।

कहा जाता है कि असल में कौशिए मंत्री बनना चाहते  हैं लेकिन पहले ही बिलास‌पुर से मंत्रियों की भरमार और उपर से जाति समीकरण में अपने से जूनियर टंकराम वर्मा से मात खाने के बाद वे कुलबुलाने लगे है। 

कहा जाता है कि जिसके सहारे वे मंत्री बनना चाहते थे उन्होंने भी उनकी सिफारिश करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि लगातार चुनाव तो वे जीत नहीं पाते हैं फिर मंत्री किस काम को देखकर बनाया जाए। 

अविभाजित मध्यप्रदेश में भी विधायक रहे धामलाल कौशिक के बारे में कहा जाता है कि उनकी दाऊ गिरी के अपने क़िस्से हैं लेकिन लाल बत्ती का सपना संजोने वाले कौशिक को फटका तब लगा जब इस बात की चर्चा होने लगी कि अब विधायकों को निगम -मंडल या आयोग में भी नहीं बिठाया जायेगा।

तब से उनका ग़ुस्सा बेक़ाबू हो गया है।

गुरुवार, 25 जुलाई 2024

योगी के ख़िलाफ़ ऐसा षड़यंत्र…

 मोदी के बाद योगी'

पर लग रहा पलीता.


लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा बेचैन संघ है लेकिन मोदी के आगे घुटने टेक चुके संघ प्रमुख की दिक्कत यह है कि वे इस बात का विरोध भी नहीं पा रहे हैं कि आखिर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इतनी छिछालेदर क्यों की जा रही है।

दरअसल योगी आदित्यनाथ पर प्रहार तो लोकसभा चुनाव के बहुत पहले जब उत्तरप्रदेश में विधानसभा का चुनाव हुआ था तभी से योगी के खिलाफ षड़यंत्र शुरु हो चुका था। और इसकी एक मात्र वजह सोशल मीडिया में चलने वाला वह नारा था 'मोदी के बाद योगी।

इस नारे से भाजपा के गुजराती लॉबी में बेचैनी की खबर आने लगी। तब सवाल यह था कि आख़िर मोदी के बाद योगी वाले नारे से किसे दिक़्क़त थी और यह नारा किसे सबसे  ज्यादा परेशान कर रहा है।

क्या वे लोग परेशान हैं जो योगी के मुख्यमंत्री बनने से पहले अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे या ख़ुद अमित शाह।

यह गंभीर सवाल है, जिसका जवाब सीधे कोई नहीं देना चाहेगा। लेकिन उत्तरप्रदेश में अमित शाह के बढ़ते हस्तक्षेप की जो चर्चा रही, उससे यह समझा जा सनता है कि योगी के बढ़ते कद को कौन रोक रहा था या किसे दिक़्क़त है…?

तब लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद केशव‌प्रसाद मोर्या को क्या आगे ला कर फिर योगी को बदनाम करने की कोशिश हो रही है?

लेकिन भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत आज भी संघ है। क्योंकि कहा जा है कि यदि संघ ने इस मामले में कड़ा रुख़ अख़्तियार नहीं करता तो योगी बहुत पहले ही हटा दिये जाते।तब मोदी के प्रभाव का डंका भी बज रहा था।

लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में योगी को हटा पाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि लोकसभा के परिणाम से साफ़ है कि अब मोदी के चेहरे से यूपी में चुनाव नहीं जीता जा सकता?

हालोकि भाजपा के भीतर खाने में चर्चा यह भी है कि योगी को बचाने में संघ की भूमिका केवल बतौलेबाजी है। असल बात तो यह है कि मोदी-शाह भी जानते और मानते हैं कि उत्तरप्रदेश में योगी से बड़ा न तो कोई बड़ा नेता है और न ही किसी भाजपा नेता में वह दम है कि उत्तरप्रदेश में सरकार अपने बूते पर बना ले।

तब क्या यह पूरा खेल योगी को हटाने नहीं बल्कि योगी की छवि को बिगाड़‌ने का है ताकि मोदी के बाद योगी के नारे पर पलीता लग जाए?

मंत्री पद जाने का असर…

 मंत्री पद से  इस्तीफ़ा का असर...


कहा जाता है कि मंत्री पद का अपना जलवा है और मंत्री पद के साथ मिलने वाली सुविधा का अपना मिजाज । और मंत्री पद ही छिन जाये तो सबसे ज्यादा परिवार वालों पर इसका असर होता है। बंगला छिने जाने का असर के कई किस्से है। और नेता के परिवार वालों का बंगला छिने जाने के बाद बंगले के दीवार, खंभे से लिपटकर रोने के भी किसे चर्चा में रहे हैं। तो चेहरे से हंसी गायब हो जाने और भूख नहीं लगने , कुछ भी अच्छा नहीं लगने के किस्से भी जान चर्चा में रहे हैं। 

ऐसे में रायपुर के सांसद बने बृजमोहन अग्रवाल के मंत्री पद से इस्तीफा का असर भी जनचर्चा में है।

बड़े भाई गोपाल अग्रवाल ने तो सोशल मीडिया में अपना तेवर भी दिखाना शुरू कर दिया है। 



वे लगातार भाजपा की सरकार को कोस रहे हैं। जबकि वे खाटी संघी है और महानगर प्रमुख भी रह चुके हैं। पहले वे मीडिल क्लास की तकलीफ के बहाने गरियाते रहे तो अब बजट पर को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है।

दूसरे छोटे माई योगेश आग्वाल के अपने ही क़िस्से हैं। चला मुरारी हीरो बनने की तर्ज़ पर कवर्धा कांड  के किस्से तो सभी जानते ही हैं कि होटल में क्या क्या हुआ अब चेंबर की बैठक में उनके हरकतों को तिलमिलाहट की संज्ञा दी जा रही है। क्योंकि चेम्बर चुनाव में मोहन सेठ की सत्तावाली ताकत के बाद भी वे बुरी तरह हार गये थे।

एक और छोटे भाई तो रायपुर दक्षिण से विधायक बनने का सपना ही पाल लिया है और कहा जा रह है कि पत्रकारों से अपनी दावेदारी को सबसे सक्षम बताने और मोहन सेठ का सही उत्तराधिकारी बताने में लग गये है। इस सबसे  दूर यशवंत का मिजाज भी कम चर्चा में नहीं है उनके इस तरह से राजनीति से दूरी पर कई तरह की चर्चा है जो पारिवारिक बताया जा रहा है।

यानी मंत्री पद चले जाने का असर इस तरह चर्चा में है।।

बुधवार, 24 जुलाई 2024

सुप्रीम फ़ैसले ने गाल पर तमाचे से बचा लिया…

 नीट मामले में सुप्रीम फैसले का यह सच जानकर होश उड़ जायेंगे...


पता नहीं यह बात किसने कही है कि आपकी सड़‌क जब तक खामोश रहेगी संसद और उसके तंत्र अवारा होकर आपकों खुल्ला सांड की तरह अपनी सींगों से बिंधते रहेगें।

यह कड़‌वा सच भयावह भी है और डराने वाला भी।  NEET पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या इस हकीकत को बयां करने वाला नहीं है?

आख़िर क्या वजह थी कि सुप्रीम कोर्ट भी इस नीट पेपर लीक की परीक्षा रद्द नहीं कर सका। क्या यह इस फैसले ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के माथे पर  लगने वाले कालिख से बचाने वाला साबित नहीं हुआ।

25000 सीट और हर एक सीट के लिए औसतन २० लाख रुपये भी माने जाये तो यह खेल 50000000000 का मामला है।

सारे तथ्य चीख चीख कर कह रहे थे  कि पेपर लीक हुआ है और इस घपले को दबाने के लिए परीक्षा परिणाम की घोषणा तब की गई जब समूचा देश लोकसभा चुनाव के परिणाम में व्यस्त था। क्या परिक्षा परिणाप का समय भी सुप्रीम कोर्ट ने अनदेखा किया।

कितने ही तथ्य है जो कह रहे थे कि परीक्षा परिणाम रद्द कर फिर से परीक्षा आयोजित किया जाना चाहिए। NTA, शिक्षा' माफिया के साथ पूरा सरकारी तंत्र की संलिप्तता स्पष्ट दिखाई देने के बावजूद यह फैसला क्या न्याय है।

तथ्य जो सामने है…

*67 छात्र- 720 में 720 अंक, इनमें से 8 छात्र एक ही सेंटर के.इससे पहले एक बार में 4 छात्र ही यह कीर्तिमान कर पाये थे.

*5 मई को NEET 2024 की परीक्षा हुई थी जिसका परिणाम 14 जून को आना था. लेकिन यह परिणाम 10 दिन पहले 4 जून को ही निकाल दिये गये, जिस दिन  लोकसभा चुनाव के नतीजे आ रहे थे. चुनाव परिणाम की आड़ में क्या छुपाना था? 

*परीक्षा कराने वाली सरकारी एजेंसी NTA संदेह के घेरे में है. इम्तिहान से  ठीक 24 दिन पहले 9 और 10 अप्रैल को एप्लीकेशन विंडो को फिर खोला गया था. बाद में Form correction के नाम एक बार फिर से window  खोला गया.  ऐसा क्यों किया गया, 24246 बच्चों ने तब फॉर्म भरा, उनमें से कितने कौन से सेंटर के थे, उनमें से कितनों का सेलेक्शन हुआ? इनमें से किनके कितने मार्क्स थे? 

*रांची से पटना पुलिस को इनपुट गया- एक डस्टर गाड़ी की तलाशी ली गई- 4 May  को पटना में NEET पेपरलीक की खबर, प्रश्नपत्र की बरामदगी, एक परिक्षार्थी की रात में प्रश्नपत्र मिलने की स्विकारोक्ती और  बिहार के 3 जिले से solver gang के 19 आरोपियों की गिरफ्तारी. अन्य राज्यों में भी अभ्यर्थियों के बदले परीक्षा देने वालों की गिरफ्तारी हुई.

*सवाई माधोपुर, राजस्थान में भी एक परिक्षार्थी ने स्विकारोक्ती दी कि उसे 4 की रात हूबहू प्रश्नपत्र हासिल हो गया था.

*बिहार, उड़ीसा, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक आदि से कई  छात्रों का सेंटर 1000-1500 किलोमीटर दूर गुजरात के गोधरा में. ये कमाल कैसे? 

*गोधरा में ही, 5 मई से पहले NEET परीक्षार्थियों की 10-10 लाख में गैरकानूनी मदद कर रहे एक एजुकेशनल कंसलटेंसी के मालिक पुरुषोत्तम राय, एक स्कूल शिक्षक एवं सुपरवाइजर तुषार भट्ट और भाजपा का एक नेता आरिफ बोहरा सहित 5 लोगों को पुलिस और कलेक्टर ने detain किया. DM ने कहा है कि solver gang  के साथ  करोड़ों के ट्राजेक्शन के सबूत हैं. गुजरात में ही एक छात्र  cbse में फेल (physiscs theory paper में 1 नं), पर   NEET में 715, कमाल पर कमाल!! 

*हरियाणा के झज्जर परिक्षा केंद्र पर बिना सरनेम के  8 छात्रों का केंद्र और सभी टॉपर. यह भी कमाल कैसे? और कुल मिलाकर 67 टॉपर - 720 /720, 718, 719. असंभव!!!! 

*67 टॉपर में से 44 को Physics  का एक सवाल गलत होने के कारण ग्रेस मार्क्स दिया गया जबकि 2018 के बाद छपी किताब के अनुसार वह सवाल सही है. 

*पटना पुलिस द्वारा आपराधिक विवेचना हेतु मांगे जाने के बाद भी NTA द्वारा प्रश्न पत्र का मिलान नहीं किया गया, जबकि 10 मिनट में मिलान करके बता सकता था कि यह प्रश्न पत्र NEET में पुछा गया प्रश्न पत्र है या नहीं. हांलाकि पटना पुलिस ने forensic जांच द्वारा साबित कर दिया कि  यह ओरिजिनल प्रश्नपत्र है. बिहार पुलिस ने  NTA से 3 बार ओरिजिनल प्रश्नपत्र की मांग, लेकिन NTA ने सहयोग नहीं किया. क्यों? 

*NTA ने बताया कि झज्जर में 6 टॉपर को प्रश्नपत्र देरी से मिलने के कारण ग्रेस मार्क्स दिया गया. जबकि  स्कूल के प्रिंसिपल ने टीवी चैनल पर कहा कि कोई देरी नहीं हुई थी. यहाँ बंटे  MNOP सीरीज के शीट पुरे देश में कहीं नहीं बंटे. घोटाला यहाँ पकड़ें. पूरा NTA संलिप्त है.

*महाराष्ट्र सहित और भी कई सेंटर पर प्रश्नपत्र 20 - 60 मीनट देरी से मिलने की खबर आई थी.

*सवाल है कि देरी से प्रश्न पत्र मिलने के कारण ग्रेस मार्क्स देने का कोई कानून न होने के बावजूद आखिर किस फार्मूले के तहत NTA ने ग्रेस मार्क्स दिए? और अब कोर्ट में अपनी गलती मान ली. तो आखिर इस तरह का भ्रष्टाचार करने वाले  NTA को अपराध की सजा कौन देगा और कब तक मिल जाएगी? 

2015 में पेपर लीक के कारण CBSE से छीनकर NTA को  exam conduct  करने का अधिकार दिया गया था. अब क्या? 

सवाल तो इतने सारे हैं कि बिना यह जांच किए ही…

1.1 महीने बाद 9-10 अप्रैल को  window क्यों खोला

    गया, 

2.पटना प्रश्नपत्र लीक की FIR की जांच पूरी किए बिना,

    झज्जर और गोधरा कांड की FIR की जांच किएबिना,  

3.मार्क्स के अनुसार रैंक में हेराफेरी की जांच किये बिना, 

    फटे  OMR शीट की जांच किये बिना, OMR शीट के

    अनुसार कम  मार्क्स आने की जांच किये बिना, खाली

    OMR शीट भरे जाने की जाच किये बिना, 

4. असाधारण और अप्राकृतिक रूप से अबतक के 

     highest cut off marks  आने की जांच किये

     बिना, 

5. बारबार application window खोलने वाले,

     लगातार अपना बयान बदलने वाले और  गैरकानूनी

     तरीके से ग्रेस मार्क्स देने वाले NTA की जांच किये

     बिना

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कैसे 1567 ग्रेस मार्क्स पाए बच्चों में से  50 टॉपर सहित 1536 बच्चों के  re-exam का आदेश  दिया? 

*शिक्षा मंत्री ने NTA को क्यों क्लीन चिट दे दी बिना जांच के?भ्रष्टाचार करने वाले को ही जांच का जिम्मा कैसे दे दिया गया? चोर को ही चौकीदार बना दिया. इतनी हडबडी  किसको है और क्यों है? 

*पहले भी शिक्षा के  Don ने, नटवरलालों ने, माफियाओं ने  entrance exam में कई बार घपले किए हैं, मध्यप्रदेश के व्यापम का रहस्य नहीं खुला अब तक और आज नटवरलाल और शिक्षा माफियाओं ने, कई कोचिंग संस्थान ने  सरकारी तंत्र के साथ मिलकर एक जाल बुनकर अरबों का व्यपार खड़ा कर लिया है. 

*इस वर्ष, NEET 2024 के लिए कुल 24,06,079 अभ्यर्थी पंजीकृत हुए, जिनमें से 23,33,297 उम्मीदवार परीक्षा में उपस्थित हुए। NEET 2024 परीक्षा में कुल 1,316,268 अभ्यर्थी सफल रहे हैं। भारत में वर्तमान में 695 चिकित्सा कॉलेज हैं, जिनमें कुल 1,06,333 सीटें चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए प्राप्त हैं। इनमें से लगभग 55,648 सीटें सरकारी कॉलेजों में हैं, और 50,685 सीटें निजी MBBS कॉलेजों में हैं। 

सोचिये, 12 लाख अधिक रिजल्ट क्यों? ....प्राईवेट कालेज में एडमिशन के लिए अधिक से अधिक पैसे लेकर अभिभावकों की अंधी दौड़.

*गोधरा, गुजरात NEET घोटाले का सबसे बड़ा सेंटर है. सुप्रीम साहेब, आप सिर्फ गोधरा की जांच कर लेते, आपको देशव्यापी नेटवर्क का पता चल जाता. जी हां, व्यापम पूरे देश में व्याप्त हो गया है. 

गोधरा में खाली पेपर जमा' करवाए गए, बाद में खाली पेपर भरे गए और स्टूडेंट टॉप कर गया!!  मीडिया बता रहा है..

*क्यों कोर्ट NEET की काउंसलिंग बंद कर "कोर्ट मॉनिटरड जांच" नहीं करना चाहती थी? कोर्ट को जांच से क्या दिक़्क़त हो सकती थी?

पिछले 10 सालों में सैकड़ों  एग्जाम्स रद्द, सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में. द टाइम्स आफ इंडिया अखबार ने इन्वेस्टिगेट कर 41 एग्जाम्स में पेपर लिक की पोल खोली है. जी हाँ, पिछले 50 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाले देश में! 

अब तो संपूर्ण देश के करोड़ों छात्रों युवाओं के जीवन का प्रश्न है.

इस तथ्य के बाद भी सुप्रीम फैसले का क्या मतलब है, किसके साथ न्याय  हुआ?

अब तो उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे की तर्ज पर इस मु‌द्दे को उठाने वालों से ही माफी मांगने कहा जा रहा है।

बेशर्मी के इस दौर में एक बार फिर राफेल घोटाले की याद ताजा कर ही। 

मंगलवार, 23 जुलाई 2024

सीजी में भी निकला जियो का कबाड़ा…


 जियो का निकला कबाड़ा...

सीजी में भी कर रहे बॉय-बॉय… 

बीएसएनएल का टैरिफ़ प्लान जानिए 

पहले ही निजी टेलीकॉम कंपनियों से परेशान लोगों ने टैरिफ बढ़‌ाने के बाद जिस तरह से भारतीय दूर संचार BSNL की तरफ कूच कर रहे हैं, उससे सबसे ज्यादा नुकसान जियो को उठाना पड़ सकता है। कहा जा रहा है कि जियो द्वारा अपने टैरिफ़ प्लान में कीमत बढ़ाने अनंत अंबानी की शादी क्या रिश्ता है यह चर्चा का अलग मुद्दा है लेकिन कहा जा रहा है कि निजी कंपनियों के द्वारा कीमत बढ़ाई जाने के बाद बीएसएसएल की बल्ले-बल्ले हो गई है।

सूत्रों की माने तो पिछले एक सप्ताह में बीएसएनएल को लगभग एक करोड़ नये ग्राहक मिले है जिसमें सर्वाधिक ग्राहक बिहार यूपी और • महाराष्ट्र के है। वहीं सूत्रों का यह भी दावा है कि इस दौरान न केवल बीएसएनएल नये सिम तो बेचे ही है प्राईवेट कंपनी से पोर्ट कराकर बीएसएलएल आने वाले ग्राहकों की संख्या भी 80 लाख से अधिक हो गई है।

कहा तो यहां तक जा रहा है कि निजी कंपनियों में जियो, एयरतेल, वीआई के सामने ग्राहक बचाने की दिक़्क़त आ गई है और  इस निजी कंपनियों से छुटकारा पाने वालों में जीयो  के ग्राहरु सबसे ज्यादा है।

इधर बीएसएनएल और टाटा समूह के बीच करार होने के आलावा बीएसएनएल का वह टैरिफ प्लान है जो ग्राहकों को सस्ते दर पर सुविधा प्रदान कर रहा है।






ज्ञात हो कि निजी टेलीकॉम कंपनियों की मनमानी को लेकर पहले ही उपभोक्ताओ में नाराज़गी थी ।

छत्तीसगढ़ से मिली जानकारी के मुताबिक भले ही जियों ने यहां के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से सेटिंग कर केबल बिछाने का काम पूरा कर लिया हो लेकिन कहा जा रहा है कि नेटवर्क के प्राबलम से वे सर्वाधिक प्रभावित थे। रायपुर राजधानी से ही इस तरह की शिकायते लगातार आ रही थी। ऐसे में कीमत 20 से 25 फ़ीसदी बढ़ने से लोग और ज्यादा नाराज हो गये।

सूत्रों की माने तो केबल बिछाने के खेल को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे है और इस खेल में जिस तरह से नगर निगम और पालिका के अधिकारी शामिल थे, उसकी शिकायत भी की गई है।

इधर छत्तीसगढ़ में भी जियो को छोड़ने वाले ग्राहकों की संख्या सबसे ज्यादा है और अभी भी लतातार जियो को बॉय-बॉय करने का सिलसिला जारी है।