शनिवार, 24 अगस्त 2024

ओपीएस - एनपीएस - यूपीएस के बाद क्या ...

 ओपीएस - एनपीएस - यूपीएस के बाद क्या ...


एक बार फिर सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा कर दी गई है। लेकिन ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग पर अड़े कर्मचारियों का ग़ुस्सा इससे शांत नहीं हो रहा  है, वे  इस नये पेशन स्कीम यानी यू पी एस को अपनाने तैयार नहीं हैं।

दरअसल ओपीएस का मामला इतना बड़ा हो गया कि वह चुनाव को प्रभावित करने लगा है और जब अब हरियाणा - जम्मूकश्मीर के बाद महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसमा का चुनाव है तो मोदी सरकार ने यूपीएस स्कीम लांच कर कर्मचारियों के ग़ुस्से पर पानी डालने की कोशिश कर रही है। लेकिन लगता है कि इससे बात नहीं बनने वाली है कर्मचारी संगठनों ने अपनी ओपीएस की माँग को दोहराते हुए नये सिरे से आन्दोलन की रूपरेखा बनाने की घोषणा कर दी है।

असल में एन पी एस को लागू करने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में शुरू किया गया था, इसलिए कर्मचारियों का ग़ुस्सा बीजेपी पर फूटने लगा है। और मोदी सरकार जानती है कि यदि कर्मचारियों को नहीं मनाया गया तो जैसे जैसे आन्दोलन तेज होगा, बीजेपी का चुनाव जीतना मुश्किल होता चला जायेगा।

इस स्कीम के लागू होते ही कर्मचारियों के पास विकल्प चुनने का अवसर तो बढ़ गया है लेकिन वोट की राजनीति के चलते जिस तरह से सरकार नई-नई पेंशन स्कीम ला रही है क्या आने वाले दिनों में कोई और स्कीम लाई जायेगी।

इस नई पेंशन स्कीम के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के अंतिम वेतन के 40 से 50 प्रतिशत के बराबर पेंशन की गारंटी होगी. आसान भाषा में कहें तो, यदि आपका 50,000 रुपये महीने के अंतिम वेतन पर रिटायर होते हैं तो, आपको 20 से 25 हजार रुपये प्रति महीने पेंशन के रूप में दिया जाएगा. हालांकि कुल सेवा का समय और पेंशन कोष से आपके द्वारा किसी भी प्रकार की निकासी का समायोजन किया जाएगा. इस पेंशन गारंटी को पूरा करने के लिए पेंशन कोष में किसी भी कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार के बजट से पूरा किया जाएगा. 

दावा किया जा रहा है कि अगर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली को लागू किया जाता है तो 1 जनवरी साल 2004 से नेशनल पेंशन स्कीम में रजिस्ट्रर्ड कें 87 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों को इसका फायदा मिलेगा. वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, डीए दरों में बढ़ोतरी के साथ यह राशि बढ़ती रहती है. मंत्रालय ने कहा था कि ओपीएस वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है क्योंकि यह अंशदायी नहीं है और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहता है. 

सत्ता के नर‌पिशाचों की हवस...

 सत्ता के नर‌पिशाचों की हवस... 


दिल्ली की निर्भया से लेकर उत्तराखंड की अंकिता भंडारी,  कुछ भी तो नहीं बदला है। बल्कि कानून कड़े  करने की नौटंकी और राजनैतिक नफा-नुक़सान  वाला प्रदर्शन नया जुड़ गया है। 

ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में बलात्कारियों के साथ सत्ता का गठजोड़ एक वीभत्स चेहरा  के रूप सामने आकर छाती ठोंककर खड़ा होने लगा है। राजनैतिक दलों की बेशर्मी को उजागर करती घटनाएं क्या इस शांत प्रदेश को उद्देलित नहीं करती ।

ऐसा भी नहीं है कि रायगढ़ और कांकेर में हुए गैंगरेप पर जो मीडिया आज खामोश है, पहले भी ऐसा ही था । तब मीडिया ईट पर ईट बजा देता था और न तो  राजनैतिक दलों की और न ही उनके नेताओं की हिम्मत पड़ती कि वह किसी यौन शोषण के किसी छिछोरे  के साथ खड़ा  हो सके ।

लेकिन राज्य बनने के बाद सत्ता ने जिस तरह से मीडिया को अपने ईशारे पर नचाना शुरु किया है उसके बाद ऐसे छिछोरों के साथ न केवल नेता बल्कि समूची पार्टी खड़ी हो जाती है।

रायगढ़ के भाजपा जिलाध्यक्ष अग्रवाल की करतूत पर तो उसे हटाने की बजाय समू‌ची पार्टी का इस कदर संरक्षण में खड़ा रहा कि बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी गई।

कांकेर के बाहुचर्चित घटना के आरोपी को तो सांसद की रिकिट तक दे दी गई।

और औद्योगिक नगरी के विमला रेप कांड का कथित आरोपी सत्ता तक जा पहुंचा है तो फिर हिमशिखर गुप्ता से लेकर कितने ही नाम बरबस ही याद आ जाते हैं जो सत्ता और नेताओं के साये तले अपनी हवस के लिए नरपिशाच से कम नहीं है।

क्या एक बार फिर उन घटनाँओं को सामने लाया जाना चाहिए जिसने आदोलन की शक्ल लेकर समूचे छत्तीसगढ़ में हलचल मचा दी थी।

हमने तय किया है कि अब इतिहास के पन्नों को कुरेद कर उन नरपिशाचों की करतूत को लोगों तक लाने की जो शायद आम लोगों को यह से सोचने के लिए मजबूर कर दे कि राजनीति में हवस के नरपिशाचों के लिए कोई जगह नहीं है और राजनैतिक दल भी ऐसे लोगों से ही दूरी बना लें।

याद कीजिए 80 के दशक की नह श्वेता हत्याकांड जिसने समूचे छत्तीसगढ़ में अपने विरोध प्रदर्शन से हलचल मचा दी थी, और पुलिस की वह भूमिका जिसने आनन फानन में किसी को भी पकड़ लेने की पटकथा लिखी थी । इस घटना में शामिल डाक्टरी की पढ़ाई करने वालों को बचाने की भी चर्चा रही। क्या है यह श्वेता रेप हत्याकांड, पूरे मामले को  एक बार किए आपकी आँखों के सामने लाने की कोशिश होगी। विमला रेप कांड हो या हो या कांकेर रायगढ़ हो या छत्तीसगढ़ के किसी भी हिस्से का रेप कांड  सिलसिलेवार प्रस्तुत करने की कोशिश होगी।

किस किस पाटी के कौन कौन से नेता या फिर संभ्रात परिवारों के रईसज़ादे ? सब कुछ आपने सामने लाने की कोशिश... (शीघ्र ही)

गुरुवार, 22 अगस्त 2024

हमने मारी औरतें…

 हमने मारी औरतें....


पिछले दस दिनों से देश का प्रायः हर राज्य औरतों के बलात्कार की घटना से स्तब्ध है । लगातार हो रही अपराधों में सबसे विभत्स अपराध को लेकर बहस भी हो रही है कि इस बढ़ते अपराध लिए कौन दोषी है, इसका कारण  क्या है।जबकि ऐसे अपराधों पर सज़ा के कानून भी कड़े बना दिये गए है फिर भी अपराध पर अंकुश क्यों नहीं लग रहा है।

हर रोज 87 बलात्कार ! क्या किसी  सभ्य समाज को विचलित नहीं करते। चर्चा में कहा जा रहा है मोबाईल और बाजारवाद ही इसका प्रमुख कारण है लेकिन कलकत्ता जैसे महानगर से लेकर सुदूर बस्तर जैसे इलाके में हो रही घटनाओं की असली वजह से कौन भाग रहा है।

सबके अपने अपने विचार और सुझाव है लेकिन किसी ने राजनैतिक दलो पर ऊँगली उठाने की हिम्मत नहीं की जो इन घटनाओं के बढ़ने में सबसे बड़े दोषी के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

राजनीति का अपराधीकरण को लेकर अब कोई बहस भी नहीं कहना चाहता। तब बलात्कारियों के लिए संरक्षक बन चुके इन संगठित गिरोह पर उंगली उठाना आसान भी नहीं है।

बेटी बचाओ - बेटी पढ़‌ाओ के नारे जितने सुन्दर लगते है, नारा लगाने वालों की करतूत उतनी ही भयावह हो चली है। बेशर्मी की पराकाष्ठा तक पहुंच चुके लोग अब बलात्कार को भी राजनैतिक नफ़ा-नुक़सान के तराजू से तौलने लगे हैं।

शायद यही वजह है कि कल तक जो राजनैतिक दल बलात्कारियों को टिकिट देने से या पार्टी संगठन में बड़े पद देने से कतराती थी वे अब खुले आम बलात्कारियों के संरक्षक बने हुए है।

जैसी राजा-वैसी प्रजा कहना बेहद कठोर हो जायेगा लेकिन सन्च तो यही है कि बलात्कार के आरोपियों को टिकिट देकर, या पद देने के बाद भी लोगों की खामोशी से राजनैतिक दलों के हौसले इतने बुलंद हो गये कि इन दलों  ने बलात्कारियों का पक्ष लेना, स्वागत करना और रिहाई का इंतजाम करने जैसे फैसले बेशर्मी से करने लगे।

कांकेर में कल हुए गैंगरेप के बाद किसी ने सोशल मीडिया में अपना गुस्सा उतारते हुए लिख मारा कि जब यौन शोषण के आरोप के बाद बीजेपी  ने सांसद की टिकिट दे दी और जनता ने जीता दिया तो फिर झेलो...।

ग़ुस्सा कितना जायज है? लेकिन कठुआ के बलात्कारियों का स्वागत करने की बेशर्मी पर चुप्पी  और बिल्किस बानों के बलात्कारियों की समय पूर्व रिहाई और  स्वागत  पर लोगों की ख़ामोशी क्या विचलित नहीं करता। या देश का गौरव बढ़ाने वाली महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह को सत्ता संरक्षण पर लोगों की चुप्पी ? क्या राजनैतिक दलों के हौसले बुलंद नहीं करता ?

राजनैतिक दलों के हौसले कितने बुलंद है, 'सत्ता का हौसला किस तरह उफान मारता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो बलात्कारी और छिछोरे राम-रहीम का हर चुनाव के पहले पैरोल पर रिहा हो जाना है। अब तक इस बलात्कारी को 12 बार से अधिक पैरोल मिल चुका है।

सत्ता के इस कृत्य पर किसने विरोध जताया। तब कदम, कदम पर राज्य दर राज्य आ  रहे बलात्कारियों के चेहरे और बढ़‌ती घटनाए क्या यह तय नहीं करती कि हम सबने मिलकर औरतों  को मारा है और रोज मार रहे हैं...।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

चौधरी को छवि की चिंता...

 चौधरी को छवि की चिंता...


यह तो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अमित शाह जैसे कद्‌दावर नेता के खासमखास और प्रदेश सरकार के दमदार मंत्री ओपी चौधरी को अपनी छवि सुधारने के लिए इतनी कवायद नहीं करनी पड़ती।

कहा जा रहा है कि ३३ हजार शिक्षकों की भर्ती वाले मामले में विडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया में जिस तरह से ओपी चौधरी के ख़िलाफ़ बेरोजगारों ने मोर्चा खोला है उससे ओपी चौधरी अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गए है, हालाँकि कलेक्टरी के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप भी उन पर कम नहीं है, लेकिन अमित शाह के वरदहस्त में सुपर सीएम की कथित पदवी से उत्साहित ओपी चौधरी ने जिए ताह से सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की थी वह उतनी ही तेजी से फिसलता जा रहा है।

और शायद यही वजह है कि उन्होंने अब अपनी छवि नये सिरे से गढ़ने की कवायद करने में  लग गये  हैं। दरअसल ओपी चौधरी यह बात भूल गये हैं कि एक बार छवि बिगड़ गई तो उसे सुधारना बड़ा टेढ़ा काम है लेकिन नौकरशाही का रुतबा उन्हें हार नहीं मानने दे रहा है, ऐसे में चर्चा  इस बात की भी है कि नेशनल प्रोपेगेंडा ग्रुप भोपाल वाले ने ठेका लिया कि वे हर हप्ते अपने सबसे बड़े पोर्टल में उनकी छवि सुधारेंगे तो दर्जन भर पोर्टल को भी छवि सुधारने की जिम्मेदारी तो दे दी गई लेकिन छवि है कि...!

राजीव गांधी को क्यों याद किया जाना चाहिए...

 राजीव गांधी को क्यों याद किया जाना चाहिए...


युवा प्रधानमंत्री, मिस्टर क्लीन के रूप में चर्चित रहे इंदिरा के बेटे राजीव गांधी की असमय मृत्यु ने देश को नई आधु‌निक सोच के साथ काम करने वाले को ही नहीं खोया था, बल्कि  उस  नये भारत की उम्मीद की नींव को भी धराशाही कर दिया था, जो विश्व में युवाओं ने जो सपने पाल रखे थे।

समूचा देश २० अगस्त को जब उन्हें याद कर रहा था तब मेरे ज़ेहन में रायपुर के उस छोटे से एयरपोर्ट में उनकी आमद  की धुंधली  तस्वीर में खो गया ।

हम रिपोर्टरों का समूह एक ही जगह पर खड़े थे और राजीव हम सबके बेहद नज़दीक। फोटोग्राफरों गोकूल सोनी - विनय शर्मा की सजग आँखें राजीव की एक एक हरकत पर

कैमरे को क्लीक कर रही थी तो तमाम कांग्रेसियों की नजर टकटकी लगाए राजीव को देख रही थी। हाथ हिलाते पत्रकारों के सामने से गुजरते हुए एक आवाज ने सबका ध्यान अपनी खीच लिया 

राजीव....

यही कहा था नेता शिवेन्द्र बहादूर सिंह ने। राजीव के लिए यह संबोधन जीतना सहज़ रहा होगा मौजूद लोगों के लिए उतना ही असहज । इस घटना की चर्चा अब भी होती है। राजीव और शिवेंद्र दून स्कूल के सहपाठी थे।

लेकिन वे जितने सहज और सरल थे उतने ही संवेदनशील और बेबाक ।

गांवों की बदहाली उन्हें भीतर तक सालती रही होगी इसलिए उन्होंने जब कहा कि केंद्र सरकार एक रुपये भेजतीं है वह गाँव तक पहुंचते पहुंचते 25 पैसे रह जाते है तब विपक्ष ने राजीव के इस कथन को कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत प्रस्तुत करने लगे और आज भी गाहे-बगाहे कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार  के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 

राजनैतिक चालबाज़ी से दूर 1984 के दंगों पर उनकी टिप्पणी को  भी विपक्ष  ने कांग्रेस के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो....! लेकिन यह बात उन्होंने इंदिरा की जयंती समारोह में तब कही थी जब दंगे समाप्त हो चुके थे।

श्रीलंका में शांति  सेना भेजने की बात हो या उन पर हमला ।' कोई कैसे भूल सकता है।

इस देश को राजीव को क्यो याद कर नमन करना चाहिए यह बताने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि उनकी हत्या की खबर जब लोगों तक पहुंची तब तक शाम का अंधेरा गहरा चुका था, दोपहर की इस घटना की खबर जब प्रेस तक पहुंची तो रोजमर्रा के कामकाज ऊफान पर था।

खट् खट् करते टेली प्रिंटर से आई इस खबर को देखकर सहसा किसी को भरोसा नहीं हो रहा था । पर नियति ने अपनी इबादत लिख दिया था । तब मैं दैनिक स्वदेश में रिपोर्टर की हैसियत से काम कर रहा था।

फ़्रंट पेज प्रशांत शर्मा देखते थे। उन्होंने ही यह खबर पहले दी थी, और इसके बाद आनन फानन में बुलेटिन निकाला गया था ।

राजीन के इस असमय चले जाने को लेकर देश भर से शोक संवेदनाओ ने टेली प्रिंटर की स्पीड बड़ा दी थी और  छोड़ गई राजीव की वह यादें जिसके लिए यह देश उन्हें हमेशा याद रखेगा।

राजीव ने इस देश को क्या दिया इसका सबसे अच्छा जवाब यह है कि आज जो दूरसंचार, डिजिटल हेडिया, सोशल मीडिया जो  कुछ भी दिखाई दे रहा है, उसके पीछे का मूल विचार राजीव का ही था। उन्होंने दूरसंचार क्रांति लाई। सी डॉट  से लेकर एमटीएनएल जैसी  कंपनियां उन्ही की देन है।

90 के दशक में जब लोग बेरोजगारी से जूझ रहे थे तब लाखों लोगों को रोजगार देने वाला एसटीडी पीसीओ बूथ उनकी ही देन है। स्वरोजगार का वर्तमान मॉडल जनसेवा केंद्र की नींव भी राजीव की सोच है।भारत का युवा आईटी सेक्टर में जो झंडे गाड़ रहा है उसके पीछे एक छोटी उम्र के प्रधानमंत्री की बड़ी सोच है । राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर क्रांति लाने का काम किया राजीव विज्ञान और तकनीक की ताकत जानते थे उन्होंने सस्ते कंप्यूटर के लिए इंपोर्ट ड्यूटी कम कर दी थी . रेलवे में कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करके टिकीटिंग भी शुरू करवाई. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 1970 में देश में पब्लिक डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स की शुरुआत हो गई थी लेकिन आईबीएम के साथ देश मे कम्प्यूटर के व्यवसायिक उपयोग को गति राजीव के प्रयासों से ही मिली थी आज अगर भारत आईटी सेक्टर का सुपर पावर है तो उसकी एक वजह राजीव की सोच है।

राजीव गांधी को 21 वीं सदी के महान लोकतंत्र का सबसे बडा कैटेलिस्ट माना जाना चाहिए।  राजीव सरकार ने 1989 में संविधान के 61 वें संशोधन के जरिए वोट देने की उम्रसीमा 21 से घटाकर 18 वर्ष कर इस लोकतंत्र की जवान कर दिया, तो पंचायत राज अधिनियम लाकर ग्रामीण भारत को शहर के बराबर शक्तिशाली बनाया।

राजीव गांधी ने शिक्षा क्षेत्र में क्रांति की पहल करते हुए नवोदय विद्यालयों की शुरुआत की और गाँव के बच्चों को भी उत्कृष्ट शिक्षा मिले इसलिए गाँव -गाँव मे नवोदय विद्यालय खोलकर बच्चों को कक्षा 6 से 12 वीं तक की मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल में रहने की सुविधा दी और आज नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी पूरे देश विदेश मैं देश का झंडा ऊंचा कर रहे है

ये है इंदिरा के बेटे की सोच जिसकी वजह से उन्हें देश हमेशा याद रखेगा।

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...

 अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...


इधर देश में बलात्कारियों की करतू‌तों को लेकर हंगामा मचा हुआ है, मणिपुर जल रहा जम्मू तक में आकर आतंकवादी अपनी करतू‌तों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह को बंग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती संख्या को लेकर टेंशन है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिंदुओं की  कथित दुर्दशा और कम होती जनसंख्या का सच क्या है। क्या  यह पूरा खेल भारत में हिंदू वोटरों के ध्रुवीकरण का खेल है। 

क्या लोगों को सच से दूर रखकर एक ख़ास वर्ग के प्रति नफरत फैलाकर अपनी राजनीति साधाने का प्रयास हर चुनाव के पहले किया जाता है।

ये सच है कि 1941 की जनगणना के मुताबिक वेस्ट पाकिस्तान (वर्तमान) में 14 फीसदी हिदू थे और ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 26 फीसदी हिन्दू थे।

ऐसे में पाकिस्तान और बाग्लादेश मैं वर्तमान में हितुओं की संख्या  को लेकर बवाल मचाया जाता है कि देखिये पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिदुओं को काट डाला गया।

बहरहाल पाकिस्तान और बाग्लादेश में हिंदुओं की संख्या घटने के तीन प्रमुख कारण है जिसमें से पहला कारण तो सिम्पल स्टेस्टिक्स है तो दूसरा कन्वर्जन जबकि तीसरा कारण

माइग्रेशन है। इन तीनों कारणों से पहले के कारण भी महत्वपूर्ण है जो हिंदुओं की आबादी कम होने की वजह है।

अब 1941 की जनसंध्या के आंकड़े से आगे आ जाइये 1947 में। और 1947 के विभाजन में 50 लाख हिन्दू और सिख वेस्ट पाकिस्तान से भारत आ गये तब 1951 की जन‌ग़णना में हिन्दुओं की संख्या दो फीसदी रह गई। तब से लेकर आजतक उनकी जनसंख्या प्रतिशत में लगभग उतनी है बल्कि 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

ईस्ट पाकिस्तान से भी बंटवारे के दौरान यानी 1947 में हिंदुओं की जनसंख्या  26 से गिरकर 22 फ़ीसदी हो गई।

लेकिन 1970 में पाकिस्तानी सरकार ने तमाम बंगालियों पर अत्याचार किये । मार्शल लॉ लगाया। दो करोड़ हिंदू शरणार्थी भारत की शरण में आ पहुंचे। मुसलमान कहां जाते इसलिए वे वही रहे, वे वहीं मरते रहे, अत्याचार सहते रहे।

अब 7 करोड़ की जनसंख्या में दो करोड़ यदि भारत आ गए तो हिसाब लगा लिजिए कि बांग्लादेश में हिन्दु‌ओं की संख्या कितनी घटी। तब से आज तक ओवर ऑल हिदुओं की संख्या 9-10 फीसदी बची है जो आज भी उतनी ही हैं।

इसी 9-10 फ़ीसदी आंकड़े को पकड़‌कर गृह मंत्री अमित शाह कलह मचाये हुए हैं।

जनसंख्या  घटने का एक और कारण कन्वर्जन को लेकर जो हल्ला मचाया जाता है वह कन्वर्जन प्रासिक्यूशन वहां भी वैसा है जैसे इंडिया में।

ईज्ज़त नौकरी, न्याय  अधिकार को लेकर कन्वर्जन इंडिया में क्या कम हुए है।

जहां तक धर्म के आधार पर विभाजन की बात है तो यह बिल्कुल गलत है लेकिन अमित शाह फिर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुस्लिम लीग के साथ तालमेल बिठानेवाले सावरकर को सर आँखों पर क्यों  बिठाते हैं?

हैरानी की बात तो यह है कि सारा सच इंटरनेट पर मौजूद होने के बाद भी यदि लोग़ राष्ट्रवाद के नाम पर परोसे जा रहे झूठ  पर आखें बंद किये हुए है तो फिर गलत लोगों को राज करने से कोई कैसे रोक सकता है!

सोमवार, 19 अगस्त 2024

अंधा बाँटे रेवड़ी...

 अंधा बाँटे रेवड़ी...


यह तो अंधा बाँटे रेवड़ी... की कहावत को ही चरितार्थ करता है, वरना खेल विभाग के द्वारा  खेल अलंकरण और पुरस्कार को लेकर इतना गोल माल नहीं होता, कहा जाता है कि अपने लोगों को उपकृत करने में लगी छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार के खेल मंत्री टंकराम वर्मा की इस टंकार से खिलाड़ियों में ग़ुस्सा भर गया है और वे इसे लेकर प्रधानमंत्री तक शिकायत करने लगे है।

पीएगिरी से मंत्री तक के सफ़र में खेल मेत्री के कारनामें की चर्चा नया नहीं है, कहा जाता है कि जब वे पीएगिरी कर रहे थे तब भी अपनी लाला वाले रोल से चर्चित थे। चर्चित तो वे अपने गृह जिले में खेलों की बदहाली को लेकर भी है लेकिन इस बार चर्चा खेल अलंकाण और खेल पुरस्कार को लेकर है।

भूपेश सरकार के दौरान इसके लिए तरस रहे खिलाड़ियों व खेल संगठनों की उम्मीद पर पानी तब फिरने लगा जब पुरस्कारों की सूची जारी हुई। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अवॉर्ड के लिए खेल विभाग ने एक ऐसे खेल संघ को पात्रता दे दी, जिसे विभागीय मान्यता 7 जुलाई 2024 को दी गई। यहां बात नॉन ओलंपिक गेम किक बॉक्सिंग की हो रही है। जिस वर्ष में उपलब्धि के लिए खिलाड़ियों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं, उस वर्ष में तो किक बॉक्सिंग को विभागीय मान्यता मिली थी या नहीं, इस पर भी अब प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है। इस खेल में कोरबा की श्रेया शुक्ला और कृष्णकुमार डडसेना को वर्ष 2021- 22 एवं वर्ष 2022-23 में शहीद कौशल यादव पुरस्कार की पात्रता खेल विभाग की पुरस्कार समिति ने दी है। इसे लेकर अब खिलाड़ियों में चर्चा शुरू हो गई। इतना ही नहीं सीनियर वर्ग के शहीद राजीव पांडेय पुरस्कार के लिए ओलंपिक खेलों की सूची में वुशू को शामिल करके वेटलिफ्टिंग के पदक विजेता खिलाड़ी को दरकिनार कर दिया गया। वुशू में राजनांदगांव के डी. पार्थ को इसकी पात्रता दी गई है। वहीं सीनियर नेशनल वेटलिफ्टिंग के पदक विजेता रायपुर के विजय कुमार को इस अवॉर्ड की पात्रता से अलग कर दिया गया है। इसे लेकर वुशू के सीनियर खिलाड़ी प्रतीक सिंह ने कहा कि डी. पार्थ का सीनियर वर्ग में कोई पदक नहीं है, वह जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भाग लिया था। इधर वेटलिफ्टर विजय कुमार ने वुशू को ओलंपिक गेम कैसे माना जा रहा है।

वर्ष 2022-23 के शहीद राजीव पांडेय पुरस्कार नियम में सात खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने का प्रावधान है। लेकिन खेल विभाग द्वारा जारी सूची में केवल 6 खिलाड़ियों को ही इसकी पात्रता दी गई। इसमें ओलंपिक गेम से 4 खिलाड़ियों को शामिल किया गया, लेकिन नॉन ओलंपिक व पैरास्पोर्ट्स से 1-1 खिलाड़ी नामित किये गये।

वर्ष 2008 के बीजिंग ओलंपिक में इसे केवल प्रदर्शन के लिए रखा गया था। मेडल टेली में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। 

एक खिलाड़ी को रस्साकशी में दो पुरस्कार खेल विभाग की जारी सूची में टग ऑफ वार (रस्साकशी) की खिलाड़ी रायपुर की नेहा यादव को वर्ष 2021-22 के शहीद कौशल यादव पुरस्कार के लिए नामित किया गया है।

यही खिलाड़ी वर्ष 2021-22 के मुख्यमंत्री ट्रॉफी पुरस्कार के लिए नामित 10 खिलाड़ियों

के दल में भी शामिल है। इस प्रकार एक खिलाड़ी को एक ही वर्ष में दो अलग-अलग

पुरस्कार की पात्रता कैसे दी गई, इस पर भी आपत्ति दर्ज कराई जा रही है।

राज्य के लिए पदक विजेता राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और उन्हें इसके लिए तैयार करने वाले प्रशिक्षकों के अधिकारिक रूप से जारी कर दी।